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माता-पिता व गुरुजनों की महत्ता

mata pita guru ki mahatta
  • युधिष्ठिर ने पूछा : पितामह ! धर्म का रास्ता बहुत बड़ा है और उसकी अनेकों शाखाएँ हैं । इनमें से किस धर्म को आप सबसे प्रधान एवं विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोक में भी धर्म का फल पा सकूँगा ।”
  • भीष्म ने कहा :

मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा बहुमता मम ।
इह युक्तो नरो लोकान् यशश्च महदश्नुते ।।

  • राजन् ! मुझे तो माता – पिता तथा गुरुजनों की पूजा ही अधिक महत्व की वस्तु जान पड़ती है । इस लोक में इस पुण्यकार्य में संलग्न होकर मनुष्य महान यश और श्रेष्ठ लोक पाता है ।
    (महाभारत, शांति पर्व : 108.3)
  • राजन् ! माता, पिता और गुरुजन जिस काम के लिए आज्ञा दें, उसका पालन करना ही चाहिए । इन तीनों की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करें । जिस काम के लिए उनकी आज्ञा हो, ‘वह धर्म ही है’ ऐसा निश्चय रखना चाहिए ।
  • माता, पिता और गुरु – ये ही तीनों लोक हैं, ये ही तीनों आश्रम हैं, ये ही तीनों वेद हैं और ये ही तीनों अग्नियाँ है । पिता गार्हपत्य अग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरु आहवनीयाग्नि है। लौकिक अग्नियों से माता, पिता व गुरु, इन त्रिविध अग्नियों का गौरव अधिक है । इन तीनों की सेवा में यदि भूल न करोगे तो तुम तीनों लोकों को जीत लोगे । पिता की सेवा से इस लोक को, माता की सेवा से परलोक को तथा नियमपूर्वक गुरु की सेवा से ब्रह्मलोक को भी लाँघ जाओगे, इसलिए तुम इनके साथ सदैव अच्छा बर्ताव करो । ऐसा करने से तुम्हें उत्तम यश, परम कल्याण और महान फल देने वाले धर्म की प्राप्ति होगी ।
  • सब कुछ प्राप्त कर लोगे ।

सर्वेतस्यादृता लोका यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनाटृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः कियाः॥

  • जिसने इन तीनों का आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं । (महाभारत, शांति पर्व: १०८.१२)
  • जिसने इन तीनों गुरुजनों का सम्मान नहीं किया, उसके लिए न यह लोक है न परलोक । उसे न इस लोक में यश मिलता है न परलोक में सुख । मैं तो सब तरह के शुभ कर्मों का अनुष्ठान करके इन गुरुजनों को ही अर्पण कर देता था । इससे उन कर्मों का पुण्य सौ गुना और हजार गुना बढ़ गया है तथा उसी का यह फल है कि आज तीनों लोक मेरी दृष्टि के सामने हैं । दस श्रोत्रियों से बढ़कर हैं आचार्य (कुलगुरु), दस आचार्यों से बड़ा है उपाध्याय (विद्यागुरु). दस उपाध्यायों से अधिक महत्व रखता है पिता और दस पिताओं से भी अधिक गौरव है माता का । माता का गौरव तो सारी पृथ्वी से भी बढ़कर है । उसके समान गौरव किसी का नहीं है । मगर मेरा विश्वास ऐसा है कि आत्मतत्व का उपदेश देने वाले गुरु का दर्जा माता – पिता से भी बढ़कर है । माता – पिता तो केवल इस शरीर को जन्म देते । आत्मतत्व का उपदेश देने वाले आचार्य द्वारा जो जन्म होता है, यह दिव्य है, अजर-अमर है ।
  • माता – पिता यदि कोई अपराध करें तो भी उन पर हाथ नहीं उठाना चाहिए ।

वाचावृणोत्यवितबेन कर्मणा ऋतं ब्रुवन्ननृतं सम्प्रयच्छन् ।
संवैमन्येत पितरं मातर च तस्मै न द्रुहोत् कृतमस्य जानन् ।।

  • “जो सत्यकर्म (के द्वारा और यथार्थ उपदेश) के द्वारा पुत्र या शिष्य को कवच की भाँति ढक लेता है, सत्यस्वरूप वेद का उपदेश देता है और असत्य की रोकथाम करता है, उस गुरु को ही पिता और माता माने और उसके उपकार को जानकर कभी उससे द्रोह न करें ।’
    (महाभारत, शांति पर्व : 108.22)
  • जो लोग विद्या पढ़कर गुरु का आदर नहीं करते, निकट रहते हुए भी मन, वाणी अथवा क्रिया द्वारा गुरु की सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भस्थ बालक की हत्या से भी बड़ा पाप लगता है । संसार में उससे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं जैसे गुरुओं का कर्तव्य है शिष्यों को आत्मोन्नति पथ पर पहुँचाना, उसी तरह शिष्यों का धर्म है गुरुओं का पूजन करना ।
  • मनुष्य जिस धर्म से पिता को प्रसन्न करता है, उसी के द्वारा प्रजापति ब्रह्माजी भी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बात से वह माता को प्रसन्न कर लेता है उसी के द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी की पूजा हो जाती है । परंतु जिस व्यवहार से शिष्य अपने गुरु को प्रसन्न कर लेता है, उसके द्वारा परब्रह्म परमात्मा की पूजा सम्पन्न होती है, इसलिए गुरु माता – पिता से भी अधिक पूजनीय हैं । गुरुओं के पूजित होने पर पितरों सहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं, इसलिए गुरु परम पूजनीय हैं ।
  • जो लोग मन, वाणी और क्रिया द्वारा गुरु, पिता व माता से द्रोह करते हैं, उन्हें गर्भहत्या का पाप लगता है, जगत में उनसे बढ़कर और कोई पापी नहीं है । मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्री – हत्यारा और गुरुघाती – इन चारों के पाप का प्रायश्चित हमारे सुनने में नहीं आया है ।
  • अतः माता, पिता और गुरु की सेवा ही मनुष्य के लिए परम कल्याणकारी मार्ग है । इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है । सम्पूर्ण धर्मों का अनुसरण करके यहाँ सबका सार बताया गया है ।
    (‘महाभारत’ के शांति पर्व से)
  • क्या अपना कल्याण चाहने वाले आज के युवक – युवतियाँ भीष्मजी के ये शास्त्र – सम्मत वचन बार-बार विचार कर अपना कल्याण नहीं करेंगे ? ‘गर्भ-हत्यारों की कतार में आना है या श्रेष्ठ पुरुष बनना है ?’- ऐसा अपने – आपसे पूछा करो । अभी भी समय है, चेत जाओ ! समय है भैया !… सावधान !!..
    • अपने से उम्र में, ज्ञान में बड़े व्यक्ति को ‘आप’ कहकर संबोधित करें ।
    • सुनें अधिक, बोलें बहुत कम । बोलें तो सत्य हितकारी, प्रिय और मधुर वचन बोलें ।
    • ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ उन्नत जीवन का एक साधन है ।
    • किसी की निंदा न करें न सुनें, किसी की हँसी न उड़ायें ।
    • स्वच्छता  -प्रेमी स्वावलम्बी बनें ।
    – ऋषि प्रसाद, अगस्त 2006
अमृतबिंदु : अरे ! तुम आत्मा हो । निष्फिक्र, निश्चिन्त एवं निर्भय होकर जियो । जो हो गया उसे सपना समझो । जो हो रहा है वह भी सपना है । जो होगा वह भी एक दिन सपना हो जायेगा । 
– पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
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