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गणेश जी का स्वरूप देता है अनोखी प्रेरणा
जो इन्द्रिय-गणों का, मन-बुद्धि गणों का स्वामी है, उस अंतर्यामी विभु का ही वाचक है ‘गणेश’ शब्द ।‘गणानां पतिः इति गणपतिः ।’ उस निराकार परब्रह्म को समझाने के लिए ऋषियों ने और भगवान ने क्या लीला की है !कथा आती है, शिवजी कहीं गये थे ।पार्वतीजी ने अपने योगबल से एक बालक पैदा कर उसे चौकीदारी करने रखा । शिवजी जब प्रवेश कर रहे थे तो वह बालक रास्ता रोककर
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सद्गुरु तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं…
( गुरु नानकजी जयंती : 12 नवम्बर ) -पूज्य बापूजी ब्रह्मवेत्ता गुरु ने अपने सत्शिष्य पर कृपा बरसाते हुए कहा : ‘‘वत्स ! तेरा-मेरा मिलन हुआ है ( तूने मंत्रदीक्षा ली है ) तब से तू अकेला नहीं और तेरे-मेरे बीच दूरी भी नहीं है । दूरी तेरे-मेरे शरीरों में हो सकती है… आत्मराज्य में दूरी की कोई गुंजाइश नहीं । आत्मराज्य में देश-काल की कोई विघ्न-बाधाएँ नहीं आ सकतीं…
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प्यार भरा अनुशासन
-पूज्य बापूजी “अनुशासन में प्यार और सामने वाले का हित तथा शुद्ध ज्ञान और मंगल भावना नहीं भरी है तो वह अनुशासन अहमपोषक और शासितों को सतानेवाला हो जाएगा। बिना प्यार का अनुशासन झगड़ा, तंगदिली और खिंचाव लाएगा। प्यार में से अनुशासन निकाला तो मोह बन जायेगा। अनुशासन तो जरूरी है पर उसमें प्यार मिला हुआ हो ।”
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बोलने से नहीं चुप रहने से होता है ज्यादा लाभ
🌷 मौन से शक्तिसंचय 🌷【बोलने से नहीं, चुप रहने से होता है ज्यादा लाभ..】 ▪ मौन से शक्ति की सुरक्षा, संकल्पबल में वृद्धि तथा मन के आवेगों पर नियंत्रण होता है। मानसिक तनाव दूर होते हैं। शारीरिक तथा मानसिक कार्यक्षमता बढ़ जाती है। ▪ ʹछांदोग्य उपनिषद्ʹ के अनुसार वाणी तेजोमय है। वाणी का निर्माण अग्नि के स्थूल भाग, हड्डी के मध्य भाग तथा मज्जा के सूक्ष्म भाग से होता है।
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शिक्षक कैसा होना चाहिए
शिक्षक का चरित्र ज्वाज्वल्यमान अग्नि के समान हो, जिससेउच्चतम शिक्षा का सजीव आदर्श शिष्य के सामने बना रहे। सच्चा शिक्षक वही है जो विद्यार्थी कोसीखने के लिए तत्काल उसी की मनोभूमि पर उतर आये और अपने आत्मा को अपने छात्र के आत्मा में एकरूप कर सके तथा जो छात्र की ही दृष्टि से देख सके, उसीके कानों से सुन सके व उसके मस्तिष्क से समझ सके। ऐसा ही शिक्षक शिक्षा
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