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swami vivekanand speech in chicago
Swami Vivekananda Speech in Chicago: Indian Culture Importance
Swami Vivekananda Speech in Chicago 1893: Importance of Indian Culture/ Hindu Dharam: आज से 125 वर्ष पूर्व सन् 1893 में शिकागो में जब विश्व धर्म परिषद (वर्ल्ड रिलीजियस पार्लियामेंट) का आयोजन हुआ था तब भारत के धर्म प्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानंद वहां गए थे । विश्व धर्म परिषद वाले मानते थे कि “यह तो भारत के कोई मामूली साधु हैं। इन्हें तो प्रवचन के लिए पांच मिनट भी
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dhanya hain bharat ke vidyarthi
धन्य हैं भारत के विद्यार्थी | Chinese Hiuen Tsang & Nalanda Vishwavidyalaya
[Chinese Traveller  Hiuen Tsang & Nalanda Vishwavidyalaya] ➠ आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व पटना (बिहार) में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में चीन, जापान, कोरिया, सियाम, लंका, तुर्किस्तान व यूनान आदि देशों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए आते थे । प्रसिद्ध चीनी यात्री हुएन्सांग (Chinese Traveller Hiuen Tsang) लिखता है कि ‘ संसार में ऐसा एक भी देश नहीं है जो नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda Vishwavidyalaya) को न जानता हो अथवा
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safalta ka raaz mahatma gandhiji
Bhoot Ka Darr Kaise Bhagaya, Mahatama GandhiJi: 2nd Oct Special
भूत का डर भाग गया…!! रात बहुत काली थी और मोहन डरा हुआ था । हमेशा से ही उसे भूतों से डर लगता था। वह जब भी अँधेरे में अकेला होता, उसे लगता की कोई भूत आस-पास है और कभी भी उस पर झपट पड़ेगा और आज तो इतना अँधेरा था कि कुछ भी स्पष्ट नहीं दिख रहा था , ऐसे में मोहन को एक कमरे से दूसरे कमरे में
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bankim chandra chatterjee bhagwad geeta par shraddha
Bankim Chandra Chatterjee: Bhagwad Geeta Par Dridh Shraddha
Bankim Chandra Chatterjee Bhagwat Geeta Par Shraddha : ▪ ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत के रचयिता बंकिमचंन्द्र चट्टोपाध्याय प्रतिदिन नियमित रूप से गीता का पाठ करते थे । ▪ एक बार वे बीमार पड़ गये । डॉक्टर ने उन्हें दवा दी, किंतु बंकिम बाबू ने वह दवा बाहर फेंक दी । उन्हें दवा की अपेक्षा गीता में ज्यादा श्रद्धा थी । वे गीता पढ़ने लगे । डॉक्टर यह देखकर चिढ़ते हुए बोला
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roz apne sankalp ko dohrao atma sakshatkar
Daily Morning: Roz Apne Lakshya/ Goal ko Repeat Karna Chahiye
Review and Repeat your Goal/ Target/ Lakshya Every Mornig (Subha ki Prayer) : ईश्वर के साक्षात्कार जैसा सरल और कोई काम नहीं है। जो वास्तविक ‘मैं’ है उसमें टिकने के लिए ओंकार अथवा जिस देव में प्रीति है उसका गुरुप्रदत्त मंत्र (गुरुमंत्र) जपते-जपते उसके अर्थ में लीन होते जायें ताकि दूसरे अनर्थकारी संस्कार, अनर्थकारी आकर्षण हटते जायें। यदि अनर्थकारी संस्कार ही सार दिखते हैं और सोचते हैं : ‘भजन तो
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