एक बार माघ मेले के अवसर पर मदन मोहन मालवीय जी ‘सनातन धर्म महासभा’ मिलन में भाषण दे रहे थे। विरोधी दल के कुछ लोग वहाँ आये और सम्मेलन भंग करने के उद्देश्य से शोरगुल मचाने लगे ।

▪तब उनके एक प्रवक्ता को मालवीय जी ने भाषण के लिए आमंत्रित किया। उस प्रवक्ता ने मालवीय जी पर दलबंदी करने का आरोप लगाया।

▪उसके उत्तर में मालवीय जी ने कहा : “मैंने अपने समस्त जीवन में दल तो केवल एक ही जाना है । वह दल ही मेरा जीवन-प्राण है और जीवन रहते उस दल को मैं कभी छोड़ भी नहीं सकता। उस दल के अतिरिक्त किसी दूसरे दल से मुझे कोई मतलब नहीं।

▪यह कहकर उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा-सा दिल निकाला और उसे जनता को दिखलाते हुए कहा: “और वह दल है यह तुलसी-दल!” हर्षध्वनि और ‘मालवीयजी की जय!’ के नारों से सारा पंडाल गूँज उठा तथा प्रतिपक्षी अपना-सा मुँह लेकर वापस लौट गये ।

इतने उदार-सत्यनिष्ठ सज्जन को भी प्रतिपक्षी-द्वेषी लोगों ने बदनाम करने में कमी नहीं रखी। इस लौह पुरुष से द्वेष करनेवाले तो पचते रहे परंतु वे सत्संग और स्नेह रस से सराबोर रहे।

~ऋषि प्रसाद / अगस्त २००६