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Navratri 2024 Fast Importance & Benefits| Navratri Vrat Katha

Benefits of Navratri Fast/ Vrat/ Upvas [The importance of fasting during Navratri]

नवरात्र-व्रत पापनाशक है । इसमें उपवास करके देवी भगवती की पूजा,जप व होम करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है। धर्म,अर्थ, काम व मोक्ष – इन चारों की अभिलाषा करने वाले को यह उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिए । -परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

Navratri Vrat Katha [Importance of Navratri Vrat]

प्राचीन समय की बात है- एक वैश्य निर्धनता के कारण बहुत दुःखी था। बड़ी कठिनाई से वह कुटुम्ब का भरण-पोषण करता था। इस कारण उसके मन में अपार चिंता रहती पर वह धर्म में सदैव तत्पर रहता था। वह कभी भी असत्य भाषण नहीं करने वाला व बड़ा ही सदाचारी था । वह सदैव धैर्य से कार्य करता व मन में अहंकार, डाह तथा क्रोध नहीं आने देता था । इन्हीं उत्तम गुणों के कारण उसका नाम सुशील रख दिया गया था।

एक दिन दरिद्रता से अत्याधिक घबराकर उसने एक शांत स्वभाव मुनि से पूछा :”ब्राह्मण देवता ! आपकी बुद्धि बड़ी विलक्षण है । कृपा करके आप यह बताइये कि मेरी दरिद्रता कैसे दूर हो सकती है? मेरी छोटी बच्ची और बच्चे भोजन के लिए रोते रहते हैं। मेरी एक लड़की विवाह के योग्य हो गयी है । मेरे पास धन नहीं है, मैं क्या करूँ ? कोई भी ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं अपने आश्रित-जनों का भरण-पोषण सुचारु रूप से कर सकूँ । बस, मुझे इतना ही धन चाहिए । दयानिधे ! आपकी कृपा से मेरा परिवार सुखी हो जाए ।”

मुनि ने कहा :”वैश्यवर ! तुम श्रेष्ठ नवरात्र-व्रत करो । भगवान श्रीराम राज्य से च्युत हो गये थे व उन्हें सीताजी का वियोग हो गया था । उस समय किष्किन्धा में उन्होंने यह व्रत कर भगवती जगदम्बा की उपासना की । फिर महाबली रावण का वध किया तथा जनकनन्दिनी सीताजी व निष्कंटक राज्य को पाया । यह सब नवरात्र- व्रत के प्रभाव से ही हुआ था।”

मुनि की बात सुनकर सुशील ब्राम्हण ने उन्हें अपना गुरु बना लिया और उनसे भगवती के मंत्र की दीक्षा ले ली । फिर नवरात्र-व्रत करके संयमपूर्वक उत्तम भक्ति के साथ उसने जप का आरंभ कर दिया । आदरपूर्वक माँ भवानी की आराधना की ।

नौ वर्षों के प्रत्येक नवरात्र में देवी का पूजन करके उसने मंत्र का जप किया । नौवें वर्ष के नवरात्र में अष्टमी के दिन आधी रात के समय भगवती ने प्रकट होकर उस वैश्य को दर्शन दिये तथा विविध प्रकार के वर देकर कृतकृत्य कर दिया ।

किसी कठिन परिस्थिति में पड़ने पर व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिए । विश्वामित्र,भृगु ऋषि, वसिष्ठजी और कश्यप ऋषि ने भी इस व्रत का अनुष्ठान किया था । वृत्रासुर का वध करने के लिए इन्द्र तथा त्रिपुर-वध के लिए भगवान शंकर भी इस उत्कृष्ट व्रत का अनुष्ठान कर चुके हैं । मधु दैत्य को मारने के लिए भगवान श्रीहरि ने सुमेरु गिरि पर यह व्रत किया था ।

~ लोक कल्याण सेतु/सित.-अक्टू. २००५

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