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Atma Gyan/ Sakshatkar Kaise Kare [Self Realization] : A Story

साक्षात्कार करने की सफलता का राज… जानिए साधु से मिली युक्ति !!

▪ एक व्यक्ति ने किसी आध्यात्मिक ग्रंथ में पढ़ा कि मनुष्य-जीवन ईश्वर-साक्षात्कार करने के लिए ही होता है। अगर वह नहीं किया तो जीवन निष्फल हो जाता है। उसने अपनी तरफ से बहुत प्रयास किया, तरह-तरह की साधना की, तीर्थों में भटका परंतु कुछ रास्ता न मिला। भगवान के लिए कोई सच्चाई से चलता है तो वे उसे अपने प्यारे संतों की संगति देते हैं।

▪ एक बार मार्ग में उसने देखा कि किन्हीं महात्मा का सत्संग हो रहा है। उसने सोचा, ‘हो सकता है यहाँ कोई उपाय मिल जाए ।’

जब द्रवै दीनदयालु राघव, साधु संगति पाइये।
(विनयपत्रिका : १३६.१०)

▪ महात्मा का सत्संग सुनने के बाद तो उसके हृदय में ईश्वर का साक्षात्कार करने की धुन सवार हो गयी। उसने सोचा,’अब तो मुझे इन्हीं की शरण में रहना है।’ सत्संग पूरा होने के बाद सब चले गये पर वह देर रात तक वहीं बैठा रहा ।

▪ महात्मा जी ने उसे अपने पास बुलाया और पूछा :”बेटा ! क्या चाहते हो?”
“स्वामीजी ! मैं ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहता हूँ। क्या मुझे वह हो सकता है ?”

“क्यों नहीं, कल सुबह आना। हम लोग सामने के पहाड़ की चोटी पर चलेंगे। वहाँ मैं तुम्हें उसके रहस्य की प्रत्यक्ष अनुभूति कराऊँगा।”

▪ अगले दिन वह एकदम सुबह-सुबह महात्मा के पास पहुँचा।

संत बोले : “तुम इस गठरी को सिर पर रख लो और मेरे साथ चलो।”

वह बड़ी उमंग से चल पड़ा। पहाड़ की चोटी काफी ऊँची थी। थोड़ी देर बाद वह बोला :”स्वामीजी ! मैं थक गया हूँ, चला नहीं जाता।”

▪ स्वामीजी ने सहज भाव से कहा : “कोई बात नहीं, गठरी में पाँच पत्थर हैं। एक निकालकर फेंक दो। इससे गठरी कुछ हलकी हो जायेगी।”

उसने एक पत्थर फेंक दिया। कुछ ऊपर चढ़ने पर फिर उसे थकान होने लगी। महात्मा ने कहा: “एक पत्थर और कम कर दो।”

▪ इस प्रकार वह ज्यों-ज्यों ऊपर की ओर बढ़ता जाता, त्यों-त्यों कम वजन भी भारी लगने लगता।
महात्मा जी ने एक-एक करके सभी पत्थर फिंकवा दिये। फिर तो केवल कपड़ा बचा। उसे कंधे पर डालकर वह बड़ी सरलता से चोटी पर पहुँच गया।

▪ उसने महात्माजी से कहा : “स्वामीजी ! हम चोटी पर तो आ गये,अब ईश्वर-साक्षात्कार कराइये।”

स्वामीजी मुस्कराते हुए बोले: “बेटे! जब पाँच पत्थर की गठरी उठाकर तू पहाड़ पर नहीं चढ़ सका तो काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद की चट्टानें सिर पर रखकर ईश्वर का साक्षात्कार कैसे कर सकता है !”

▪ उसको अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने विनम्रता से प्रार्थना करते हुए कहा: “स्वामीजी ! अब आप ही मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

महात्मा ने उसे दीक्षा दी… साधना की पद्धति बतायी और निःस्वार्थ भाव से सेवा करने को कहा।

फिर तो वह उन महात्मा की शरण में रहकर उनके बताए अनुसार साधना करके अपने महान उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो गया।

📚ऋषि प्रसाद/सितम्बर २०११

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