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Ram Navmi
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामजी की मर्यादा
  • विद्यार्थी काल जीवन का श्रेष्ठतम समय होता है । इस काल का परम सदुपयोग कैसे करें ? इसके लिए भगवान श्रीरामचन्द्रजी की बाल्यावस्था बड़ी ही प्रेरणादायी व अनुकरणीय है । रामजी ऐसे थे कि अयोध्या के बालक इनसे मित्रता करके परम सुखी होते थे । ये खिलौने, वस्त्र, आभूषण अपने मित्रों को बाँट दिया करते थे । खेल में ये जानबूझकर हार जाते । इनके दिल में परहित का प्रभाव खिलता और मित्र जीतकर खुश होते, उनका उत्साह बढ़ता । उनके उत्साह और खुशी में भी इनको खुशी मिलती । तीनों भाई श्रीरामजी की सेवा करते और उन्हें प्रसन्न करने की सदा चेष्टा करते तथा श्रीरामजी भी सदा भाइयों को सुख पहुँचाने और प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे ।
  • नगर के लोग राजकुमारों को अपने प्राणों के समान प्यार करते थे । राजकुमार होने पर भी वे बालक नगर के लोगों में जो जैसे बड़े आदरणीय थे, उनका उसी प्रकार आदर करते थे । वे बड़ों को नम्रता से प्रणाम करते थे । प्रजा में पुरस्कार बाँटते थे और सबको प्रसन्न करते थे । 6 वर्ष की अवस्था होते ही राजकुमारों का यज्ञोपवीत संस्कार हो गया और वे कुलगुरु ब्रहर्षि वसिष्ठजी के आश्रम में विद्याध्ययन हेतु चले गये ।
  • उन दिनों आजकल की भाँति स्कूल कॉलेज नहीं थे । विद्यार्थी बड़े संयम-नियम से रहकर गुरुदेव की सेवा करते थे उनके पास बिछाने या कंधे पर रखने को एक मृगछाला रहती थी । विद्यार्थी जमीन पर मृगछाला बिछाकर सोते थे । प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर आत्मचिंतन करने के बाद शौच, स्नान, संध्या तथा हवन आदि नित्यकर्म करते थे । दोपहर तथा सायंकाल में भी संध्या और हवन किया जाता था ।
  • गुरुदेव का आश्रम नगर से दूर वन में होता था । आश्रम में झाडू लगाने, लीपने, पौधों में जल देने, कुश व फूल तोड़ने तथा हवन के लिए लकड़ियाँ लाने की सेवा विद्यार्थी ही करते थे । विद्यार्थी एक समय नगर या ग्रामों से भिक्षा माँगकर ले आते और गुरुदेव को अर्पण करते थे । उसमें से गुरुदेव जो दे देते थे, उसी को प्रसादरूप में पाकर संतुष्ट रहते थे । इस प्रकार गुरुसेवा करते हुए गुरुकृपा से जो विद्या प्राप्त होती थी, वह विद्या इस लोक और परलोक में भी कल्याण करने वाली होती थी ।
  • गुरुदेव के आश्रम में धनी-दरिद्र के बालकों में कोई भेद नहीं होता था । सभी बालक समान भाव से ही रहते थे । श्रीरामजी सहित चारों भाइयों ने बहुत थोड़े दिनों में ही गुरुमुख से सुनकर चारों वेद, चारों उपवेद, छः शास्त्र, वेद के छः अंग, इतिहास, पुराण और सभी कलाएँ सीख लीं ।
गुरगृहं गए पढ़न रघुराई ।
अलप काल बिद्या सब आई ॥
  • गुरुदेव ने राजकुमारों को सब विद्याओं में निपुण हुआ देखकर घर लौटने की आज्ञा दी । विधिपूर्वक गुरुदक्षिणा देकर और समावर्तन संस्कार (गुरुकुल में विद्याध्ययन के बाद गुरु – अनुमति से घर वापस जाने का संस्कार) कराके चारों राजकुमार राजधानी में लौट आये ।
  • मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीरामजी धर्म के साक्षात् स्वरूप हैं । उनका चरित्र विश्वमानव के लिए आदर्श चरित्र है । उनके बाल्यकाल से लेकर प्रयाणकाल तक की सम्पूर्ण चेष्टाएँ धर्म व मर्यादा से ओतप्रोत हैं । वे सभी विद्याओं तथा ज्ञान के सागर होते हुए भी गुरु-आश्रम में रहकर गुरुसेवा की मर्यादा का इतना उत्कृष्ट आदर्श प्रस्तुत करते हैं कि समस्त विश्व उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ कहता है ।

Ram Navami Puja Vidhi at Home

राम नवमी को अगर सामान्य विधि-विधान से लेकिन संपूर्ण मन और चित्त से पूजन और उपाय किए जाए तो निश्चित रूप से अपार धन संपदा की प्राप्ति होगी ।

मंत्र : राम रामाय नमः।

राम स्तुति – श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन का पाठ अवश्य करें, यहाँ से

Happy Ram Navami 2022 Wishes, Messages

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।
कोशल देश की वह कौशल्या…

अर्थात् योगः कर्मसु कौशलम् । कुशलतापूर्वक कर्म वाली मति कौशल्या हो जायेगी और कौशल्या के यहाँ मति का हित करने वाले सच्चिदानंद राम प्रकट होंगे ।
– पूज्य बापूजी

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः ।
जिनमें योगी लोगों का मन रमण करता है वे हैं रोम-रोम में बसने वाले अंतरात्मा राम ।
– पूज्य बापूजी

रामजी आत्मरस में रसवान थे तो उनका दर्शन करने से लोगों को आनंद, आह्वाद, पुण्य, पवित्रता, सत्प्रेरणा मिलते थे व मिलते हैं ।

श्रीरामचन्द्रजी परम ज्ञान में नित्य रमण करते थे। ऐसा ज्ञान जिनको उपलब्ध हो जाता है, वे आदर्श पुरुष हो जाते हैं ।
– पूज्य बापूजी

कष्ट आप सहें और यश और भोग सामने वाले को दें, यह सिद्धांत श्रीरामचन्द्रजी जानते हैं ।
– पूज्य बापूजी

श्रीरामचन्द्रजी प्रेम व पवित्रता की मूर्ति थे, प्रसन्नता के पुंज थे। ऐसे प्रभु राम का प्राकट्य दिन राम नवमी की आप सबको बधाई हो !
– पूज्य बापूजी

श्रीरामचन्द्रजी का श्वासोच्छ्वास समाज के हित में खर्च होता था । उनका उपास्य देव आकाश-पाताल में दूसरा कोई नहीं था, उनका उपास्य देव जनता-जनार्दन थी । – पूज्य बापूजी

श्रीरामजी का ऐसा लचीला स्वभाव है कि दूसरे के अनुकूल हो जाने की कला रामजी जानते हैं । – पूज्य बापूजी

निंदा सुनने में रामचन्द्रजी का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाता, वे अपने समय का दुरुपयोग नहीं करते थे । – पूज्य बापूजी

रामराज्य की तैयारियाँ हो रही हैं, राज्याभिषेक की शहनाइयाँ बज रही हैं, मंगल गीत गाये जा रहे हैं लेकिन दस इन्द्रियों में रत जीव दशरथ । रामराज्य की तैयारियाँ होते-होते कैकयी के कहे-सुने में आ जाता है अर्थात् कामनाओं के जाल में फँस जाता है । रामराज्य की जगह राम-वनवास हो जाता है । – पूज्य बापूजी

राम कहाँ प्रकट होते हैं ? कौशल्या की गोद में, लेकिन कैसे प्रकट होते हैं कि दशरथ यज्ञ करते हैं अर्थात् साधन, पुण्यकर्म करते हैं और उस साधन-पुण्य, साधन-यज्ञ से उत्पन्न वह हवि बुद्धि रूपी कौशल्या लेती है और उसमें सच्चिदानंद राम का प्राकट्य होता है । आपकी मतिरूपी कौशल्या के स्वभाव में राम प्रकट हों ।
– पूज्य बापूजी

शत्रु हो तो रामजी जैसा हो । रावण जब वीरगति को प्राप्त हुआ तो श्रीराम कहते हैं : “हे विभीषण ! जाओ, पंडित, बुद्धिमान व वीर रावण की अग्नि-संस्कार विधि सम्पन्न करो ।
– पूज्य बापूजी

श्रीरामचन्द्रजी परम ज्ञान में नित्य रमण करते थे । ऐसा ज्ञान जिनको उपलब्ध हो जाता है, वे आदर्श पुरुष हो जाते हैं ।
– पूज्य बापूजी

श्रीरामजी का चित्त सर्वगुणसम्पन्न है । कोई भी परिस्थिति उनको द्वन्द्व या मोह में खींच नहीं सकती । वे द्वन्द्वातीत, गुणातीत, कालातीत स्वरूप में विचरण करते हैं ।
– पूज्य बापूजी

भगवान रामजी में धैर्य ऐसा जैसे पृथ्वी का धैर्य और उदारता ऐसी कि जैसे कुबेर भंडारी देने बैठे तो फिर लेने वाले को कहीं माँगना न पड़े, ऐसे रामजी उदार !
– पूज्य बापूजी

श्रीरामचन्द्रजी बाल्यकाल में गुरु-आश्रम में रहते हैं तो गुरुभाइयों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि हर गुरुभाई महसूस करता है कि ‘रामजी हमारे हैं ।’ – पूज्य बापूजी

कोई रामचन्द्रजी के आगे बात करता है तो वे उसकी बात तब तक सुनते रहते, जब तक किसी की निंदा नहीं होती अथवा बोलने वाले के अहित की बात नहीं है और फिर उसकी बात बंद कराने के लिए रामजी सत्ता व बल का उपयोग नहीं करते हैं, विनम्रता और युक्ति का उपयोग करते हैं, उसकी बात को घुमा देते हैं ।
– पूज्य बापूजी

Ram Navami 2022 Whatsapp Status

Some FAQ’s for Ram Navmi 2022

10 अप्रैल 2021

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।कोसल देश की वह कौसल्या… अर्थात् योगः कर्मसु कौशलम् । कुशलतापूर्वक कर्मवाली मति कौसल्या हो जायेगी और कौसल्या के यहाँ मति का हित करनेवाले सच्चिदानंद राम प्रकट होंगे । – पूज्य बापूजी

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः । जिनमें योगी लोगों का मन रमण करता है वे हैं रोम-रोम में बसनेवाले अंतरात्मा राम । – पूज्य बापूजी

रामजी आत्मरस में रसवान थे तो उनका दर्शन करने से लोगों को आनंद, आह्वाद, पुण्य, पवित्रता, सत्प्रेरणा मिलते थे व मिलते हैं ।
– पूज्य बापूजी

श्रीरामचन्द्रजी परम ज्ञान में नित्य रमण करते थे। ऐसा ज्ञान जिनको उपलब्ध हो जाता है, वे आदर्श पुरुष हो जाते हैं ।
– पूज्य बापूजी

कष्ट आप सहें और यश और भोग सामनेवाले को दें, यह सिद्धांत श्रीरामचन्द्रजी जानते हैं । – पूज्य बापूजी

श्रीरामजी का चित्त सर्वगुणसम्पन्न है। कोई भी परिस्थिति उनको द्वन्द्व या मोह में खींच नहीं सकती। वे द्वन्द्वातीत, गुणातीत, कालातीत स्वरूप में विचरण करते हैं । – पूज्य बापूजी

श्रीरामचन्द्रजी का श्वासोच्छ्वास समाज के हित में खर्च होता था । उनका उपास्य देव आकाश-पाताल में दूसरा कोई नहीं था, उनका उपास्य देव जनता-जनार्दन थी । – पूज्य बापूजी

श्रीरामजी का ऐसा लचीला स्वभाव है कि दूसरे के अनुकूल हो जाने की कला रामजी जानते हैं । – पूज्य बापूजी

निंदा सुनने में रामचन्द्रजी का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाता, वे अपने समय का दुरुपयोग नहीं करते थे । – पूज्य बापूजी

रामराज्य की तैयारियाँ हो रही हैं, राज्याभिषेक की शहनाइयाँ बज रही हैं, मंगल गीत गाये जा रहे हैं लेकिन दस इन्द्रियों में रत जीव दशरथ । रामराज्य की तैयारियाँ होते-होते कैकयी के कहे-सुने में आ जाता है अर्थात् कामनाओं के जाल में फँस जाता है । रामराज्य की जगह राम-वनवास हो जाता है । – पूज्य बापूजी

राम कहाँ प्रकट होते हैं ? कौसल्या की गोद में, लेकिन कैसे प्रकट होते हैं कि दशरथ यज्ञ करते हैं अर्थात् साधन, पुण्यकर्म करते हैं और उस साधन-पुण्य, साधन-यज्ञ से उत्पन्न वह हवि बुद्धिरूपी कौसल्या लेती है और उसमें सच्चिदानंद राम का प्राकट्य होता है। आपकी मतिरूपी कौसल्या के स्वभाव में राम प्रकट हों ।

शत्रु हो तो रामजी जैसा हो । रावण जब वीरगति को प्राप्त हुआ तो श्रीराम कहते हैं : “हे विभीषण ! जाओ, पंडित, बुद्धिमान व वीर रावण की अग्नि-संस्कार विधि सम्पन्न करो ।

श्रीरामचन्द्रजी परम ज्ञान में नित्य रमण करते थे। ऐसा ज्ञान जिनको उपलब्ध हो जाता है, वे आदर्श पुरुष हो जाते हैं ।
– पूज्य बापूजी

शत्रु हो तो रामजी जैसा हो । रावण जब वीरगति को प्राप्त हुआ तो श्रीराम कहते हैं : “हे विभीषण ! जाओ, पंडित, बुद्धिमान व वीर रावण की अग्नि-संस्कार विधि सम्पन्न करो ।

भगवान रामजी में धैर्य ऐसा जैसे पृथ्वी का धैर्य और उदारता ऐसी कि जैसे कुबेर भंडारी देने बैठे तो फिर लेनेवाले को कहीं माँगना न पड़े, ऐसे रामजी उदार ! – पूज्य बापूजी

श्रीरामचन्द्रजी बाल्यकाल में गुरु-आश्रम में रहते हैं तो गुरुभाइयों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि हर गुरुभाई महसूस करता है कि ‘रामजी हमारे हैं ।’ – पूज्य बापूजी

कोई रामचन्द्रजी के आगे बात करता है तो वे उसकी बात तब तक सुनते रहते, जब तक किसी की निंदा नहीं होती अथवा बोलनेवाले के अहित की बात नहीं है और फिर उसकी बात बंद कराने के लिए रामजी सत्ता व बल का उपयोग नहीं करते हैं, विनम्रता और युक्ति का उपयोग करते हैं, उसकी बात को घुमा देते हैं । – पूज्य बापूजी