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safalta ka raaz mahatma gandhiji
Bhoot Ka Darr Kaise Bhagaya, Mahatama GandhiJi: 2nd Oct Special
भूत का डर भाग गया…!! रात बहुत काली थी और मोहन डरा हुआ था । हमेशा से ही उसे भूतों से डर लगता था। वह जब भी अँधेरे में अकेला होता, उसे लगता की कोई भूत आस-पास है और कभी भी उस पर झपट पड़ेगा और आज तो इतना अँधेरा था कि कुछ भी स्पष्ट नहीं दिख रहा था , ऐसे में मोहन को एक कमरे से दूसरे कमरे में
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bankim chandra chatterjee bhagwad geeta par shraddha
Bankim Chandra Chatterjee: Bhagwad Geeta Par Dridh Shraddha
Bankim Chandra Chatterjee Bhagwat Geeta Par Shraddha : ▪ ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत के रचयिता बंकिमचंन्द्र चट्टोपाध्याय प्रतिदिन नियमित रूप से गीता का पाठ करते थे । ▪ एक बार वे बीमार पड़ गये । डॉक्टर ने उन्हें दवा दी, किंतु बंकिम बाबू ने वह दवा बाहर फेंक दी । उन्हें दवा की अपेक्षा गीता में ज्यादा श्रद्धा थी । वे गीता पढ़ने लगे । डॉक्टर यह देखकर चिढ़ते हुए बोला
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roz apne sankalp ko dohrao atma sakshatkar
Daily Morning: Roz Apne Lakshya/ Goal ko Repeat Karna Chahiye
Review and Repeat your Goal/ Target/ Lakshya Every Mornig (Subha ki Prayer) : ईश्वर के साक्षात्कार जैसा सरल और कोई काम नहीं है। जो वास्तविक ‘मैं’ है उसमें टिकने के लिए ओंकार अथवा जिस देव में प्रीति है उसका गुरुप्रदत्त मंत्र (गुरुमंत्र) जपते-जपते उसके अर्थ में लीन होते जायें ताकि दूसरे अनर्थकारी संस्कार, अनर्थकारी आकर्षण हटते जायें। यदि अनर्थकारी संस्कार ही सार दिखते हैं और सोचते हैं : ‘भजन तो
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satya saman dharm nahi, jhuth saman nahi paap
Satya Ke Saman Dharm Nahi, Jhuth Ke Saman Paap Nahi: Gandhi Ji
Mahatma Gandhi Ji : Sach Vs Jhuth. Satya Ahimsa Philosophy of GandhiJi, Truth Vs Lies:  ‘सत्य के समान कोई तप नहीं है एवं झूठ के समान कोई पाप नहीं है ।’ जिसके हृदय में सच्चाई है, उसके हृदय में स्वयं परमात्मा निवास करते हैं । एक बार स्कूल में विद्यार्थियों के अंग्रेजी की परीक्षा के लिए कुछ अंग्रेज इन्स्पेक्टर आये हुए थे । उन्होंने कक्षा के समस्त विद्यार्थियों को एक-एक कर पाँच शब्द
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sant ki ninda jo kare swami tulsidas ji
Sant Ki Ninda Jo Kare, Unhe Hona Pade Sharminda: Tulsidas Ji
काशी में तुलसीदास जी की बढ़ती ख्याति देखकर साजिशों की श्रृंखला को बढ़ाते हुए काशी के ही कुछ पंडितों को तुलसीदास जी के खिलाफ भड़काया गया। वहाँ कुप्रचारकों का एक टोला बन गया, जो नये-नये वाद-विवाद खड़े करके गोस्वामी जी को नीचा दिखाने में लगा रहता था। परंतु जैसे-जैसे कुप्रचार बढ़ता, अंजान लोग भी सच्चाई जानने के लिए सत्संग में आते और भक्ति रस से पावन होकर जाते, जिससे संत
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