ऐसे उत्सव में अगर असावधान रहते हैं तो स्त्री-पुरुष, देवर-भाभी, पड़ोसी-पड़ोसन, युवान-युवती छूटछाट लेकर एक-दूसरे के अंगों को स्पर्श कर लेते हैं तो जो विकार सुषुप्त हैं वे उत्तेजित हो जाते हैं और होली बाहर जलती है पर उनके हृदय में कामुकता की होली जलने लग जाती है। लाभ होने के बजाय हानि हो जाती है। ऐसे उत्सव अगर संतों, ऋषियों व शास्त्र के निर्देशानुसार मनाये जायें तो ये उत्सव जीवन में उत्साह-आनंद लाते हैं, हृदय की क्षुद्रता मिटाते हैं और देर-सवेर जीव को शिव से मिलाने का सामर्थ्य रखते हैं। ~ऋषि प्रसाद / फरवरी २०२०