Every Child/ Kid can become a Successful Person | Horhan Birwan

Har baccha ban sakta hai mahan

 
Kids can become a Successful Person in Hindi :

कहते हैं:
होनहार बिरवान के होत चिकने पात।

➠ होनहार बालक की कुशलता, तेजस्विता एवं स्वर्णिम भविष्य के लक्षण बचपन से ही दिखने लगते हैं । पांडुरंग नाम का बालक ९ महीने की अल्प आयु में ही सुस्पष्ट और शुद्ध उच्चारण से बातचीत करने लगा । डेढ़ वर्ष की उम्र में तो वह बालक अपने पिताजी के साथ गूढ़ प्रश्नोत्तरी करके अपने और पिताजी के ज्ञान-भंडार को टटोलने लगा ।

➠ एक बार अर्थी ले जाते लोगों और उसके पीछे रोती-बिलखती स्त्रियों को देख बालक पांडुरंग ने पिताजी से पूछा : “ये सब क्यों रोते हैं ? और ये लोग किसी को इस तरह क्यों ले जाते हैं ?”

पिता: “बेटा! वह आदमी मर गया है और उसको जलाने के लिए ले जा रहे हैं । इसलिए उसके संबंधी रो रहे हैं।”

“तो क्या आप भी मर जायेंगे ? मेरी माता भी मर जायेगी क्या ?”

पिता ने बात टालते हुए कहा : “हाँ। “

“आपको भी जला देंगे क्या ?”

“हाँ।”

➠ पिता ने संक्षिप्त जवाब और अन्य प्रकार से प्रश्नों को रोकने के प्रयास किये मगर बालक की विचारधारा इन उपायों से रुकी नहीं। उसे तो समाधानकारक उत्तर चाहिए था।

➠ दूसरे दिन जब वैसी ही यात्रा की पुनरावृत्ति होती है तो बालक ने फिर शुरू किया : “पिताजी ! उसको जला क्यों देते हैं ? उसको जलन नहीं होगी क्या ?”

“मर जाने के बाद जलन नहीं होती और दुर्गंध न हो इसलिए उसको जला देते हैं।”

बालक ने और भी ज्यादा गूढ़ प्रश्न पूछा : “मगर वह मर गया माने क्या ?

“किसी का शरीर जब चलना-फिरना बंद हो जाए, जब वह किसी काम का न रह जाए और जब उसमें से जीव चला जाए, तब ‘वह मर गया’ ऐसा कहा जाता है।”

“वह जीव कहाँ जाता है पिताजी ?”

“अवकाश में कहीं इधर-उधर घूमके फिर से जन्म लेता है।”
“वह जन्म लेता है, मर जाता है, फिर लेता है और फिर मर जाता है… ऐसा चक्र चलता ही रहता है क्या ?”

“हाँ।”

➠ बालक के पिता अब परेशान होने लगे परंतु उसकी जिज्ञासा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।  उसने फिर पूछा : “इन सब झंझटों दूर होने का कुछ उपाय नहीं है क्या? जिससे जन्म-मरण छूट जाए ऐसी तरकीब नहीं है क्या ?”

पिता ने भी इन सबसे छूटने के लिए उत्तर दिया : “है, क्यों नहीं ! राम का नाम लेने से सब मुसीबतों से हम पार हो जाते हैं। भगवन्नाम जपने से जन्म-मरण का चक्र छूट जाता है।”

➠ बालक ने इस बात की गाँठ बाँध ली। उस अंतर-बाह्य सभी अंग पुलकित हो उठे। उसको आज भव-भय नाशक भगवन्नाम मिल गया था । उसको मानो वह कुंजी मिल गयी जिससे अंत के सभी द्वार खुलने लगते हैं ।

➠ जिस बालक के में डेढ़ वर्ष की उम्र से ही इस प्रकार के गूढ़ आध्यात्मिक प्रश्न उठे हों, ऐसी सत्य की जिज्ञासा जगी हो, वह आगे चलकर महानता के चरम के छू ले, इसमें क्या आश्चर्य ! और हुआ भी ऐसा ही। यही पांडुरंग सद्गुरु वासुदेवानंद सरस्वती की कृपा से आत्मज्ञान पाकर संत रंग अवधूत महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्वयं तो भवसागर पार हुए, औरों के भी पथ प्रदर्शक बने।

➠ बचपन की निर्दोष जिज्ञासा को यदि भारतीय संस्कृति के शास्त्रों का ज्ञान, सुसंस्कारों की सही दिशा मिल जाए तो सभी ऐसे महान बन सकते हैं क्योंकि मनुष्य जन्म मिला ही ईश्वर प्राप्ति के लिए है । सभी में परमात्मा का अपार सामर्थ्य छुपा हुआ है। धन्य हैं वे माता-पिता जो अपने बालकों को संस्कार सिंचन के लिए ब्रह्मज्ञानी संतों के सत्संग में ले जाते हैं, बाल संस्कार केंद्र में भेजते हैं, भगवान के नाम की महिमा बताते हैं ! वास्तव में वे उन्हें सच्ची विरासत देते हैं । ये ही सुसंस्कार उनके जीवन की पूँजी बन जाते हैं ।

📚ऋषि प्रसाद / नवम्बर 2014

संतो की सहिष्णुता – Sant Swami Teoonram Ji [स्वामी टेऊँराम]

सिंधी जगत के महान तपोनिष्ठ ब्रह्मज्ञानी संत श्री टेऊँराम जी ने जब अपने चारों ओर समाज में व्याप्त भ्रष्टाचारों को हटाने का प्रयत्न किया, तब अनेकानेक लोग आत्म कल्याण के लिए सेवा में आने लगे । जो अब तक समाज के भोलेपन और अज्ञान का अनुचित लाभ उठा रहे थे, समाज का शोषण कर रहे थे, ऐसे असामाजिक तत्त्वों को तो यह बात पसन्द ही न आई। कुछ लोग डोरा, धागा, तावीज का धन्धा करनेवाले थे तो कुछ शराब, अंडा, माँस, मछली आदि खाने वाले थे तथा कुछ लोग ईश्वर पर विश्वास न करनेवाले एवं संतों की विलक्षण कृपा, करुणा व सामाजिक उत्थान के उनके दैवी कार्यों को न समझकर समाज में अपने को मान की जगह पर प्रतिष्ठित करने की इच्छा वाले क्षुद्र लोग थे। वे संत की प्रसिद्धि और तेजस्विता नहीं सह सके । वे लोग विचित्र षड़यंत्र बनाने एवं येन केन प्रकारेण लोगों की आस्था संत जी पर से हटे। ऐसे नुस्खे आजमाकर संत टेऊँरामजी के ऊपर कीचड़ उछालने लगे । उनको सताने में उन दष्ट हतभागी पामरों ने जरा भी करकसर न छोड़ी। उनके आश्रम के पास मरे हुए कुत्ते, बिल्ली और नगर पालिका की गन्दगी फेंकी जाती थी । संत श्री एवं उनके समर्पित व भाग्यवान शिष्य चुपचाप सहन करते रहे और अन्धकार में टकराते हुए मनुष्यों को प्रकाश देने की आत्मप्रवृत्ति उन्होंने न छोड़ी ।

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं..

कुप्रचार ने इतना जोर पकड़ा, इतना जोर पकड़ा कि कुछ भोले-भाले सज्जन लोगों ने साँई राम के पास जाना बंद कर दिया। उस वक्त के सज्जनों की यह बड़ी भारी गलती रही कि उन्होंने सोचा, ‘अपना क्या, जो करेगा सो भरेगा।’ अरे! कुप्रचार करनेवाले क्यों कुप्रचार करते ही रहें ? वे बेचारे करें और फिर भरें, उससे पहले ही तुम उन्हें आँखें दिखा दो ताकि वे दुष्कर्म करें भी नहीं और भरें भी नहीं, समाज की बरबादी न हो, समाज गुमराह न हो।

खैर… साँई टेऊँराम की निंदा एवं कुप्रचार ने आखिरकार इतना जोर पकड़ा कि नगरपालिका में एक प्रस्ताव पास किया गया कि ‘साँई टेऊँराम के आश्रम में जो जायेंगे उनके माता-पिता को पाँच रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा।’ उस वक्त पाँच रुपये की कीमत बहुत थी। करीब ६० रुपये तोला सोने की कीमत थी तब की यह बात है। कुछ कमजोर मन के लोगों ने अपने बेटे-बेटियों को साँई टेऊँराम के आश्रम में जाने से रोका । कुछ तो रुक गये लेकिन जिनको महापुरुष की कृपा का महत्त्व ठीक-से समझ में आ गया था वे नहीं रुके। उनकी अंतरात्मा तो मानो कहती हो कि :

‘हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं।
हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं ।’

बीड़ी-सिगरेटवाला बीड़ी-सिगरेट नहीं छोड़ता, शराबी शराब नहीं छोड़ता, जुआरी जुआ खेलना नहीं छोड़ता तो वे सत्संगी, समझदार लोग गुरु के द्वार पर जाना कैसे छोड़ देते ? पास करनेवालों ने तो पाँच रुपये का जुर्माना पास कर दिया किंतु सच्चे भक्तों ने साईं टेऊँराम के आश्रम में जाना नहीं छोड़ा।

जब कुप्रचारकों ने कुप्रचार के साथ-साथ दंड का प्रस्ताव पास करवाया तब क्या हुआ..?

हमारी जिनके प्रति श्रद्धा होती है उनके लिए हमारे चित्त में सुख देने की भावना होती है वह फिर राम भक्त शबरी हो या कृष्ण भक्त मीरा, उनके हृदय में अपने आराध्य को सुख देने की ही भावना थी। साँई टेऊँराम के शिष्य भी अपने गुरु की प्रसन्नता के लिए प्रयत्नशील रहते थे। गुरु के प्रति अपने अहोभाव को प्रदर्शित करने के लिए अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार पत्र-पुष्प आदि अर्पित करते थे। इसे देखकर निंदकों के हृदय में बड़ी ईर्ष्या उत्पन्न होती थी। अतः उन्होंने कुप्रचार करने के साथ-साथ पाँच रुपये दंड का प्रस्ताव भी पास करवा लिया था। कुछ ढीले-ढाले लोग जो आते थे, बाकी के साँई टेऊँराम के प्यारों ने आश्रम जाना जारी ही रखा। ईश्वर के पथ के पथिक इसी प्रकार वीर होते हैं। उनके जीवन में चाहें हज़ार विघ्न-बाधाएँ आ जायें किंतु वे अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होते। अनेक अफवाहें एवं निंदाजनक बातें सुनकर भी उनका हृदय गुरुभक्ति से विचलित नहीं होता क्योंकि वे गुरुकृपा के महत्त्व को ठीक से समझते हैं। गुरु के महत्त्व को जानते हैं।

और भी जोरों से चली कुप्रचार की आँधी..!
फिर भी भक्तों की में कमी न आई..!!

……..तो वे साँई टेऊँराम के प्यारे कैसे भी करके पहुँच जाते थे अपने गुरु के द्वार पर । माता-पिता को कहीं बाहर जाना होता तब लड़के कहीं भागकर आश्रम न चले जायें यह सोचकर माता-पिता अपने बेटों को खटिया के पाये से बाँध देते और उन्हें बरामदे में रखकर बाहर से ताला लगाकर चले जाते । फिर सत्संग के प्रेमी लड़के क्या करते…
खटिया को हिला-डुलाकर तोड़ देते एवं जिस पाये से उनका हाथ बँधा होता उस पाये के साथ ही साँई टेऊँराम के आश्रम पहुँच जाते । साँई टेऊँराम एवं अन्य साधक उनके बंधनों को खोल देते। लोगों ने देखा कि ये लोग तो खटिया के पाये समेत आश्रम पहुँच जाते हैं ! अब क्या करें?

साँई टेऊँराम अपने आश्रम में ही अनाज उगाते थे। जब कुप्रचारकों ने देखा कि हमारा यह दाँव भी विफल जा रहा है तो उन्होंने एक नया फरमान जारी करवा दिया कि कोई भी दुकानदार साँई टेऊँराम के आश्रम की कोई भी वस्तु न खरीदे, अन्यथा उस पर जुर्माना किया जायेगा। इतने से भी साँई टेऊँराम की समता, सहनशीलता में कोई फर्क नहीं आया एवं उनके साधकों की श्रद्धा यथावत् देखी तो उन नराधमों ने, आश्रम जिस कुएँ के जल का उपयोग करता उसमें केरोसिन (मिट्टी का तेल) डाल दिया। क्या नीचता की पराकाष्ठा है! कितना घोर अत्याचार ! लेकिन साँई टेऊँराम भी पक्के थे।

संत-महापुरुष कच्ची मिट्टी के थोड़े ही होते भगवान की छाती पर खेलने की उनकी ताकत है | कई बार भगवान अपने प्रण को त्यागकर भक्तों की, संतों की बात रख लेते हैं, जैसे – पितामह के संकल्प को पूरा करने के लिए भगवान ने अपने हथियार न उठाने के प्रण को छोड़ दिया था।

साई टेऊँराम के प्रचार से एक ओर जहाँ कमजोर मनवालों की श्रद्धा डगमगाती, वहीं उनके प्यारों का प्रेम उनके प्रति दिन-ब-दिन बढ़ता जाता। साँई टेऊँराम अपने आश्रम में एक चबूतरे पर बैठकर सत्संग करते थे। उनके पास अन्य साधु-संत भी आते थे। अतः वह चबूतरा छोटा पड़ता था। यह देखकर उनके भक्तों ने उस चबूतरे को बड़ा बनवा दिया। बड़े चबूतरे को देखकर उनके विरोधी ईर्ष्या से जल उठे एवं वहाँ के तहसीलदार को बुला लाये। उसने आकर कहा कि यह चबूतरा अनधिकृत रूप से बनाया गया है जिसके कारण सड़क छोटी हो गयी है एवं लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है। अतः इस चबूतरे को तोड़ देना चाहिए। यह कहकर उसने साँई टेऊँराम के विरुद्ध मामला दर्ज कर दिया एवं उन्हें अदालत में उपस्थित होने को कहा किंतु निश्चित समय पर साँई टेऊँराम अदालत में उपस्थित न हुए।

दूसरे दिन जब वे स्नान करके तालाब से लौटे तो देखा कि चबूतरा टूटा हुआ है संत तो सहन कर लेते हैं किंतु प्रकृति से उनका विरोध सहा नहीं जाता। कुछ समय के पश्चात् उस तहसीलदार का तबादला दूसरी जगह हो गया। उसकी जगह दूसरा तहसीलदार आया जो बड़ा श्रद्धालु और भक्त था। अतः उसने पुनः वह चबूतरा बनवा दिया। जिन्होंने साँई टेऊँराम को अपमानित करने की कोशिश की, लज्जित और बदनाम करने की कोशिश की, उनकी तो कोई दाल नहीं गली। जिन्होंने साँई टेऊँराम को निंदित करने का प्रयास किया, उनका कुप्रचार करके उनकी कीर्ति को कलंकित करने का प्रयास किया उनमें से कुछ लोगों ने पश्चात्ताप करके माफी ले ली और बाकी के नीच कृत्य करनेवाले न जाने कौन-से नरक में होंगे। लेकिन साँई टेऊँराम के पावन यश का सौरभ आज भी चतुर्दिक प्रसारित होकर अनेक दिलों को पावन कर रहा है।

📚 ऋषि प्रसाद /सितम्बर २००८

गवरी बाई का जीवन और वचन- Gavri Devi Wiki (Bio), Quotes, Bhajan

संवत् १८१५ में डूँगरपुर (प्राचीन गिरिपुर) गाँव (राज.) में एक कन्या का जन्म हुआ, नाम रखा गया गवरी। ५-६ साल की उम्र में ही उसका विवाह कर दिया गया। विवाह के एक वर्ष बाद ही उसके पति का देहांत हो गया।

थोड़े समय बाद माँ और फिर पिता भी चल बसे। 

संसार के संबंधों की नश्वरता को गवरीबाई ने प्रत्यक्ष देखा, उनको संसार फीका लगने लगा । उन्होंने  भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना सब कुछ मान लिया। वे गीता, भागवत, रामायण, उपनिषद् आदि ग्रंथ पढ़तीं। भगवान के प्रति भजन के रूप में निकले उनके भाव लोगों को ईश्वर की याद से भर देते । गवरीबाई के श्री कृष्ण भक्ति परक पदों में संत मीराबाई के समान माधुर्यभाव व विरह की परिपूर्णता रहती। 

गवरीबाई के परम सौभाग्य का उदय तो तब हुआ जब उन्हें एक आत्मज्ञानी ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की शरण मिली। उनके गुरुदेव ने उन्हें ब्रह्मज्ञान व योगदर्शन का उपदेश दिया।      

संसार से उपराम और सुख-भोगों की अनासक्ति से युक्त गवरीबाई के परिपक्व हृदय में गुरु के वचन गहरे उतर जाते । सुनते-सुनते वे अहोभाव से भर जातीं और घंटों उसी भाव में खोयी रहतीं । वे कहती थीं :

 हरि नाम बिन और बोलना क्या,
 हरि कथा बिना और सुनना क्या।
 सुखसागर समालिओ त्यागी,
 कूप डाब में डालना क्या। 
घट गिरधर गिरधर पाया, 
बाहेर द्रांग अब खोलना क्या। 
आत्मा अखंड आवे न जावे,
जन्म नहीं तो फिर मरना क्या।
न गवरी ब्रह्म सकल में जाना,
जाना तो जद खोलना क्या।

गवरी बाई गुरु-महिमा का वर्णन करते हुए कहती हैं

ज्ञानघटा घेरानी अब देखो,
    सतगुरु की कृपा भई मुझ पर
 शब्द ब्रह्म पहचानी ।

गवरी बाई पर गुरुकृपा ऐसी बरसी कि उनके लिए अब भगवान केवल श्री कृष्ण की मूर्ति तक ही सीमित न रहे, गुरु ज्ञान ने उनके अज्ञान-आवरण को चीर डाला और उन्हें घट-घट में परमात्मा के दीदार होने लगे। वे कहती हैं:
 ‘पूरे ब्रह्मांड का स्वामी सर्वव्यापक हरि ही है। चौदह भुवनों में बाहर, भीतर सर्वत्र वही समाया हुआ है। चाँद में चैतन्य भी वही है। सूरज में तेज भी वही है। ऐसे हरि को भजे बिना दसों दिशाएँ सूनी लगती हैं। हे प्रभु ! तुम्हारा न कोई निश्चित रूप है, न रंग, न वर्ण है। तुम ॐकारस्वरूप हो, तुम निराकार रूप हो । न तुम माया हो न कर्म । उस प्रकार गवरीबाई लिखती हैं कि उनके गुरु के उपदेशों से उन्हें ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हुआ है। उस प्रकाश से अज्ञान का अंधकार समाप्त हो गया है।        

गवरीबाई ने अपने गुरुदेव से जो ज्ञान पाया था उसकी झलक उनके पदों में छलक रही है ~

आत्मज्ञान विना प्राणी ने सुख न थाऊ रे,
आत्मज्ञान विना मन विश्राम न पाऊ रे,
आत्मज्ञान विचार विना न पावे मुक्ति रे,
आत्मज्ञान विना कोई अड़सठ तीर्थ नाहे रे,

 ~ ऋषि प्रसाद अप्रैल २०१८

 

श्री वल्लभाचार्य जयंती | Brahmgyani Shri Vallabhacharya Jayanti Vishesh

shri vallabhacharya

बूला मिश्र का जन्म लाहौर के एक सारस्वत ब्राह्मण के घर हुआ था । 10 वर्ष की उम्र में वह शास्त्राध्ययन के लिए काशी गया ।

उसे 3 साल तक पढ़ाने के बाद उसके आचार्य ने कहा : ‘‘मैंने कई विद्यार्थियों को पढ़ाया परंतु तेरे जैसा ठूँठ मैंने आज तक नहीं देखा । लगता है तेेरे भाग्य में विद्या है ही नहीं । मैं अब तुझे नहीं पढ़ा सकता ।’’
बूला मिश्र ने संकल्प किया कि ‘जब तक मुझे विद्या प्राप्त नहीं होगी, तब तक मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा ।’

गंगा-किनारे जाकर वह 3 दिन तक भूखा-प्यासा बैठा रहा ।

बालक की तपस्या से माँ सरस्वती प्रकट हुईं, बोलीं : ‘‘वत्स ! तेरे भाग्य में विद्या नहीं है । परंतु तू भगवान का भजन कर, उनकी कृपा से तू अवश्य विद्यावान हो जायेगा ।’’

बूला मिश्र बोला : ‘‘मैं अब तक आपके लिए तड़प रहा था तो अब भगवान के लिए तड़पूँगा ।’’ अब वह वहीं बैठकर पूरी श्रद्धा से भगवन्नाम-जप करने लगा । भगवान प्रसन्न हुए, सरस्वतीजी को भेजा । 

बूला मिश्र बोला : ‘‘आपने तो कहा था कि ‘तेरे भाग्य में विद्या नहीं है’, अब क्या हुआ ?’’ 

सरस्वतीजी : ‘‘सच्चे मन से भगवन्नाम का जप करने से भगवान तुझ पर प्रसन्न हुए हैं और तेरे भाग्य के कुअंक मिट गये हैं ।’’ 
‘‘भगवान की प्रसन्नता से जब भाग्यहीन का भाग्य बदल सकता है तो अब मुझे विद्या नहीं चाहिए, मैं भगवान को ही पाऊँगा ।’’

पाँच दिन निकल गये थे । बूला मिश्र ने जल तक नहीं लिया । उसके दृढ़ संकल्प व सच्ची तड़प से प्रसन्न होकर भगवान ने साकाररूप में दर्शन दिये, 

भगवान बोले : ‘‘वत्स ! मेरे दर्शन का परम फल यही है कि जीव अपने आत्मस्वरूप में जग जाय, आत्मविश्रांति पा ले । परंतु गुरुकृपा के बिना यह सम्भव नहीं है । मैं भी जब अवतार लेकर आता हूँ तो मुझे भी ब्रह्मज्ञानी सद्गुरु की शरण में जाना पड़ता है । अतः तू अडेल जा, वहाँ तुझे वल्लभाचार्यजी मिलेंगे ।’’ 

बूला मिश्र प्रसन्नतापूर्वक भोजन करके अडेल पहुँचा । वहाँ वल्लभाचार्यजी (Shri Vallabhacharya) को देखते ही दंडवत् पड़ गया । आचार्य श्री प्रसन्न होकर बोले : ‘‘तू धन्य है ! तूने दृढ़ हरिभक्ति से भगवान को भी प्रकट कर दिया ।’’ 

बूला मिश्र : ‘‘गुरुदेव ! भगवान के दर्शन तो हो गये परंतु भगवत्स्वरूप के आनंद का अनुभव तो नहीं हुआ । इसीलिए मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे स्वीकार कीजिये ।’’
उसकी निष्ठा और विवेक देखकर वल्लभाचार्यजी (Shri Vallabhacharya) ने उसे मंत्रदीक्षा दी । जिस बूला मिश्र को अक्षरज्ञान तक नहीं था, वह गुरुमंत्र के जप और गुरुसेवा से वेद-शास्त्रों के ज्ञान में निपुण व अलौकिक अनुभवों का धनी होने लगा ।

 ईश्वरप्राप्ति की तीव्र तड़प और गुरुजी की कृपा से शीघ्र ही बूला मिश्र को ईश्वर-तत्त्व का साक्षात्कार हो गया ।
बूला मिश्र तो विद्या पाने के लिए घर से निकला था, तितिक्षा सही, बहुत कष्टदायक लम्बी यात्रा के बाद भगवान के दर्शन हुए, भगवान प्रसन्न हुए तब उसे गुरु मिले और भगवान के तत्त्व का साक्षात्कार हुआ । परंतु जो सीधे ऐसे हयात ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को खोजकर उनकी शरण में पहुँच जाते हैं, उनके सौभाग्य का तो कहना ही क्या ! और जो ऐसे महापुरुषों के वचनों में अडिग श्रद्धा करके बूला मिश्र से भी सरलता से आत्मानुभव कर लेते हैं, ऐसे सौभाग्यशालियों को तो आपके-हमारे प्रणाम हैं !

नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति ।
हसंदिआ खेलंदिआ पैनंदिआ खावंदिआ विचे होवै मुकति ।।  (गुरुग्रंथ साहिब)

उन महादुर्लभ ब्रह्मज्ञानी सद्गुरुओं का बड़ा उपकार है । ब्रह्मज्ञान से सर्वथा अनजान लोग, जो संसारी छोटी-छोटी चाहें और मान्यताएँ लेकर उनके पास आते हैं, उन्हें भी ये करुणावान महापुरुष हँसते-खेलते, खाते-पहनते आत्मज्ञान का खजाना देकर मुक्ति-मार्ग की यात्रा कराते हैं ।
(लोक कल्याण सेतु : अगस्त 2013)

 

जब करुणा के आँसू छलक पड़े… | Mahavir Jayanti

mahavir jayanti

महावीर जयंती (Mahavir Jayanti) : 6 अप्रैल

जैसे हर संत के जीवन में देखा जाता है,वैसे महावीर स्वामी के समय भी देखा गया…… जहाँ उनसे लाभान्वित होनेवाले लोग थे, वहीं समाजकंटक निंदक भी थे।

उनमें से पुरंदर नाम का निंदक बड़े ही क्रूर स्वभाव का था। वह तो महावीर जी के मानो पीछे ही पड़ गया था। उसने कई बार महावीर स्वामी को सताया, उनका अपमान किया पर संत ने माफ कर दिया।

एक दिन महावीर स्वामी (Mahavir Swami) पेड़ के नीचे ध्यानस्थ बैठे थे। तभी घूमते हुए पुरंदर भी वहाँ पहुँच गया। वह महावीर जी को ध्यानस्थ देख आग-बबूला होकर बड़बड़ाने लगा :
“अभी इनका ढोंग उतारता हूँ। अभी मजा चखाता हूँ….”

और आवेश में आकर उसने एक लकड़ी ली और उनके कान में खोंप दी। कान से रक्त की धार बह चली लेकिन महावीर जी के चेहरे पर पीड़ा का कोई चिह्न न देखकर वह और चिढ़ गया और कष्ट देने लगा।

इतना सब होने पर भी महावीरजी किसी प्रकार की कोई पीड़ा को व्यक्त किये बिना शांत ही बैठे रहे। परंतु कुछ समय बाद अचानक उनका ध्यान टूटा, उन्होंने आँख खोलकर देखा तो सामने पुरंदर खड़ा है। उनकी आँखों से आँसू झरने लगे।
पुरंदर ने पूछा : “क्या पीड़ा के कारण रो रहे हो?”
महावीर स्वामी : “नहीं, शरीर की पीड़ा के कारण नहीं।”
पुरंदर : “तो किस कारण रो रहे हो?”

“मेरे मन में यह व्यथा हो रही है कि मैं निर्दोष हूँ फिर भी तुमने मुझे सताया है तो तुम्हें कितना कष्ट सहना पड़ेगा ! कैसी भयंकर पीड़ा सहनी पड़ेगी ! तुम्हारी उस पीड़ा की कल्पना ,करके मुझे दुःख हो रहा है।”

यह सुन पुरंदर मूक हो गया और पीड़ा की कल्पना से सिहर उठा।

पूज्य बापूजी कहते हैं : “जो दुःसंकल्प करता है और उसे क्रियान्वित करते समय भी पश्चात्ताप नहीं करता, दुःखी नहीं होता, वह दुःसंकल्प और दुष्क्रिया का जब फल भोगता है तब दुःखी होता है, जब नरक मिलता है तब दुःखी होता है। अतः गलती करते समय ही रोइये, गलती के संकल्प के समय ही सावधान रहिये ।”

पुरंदर की नाई गोशालक नामक एक कृतघ्न गद्दार ने भी महावीर स्वामी (Mahavir Swami) को बहुत सताया था। महावीरजी के ५०० शिष्यों को उनके खिलाफ खड़ा करने का उसका षड्यंत्र भी सफल हो गया था। उस दुष्ट ने महावीर स्वामी जी को जान से मारने तक का प्रयत्न किया लेकिन जो जैसा बोता है उसे वैसा ही मिलता है। धोखेबाज लोगों की जो गति होती है, गोशालक का भी वही हाल हुआ।

अतः निंदको व कुप्रचारको ! अब भी समय है, कर्म करने में सावधान हो जाओ। अन्यथा जब प्रकृति तुम्हारे कुकर्मों की तुम्हें सजा देगी उस समय तुम्हारी वेदना पर रोनेवाला भी कोई न मिलेगा।

– श्री आर.एन. ठाकुर

~लोक कल्याण सेतु / जून २०१४

छत्रपति शिवाजी महाराज की महानता | Shivaji Maharaj

chhatrapati shivaji maharaj

– पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

शास्त्र में कहा गया है :
ब्रह्मचर्यं परं बलम् । ‘ब्रह्मचर्य परम बल है ।’

जिसके जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन नहीं होता उसकी आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, यश, पुण्य और प्रीति – ये सब नष्ट हो जाते हैं । उसके यौवन की सुरक्षा नहीं होती ।
दुनिया में जितने भी महान् व्यक्ति हो गये हैं उनके मूल में ब्रह्मचर्य की ही महिमा है ।

पूरी मुगल सल्तनत जिनके नाम से काँपती थी, ऐसे वीर छत्रपति शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj) की वीरता का कारण भी उनका संयम ही था ।

एक बार मुगल सरदार बहलोल खाँ एवं शिवाजी की सेनाओं में युद्ध चल रहा था । शिवाजी युद्ध के विचारों में ही खोये हुए थे कि सेनापति भामलेकर तेजी से घोड़े को दौड़ाते हुए शिवाजी के पास आये ।

भामलेकर को देखकर ही शिवाजी समझ गये कि ये विजयी होकर आये हैं किंतु उनके पीछे दो सैनिक जो डोली लेकर आ रहे थे, उसके बारे में उनको कुछ समझ में नहीं आया । वे दौड़कर नीचे आये और भामलेकर को गले लगा लिया ।

भामलेकर ने कहा : ‘‘छत्रपति ! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गयी है । बेचारा बहलोल खाँ जान बचाकर भाग गया । अब हिम्मत नहीं कि मुगल सेना इधर की तरफ मुँह भी कर सके ।’’

शिवाजी : ‘‘वह तो मैं तुम्हें देखकर ही समझ गया था, भामलेकर ! किंतु इस डोली में क्या है ?’’

अट्टहास्य करते हुए भामलेकर ने कहा : ‘‘इसमें मुस्लिमों में सुंदरता के लिए प्रसिद्ध बहलोल खाँ की बेगम है, महाराज ! मुगल सरदार ने हजारों-लाखों हिन्दू नारियों का सतीत्व लूटा है । उसी का प्रतिशोध लेने के लिए मेरी ओर से आपको यह भेंट है ।’’

यह सुनकर शिवाजी अवाक् रह गये । उन्हें अपने किसी सरदार और सामन्त से ऐसी मूर्खता की आशा नहीं थी । कुछ देर ठहरकर वे डोली के पास गये तथा पर्दा हटाया और बहलोल खाँ की बेगम को बाहर आने के लिए कहा । डरती-सहमती वह बाहर आयी तब शिवाजी ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा : ‘‘सचमुच, तुम बड़ी सुंदर हो । किंतु अफसोस है कि मैं तुम्हारी कोख से पैदा नहीं हुआ । नहीं तो मैं भी तुम्हारे जैसा ही सुंदर होता ।’’

उन्होंने अपने एक अन्य अधिकारी को आदेश दिया कि वह बेगम को बाइज्जत ले जाकर बहलोल खाँ को सौंप दे । फिर भामलेकर की ओर मुड़कर बोले : ‘‘तुम मेरे साथ इतने दिनों तक रहे पर मुझे पहचान नहीं पाये । वीर उसे नहीं कहते जो अबलाओं पर प्रहार करे, उनका सतीत्व लूटे । हमें अपनी सांस्कृतिक गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए ।’’

शिवाजी के कथन को सुनकर भामलेकर को अपनी भूल के लिए पश्चात्ताप होने लगा । इधर बेगम को ससम्मान लौटाया हुआ देखकर बहलोल खाँ भी विस्मित हुए बिना नहीं रहा । वह तो सोच रहा था कि ‘अब उसकी सबसे प्रिय बेगम शिवाजी के महल की शोभा बन चुकी होगी ।’

परंतु बेगम ने अपने पति को छत्रपति के बारे में जो कुछ बताया वह जानकर तथा अधिकारी के हाथों भेजा गया पत्र पढ़कर बहलोल खाँ जैसा क्रूर सेनापति भी पिघल गया । पत्र में शिवाजी ने अपने सेनानायक की गलती के लिए क्षमा माँगी थी । इस पत्र को देखकर स्वयं को बहुत महान् वीर और पराक्रमी समझनेवाला बहलोल खाँ अपनी ही नजर में शिवाजी के सामने बहुत छोटा दिखाई देने लगा । उसने निश्चय किया कि ‘इस फरिश्ते को देखकर ही दिल्ली लौटूँगा।’

इसके लिए आग्रह-पत्र भेजा गया । बहलोल खाँ और शिवाजी के मिलने का स्थान निश्चित हुआ । नियत तिथि, समय व स्थान पर शिवाजी बहलोल खाँ से पहले ही पहुँच गये । बहलोल खाँ जब वहाँ पहुँचा तो पश्चात्ताप व आत्मग्लानि के साथ-साथ शिवाजी के व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धाभाव से इतना अभिभूत था कि देखते ही उनके पैरों में झुक गया और बोला : ‘‘माफ कर दो मुझे मेरे फरिश्ते ! बेगुनाहों का खून मेरे सर चढ़कर बोलेगा और मैं उनकी आह से जला करूँगा । उस समय आपकी सूरत की याद मुझे थोड़ी-सी ठंडक पहुँचायेगी ।’’

‘‘जो हुआ सो हुआ । अब आगे का होश करो ।’’ एक पराजित और श्रद्धानत सेनापति को गले लगाते हुए छत्रपति शिवाजी ने कहा ।

इन सबके मूल में क्या था ? समर्थ रामदास जैसे महापुरुष का सान्निध्य, यौवन-सुरक्षा के सिद्धांत का आदर, सज्जनता एवं दृढ़ संयम । अपने संयम के कारण ही वे भारतीय संस्कृति की गरिमा को बनाये रखने में सक्षम हुए एवं शत्रु के हृदय में भी अपना स्थान बना सके ।

✍🏻हे भारत के युवानों ! उठो, जागो और अपने पूर्वजों के गौरव को याद करो । अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए कमर कसकर तैयार हो जाओ । अश्लील फिल्म, उपन्यास, साहित्य आदि गंदगी से बचो एवं ‘यौवन-सुरक्षा’ जैसी पुस्तकें पढ़कर, शिवाजी जैसे महान् योद्धाओं का जीवन-चरित्र पढ़कर एवं ऋषि-मुनियों की दिव्य देन सत्शास्त्रों को पढ़कर अपने जीवन को उन्नत बनाओ। सत्संग-श्रवण करके, संतों के द्वारा श्रेष्ठ मार्गदर्शन पाकर, संयम एवं सदाचार का आश्रय लेकर अपने जीवन में भी ओजस्विता-तेजस्विता भर दो । पाश्चात्य जगत के अंधानुकरण से बचकर रॉक-पॉप, डिस्को आदि जीवन-शक्ति का ह्रास करनेवाली विकृति से बचकर अपनी भव्य भारतीय संस्कृति को अपनाओ । शाबाश वीर ! शाबाश…

~ऋषि प्रसाद : अप्रैल 1998

चार बजे तो चार बजे..!!

समय का महत्व बताती हुई प्रेरणादायी आज की कहानी बच्चों को अवश्य सुनाएँ।

    ~गुरु-सन्देश~
“विद्यार्थीकाल सद्गुणों के उपार्जन, चरित्र-निर्माण व सुषुप्त योग्यताओं को विकसित करने का सुनहरा अवसर है । यदि यह अवसर खो दिया तो फिर जीविकोपार्जन में लगने के बाद इन सबके विकास के लिए कितना समय मिल पायेगा ! किंतु इस बात से अनजान विद्यार्थी प्रायः अपने कीमती समय को टी.वी., सिनेमा आदि देखने में तथा चरित्रभ्रष्ट करनेवाली फालतू पुस्तकें पढ़ने में बरबाद कर देते हैं । बड़े धनभागी हैं वे विद्यार्थी जो मिली हुई समय-शक्ति का सदुपयोग कर अपने जीवन को महानता के पथ पर अग्रसर कर लेते हैं ।”

बात उस समय की है जब गांधीजी साबरमती आश्रम में थे । एक दिन एक गाँव के कुछ लोग उनके पास आकर कहने लगे : ‘‘बापू ! कल हमारे गाँव में एक सभा हो रही है । यदि आप समय निकालकर जनता को देश की स्थिति व स्वाधीनता के विषय में कुछ मार्गदर्शन देंगे तो बड़ी कृपा होगी ।’’

 गांधीजी : ‘‘कार्यक्रम का समय क्या है ?’’

‘‘शाम चार बजे ।’’

गांधीजी ने अपने कल के कार्यक्रम देखकर स्वीकृति दे दी ।
 मुखिया बोला : ‘‘बापू ! मैं आपको लेने के लिए गाड़ी भेज दूँगा ।’’

अगले दिन जब पौने चार बजे तक मुखिया का आदमी नहीं पहुँचा तो गाँधीजी ने विचार किया कि  ‘यदि मैं समय से नहीं पहुँचा तो कितने लोगों का समय व्यर्थ ही नष्ट होगा और मैं उन्हें क्या जवाब दूँगा !’ वे थोड़े शांत हो गये । उन्हें एक तरीका सूझा और उसीका उन्होंने तुरंत अमल किया । कुछ समय बाद मुखिया गाँधीजी को लेने आया परंतु वे वहाँ नहीं मिले । निराश व चिंतित मन से मुखिया सभास्थल पर पहुँचा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । उसने देखा कि गांधीजी भाषण दे रहे हैं और सभी लोग तन्मयता से सुन रहे हैं ।

भाषण के बाद मुखिया गांधीजी से पूछने लगा : ‘‘मैं आपको लेने आश्रम गया था लेकिन आप वहाँ नहीं मिले, फिर आप यहाँ तक कैसे पहुँचे ?’’

गांधीजी :  ‘‘जब आप पौने चार बजे तक नहीं पहुँचे तो मुझे चिंता हुई कि मेरे कारण इतने लोगों का समय नष्ट हो सकता है, इसलिए मैंने साइकिल उठायी और तेजी से चलाते हुए यहाँ पहुँच गया ।’’ 

मुखिया शर्म से पानी-पानी हो गया और देर होने के लिए माफी माँगने लगा । 

 तब गाँधीजी ने कहा : ‘‘समय बहुत मूल्यवान होता है । हमें प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए । किसी भी व्यक्ति की प्रगति में समय महत्त्वपूर्ण होता है । मेरे जैसे साधक के लिए तो समय की पाबंदी जीवन-साधना का अनिवार्य अंग हो जाती है ।’’ मुखिया को समय की महत्ता समझ में आ गयी ।

 ~ सीख : जो समय को बरबाद करता है उसका जीवन भी बरबाद हो जाता है । समय का सदुपयोग करनेवाले का जीवन आबाद हो जाता है । सब कुछ देकर बीते हुए समय का एक क्षण भी वापस नहीं पा सकते हैं ।

 ~ संकल्प : हम भी सावधानी पूर्वक समय का खूब ख्याल रखेंगे।

 

सद्गुरु तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं… Guru Nanak Jayanti

guru nanak jayanti

(Guru Nanak Jayanti |  गुरु नानकजी जयंती : 12 नवम्बर ) -पूज्य बापूजी

ब्रह्मवेत्ता गुरु ने अपने सत्शिष्य पर कृपा बरसाते हुए कहा : ‘‘वत्स ! तेरा-मेरा मिलन हुआ है ( तूने मंत्रदीक्षा ली है ) तब से तू अकेला नहीं और तेरे-मेरे बीच दूरी भी नहीं है । दूरी तेरे-मेरे शरीरों में हो सकती है… आत्मराज्य में दूरी की कोई गुंजाइश नहीं । आत्मराज्य में देश-काल की कोई विघ्न-बाधाएँ नहीं आ सकतीं… देश-काल की दूरी नहीं हो सकती। तू अब आत्मराज्य में आ रहा है, इसलिए जहाँ तूने आँखें मूँदीं, गोता मारा… वहीं तू कुछ-न-कुछ पा लेगा ।

करतारपुर में सत्संगियों की भारी भीड़ में गुरु नानकजी सत्संग कर रहे थे । किसी भक्त ने ताँबे के 4 पैसे रख दिये । आज तक कभी भी नानकजी ने पैसे उठाये नहीं थे परंतु आज चालू सत्संग में उन पैसों को उठाकर दायीं हथेली से बायीं और बायीं हथेली से दायीं हथेली पर रखे जा रहे हैं । नानकजी के शिष्य बाला और मरदाना चकित-से रह गये । ताँबे के वे 4 पैसे, जो कोई 10-10 ग्राम का एक पैसा होता होगा, करीब 40 ग्राम होंगे ।

नानकजी बड़ी गम्भीर मुद्रा में बैठे हुए, सत्संग करते हुए पैसों को हथेलियों पर अदल-बदल रहे हैं । वे यह उसी समय कर रहे हैं, जिस समय सैकड़ों मील दूर उनका भक्त जो किराने का धंधा करता था, उसके द्वारा वजीर के लड़के को बेची गयी शक्कर राजा और वजीर के सामने तौली जा रही थी । उस व्यापारी भक्त ने वजीर के लड़के को जो शक्कर तौलकर दी थी, वह किसी असावधानी से रास्ते में थैले से ढुल गयी । वजीर ने शक्कर तौली तो 4 रानी छाप पैसे के वजन की शक्कर कम थी ।

वजीर ने राजा से शिकायत की । उस गुरुमुख को सिपाही पकड़कर राजदरबार में लाये । वह गुरुमुख अपने गुरु को ध्याता है: ‘नानकजी ! मैं आपके द्वार तो नहीं पहुँच सकता हूँ परंतु आप मेरे दिल के द्वार पर हो, मेरी रक्षा करो । मैंने तो व्यवहार ईमानदारी से किया है लेकिन अब शक्कर रास्ते में ही ढुल गयी या कैसे क्या हुआ यह मुझे पता नहीं । जैसे, जो भी हुआ हो, कर्म का फल तो भोगना ही है परंतु हे दीनदयालु ! मैंने यह कर्म नहीं किया है । मुझ पर राजा की, सिपाहियों की, वजीर की कड़ी नजर है किंतु गुरुदेव ! आपकी तो सदा मीठी नजर रहती है ।’

व्यापारी ने सच्चे हृदय से अपने सद्गुरु को पुकारा । नानकजी 4 पैसे ज्यों दायीं हथेली पर रखते हैं त्यों जो शक्कर कम थी वह पूरी हो जाती है । वजीर, तौलनेवाले तथा राजा चकित हैं । पलड़ा बदला गया । जब दायें पलड़े पर शक्कर का थैला था वह उठाकर बायें पलड़े में रखते हैं तो नानकजी भी अपने दायें पलड़े (हथेली) से पैसे उठाकर बायें पलड़े (हथेली) में रखते हैं और वहाँ शक्कर पूरी हुई जा रही है ।

ऐसा कई बार होने पर ‘खुदा की कोई लीला है, नियति है’ ऐसा समझकर राजा ने उस दुकानदार को छोड़ दिया ।

बाला, मरदाना ने सत्संग के बाद नानकजी से पूछा : ‘‘गुरुदेव ! आप पैसे छूते नहीं हैं फिर आज क्यों पैसे उठाकर हथेली बदलते जा रहे थे ?

नानकजी बोले : ‘‘बाला और मरदाना ! मेरा वह सोभसिंह जो था, उसके ऊपर आपत्ति आयी थी । वह था बेगुनाह । अगर गुनाहगार भी होता और सच्चे हृदय से पुकारता तब भी मुझे ऐसा कुछ करना ही पड़ता क्योंकि वह मेरा हो चुका है, मैं उसका हूँ । अब मैं उन दिनों का इंतजार करता हूँ कि वह मुझसे दूर नहीं, मैं उससे दूर नहीं, ऐसे सत् अकाल पुरुष को वह पा ले । जब तक वह काल में है तब तक प्रतीति में उसकी सत्-बुद्धि होती है, उसको अपमान सच्चा लगेगा, दुःखी होगा । मान सच्चा लगेगा, सुखी होगा, आसक्त होगा । मैं चाहता हूँ कि उसकी रक्षा करते-करते उसको सुख-दुःख दोनों से पार करके मैं अपने स्वरूप का उसको दान कर दूँ । यह तो मैंने कुछ नहीं उसकी सेवा की, मैं तो अपने-आपको दे डालने की सेवा का भी इंतजार करता हूँ ।

शिष्य जब जान जाता है कि गुरु लोग इतने उदार होते हैं… इतना देना चाहते हैं… शिष्य का हृदय और भी भावना से, गुरु के सत्संग से पावन होता है । साधक की अनुभूतियाँ, साधक की श्रद्धा, तत्परता और साधक की फिसलाहट, साधक का प्रेम और साधक की पुकार गुरुदेव जानते हैं ।

सीख : सच्चे हृदय की प्रार्थना, जब भक्त सच्चा गाये है ।
भक्तवत्सल के कान में, वह पहुँच झट ही जाय है ।।

संत तुलसीदास की जयंती [ Sant Tulsidas]

( क्या आप अपने बच्चों को हर प्राणी में…. हर वस्तु में…. ईश्वर को देखने का नजरिया देना चाहते हैं ???? तो उन्हें तुलसीदासजी की जयंती पर यह प्रसंग जरूर सुनाएं । )

संत तुलसीदासजी की प्रभुनिष्ठा……..

▪ संत तुलसीदासजी अरण्य में विचरण करने जा रहे थे । एक सुंदर, सुहावना वृक्ष देखकर वे उसकी छाया में बैठ गये और सोचने लगे :- ‘ प्रभु ! क्या आपकी लीला है ! आप कैसे फूलों में, फलों में निखरे हैं ! आपने वृक्ष के अंदर रस खींचने की कैसी लीला की है और कैसे रंग दे रखे हैं ! मेरे प्रभु ! आप कैसे सुहावने लग रहे हैं, मेरे रामजी ! ‘

▪ प्रभु की लीला देखते-देखते तुलसीदासजी आनंदित हो रहे थे । इतने में कोई लकड़हारा वहाँ से निकला और पेड़ पर चढ़कर धड़-धड़ करके वृक्ष काटने लगा । तुलसीदाजी घबराये और लकड़हारे के पास जाकर बोले :- भैया ! मैं तेरे पैर पकड़ता हूँ तू मेरे प्रभु को मत मार ।

लकड़हारे ने कहा :- ‘‘ महाराज ! मैं आपके प्रभु को तो कुछ नहीं कर रहा हूँ । “

तुलसीदाजी बोले :- ‘‘ नहीं, चोट तो पहुँच रही है । मुझे पेड़ नहीं…. पेड़ में मेरे प्रभु दिख रहे हैं । तू उनके इस रूप को न मार, चाहें मेरे इस शरीर को मार दे । मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ ।

लकड़हारा :- ‘‘ महात्मन् ! यह क्या हो गया है आपको ??? “

तुलसीदाजी :- ‘‘ देखो वे प्रभु कैसा सुंदर रूप लेकर सजे-धजे हैं और तुम उनके हाथ-पैर काट रहे हो । ऐसा न करो….मेरे हाथ काट लो । “

लकड़हारे का मन बदल गया और वह आगे चला गया………………………………….

▪ एक बार तुलसीदासजी यात्रा करते-करते किसी शांत वातावरण में बैठे थे । वहाँ से कभी हिरणों के झुंड गुजरते तो कभी अन्य प्राणियों के !! वहाँ से गुजर रहे हिरणों के झुंड को देखकर वे सोचने लगे :- ‘ प्रभु ! क्या आपकी लीला है !!! कैसी प्यारी-प्यारी आँखें हैं….. आपने कैसा निर्दोष चेहरा बनाया है….. मेरे रामजी !

तभी एक शिकारी तीर लेकर बारहसिंगे पर निशाना साध रहा था । तुलसीदासजी समझ गये ।

▪ शिकारी के पास गये और बोले :- ‘‘ यह क्या करता है ? मेरे ठाकुरजी, मेरे रामजी इतने सुंदर-सुंदर दिख रहे हैं । तू इनको न मार । भैया ! मारना है तो मुझे मार ।

…………..तो ये जो महात्मा लोग/ आत्मज्ञानी संत हैं……. वे तो तत्त्व में टिके हुए होते हैं लेकिन भाव से सब जगह – कीड़ी में, हाथी में, माई में, भाई में….. सबकी गहराई में परमेश्वर को देखते हैं ।

संतप्रवर तुलसीदासजी की वाणी है :- सीय राममय सब जग जानी । करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।।

संकल्प :- हम भी हर प्राणी की गहराई में छुपे हुए ईश्वर को निहारेंगे और सबसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे ।

प्रश्नोत्तरी :- लकड़हारे का मन कैसे बदल गया ?????