स्यमंतक मणि की कथा

गणेश चतुर्थी को ‘कलंकी चौथ’ भी कहते हैं। इस चतुर्थी का चाँद देखना वर्जित है।
यदि भूल से भी चौथ का चंद्रमा दिख जाय तो ‘श्रीमद् भागवत्’ के 10वें स्कन्ध के 56-57वें अध्याय में दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी’ की कथा का आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिए।

स्यमंतक मणि की कथा

सत्राजित् भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था। उसकी भक्ति से खुश होकर सूर्यदेव उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान ने प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे स्यमन्तकमणि दी थी ।

सत्राजित् उस मणि को गले में धारण ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। वह मणि प्रतिदिन आठ भार (बीस तोले) सोना दिया करती थी। और जहाँ पर ये रहती थी वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीड़ा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक रोग तथा मायावियों का उपद्रव आदि कोई भी अशुभ घटना नहीं होती थी ।

एक बार सत्राजित ने इस मणि को अपने गले में डाला और द्वारका में आया। अत्यन्त तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान न सके । इस मणि का बहुत तेज प्रकाश था सभी ने सोचा की सूर्य देव आ गए हैं। उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हें इस बात की सूचना दी। उस समय भगवान श्रीकृष्ण चौसर खेल रहे थे । लोगों ने कहा : “द्वारिकाधीश जी, साक्षात सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं ।”

भगवान कृष्ण यह सुनकर हंसने लगे और कहते हैं- ‘अरे, ये सूर्यदेव नहीं हैं। यह तो सत्राजित् है, जो मणि के कारण इतना चमक रहा है । इसके बाद सत्राजित् अपने समृद्ध घर में चला आया।

एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा—‘सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो। क्योंकि ऐसी मणि तो जगत के कल्याण में बहुत लाभदायक सिद्ध होगी।’

सत्राजित ने सोचा कि इस मणि को लेने की इच्छा तो खुद श्री कृष्ण की है और नाम उग्रसेन जी का ले रहे हैं।

एक बार सत्राजित के भाई प्रसेन ने उस मणि को अपने गले में पहना और घोड़े पर बैठकर जंगल में शिकार करने के लिए चला गया। वहां पर एक शेर ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया। वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि ऋक्षराज जाम्बवान् ने उसे मार डाला । उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर अपनी बेटी जाम्बवती को खेलने के लिये दे दी।

इधर जब प्रसेन घर नही लौटा तो उसके भाई सत्राजित् ने उसकी खोज करवाई। पता चला की प्रसेन की घोड़े सहित मौत हो गई है। ये कहने लगा – ‘बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो; क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।’ सत्राजित् की यह बात सुनकर लोग आपस में काना-फूसी करने लगे ।

कृष्ण पर झूठा कलंक लगना…..

भगवान श्री कृष्ण को जब इस बात का पता चला तो बोले हमने भादो सुदी चौथ का चन्द्रमा देखा तो हमपर झूठा कलंक लग गया। ऐसा कहते हैं कि एक बार, इस दिन भगवान श्री कृष्ण को गाय दुहते समय गाय के मूत्र में चांद दिख गया था। परिणामस्वरूप उन पर समयंतक मणि की चोरी का झूठा कलंक लगा।

भगवान ने सोचा की जब मुझ पर ये झूठा कलंक लग ही गया है तो इस कलंक को धो डालते हैं।

अब भगवान श्रीकृष्ण नगर के कुछ सभ्य पुरुषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूँढने के लिये वन में गये । वहां लोगों को और कृष्ण जी को पता चला की एक सिंह(शेर) ने प्रसेन और उसके घोड़े को मारा है। जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते हुए आगे बढे, तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर एक रीछ ने सिंह को भी मार डाला है ।

भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों को बाहर ही बिठा दिया और खुद अँधेरी ऋक्षराज की गुफा में प्रवेश किया। भगवान ने वहाँ जाकर देखा की इस मणि को खिलौना बनाकर खेल जा रहा है। तब भगवान ने जाम्बवती से वह मणि लेनी चाही। उसी समय जांबवती ने चिल्लाना शुरू कर दिया। उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली ऋक्षराज जाम्बवान् क्रोधित होकर वहाँ दौड़ आये । बड़े क्रोधित थे उन्हें पता नही चला की श्री कृष्ण भगवान हैं और उनके साथ युद्ध करना शुरू कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवान् आपस में घमासान युद्ध करने लगे। पहले तो उन्होंने में अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार किया, फिर शिलाओं का, तत्पश्चात् वे वृक्ष उखाड़कर एक-दूसरे पर फेंकने लगे। अन्त में उनमें बाहुयुद्ध होने लगा ।

व्रज-प्रहार के समान कठोर घूँसों से आपस में वे अट्ठाईस दिन तक बिना विश्राम किये रात-दिन लड़ते रहे । अन्त में भगवान श्रीकृष्ण के घूँसों की चोट से जाम्बान् के शरीर की एक-एक गाँठ टूट-फूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीने से लथपथ हो गया। भगवान ने जामवंत को इतना मारा की मार-मार के इसकी नस-नस ढीली कर दी।

अब इसने चकित होकर कहा- ‘प्रभो! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक, पुराणपुरुष भगवान विष्णु हैं। आप ही मेरे राम हैं। मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रों में तनिक-सा क्रोध का भाव लेकर तिरछी दृष्टि से समुद्र की ओर देखा था। उस समय समुद्र के अन्दर रहने वाले बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्र ने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उस पर सेतु बाँधकर सुन्दर यश की स्थापना की तथा लंका का विध्वंस किया। आपके बाणों से कट-कटकर राक्षसों के सिर पृथ्वी पर लोट रहे थे (अवश्य ही आप मेरे वे ही ‘रामजी’ श्रीकृष्ण के रूप में आये हैं)’ ।

जब ऋक्षराज जाम्बवान् ने भगवान को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ने अपने करकमल(हाथों) को उनके शरीर पर फेर दिया और फिर जाम्बवान् जी से कहा— ‘ऋक्षराज! हम मणि के लिये ही तुम्हारी इस गुफा में आये हैं। इस मणि के द्वारा मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूँ’ ।

कृष्ण और जाम्बवती का विवाह

फिर जांबवान जी कहते है- प्रभु, सारी बात ठीक है पर एक बात बताइये, आप मणि तो बिना युद्ध किये भी ले सकते थे। आप मुझे पहले ही बता देते की आप ही श्री राम हैं।

ये बात सुनकर कृष्ण जी मुस्कराये और कहा- जामवंत, तुम्हे याद होगा की जब मेरा(राम) और रावण का युद्ध हो रहा था। कितना भयंकर युद्ध था। जिसका वर्णन नही किया जा सकता। लेकिन तुम उस समय सोच रहे थे की ये भी कोई युद्ध है। अगर राम की जगह मैं होता तो रावण को बताता।

बस तुम्हारी इसी बात को पूर्ण करने के लिए आज मैंने तुमसे युद्ध किया।

जब जामवंत जी ने ये सुना तो उसकी आँखों से आंसू आ गए। और कहते हैं प्रभु, आप तो अंतर्यामी हो। मुझ पर एक कृपा करो मेरी एक बेटी है जाम्बवती। तुम इसके साथ विवाह करलो। ऐसा कहकर जाम्बवान् ने बड़े आनन्द से अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया ।

भगवान श्रीकृष्ण जिन लोगों को गुफा के बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिन तक उनकी प्रतीक्षा की। परन्तु जब उन्होंने देखा कि अब तक वे गुफा से नहीं निकले, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर द्वारका को लौट आये । वहाँ जब माता देवकी, रुक्मिणी, वसुदेवजी तथा अन्य सम्बन्धियों और कुटुम्बियों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफा में से नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ । सभी द्वारकावासी अत्यन्त दुःखित होकर सत्राजित् को भला-बुरा कहने लगे और भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिये महामाया दुर्गादेवी की शरण में गये, उनकी उपासना करने लगे।

उनकी उपासना से दुर्गादेवी प्रसन्न हुईं और उन्होंने आशीर्वाद किया। उसी समय उनके बीच में मणि और नववधु जाम्बवती के साथ श्रीकृष्ण सबको प्रसन्न करते हुए प्रकट हो गये । सभी द्वारकावासी भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी के साथ और गले में मणि देखकर बहुत खुश हुए, मानो कोई मरकर लौट आया हो ।

फिर भगवान ने सत्राजित् को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित् को सौंप दी । सत्राजित् बहुत लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, लेकिन उसका मुँह नीचे की ओर लटक गया। अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चाताप हो रहा था।

किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा । उसके मन में आँखों के सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। अब वह यही सोचता रहता कि ‘मैं अपने अपराध का मार्जन कैसे करूँ ? मुझ पर भगवान श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्न हों ?? मैंने भगवान पर शक करके ठीक नहीं किया।

क्यों ना अब मैं अपनी कन्या सत्यभामा और वह स्यमन्तकमणि दोनों ही श्रीकृष्ण को दे दूँ। यह उपाय बहुत अच्छा है। ऐसा मन में विचार करके सत्राजित् ने अपनी कन्या तथा स्यमन्तकमणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्ण को अर्पण कर दीं । सत्यभामा शील-स्वभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सद्गुणों से सम्पन्न थीं। बहुत से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिलें और उन लोगों ने उन्हें माँगा भी था। परन्तु अब भगवान श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया ।

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्राजित् से कहा—‘हमको स्यमन्तकमणि नहीं चाहिए क्योंकि इसके कारण बहुत बवाल हुआ है। आप सूर्यभगवान के भक्त हैं, इसीलिये वह आपके ही पास रहे। आप केवल इतना कर दीजिये की इस मणि से जो सोना निकलता है आप मुझे वो दे दीजिये। सत्राजित को ये बात अच्छी लगी। इस प्रकार भगवन की ससुराल से बीस तोले सोना प्रतिदिन आता है। जिसे भगवान राज-काज और धर्म के काम में लगते थे।

यदि अनिच्छा से चन्द्रदर्शन हो जाय तो निम्नलिखित मंत्र से पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए।

मंत्र इस प्रकार हैः
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।
‘सुन्दर, सलोने कुमार ! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा अधिकार है।’ (ब्रह्मवैवर्त पुराणः अध्याय 78)

चौथ के चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है। इस मंत्र-प्रयोग अथवा उपर्युक्त पाठ से उसका प्रभाव कम हो जाता है।