aao khele gyan ki holi

आओ खेलें ज्ञान की होली !
आओ खेलें ज्ञान की होली, राग-द्वेष भुलायें।
समता-स्नेह बढ़ा के दिल में, प्रेम का रंग लगायें।
नहीं उछालें कीचड़-मिट्टी, ना अपशब्द बुलायें।
रंग पलाश से होली खेलें, ना गंदे रंग लगायें।
रासायनिक रंगों का त्याग करें, प्राकृतिक रंग लगायें।
बड़े बुजुर्गों को तिलक लगायें, भक्ति आशीष पायें।
नहीं पियें हम भाँग और मदिरा, पंचामृत बनायें।
जिससे रहे मन में प्रसन्नता, ऐसा प्रसाद खाएं ।
ठाकुरजी को भोग लगा के, अतिथि को भी खिलाएं ।
आयी बसंत में प्यारी होली, आनंद-आनंद छाये।
गुरुवर की न्यारी होली, परमानंद लुटाये ।
जैसे कहते सद्गुरु प्यारे, वैसी होली मनाएं
सबका मंगल सबका भला हो, प्रेम प्रभु से बढ़ायें।
जैसे बदलें ऋतुएँ सारी, सहज बदल हम जायें।
गुरुज्ञान में गोते लगाकर, निज को सहज बनायें।
गुरु आज्ञा में शीश झुकाकर, गुरुसेवा अपनाएं।
गुरु रंग में जीवन रेखा के, आत्मज्ञान को पायें ।

साधक गुरुशरण, अहमदाबाद ।