किसीने कहा है:

अगर तुम ठान लो, तारे गगन के तोड़ सकते हो। 
अगर तुम ठान लो, तूफान का मुख मोड़ सकते हो।।

यहाँ कहने का तात्पर्य यही है कि जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं जिसे मानव न कर सके । जीवन में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो।
जीवन में संयम, सदाचार, प्रेम ,सहिष्णुता ,निर्भयता, पवित्रता, दॄढ़ आत्मविश्वास और उत्तम संग हो तो विद्यार्थी के लिए अपना लक्ष्य प्राप्त करना आसान हो जाता है।


यदि विद्यार्थी बौद्धिक-विकास के कुछ प्रयोगों को समझ ले, जैसे कि सूर्य को अर्घ्य देना, भ्रामरी प्राणायाम करना, तुलसी के पत्तों का सेवन, त्राटक करना, सारस्वत्य मंत्र का जाप  करना आदि-तो  परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होना विद्यार्थियों के लिए आसान हो जायेगा ।


विद्यार्थी को चाहिए कि रोज सुबह सूर्योदय से पहले  उठकर सबसे पहले अपने इष्ट का, गुरु का स्मरण करे । फिर स्नानादि करके अपने पूजाकक्ष में बैठकर गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा सारस्वत्य मंत्र का जाप  करे । अपने  गुरु या इष्ट की मूर्ति की ओर एकटक निहारते  हुए त्राटक करे । अपने  श्वासोच्छ्वास की गति  पर ध्यान देते हुए मन को एकाग्र करे । भ्रामरी प्राणायाम करे जो ‘विद्यार्थी तेजस्वी तालीम शिविर’ में सिखाया जाता है ।

प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दे एवं तुलसी के ५-७ पत्तों को चबाकर २-४ घूँट पानी पिये। 

रात को देर तक न पढ़े वरन्‌ सुबह जल्दी उठकर उपरोक्त नियमों को करके अध्ययन करे तो इससे पढा हुआ शीघ्र याद हो जाता है । 
जब  परीक्षा देने जाय तो तनाव-चिंता से युक्त होकर नहीं वरन्‌ इष्ट-गुरु का स्मरण करके, प्रसन्न होकर जाये। 
परिक्षा भवन में भी जब तक प्रश्नपत्र हाथ में नहीं आता तब तक शांत एवं स्वस्थ चित्त होकर प्रसन्नता को  बनाए रखे ।

प्रश्नपत्र हाथ में आने पर उसे एक बार पूरा पढ लेना चाहीए एवं जो प्रश्न आता है उसे पहले करे। ऐसा नहीं की जो नहीं आता उसे देखकर घबरा जाये । घबराने से तो जो प्रश्न आता है वह भी भूल जाएगा।

जो प्रश्न आते हैं उन्हें हल करने के बाद जो नहीं आते उनकी ओर ध्यान दे । अंदर दृढ़ विश्वास रखे कि मुझे ये भी आ जायेंगे। अंदर से निर्भय रहे एवं भगवत्स्मरण करके एकाध मिनट शान्त हो जाये, फिर लिखना शुरू करे। धीरे-धीरे उन प्रश्नों के उत्तर भी मिल जायेंगे ।

मुख्य बात यह है कि किसी भी कीमत पर धैर्य न खोये। निर्भयता एवं दृढ़ आत्मविश्वास बनाये रखे । 

विद्यार्थियों को अपने जीवन को सदैव बुरे संग से बचाना चाहिए । न तो वह स्वयं धूम्रपानादि करे न ही ऐसे मित्रों का संग करे । व्यसनों से मनुष्य की स्मरणशक्ति पर बड़ा खराब प्रभाव पड़ता है।
व्यसन की तरह चलचित्र भी विद्यार्थी की जीवन-शक्ति को क्षीण कर देते है। आँखों की रोशनी को कम करने के साथ ही मन एवं दिमाग को भी कुप्रभावित करनेवाले चलचित्रों से विद्यार्थियों को सदैव सावधान रहना चाहिए। आँखों द्वारा बुरे दृश्य अंदर घुस जाते हैं एवं वे मन को भी कुपथ पर ले जाते हैं। इसकी अपेक्षा तो सत्संग में जाना, सत्काशास्त्रों का अध्ययन करना अनंतगुना हितकारी है।
यदि  विद्यार्थी ने अपना विद्यार्थी जीवन सँभाल लिया तो उसका भावी जीवन भी सँभल जाता है क्योँकि विद्यार्थी जीवन ही भावी जीवन की आधारशिला है । विद्यार्थीकाल में वह जितना संयमी, सदाचारी, निर्भय एवं सहिष्णु होगा, बुरे संग एवं व्यसनों का त्याग कर सत्संग का आश्रय लेगा, प्राणायाम-आसनादी को सुचारु रूप से करेगा उतना ही उसका जीवन समुन्नत होगा। यदि नींव सुदृढ़ होती है तो उस पर बना विशाल भवन भी दृढ़ एवं स्थायी होता है । विद्यार्थीकाल मानव-जीवन की नींव के समान है अत: उसको सुदृढ़  बनाना चाहिए।
इन बातों को समझकर उन पर अमल किया जाय तो केवल लौकिक शिक्षा में ही सफलता प्राप्त होगी ऐसी बात नहीं है वरन्‌ जीवन की हर परीक्षा में विद्यार्थी सफल हो सकता है।


हे  विद्यार्थी उठो.…जागो…कमर कसो। दृढ़ता एवं निर्भयता से जुट पड़ो। बुरे संग एवं व्यसनों  त्यागकर, संतों-सद्‌गुरुओं के मार्गदर्शन के अनुसार चल  पड़ो …सफलता तुम्हारे चरण चूमेगी।


धन्य हैं वे लोग जिनमें ये छ: गुण  हैं ! अंतर्यामी देव सदैव उनकी सहायता करते  हैं :

उद्यम: साहसं धैर्यं बुद्धि शक्ति: पराक्रम:।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देव: सहायकृत्‌।।

“उद्योग , साहस , धैर्य , बुद्धि , शक्ति और पराक्रम- ये  छ: गुण जिस व्यक्ति के जीवन में हैं, देव उसकी सहायता करते हैं। ‘