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कैसा था अर्जुन का सुमिरन ? – Short Stories From Mahabharata Arjuna Krishna

महाभारत (Mahabharata) में एक कथा आती है। रुक्मिणी ने किसी पर्व पर उत्सव किया। उत्सव में परिवार के एवं अन्य स्नेही, सम्बन्धी, मित्रादि लोगों की उपस्थिति आवश्यक होती है। श्रीकृष्ण (Shri Krishna) ने देखा कि मेरा प्यारा दोस्त अर्जुन ( Arjuna) नहीं आया है तो उसे बुलाने गये। उसके कक्ष में गये तो अर्जुन सो रहा है। श्रीकृष्ण धीरे-धीरे उसके पास गये। मित्रभाव है, विनोद से अठखेलियाँ करके जगाना चाहा। जब बिल्कुल नजदीक गये तो अर्जुन के हर श्वास के साथ ‘कृष्ण…. कृष्ण….कृष्ण’ की ध्वनि सुनाई देने लगी।

रूक्मिणी ने देखा कि भगवान अर्जुन को बुलाने गये हैं,अर्जुन तो नहीं आया, भगवान भी वापस नहीं आये। उत्सव में आये हुए नारदजी के भेजा उन्हें बुलाने के लिए। नारदजी ने जाकर देखा तो अर्जुन सोया हुआ है और भगवान उसके पास बैठकर ध्यान से कुछ सुन रहे हैं। नारदजी को देखकर श्रीकृष्ण ने इशारे से कहा कि आवाज किये बिना यह अजपा जाप की ध्वनि सुनो।

‘वाह ! क्या चिन्तन है। श्वास-श्वास में श्रीकृष्ण की ध्वनि…!’ नारदजी चकित रह गये।

‘इसका मन शरीर के साथ जुड़ा है। शरीर सो गया है और मन खो गया है लेकिन इसका चिन्तन नहीं खोया है। नींद में भी चिन्तन चालू है। अर्जुन मेरा प्यारा है।’ – श्री कृष्ण बोले

‘जो आपका प्यारा है वह सारे विश्व का प्यारा है। उसके श्वास में चलती ‘कृष्ण… कृष्ण’ की ध्वनि के साथ मैं वीणा से ताल देता हूँ।’ नारद धीरे-धीरे वीणा के तार को झंकृत करने लगे और मस्त होने लगे। वे भूल ही गये कि मैं इन दोनों को बुलाने आया हूँ।

अर्जुन नींद में भी अपने आन्तरिक चिन्तन में मस्त है और श्रीकृष्ण उस आन्तरिक चिन्तन के चिन्तन में मग्न हैं। दोनों की मस्ती देखकर नारद भी वीणा का ताल देते हुए मग्न हो रहे हैं।

इधर रूक्मिणी ने सत्यभामा को भेजा कि देखो तो सही, अर्जुन को बुलाने भगवान गये और उनको बुलाने नारदजी गये ! कोई वापस नहीं आये ! तलाश करो क्या कर रहे हैं?

सत्यभामा ने जाकर वह मधुर दृश्य देखा तो वह मधुर स्वर से गाने लग गयीं । उसको गाते देखकर श्रीकृष्ण मस्त होकर नाचने लगे।

– यह है सततयुक्त व्यक्ति के स्पंदनों का प्रभाव। जो केवल प्राणों से सततयुक्त होता है उसका इतना प्रभाव है तो जो स्वरूप से सततयुक्त हो गया है उसका कितना प्रभाव हो सकता है?

श्रीकृष्ण कहते हैं-

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

~ “अलख की ओर” साहित्य से..

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