pavanmuktasan
शरीर में स्थित पवन (वायु) यह आसन करने से मुक्त होता है इससे इसको पवनमुक्तासन कहा जाता है । ध्यान मणिपुर चक्र में । श्वास पहले पूरक फिर कुम्भक और रेचक ।

इस आसन से स्मरणशक्ति बढती है । बौद्धिक कार्य करनेवाले डॉक्टर, वकील, साहित्यकार, विद्यार्थी तथा बैठकर प्रवृत्ति करनेवाले मुनीम, व्यापारी आदि लोगों को नियमित रूप से पवनमुक्तासन करना चाहिए ।

भूमि पर बिछे हुए आसन पर चित्त होकर लेट जायें । पूरक करके फेफडों में श्वास भर लें । अब किसी भी एक पैर को घुटने से मोड दें । दोनों हाथों की अंगुलियों को परस्पर मिलाकर उसके द्वारा मोडे हुए घुटनों को पकडकर पेट के साथ लगा दें । फिर सिर को ऊपर उठाकर मोडे हुए घुटनों पर नाक लगायें । दूसरा पैर जमीन पर सीधा रहे । इस क्रिया के दौरान श्वास को रोककर कुम्भक चालू रखें । सिर और मोडा हुआ पैर भूमि पर पूर्ववत् रखने के बाद ही रेचक करें । दोनों पैरों को बारी बारी से मोडकर यह क्रिया करें । दोनों पैर एक साथ मोडकर भी यह आसन हो सकता है । लाभ : पवनमुक्तासन के नियमित अभ्यास से पेट की चरबी कम होती है । पेट की वायु नष्ट होकर पेट विकार रहित बनता है । कब्ज दूर होता है । पेट में अफरा हो तो इस आसन से लाभ होता है । प्रातःकाल में शौचक्रिया ठीक से न होती हो तो थोडा पानी पीकर यह आसन १५-२० बार करने से शौच खुलकर होगा ।

Recommended Posts