Manas Pujan [Mental Worship] Vidhi : Guru Purnima 2020 Special

Kaise Kare Manas Pujan/ Mansik Pujan [Mental Worship] Vidhi :
  • मानस पूजा ( गुरु पूनम पर विशेष )

  • गुरु पूर्णिमा अर्थात् गुरु के पूजन का पर्व । किंतु आज सब लोग अगर गुरु को नहलाने लग जायें, तिलक करने लग जायें, हार पहनाने लग जायें…. तो यह संभव नहीं है लेकिन षोडशोपचार की पूजा से भी अधिक फल देने वाली मानसपूजा करने से तो भाई ! स्वयं गुरु भी नहीं रोक सकते । मानसपूजा का अधिकार तो सबके पास है ।
  • महिमावान श्री सद्गुरुदेव के पावन चरण कमलों का षोडशोपचार से पूजन करने से साधक-शिष्य का हृदय शीघ्र शुद्ध और उन्नत बन जाता है ।
  • मानसपूजा इस प्रकार कर सकते हैं :

  • ➠ मन-ही-मन भावना करो कि हम गुरुदेव के श्रीचरण धो रहे हैं…
  • ➠ सप्त तीर्थों के जल से उनके पादारविन्द को स्नान करा रहे हैं । खूब आदर एवं कृतज्ञतापूर्वक उनके श्रीचरणों में दृष्टि रखकर… श्रीचरणों को प्यार करते हुए उनको नहला रहे हैं… उनके तेजोमय ललाट पर शुद्ध चंदन का तिलक कर रहे हैं… अक्षत चढ़ा रहे हैं… अपने हाथों से बनायी हुई गुलाब के सुंदर फूलों की सुहावनी माला अर्पित करके अपने हाथ पवित्र कर रहे हैं…
  • ➠ हाथ जोड़कर, सिर झुका कर अपना अहंकार उनको समर्पित कर रहे हैं… पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों एवं ग्यारहवें मन की चेष्टाएँ गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित कर रहे हैं…
  • कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्याऽऽत्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
  • करोमि यद् यद् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ।।
  • ‘शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से अथवा प्रकृति के स्वभाव से जो-जो करते हैं वह सब समर्पित करते हैं। हमारे जो कुछ कर्म है,हे गुरुदेव सब आपके श्रीचरणों में समर्पित है। हमारा कपिन का भाव, हमारा भोक्तापन का भाव आपके श्रीचरणों में समर्पित है। इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु की कृपा को, ज्ञान को, आत्मशान्ति को हृदय में भरते हुए उनके अमृतवचनों पर अडिग बनते हुए अन्तर्मुख होते जाओ.., आनन्दमय बनते जाओ…
  • ॐ आनंद! ॐ आनंद ॐ आनंद
  • ➠ इस प्रकार शिष्य मन-ही-मन अपने दिव्य भावों के अनुसार अपने सद्गुरुदेव का पूजन करके गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मना सकता है | करोड़ों जन्मों के माता-पिता, मित्र-सम्बन्धी जो न दे सके, सद्गुरुदेव वह हँसते-हँसते दे डालते हैं । हे गुरु पूर्णिमा ! हे व्यासपूर्णिमा ! तू कृपा करना…
  • ➠ ‘गुरुदेव के साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये… मैं प्रार्थना करता हूँ, गुरुवर ! जब तक है जिंदगी, आपके श्रीचरणों में मेरी श्रद्धा बनी रहे |
  • ➠ वह भक्त ही क्या जो तुमसे मिलने की दुआ न करे ?
  • भूल प्रभु को जिंदा रहूँ कभी ये खुदा न करे !!
  • लगाया जो रंग भक्ति का उसे छूटने न देना ।
  • गुरु तेरी याद का दामन कभी छूटने न देना…
  • हर साँस में तुम और तुम्हारा नाम रहे प्रीति की यह डोरी कभी टूटने न देना….,
  • श्रद्धा की यह डोरी कभी टूटने न देना ।
  • बढ़ते रहें कदम सदा तेरे ही इशारे पर, गुरुदेव ! तेरी कृपा का सहारा छूटने न देना ।
  • सच्चे बनें और तरक्की करें हम, नसीबा हमारा अब रूठने न देना !!!
  • देती है धोखा और भुलाती है दुनिया, भक्ति को अब हमसे लुटने न देना ।
  • प्रेम का यह रंग हमें रहे सदा याद, दूर हों हम तुमसे यह कभी घटने न देना ?
  • बड़ी मुश्किल से भरकर रखी है करुणा तुम्हारी..
  • बड़ी मुश्किल से थाम कर रखी है श्रद्धा-भक्ति तुम्हारी…
  • कृपा का यह पत्र कभी फूटने न देना ।
  • लगाया जो रंग भक्ति का उसे छूटने न देना, प्रभु प्रीति की यह डोर कभी टूटने न देना !!
  • आज गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर हे गुरुदेव !

  • ➠ आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम… आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विश्रांति पाने के काबिल हो जायें… अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें… ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी प्रीति हो जाय… प्रभु करे कि प्रभु के नाते गुरु-शिष्य का संबंध बना रहे…
  • – ऋषि प्रसाद, अंक -१२७, २००३
  • गुरु पूर्णिमा विशेष पेज ..

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  • पादुका पूजन विशेष पेज ..

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  • मंत्र सिद्धि का अचूक उपाय – माला पूजन

  • ➠ माला पूजन एवं स्तुति-प्रार्थना के महापुण्यमय अवसर का लाभ लें। जानिए माला पूजन कैसे करें ? Click Here

मानस पूजन विशेष Audio

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Guru Paduka Pujan : Guru ke Charan Kamal Paduka

  • || श्री सदगुरु परमात्मने नमः ||

  • ➠ हाथ जोड़कर सभी प्रार्थना करेंगे –
  • गुरुब्रह्या ग़ुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: |
  • गुरुर्साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
  • ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्‌ |
  • मंत्रमूल गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥
  • अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
  • तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
  • त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव ।
  • त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥
  • ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं ।
  • द्वन्द्रातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् ॥
  • एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं ।
  • भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥
  • श्री सद्गुरुदेव के चरणकमलों का माहात्म्य –

  • सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजम्‌ ।
  • वेदान्तार्थप्रवक्तािरं तस्मात्संपूजयेद्‌ गुरुम्‌ ॥
  • गुरु सर्व श्रुतिरूप श्रेष्ठ रत्नों से सुशोभित चरणकमलवाले हैं और वेदान्त के अर्थों के प्रवक्ताक हैं | इसलिए श्री गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए।
  • देही ब्रह्म भवेद्यस्मात्‌ त्वत्कृपार्थ वदामि तत्‌ ।
  • सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरो: पादसेवनात्‌ ॥
  • जिन गुरुदेव के पादसेवन से मनुष्य सर्व पापों से विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मरूप हो जाता है वह तुम पर कृपा करने के लिए कहता हूँ ।
  • शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजस: ।
  • गुरो: पादोदकं सम्यक्‌ संसारार्णवतारकम्‌ ॥
  • श्री गुरुदेव का चरणामृत पापरूप कीचड़ का सम्यक्‌ शोषक है, ज्ञानतेज का सम्यक्‌ उद्दधीपक है और संसारसागर का सम्यक्‌ तारक है |
  • अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारकम्‌ ।
  • ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थ गुरुपादोदकं पिबेत्‌ ॥
  • अज्ञान की जड़ को उखाड़नेवाले, अनेक जन्मों के कर्मों का निवारण करनेवाले, ज्ञान और वैराग्य को सिद्ध करनेवाले श्रीगुरुदेव के चरणामृत का पान करना चाहिए |
  • काशीक्षेत्रं निवासश्च जाह्नवी चरणोदकम्‌ ।
  • गुरुविश्वेश्वर: साक्षात्‌ तारकं ब्रह्मनिश्चय: ॥
  • गुरुदेव का निवासस्थान काशी क्षेत्र है | श्री गुरुदेव का पादोदक गंगाजी है | गुरुदेव भगवान विश्वनाथ और निश्चित ही साक्षात्‌ तारक ब्रह्म हैं ।
  • गुरुसेवा गया प्रोक्ता देह: स्यादक्षयो वट:।
  • तत्पादं विष्णुपादं स्यात्‌ तत्र दत्तमनस्ततम्‌ ॥
  • गुरुदेव की सेवा ही तीर्थराज गया है | गुरुदेव का शरीर अक्षय वटवृक्ष है । गुरुदेव के श्रीचरण भगवान विष्णु के श्रीचरण हैं । वहाँ लगाया हुआ मन तदाकार हो जाता है ।
  • सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत्‌ ।
  • गुरुपादपयोबिन्दो: सहस्रांशेन तत्फलम्‌ ॥
  • सात समुद्र पर्यन्त के सर्व तीर्थों में स्नान करने से जितना फल मिलता है वह फल श्री गुरुदेव के चरणामृत के एक बिन्दु के फल का हजारवाँ हिस्सा है |
  • दृश्यविस्मृतिपर्यन्तं कुर्याद्‌ गुरुपदार्चनम्‌ ।
  • तादृशस्यैव कैवल्यं न च तद्व्यतिरेकिण: ॥
  • जब तक दृश्यप्रपंच की विस्मृति न हो जाय तब तक गुरुदेव के पावन चरणारविन्द की पूजा-अर्चना करनी चाहिए । ऐसा करनेवाले को ही कैवल्यपद की प्राप्ति होती है, इससे विपरीत करनेवाले को नहीं होती ।
  • पादुकासनशय्यादि गुरुणा यदभीष्टितम् ।
  • नमस्कुर्वीत तत्सर्वं पादाभ्यां न स्पृशेत् क्वचित् ।।
  • पादुका, आसन, बिस्तर आदि जो कुछ भी गुरुदेव के उपयोग में आते हों उन सभीको नमस्कार करना चाहिए और उनको पैर से कभी भी नहीं छूना चाहिए।
  • विजानन्ति महावाक्यं गुरोश्चरणसेवया ।
  • ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ॥
  • गुरुदेव के श्रीचरणों की सेवा करके महावाक्य के अर्थ को जो समझते हैं वे ही सच्चे संन्यासी है, अन्य तो मात्र वेशधारी है।
  • चार्वाकवैष्णवमते सुखं प्राभाकरे न हि ।
  • गुरोः पादान्तिके यद्वत्सुखं वेदान्तसम्मतम् ॥
  • गुरुदेव के श्रीचरणों में जो वेदान्तनिर्दिष्ट सुख है वह सुख न चार्वाक मत में, न वैष्णव मत में और न प्राभाकर (सांख्य) मत में है।
  • गुरुभावः परं तीर्थमन्यतीर्थ निरर्थकम् ।
  • सर्वतीर्थमयं देवि श्रीगुरोश्चरणाम्बुजम् ॥
  • गुरुभक्ति ही सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है। अन्य तीर्थ निरर्थक हैं। हे देवि! गुरुदेव के चरणकमल सर्वतीर्थमय है।
  • सर्वतीर्थावगाहस्य संप्राप्नोति फलं नरः ।
  • गुरोः पादोदकं पीत्वा शेषं शिरसि धारयन् ।।
  • श्री सद्गुरु के चरणामृत का पान करने से और उसे मस्तक पर धारण करने से मनुष्य सर्व तीथों में स्नान करने का फल प्राप्त करता है।
  • गुरुपादोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनम् ।
  • गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरोनाम्नः सदा जपः ।।
  • गुरुदेव के चरणामृत का पान करना, गुरुदेव के भोजन में से बचा हुआ खाना, गुरुदेव की मूर्ति का ध्यान करना और गुरुनाम का जप करना चाहिए।
  • यस्य प्रसादादहमेव सर्व मय्येव सर्व परिकल्पितं च ।
  • इत्थ विजानामि सदात्मरूपं तस्यांधिपा प्रणतोऽस्मि नित्यम् ।।
  • मैं ही सब हूँ, मुझमें ही सब कल्पित है’ ऐसा ज्ञान जिनकी कृपा से हुआ है ऐसे आत्मस्वरूप श्री सद्गुरुदेव के चरणकमलों में मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।
  • आकल्पजन्मकोटीनां यशवततपः क्रियाः ।
  • ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसन्तोषमात्रतः ॥
  • हेदेवि!कल्पपर्यन्त के, करोड़ोंजन्मों केयज्ञ, व्रत,तपऔर शास्त्रोक्त क्रियाएँ, ये सब गुरुदेव के संतोषमात्र से सफल हो जाते हैं।
  • ➠ ऐसे महिमायान श्रीसद्गुरुदेव के पावन चरणकमलों का षोडषोपचार से पूजन करने से साधक-शिष्य का हृदय शीघ्र शुद्ध और उन्नत बन जाता है।
  • मन ही मन भावना करो कि हम गुरुदेव के श्रीचरण धो रहे हैं…

  • ➠ सप्ततीर्थों के जल से उनके पादारविन्द को स्नान करा रहे हैं।खूब आदर एवं कृतज्ञतापूर्वक उनके श्रीचरणों में दृष्टि रखकर…श्रीचरणों को प्यार करते हुए उनको नहला रहे हैं…
  • ➠ उनके तेजोमय ललाट में शुद्ध चन्दन का तिलक कर रहे हैं…
  • ➠ अक्षत चढ़ा रहे हैं…
  • ➠ अपने हाथों से बनाई हुई गुलाब के सुन्दर फूलों की सुहावनी माला अर्पित करके अपने हाथ पवित्र कर रहे हैं…
  • ➠ हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर अपना अहंकार उनको समर्पित कर रहे हैं…पाँच कर्मेन्द्रियों की, पाँच ज्ञानेन्द्रियों की एवं ग्यारहवें मन की चेष्टाएँ गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित कर रहे हैं…
  • कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्याऽऽत्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
  • करोमि यद् यद् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ।।
  • ‘शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से अथवा प्रकृति के स्वभाव से जो-जो करते हैं वह सब समर्पित करते हैं। हमारे जो कुछ कर्म है,हे गुरुदेव सब आपके श्रीचरणों में समर्पित है। हमारा कपिन का भाव, हमारा भोक्तापन का भाव आपके श्रीचरणों में समर्पित है। इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु की कृपा को, ज्ञान को, आत्मशान्ति को हृदय में भरते हुए उनके अमृतवचनों पर अडिग बनते हुए अन्तर्मुख होते जाओ.., आनन्दमय बनते जाओ…
  • ॐ आनंद! ॐ आनंद ॐ आनंद
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  • मंत्र सिद्धि का अचूक उपाय – माला पूजन

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Mala Pujan Kaise Kare – Vidhi, Mantra, Prarthna

  • मंत्र सिद्धि का अचूक उपाय :- जपमाला पूजा

  • शास्त्रों के अनुसार जपमाला जाग्रत होती है, यानी वह जड़ नहीं, चेतन होती है। माना जाता है कि देव शक्तियों के ध्यान के साथ हाथ, अंगूठे या उंगलियों के अलग-अलग भागों से गुजरते माला के दाने आत्मा ब्रम्ह को जागृत करते हैं। इन स्थानों से ‘दैवीय उर्जा’ मन व शरीर में प्रवाहित होती है। इसलिए यह भी देवस्वरूप है, जिससे मिलनेवाली शक्ति या ऊर्जा अनेक दुखों का नाश करती है।
  • यही कारण है कि मंत्रजप के पहले जपमाला की भी विशेष मंत्र से स्तुति एवं पूजा करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है। आज पूज्य ऋषिवर सद्गुरुदेव संत श्री आशारामजी की प्रेरणा एवं कृपा से हम सबको शास्त्रीय पद्धति से विधिवत माला पूजन एवं स्तुति-प्रार्थना का महापुण्यमय अवसर प्राप्त हुआ है, उसका लाभ लें।
  • पूजन के लिए आवश्यक सामग्री

  • ➠ थाली: २ ( एक माला पूजन के लिए, दूसरी सामग्री रखने के लिए)
  • ➠ कटोरी, चम्मच: २-२ ( अपने उपयोग के लिए एवं पूजन के लिए )
  • ➠ पूजा की थाली में पीपल के १० पत्ते, गंगाजल, पंचगव्य, चंदन, कुमकुम, फूल, तुलसी पत्ते, कलावा (मौली), धूपबत्ती, कपूर, माचिस, दीपक, बत्ती (तेल में भिगोई हुई बत्ती), अक्षत।
  • पूजा कैसे करें ?

  • ➠ पूजा की थाली में पीपल का एक पत्ता बीच में और बाकी आठ को अगल-बगल इस ढंग से रखें कि ‘अष्टदल-कमल’ या ‘आकार’ बने।
  • ➠ बीच वाले पत्ते पर अपनी जपमाला, करमाला और पहननेवाली माला रखें।
  • ➠ पीपल एवं तुलसी के पत्ते रविवार के दिन नहीं तोड़ते हैं, अतः एक दिन पहले तोड़कर अवश्य रख लें।
  • माला-पूजन विधि

  • ॐ कार का गुंजन:

  • ➠ सभी लोग ७ बार ‘हरि ॐ’ का गुंजन करेंगे।
  • ॐ गं गणपतये नमः ।
  • ॐ श्री गुरुभ्यो नमः ।
  • ॐ श्री सरस्वत्यै नमः।
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः।
  • आचमन :

  • ➠ निम्न मंत्र पढ़ते हुए तीन बार आचमन करें।
  • ॐ केशवाय नमः ।
  • ॐ नारायणाय नमः ।
  • ॐ माधवाय नमः ।
  • ॐ हृषिकेशाय नमः ।
  • (यह मंत्र बोलते हुए हाथ धो लें।)
  • पवित्रीकरण :

  • ➠ आंतरिक व बाह्य शुद्धि की भावना करते हुए बाएं हाथ में जल लेकर दायें हाथ से अपने शरीर पर छांटे।
  • ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा ।
  • य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बहायाभ्यंतर शुचि:।।
  • तिलक :

  • ➠ सभी लोग तिलक कर लें।
  • ॐ गं गणपतये नमः ।
  • ॐ चंदनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
  • आपदां हरते नित्यं लक्ष्मीः तिष्ठति सर्वदा ।।
  • रक्षासूत्र (मौली) बंधन :

  • ➠ हाथ में मौली बांधें ।
  • येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
  • तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।।
  • संकल्प :

  • ➠ हाथ में अक्षत-पुष्प व जल लेकर सभी संकल्प करें-
  • ➠ ‘हे माले ! आज रविवारी सप्तमी के पावन दिवस हम तुम्हारी पूजा कर रहे हैं। इस पूजन के प्रभाव से आज से हम तुम्हारे द्वारा जो जप करेंगे, उसका फल अनेक गुना हो जाए। हम सबको साधना में सफलता मिले और ईश्वरप्राप्ति के परम लक्ष्य की ओर तीव्र गति से आगे बढ़ने में हम सफल हों। हे माले ! हमारा तन स्वस्थ रहे, मन प्रसन्न रहे, बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रसाद प्रकट हो और हमारा आत्मविकास हो। हम सब गुरुज्ञान से अपने मुक्तात्मा, महानात्मा स्वरूप को जाने।
  • ➠ हे माते ! ‘ पूज्य बापूजी कारागृह से मुक्त हों ‘ इस उद्देश्य से हम तुम्हारे द्वारा ‘ॐ ॐ ॐ बापूजी जल्दी बाहर आयें ‘ इस मंत्र का ५ माला जप करेंगे। तुम हमें हमारे इस उद्देश्य में भी शीघ्र-से-शीघ्र सफलता प्रदान करना।
  • ( यह संकल्प थोड़ा-थोड़ा करके बोलें और पीछे-पीछे सभी को बुलवाते जायें। )
  • गुरु-स्मरण :

  • ➠ हाथ जोड़कर सभी प्रार्थना करेंगे –
  • गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
  • गुरुर्साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
  • ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।
  • मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।
  • अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
  • तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
  • त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव ।
  • त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥
  • ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं ।
  • द्वन्द्रातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् ॥
  • एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं ।
  • भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥
  • गणेश जी का स्मरण :

  • वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
  • निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।
  • माला-स्नान :

  • ➠ माला को स्नान कराने के लिए उस पर जल चढ़ाएं ।
  • ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ।
  • नर्मदे सिंधु कावेरी जलेsस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः स्नानं समर्पयामि ।
  • पंचगव्य स्नान :

  • अब माला को पंचगव्य से स्नान कराएं ।
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः पंचगव्य स्नानं समर्पयामि ।
  • शुद्धोदक स्नान :

  • माला को पुनः पवित्र जल से स्नान कराएं।
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ।
  • ( पवित्र जल से धोने के बाद माला को दूसरी थाली (सामग्री की थाली) में पीपल के एक पत्ते पर रखें। )
  • गंध :

  • ➠ माला को चंदन व कुमकुम का तिलक करें।
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः गंधं समर्पयामि ।
  • पुष्प :

  • ➠ सुगंधित पुष्प चढ़ाएं।
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः पुष्पम समर्पयामि ।
  • तुलसी :

  • ➠ तुलसी के पत्ते चढ़ाएं।
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः तुलसीदलं समर्पयामि ।
  • तुलसी हेमरूपांच रत्नरूपां च मंजरिं ।
  • भवमोक्षपदा रम्यामर्पयामि हरिप्रियाम् ।।
  • अक्षत :

  • ➠ अक्षत चढ़ाएं।
  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः अक्षतान् समर्पयामि ।
  • धूप: धूप जलाकर दिखाएं।

  • ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः धूपं आघ्रापयामि ।
  • इष्ट देव की प्रतिष्ठा :

  • ➠ हाथ में पुष्प लेकर हाथ जोड़ें। माला में इष्टदेव की प्रतिष्ठा की भावना से प्रार्थना करें और पुष्प चढ़ाएं।
  • अखण्डानन्दबोधाय शिष्यसंतापहारिणे ।
  • सच्चिदानन्दरूपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
  • तापत्रयाग्नितप्तानां अशांतप्राणीनां भुवि ।
  • गुरुरेव परा गंगा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
  • प्रार्थना :

  • ➠ हाथ में पुष्प लेकर माला को प्रार्थना करें और पुष्प चढ़ाएं।
  • माले माले महामाले सर्वतत्त्व स्वरूपिणी ।
  • चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्ततस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
  • ॐ त्वं माले सर्वदेवानां सर्वसिद्धिप्रदा मता ।
  • तेन सत्येन मे सिद्धिं देहि मातर्नमोऽस्तु ते ॥
  • त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव ।
  • शिवं कुरुष्व मे भद्रे यशो वीर्यं च सर्वदा ।।
  • ➠ ‘हे माले ! हे महामाले !! आप सर्वतत्व स्वरूपा हैं। आप में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चारों पुरुषार्थ समाये हुए हैं। इसलिए आप मुझे इनकी सिद्धि प्रदान करने वाली होइये । हे माले ! आप सभी देवताओं को समस्त सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली मानी जाती हैं। अतः मुझे सत्य स्वरूप परमात्मा की प्राप्तिरूपी सिद्धि प्रदान कीजिये । हे माते ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे माले ! आप मुझे सभी देवताओं तथा परम देव परमात्मा की प्रसन्नता प्रदान करने वाली होइये, शुभ फल देनेवाली होइये। हे भद्रे ! आप सदैव मुझे सत्कीर्ति और बल दीजिये और मेरा कल्याण कीजिये।’
  • ➠ इस प्रकार माला का पूजन करने से उसमें परमात्म-चेतना का आविर्भाव हो आता है।
  • मंत्रजप :

  • ➠ इसके बाद सभी लोग ‘ॐ ॐ ॐ बापूजी जल्दी बाहर आयें।’ इस मंत्र का १ माला जप करेंगे। ( धीमे स्वर में ध्यान का संगीत बजा सकते हैं। )
  • माला-समर्पण :

  • ➠ जप के बाद माला पकड़ लें और माला गुरुदेव को पहना रहे हों… ऐसी भावना करते हुए अपने गले में धारण कर लें।
  • आरती :

  • दीपक जलाकर आरती करें।
  • ज्योत से ज्योत जगाओ…. (पूरी आरती करें।)
  • कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम् ।
  • सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।।
  • प्रार्थना :

  • साधक मांगे मांगना….
  • विश्व-कल्याण के लिए हाथ जोड़कर प्रार्थना करें।
  • सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
  • सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुखभाग्भवेत् ।।
  • दुर्जनः सज्जनो भूयात् सज्जनः शांतिमाप्नुयात् ।
  • शांतो मुच्येत बंधेभ्यो मुक्तः चान्यान विमोच्येत् ॥
  • क्षमा प्रार्थना

  • ➠ हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि इस विधि-विधान में, पूजन-पाठ में जाने-अनजाने में कोई भूल हो गयी हो तो हे परमेश्वर ! हमें क्षमा प्रदान करें।’
  • ॐ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
  • पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥
  • ॐ मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।
  • यत्पूजितं मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे ।
  • जपघोश :

  • ‘तं नमामि हरिं परम् ।’
  • तीन बार बोलें ।

माला पूजन विशेष Audio

मंत्र सिद्धि की सम्पूर्ण जानकारी… कैसे करें विधिवत माला पूजन ?

Guru Purnima 2020 Special : Prarthna (Dhyan)

guru purnima special dhyan

‘हे गुरुपूर्णिमा ! हे व्यासपूर्णिमा ! तू कृपा करना…. गुरुदेव के साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये…. मैं प्रार्थना करता हूँ गुरुवर ! आपके श्रीचरणों में मेरी श्रद्धा बनी रहे, जब तक है जिन्दगी…..’

वह भक्त ही क्या जो तुमसे मिलने की दुआ न करे ?

भूल प्रभु को जिंदा रहूँ, कभी ये खुदा न करे ।

हे गुरुवर !

लगाया जो रंग भक्ति का, उसे छूटने न देना ।

गुरु तेरी याद का दामन, कभी छूटने न देना ॥

हर साँस में तुम और तुम्हारा नाम रहे ।

प्रीति की यह डोरी, कभी टूटने न देना ॥

श्रद्धा की यह डोरी, कभी टूटने न देना ।

बढ़ते रहे कदम सदा तेरे ही इशारे पर ॥

गुरुदेव ! तेरी कृपा का सहारा छूटने न देना।

सच्चे बनें और तरक्की करें हम,

नसीबा हमारा अब रूठने न देना।

देती है धोखा और भुलाती है दुनिया,

भक्ति को अब हमसे लुटने न देना ॥

प्रेम का यह रंग हमें रहे सदा याद,

दूर होकर तुमसे यह कभी घटने न देना।

बड़ी मुश्किल से भरकर रखी है करुणा तुम्हारी….

बड़ी मुश्किल से थामकर रखी है श्रद्धा-भक्ति तुम्हारी….

कृपा का यह पात्र कभी फूटने न देना ॥

लगाया जो रंग भक्ति का उसे छूटने न देना ।

प्रभुप्रीति की यह डोर कभी छूटने न देना ॥

गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर हे गुरुदेव ! आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम…. आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विश्रांति पाने के काबिल हो जायें…. अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें…. ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी प्रीति हो जाय…. प्रभु करे कि प्रभु के नाते गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे…’

ईश कृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान…

eesh kripa bin guru nahi

ईश कृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान ॥

आज अनेक आश्रमों, समितियों एवं सेवा-प्रवृत्तियों के मार्गदर्शक व प्रेरणास्थान तथा करोड़ों शिष्यों के सद्गुरु पूजनीय संतशिरोमणि श्री आशाराम जी बापू को देखने वाले इसकी कदाचित कल्पना भी न कर पायेंगे कि बापूजी अपनी साधनाकाल में किस प्रकार सद्गुरु साँईं श्री लीलाशाह जी के श्रीचरणों में पहुँचकर उनकी अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण हुए थे। 

शिखर के जगमगाते हुए कलश के तेज को देखने वालों को शिखर की नींव के निर्माण में जो तपश्चर्या हुई है वह कहाँ दिख पाती है !!!

माता पिता के सुसंस्कार कहो या पूर्वजन्म की दैवी सम्पदा, छोटी उम्र में ही पूज्य बापू जी संसार की असत्यता को जानकर प्रभु-मिलन की तीव्र उत्कंठा के साथ केदारनाथ, वृंदावन जैसे तीर्थों में गये परंतु सच्चा मार्ग और मार्गदर्शक नहीं मिले। वन और गिरी-गुफाओं में घूमते-घूमते आखिर नैनिताल में ब्रह्मनिष्ठ संत भगवत्पाद लीलाशाह जी बापू के आश्रम में पहुँचे। 

उनके दर्शन करके ही पूज्यश्री को प्रतीति हो गयी कि ‘अब मेरी खोज पूर्ण हो गयी !’ पूज्यपाद लीलाशाह जी ने भी पूज्य श्री की तीव्र तड़प देखकर उन्हें शिष्यरूप में स्वीकार किया।

~संत मिलन के संस्मरण

 

जो गुरु की आज्ञा दृढ़ता से मानता, प्रकृति उसके अनुकूल हो जाती

jo guru ki agya manta hai

एक बार नैनीताल में गुरुदेव (स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज) के पास कुछ लोग आये। वे ‘चाइना पीक’ (हिमालय पर्वत का एक प्रसिद्ध शिखर देखना चाहते थे। गुरुदेव ने मुझसे (पूज्य बापूजी को) कहाः “ये लोग चाइना पीक देखना चाहते हैं। सुबह तुम जरा इनके साथ जाकर दिखा के आना।”

मैंने कभी चाइना पीक देखा नहीं था, परंतु गुरुजी ने कहाः “दिखा के आओ।” तो बात पूरी हो गयी।

सुबह अँधेरे-अँधेरे में मैं उन लोगों को ले गया। हम जरा दो-तीन किलोमीटर पहाड़ियों पर चले और देखा कि वहाँ मौसम खराब है। जो लोग पहले देखने गये थे वे भी लौटकर आ रहे थे। जिनको मैं दिखाने ले गया था वे बोलेः “मौसम खराब है, अब आगे नहीं जाना है।”

मैंने कहाः “भक्तो ! कैसे नहीं जाना है, बापूजी ने मुझे आज्ञा दी है कि ‘भक्तों को चाइना पीक दिखाके आओ’ तो मैं आपको उसे देखे बिना कैसे जाने दूँ?”

वे बोलेः “हमको नहीं देखना है। मौसम खराब है, ओले पड़ने की संभावना है।”

मैंने कहाः “सब ठीक हो जायेगा।” लेकिन थोड़ा चलने के बाद वे फिर हतोत्साहित हो गये और वापस जाने की बात करने लगे। ‘यदि कुहरा पड़ जाय या ओले पड़ जायें तो….’ ऐसा कहकर आनाकानी करने लगे। ऐसा अनेकों बार हुआ। मैं उनको समझाते-बुझाते आखिर गन्तव्य स्थान पर ले गया। हम वहाँ पहुँचे तो मौसम साफ हो गया और उन्होंने चाइनाप देखा। वे बड़ी खुशी से लौट और आकर गुरुजी को प्रणाम किया।

गुरुजी बोलेः “चाइना पीक देख लिया?”

वे बोलेः “साँई ! हम देखने वाले नहीं थे, मौसम खराब हो गया था परंतु आसाराम हमें उत्साहित करते-करते ले गये और वहाँ पहुँचे तो मौसम साफ हो गया।”

उन्होंने सारी बातें विस्तार से कह सुनायीं। गुरुजी बोलेः “जो गुरु की आज्ञा दृढ़ता से मानता है, प्रकृति उसके अनुकूल जो जाती है।” मुझे कितना बड़ा आशीर्वाद मिल गया ! उन्होंने तो चाइना पीक देखा लेकिन मुझे जो मिला वह मैं ही जानता हूँ। आज्ञा सम नहीं साहिब सेवा। मैंने गुरुजी की बात काटी नहीं, टाली नहीं, बहाना नहीं बनाया, हालाँकि वे तो मना ही कर रहे थे। बड़ी कठिन चढ़ाईवाला व घुमावदार रास्ता है चाइना पीक का और कब बारिश आ जाये, कब आदमी को ठंडी हवाओं का, आँधी-तूफानों का मुकाबला करना पड़े, कोई पता नहीं। किंतु कई बार मौत का मुकाबला करते आये हैं तो यह क्या होता है? कई बार तो मरके भी आये, फिर इस बार गुरु की आज्ञा का पालन करते-करते मर भी जायेंगे तो अमर हो जायेंगे, घाटा क्या पड़ता है?

~महकते फूल

 

गुरु-शिष्य का शाश्वत नाता| Guru Shishya Relationship [Rishta]

Guru Shishya Ka Rishta [Guru Shishya Tradition Relationship Story in Hindi]  : “बाबा ! आप मेरे गुरुजी हैं । जन्म-जन्म से आप मेरे हैं । और यहाँ इसी गुफा में मैंने पूर्वजन्म में अनेक वर्षों तक निवास किया था ।‘; और लाहिड़ी अश्रुपूरित नेत्रों से अपने गुरु के चरणों में लोट गये ।

योगी श्यामाचरण लाहिड़ी बंगाल के प्रसिद्ध संत हो गये । संत बनने से पहले के जीवन में वे दानापुर में सरकार के “सैनिक इंजीनियरिंग विभाग” में एकाउंटेंट के पद पर कार्य करते थे । एक दिन प्रातःकाल ऑफिस मैनेजर ने उन्हें बुलवाया और कहा : “लाहिड़ी ! हमारे प्रधान कार्यालय से अभी-अभी एक तार आया है । तुम्हारा स्थानांतरण रानीखेत (जि. अल्मोड़ा, उत्तराखंड) के लिए हो गया है।”

लाहिड़ी रानीखेत चले गये । एक दिन वहाँ पर्वत पर भ्रमण करते समय किसीने दूर से उनका नाम पुकारा । लाहिड़ी द्रोणगिरी पर्वत पर गये तो उन्हें बाबाजी के दर्शन हुए । बाबाजी ने कहा : “लाहिड़ी ! तुम आ गये, यहीं गुफा में विश्राम करो ।” लाहिड़ी आश्चर्यचकित हो गये ।
बाबाजी ने आगे कहा : “मैंने ही परोक्षरूप से तुम्हारा स्थानांतरण यहाँ कराया है ।”
लाहिड़ी को कुछ समझ में नहीं आया और वे हतबुद्धि होकर मौन बने रहे ।

लेकिन जब बाबाजी ने लाहिड़ी के कपाल पर स्नेह से मृदु आघात किया तो उन्हें पूर्वजन्म का स्मरण होने लगा, वे बोले : “बाबा ! आप मेरे गुरुजी हैं । जन्म-जन्म से आप मेरे हैं । और यहाँ इसी गुफा में मैंने पूर्वजन्म में अनेक वर्षों तक निवास किया था ।” और लाहिड़ी अश्रुपूरित नेत्रों से अपने गुरु के चरणों में लोट गये ।

बाबाजी ने कहा : “मैंने तीन दशकों से भी अधिक समय तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा की है । तुम चले गये और मृत्यु के पार जीवन की कोलाहलमय तरंगों में खो गये । यद्यपि तुम मुझे नहीं देख सकते थे किंतु मेरी दृष्टि सदा तुम पर लगी हुई थी । देवदूत जिस सूक्ष्म ज्योति-सागर में घूमते रहते हैं, मैं वहाँ भी तुम्हें देख रहा था । जब तुमने माता के गर्भ में नियतकाल पूरा कर जन्म लिया, तब भी मेरी दृष्टि तुम्हारे ऊपर थी ।

कई वर्षों से मैं इसी दिन की प्रतीक्षा में धैर्यपूर्वक तुम्हारे ऊपर दृष्टि रखता आया हूँ । अब तुम मेरे पास आ गये हो । यह तुम्हारा वही पुराना साधना-स्थान है ।”
लाहिड़ी गद्गद हो गये और बोले : “गुरुदेव ! मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं है । आज मैं अपने शाश्वत सद्गुरु को पाकर आनंद से भर गया हूँ ।”
रात्रि में बाबाजी ने योगबल से एक स्वर्ण-महल की रचना की और लाहिड़ी को उसमें बुलाया । लाहिड़ी को उस महल में ही बाबाजी ने योगदीक्षा दी और कहा : “पूर्व के जन्म में स्वर्ण-महल के सौंदर्य का आनंद लेने की तुम्हारी दृढ़ वासना थी ।”

पिछला कर्मबंधन टूट जाय इसलिए बाबाजी ने लाहिड़ी को स्वर्ण-महल व उद्यान में भ्रमण कराया और ज्ञान के उपदेश से सारे महल को स्वप्न की भाँति बताया । जैसे स्वप्न में मनुष्य सृष्टि बना लेता है और जागने पर अनायास ही बिखेर देता है, ऐसे ही जाग्रत की सृष्टि होती है ।

बाबाजी बोले : “लाहिड़ी ! तुम्हें भूख लगी है । अपनी आँखें बंद करो ।”
और ऐसा करने से लाहिड़ी ने देखा कि सारा महल अदृश्य हो गया और उनके सम्मुख खाद्य-पदार्थ उपस्थित हो गये ।
लाहिड़ी ने अपनी भूख-प्यास तो मिटायी लेकिन अब उन्हें जगत से वैराग्य हो गया और वे बाबाजी के बताये अनुसार साधना में लग गये । अंततः गुरुदेव की पूर्ण कृपा पचाकर लाहिड़ी आत्मपद में आसीन हो निहाल हो गये ।

 

गुरु पूर्णिमा का महत्व क्या है [Meaning of Guru Purnima in Hindi]

Meaning of Guru Purnima

Meaning of Guru Purnima in Hindi [What Does Guru Poornima Means] : गुरुपूनम के दिन जो शिष्य ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु के श्रीचरणों में पहुँचकर संयम-श्रद्धा-भक्ति से उनका पूजन करता है उसे वर्षभर के पर्व मनाने का फल मिलता है।

गुरुपूर्णिमा के दिन छत्रपति शिवाजी भी अपने गुरु का विधि-विधान से पूजन करते थे।

…..किन्तु आज सब लोग अगर गुरु को नहलाने लग जायें, तिलक करने लग जायें, हार पहनाने लग जायें तो यह संभव नहीं है। लेकिन षोडशोपचार की पूजा से भी अधिक फल देने वाली मानस पूजा करने से तो भाई ! स्वयं गुरु भी नही रोक सकते। मानस पूजा का अधिकार तो सबके पास है।

“गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर मन-ही-मन हम अपने गुरुदेव की पूजा करते हैं…. मन-ही-मन गुरुदेव को कलश भर-भरकर गंगाजल से स्नान कराते हैं…. मन-ही-मन उनके श्रीचरणों को पखारते हैं…. परब्रह्म परमात्मस्वरूप श्रीसद्गुरुदेव को वस्त्र पहनाते हैं…. सुगंधित चंदन का तिलक करते है…. सुगंधित गुलाब और मोगरे की माला पहनाते हैं…. मनभावन सात्विक प्रसाद का भोग लगाते हैं…. मन-ही-मन धूप-दीप से गुरु की आरती करते हैं….”

इस प्रकार हर शिष्य मन-ही-मन अपने दिव्य भावों के अनुसार अपने सद्गुरुदेव का पूजन करके गुरुपूर्णिमा का पावन पर्व मना सकता है।