पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से
पुराणों में एक कथा आती है कि उपमन्यु माँ से दूध माँगता है और माँ बीजों को पीसकर पानी में घोल के उसे दे देती है कि ‘‘बेटा ! ले दूध ।” अब वह ननिहाल में गाय का दूध पीकर आया था । बोला : ‘‘माँ ! यह असली दूध नहीं है ।” ‘‘बेटा ! हमारे पास दूध कहाँ ? अगर दूध पीना है और खीर खानी है तो सृष्टि के जो मूल कारण हैं भगवान शिव, उनकी तू आराधना कर । वे तेरी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करेंगे ।” ‘‘शिवजी की पूजा कैसे करें ?”
‘‘बेटा ! मन को लगाना है, ‘नमः शिवाय ।’ मंत्र जपना है ।”

उपमन्यु हिमालय में जाकर उपासना करने लगा । जिनकी उपासना कर रहा था उनके समीप उसका चित्त पहुँचा । शिवजी ने उसकी परीक्षा हेतु नंदी को ऐरावत के रूप में बदल दिया और स्वयं इन्द्र का रूप धारण कर प्रकट हुए । उपमन्यु ने आवभगत की । इन्द्ररूपधारी शिवजी ने कहा : ‘‘जो तुझे माँगना है माँग ले, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ ।”
‘‘मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए । मेरे इष्ट तो शिवजी हैं, मुझे तो उनके ही दर्शन करने हैं ।” शिवजी के चित्त में हुआ कि इसकी थोडी और परीक्षा लें । अपने मुँह से भगवान स्वयं अपनी निंदा करने लगे । उपमन्यु कहता है : ‘‘वरदान हम नहीं लेते, हम तो शिवजी की भक्ति में ही रहेंगे ।” उपमन्यु ने अघोरास्त्र से अभिमंत्रित भस्म इन्द्र पर फेंका । नंदी ने अस्त्र को पकड लिया । भगवान शिव भीतर से प्रसन्न हुए । फिर उपमन्यु ने स्वयं को भस्म करने के लिए अग्नि की धारणा की परंतु शिवजी ने उसे शांत कर दिया । शिवजी अपने असली रूप में प्रकट हुए । उपमन्यु ने क्षमा-याचना की लेकिन भगवान कहते हैं : ‘‘मैं तो तेरी परीक्षा ले रहा था । पुत्र ! मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ ।”
शिवजी ने उपमन्यु का हाथ पकड के माँ पार्वती के हाथ में दिया ।

पार्वतीजी ने उपमन्यु के सिर पर अपना कृपापूर्ण वरदहस्त रखा : ‘‘बेटा ! तुझे खीर खानी थी, दूध चाहिए था । अब तुझे जो भी चाहिए होगा, तेरे लिए कुछ असम्भव नहीं है ।”

सीख : इस कथा से यह समझना है कि जिसके जीवन में संयम, व्रत, एकाग्रता और इष्ट के प्रति दृढ निष्ठा है, उसके जीवन में असम्भव कुछ नहीं है । जिसके जीवन में दृढता नहीं है, वह चाहे अभी कितना भी ऊँचा दिख रहा हो लेकिन वह सरक जायेगा । अपने सिद्धांत की दृढता होनी चाहिए ।