प- परम चैतन्य की आभा से, जगमग हो दिल दीप ।
लौ तेल बाती वही, ज्योति स्वरूप मन मीत ।
तन सितार की तार में, गूंजे ‘सोऽहम्’ संगीत ।
मिथ्या माया जगत सब, साँची प्रभु गुरु प्रीत ।।

र – रंगोली सजी प्रेम की, परम स्नेह के रंग ।
समता सुमति भक्ति संग, छलके आनंद उमंग ।
रोम-रोम कण-कण वही, ‘साक्षी’ एक असंग ।
घट-घट में साहिब बसा, नित्य निर्लेप निसंग ।।

म – मधुर मिठाई हरिनाम की, फीका है सब संसार ।
आत्मज्ञान हरिचिंतन साचा, झूठा जग व्यवहार ।
सत्य सनातन सार है, बाकी मिथ्या आसार ।
गुरु ज्ञान आत्मभाव से, जीवन नैया हो पार ।।

दि- दीया जगा है ज्ञान का, मन मंदिर हुआ प्रकाश ।
ईश अनुराग तप त्याग से, भेद भरम भय नाश ।
अनासक्ति गुरुप्रीति से, बढ़ा उत्साह विश्वास ।
निजानंद की मस्ती में, रही न आस निरास ।।

वा – वाणी मधुर व शील धन, सुखमय जीवन आधार ।
शम संतोष संयम सरलता, मन हो निर्विकार ।
परोपकार सेवा सुभाव से, खुले मन मंदिर द्वार ।
प्रसन्नता हरिचिंतन से, होवे आनंद अपार ।।

ली- ली चित्त हरिध्यान में, रही न चिंता चाह ।
अहंता ममता मिट गयी, दोष दुर्गुण की स्याह (कालिख) ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शाहों का शाह ।
गुरु ज्ञान में प्रीति से, मिल गयी सत्य की राह ।।

– साक्षी चंदनानी, अहमदाबाद

~ऋषि प्रसाद / अक्टूबर २०१७ / अंक २९८