“भारत को समर्थ राष्ट्र बनाना हो तो नयी पीढ़ी को बचपन से ही भगवन्नाम-जप, ध्यान, मौन, प्राणायाम आदि का अभ्यास कराओ। इससे उनकी बुद्धि एकाग्र होती है और भीतरी सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत होने लगती हैं। तुम विश्वासपूर्वक इस राह पर कदम बढ़ाओ, मैं सफलता की जिम्मेदारी लेता हूँ।”
-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत की नींव है। इस काल में जिस प्रकार के संस्कार बच्चों में पड़ जाते हैं, उसी प्रकार से उनका जीवन विकसित होता है। इसलिए यह आवश्यक कि हम बच्चों को भारतीय संस्कृति और योग पर आधारित ऐसी शिक्षा दें जिससे उनका सर्वांगीण विकास हो सके।

आज का विद्यार्थी कल का नागरिक है। प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में रहकर संयम, सदाचार, पुरुषार्थ, निर्भयता आदि के संस्कारों एवं सदगुणों को ग्रहण कर देश व समाज के लिए एक आदर्श नागरिक बनता था। इतिहास में हमें इसी प्रकार के संस्कारों से युक्त अनेक बालक-बालिकाओं के उदाहरण देखने को मिलते हैं।

छोटे से शिवा को गुरु समर्थ रामदास व माँ जीजाबाई ने देशप्रेम का ऐसा पाठ पढ़ाया कि शिवा में से छत्रपति शिवाजी महाराज का उदय हो गया। चन्द्रगुप्त मौर्य अपने गुरु चाणक्य के मार्गदर्शन में सर्वप्रथम भारत को अखंड राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ करने में समर्थ हुआ।