चैत्र माह से गर्मी का प्रारम्भ हो जाती है, जिससे ऋतुजन्य बीमारियाँ जैसे – फोड़े-फुंसी, घमौरी तथा अन्य चर्मरोगों आदि से बचाव के लिए नीम का सेवन उपयोगी होता है।
इस दिन स्वास्थ्य-सुरक्षा तथा चंचल मन की स्थिरता के लिए नीम की पत्तियों को मिश्री, काली मिर्च,अजवायन आदि के साथ प्रसादरूप में लेने का विधान है ।

तात्त्विक दृष्टि से देखें तो हमारे जीवन-व्यवहार में कड़वे घूँट पीने के भी अवसर आते रहते हैं अतः नीम का सेवन करते समय मानसिक तैयारी कर लेनी चाहिए कि ‘इस वर्ष प्रारब्धवश जो भी दुःख, मुसीबत, प्रतिकूलता, अपमान आदि के कड़वे घूँट पीने होंगे, उन्हें मैं प्रभु की कृपा समझकर पचा जाऊँगा । उस कड़वाहट को भी स्वास्थ्य का साधन बनाऊँगा । विघ्न-बाधा, दुःख की परिस्थितियों को भी ‘स्व’ में स्थित होने हेतु समता के अभ्यास का साधन बनाऊँगा । शरीर को ‘मैं’ व मन-बुद्धि के दोषों को अपने में न आरोपित करके साक्षी चैतन्य में टिकने का प्रयास करूँगा।