Navratri 2020: 9 Days Festival Aadi Shakti Maa Durga Puja Ke

9 Days Festival Aadi Shakti Navratri 2020

जगत में शक्ति के बिना कोई काम सफल नहीं होता है । चाहें आपका सिद्धांत कितना भी अच्छा हो, आपके विचार कितने ही सुंदर और उच्च हों लेकिन अगर आप शक्तिहीन हैं तो आपके विचारों का कोई मूल्य नहीं होगा । विचार अच्छा है, सिद्धांत अच्छा है, इसलिए सर्वमान्य हो जाता है ऐसा नहीं है ।

चुनाव में भी देखो तो हार-जीत होती रहती है । ऐसा नहीं है कि यह आदमी अच्छा है इसलिए चुनाव में जीत गया और वह आदमी बुरा है इसलिए हार गया । आदमी अच्छा हो या बुरा, चुनाव में जीतने के लिए जिसने ज्यादा शक्ति लगायी वह जीत जायेगा । वास्तव में किसी भी विषय में जो ज्यादा शक्ति लगाता है, वह जीतता है ।

वकील लोगों को भी पता होगा, कई बार ऐसा होता है कि मुवक्किल चाहें ईमानदार हो चाहें बेईमान…  परन्तु जिस वकील के तर्क जोरदार-जानदार होते हैं, वह मुकदमा जीत जाता है ।

ऐसे ही जीवन में विचारों को, सिद्धांतों को प्रतिष्ठित करने के लिए बल चाहिए, शक्ति चाहिए ।

जीवन में कदम-कदम पर कैसी-कैसी मुश्किलें, कैसी-कैसी समस्याएँ आती हैं ! उनसे लड़ने के लिए, उनका सामना करने के लिए भी शक्ति चाहिए और वह शक्ति आराधना-उपासना से मिलती है ।

शक्ति की अधिष्ठात्री देवी है माँ जगदम्बा और उनकी उपासना का पर्व है नवरात्रि ।

शस्त्रों में आता है :

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।

‘ जो देवी समस्त प्राणियों में शक्तिरूप से स्थित हैं…. उन माँ जगदम्बा को नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है ।’

नवरात्रि को तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है । इसमें पहले तीन दिन तमस को जीतने की आराधना के हैं । दूसरे तीन दिन रजस को और तीसरे तीन दिन सत्व को जीतने की आराधना के हैं । आखिरी दिन दशहरा है । वह सात्विक, रजस और तमस तीनों गुणों को जीत के जीव को माया के जाल से छुड़ाकर शिव से मिलाने का दिन है ।

जिस दिन महामाया ब्रह्मविद्या महिषासुर रुपी आसुरी वृत्तियों को मारकर जीव के ब्रह्मभाव को प्रकट करती हैं, उसी दिन जीव की विजय होती है इसलिए उसका नाम ‘विजयादशमी‘ है । हज़ारों-लाखों जन्मों से जीव त्रिगुणमयी माया के चक्कर में फँसा था, आसुरी वृत्तियों के फँदे में पड़ा था । जब महामाया जगदम्बा की अर्चना-उपासना-आराधना की तब वह जीव विजेता हो गया । माया के चक्कर से, अविद्या के फँदे से मुक्त हो गया, वह ब्रह्म हो गया ।

‘श्रीमद देवी भागवत’ शक्ति के उपासकों का मुख्य ग्रन्थ है । उसमें माँ जगदम्बा की महिमा का वर्णन है । उसमें आता है कि जगत में अन्य जितने व्रत एवं विविध प्रकार के दान हैं वे नवरात्रि व्रत की तुलना कदापि नहीं कर सकते  क्योंकि  यह व्रत महासिद्धि देने वाला, धन-धान्य प्रदान करने वाला, सुख व सन्तान बढ़ाने वाला, आयु एवं आरोग्य वर्धक तथा स्वर्ग और मोक्ष तक देने में समर्थ है । यह व्रत शत्रुओं का दमन व बल की वृद्धि करने वाला है । महान-से-महान पापी भी यदि नवरात्रि व्रत कर ले तो संपूर्ण पापों से उसका उद्धार हो जाता है ।

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्रि पर्व होता है । यदि कोई पूरे नवरात्रि के उपवास-व्रत न कर सकता हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी – तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह संपूर्ण नवरात्रि के उपवास के फल को प्राप्त करता है ।

ऋषि प्रसाद / सितम्बर २००६

Pujya BapuJi’s Sandesh on Shardiya Navratri 2020

navratri vishesh bapuji sandesh

आप भी अपनी आत्मशक्ति जगाओ !

-पूज्य बापूजी

जितना जीवन में शक्ति का विकास होता है, उतना ही जीवन हर क्षेत्र में सार्थक होता है । नवरात्रि शक्ति की आराधना-उपासना के दिन हैं । सनातन धर्म के जो भी देव हैं, वे दुर्बलता को नहीं मानते । इसलिए सब देवों के पास आसुरी शक्तियों का प्रतिकार करने के लिए अस्त्र-शस्त्र हैं । हनुमान जी के पास गदा है, रामजी के पास धनुष-बाण है, श्रीकृष्ण, विष्णुजी के पास सुदर्शन चक्र है ।

समाज या संसार में देखा गया है कि तुम्हारे विचार कितने भी अच्छे हों, तुम कितने भी सज्जन और पवित्र हो लेकिन तुम शक्तिहीन हो तो तुम्हारे को कोई गिनती में नहीं लेगा । जिनके हलके विचार हैं, जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं लेकिन शक्ति सम्पन्न हैं तो उनके विचार फैल जायेंगे ।

विचार अच्छे हैं या बुरे हैं इसलिए उनका फैलाव होता है… ऐसी बात नहीं है, उनके पीछे शक्ति होती है तो फैलाव होता है ।

जीवन में शक्ति ऐसी होनी चाहिए कि मौत जब आये तो अपनी एक दृष्टिमात्र से मौत का रुख भी बदल जाए हमारे से व्यवहार करने में ।

मंसूर, महात्मा बुद्ध, श्री रामकृष्ण परमहंस, संत एकनाथ और संत ज्ञानेश्वर जी जैसे महापुरुषों के जीवन में विरोध, संघर्ष कितना ही घटा, फिर भी उनके हृदय में शांति बनी रही… यह शक्ति का फल है ।

“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः…”

 (मुण्डकोपनिषद : ३.२.४)

अर्थात दुर्बल मन के व्यक्ति में आत्मज्ञान टिकता नहीं है ।

कोई भी सिद्धांत, कोई भी मित्र तब तक तुम्हें विशेष सहायता नहीं कर पाता जब तक तुम शक्तिहीन हो । तुम्हारे पास शक्ति होगी तो तुम्हारे शत्रु भी मित्र हो जायेंगे और तुम अंदर से शक्तिहीन हुए तो मित्र भी किनारा कर जायेंगे । हाँ, सद्गुरु या परमात्मा की बात अलग है, वे कभी साथ नहीं छोड़ते ।

एक होती है शारीरिक शक्ति, जैसे गामा पहलवान, दारा सिंह, किंगकॉंग आदि के पास थी लेकिन शरीर की शक्ति सर्वस्व नहीं है । और भी शक्तियाँ होती हैं, जैसे मन की शक्ति, बुद्धि की शक्ति, धन की शक्ति, अस्त्र-शस्त्रों की शक्ति, बड़े आदमियों से जान पहचान की शक्ति आदि । लेकिन ये सब शक्तियाँ आत्मबल पर आधारित हैं ।

व्यक्ति जब भीतर से आत्मशक्ति से हारता है तो छोटे-छोटे, तुच्छ आदमी भी उसको हरा देंगे और जिसने आत्मशक्ति नहीं खोयी उसको बड़े-बड़े असुर भी नहीं हरा सकते ।

जगदम्बा का प्राकट्य कैसे हुआ ? महिषासुर का मरण कैसे हुआ ? – इस विषय में आपने पौराणिक ढंग से कहानी सुनी है किंतु तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो सुरों-असुरों का युद्ध अनादि काल से चला आ रहा है । जब-जब सुर (देवगण) कमजोर होते हैं और असुर जोर पकड़ते हैं तो अशांति, हाहाकार मच जाता है और जब देवता, सज्जन लोग भगवान की शरण जाते हैं तो भगवान का सहयोग पाकर वे असुरों पर विजय पा लेते हैं । फिर सुख-शांति, अमन-चैन का वातावरण होता है ।

जब दुःख, विघ्न-बाधाएं आती हैं तो तुम्हें अपनी सुषुप्त शक्ति जागृत करने का संकेत देती हैं और जब सुख-सुविधाएँ आती हैं और तुम उनका सदुपयोग करके उनमें फँसते नहीं हो तो वे ही सुविधा और सुख परम सुख के द्वार खोल देती हैं ।

शक्ति की उपासना नवरात्रियों में करते हैं । जैसा व्यक्ति होता है, उसकी उपासना उस प्रकार की होती है लेकिन जीवन में शक्ति की आवश्यकता तो है । स्थूल शरीर की शक्ति, मन की शक्ति, बुद्धि की शक्ति – ये तीनों शक्तियाँ हों लेकिन ये आने के बाद क्षीण भी हो जाती हैं । जवानी में शरीर, मन व बुद्धि की शक्ति रहती है । लेकिन ये प्रकृति-अंतर्गत हैं । परंतु जब आत्मशक्ति आती है तो वह परम शक्ति है ।

जैसे आधिदैविक, आधिभौतिक, मानसिक शांति – ये शांतियाँ आती-जाती हैं लेकिन जब तत्वज्ञान होता है तो ‘ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम्…’ तत्वज्ञान मिलने पर परम शांति आती है और तत्वज्ञान गुरुप्रसाद और आत्मविचार का फल है ।

~ऋषि प्रसाद / सितम्बर २०१९

Ramakrishna Paramahamsa Short Story in Hindi: Navratri Special

RamaKrishna Paramahansa Story Rani Rasmani Navratri Special

“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता…”

श्री रामकृष्ण परमहंस की भक्त मंडली में रानी रासमणि का नाम बड़ी प्रमुखता से लिया जाता है ।

एक बार की बात है, दुर्गाष्टमी का पर्व निकट था । रानी रासमणि के पास लोगों ने निवेदन किया कि “इस बार माँ दुर्गा को चाँदी के रथ में सजाकर यात्रा निकाली जाए ।”

रानी रासमणि को यह विचार पसंद आया और उन्होंने सेवकों को रथ सजाने का निर्देश दे दिया । रथ तैयार होकर आते ही लोगों में मानो हर्षोल्लास की बाढ़ आ गई । ढोल-नगाड़े, झांझ-मृदंग आदि वाद्यों से पूरा मोहल्ला गूँज उठा ।

रानी की हवेली के सामने एक अंग्रेज रहता था। उसे यह शोर अच्छा नहीं लगा। मन-ही-मन वह जल-भुन गया । उसने कमिश्नर से शिकायत करके पुलिस को बाजे बंद कराने का हुक्म दिलवा दिया किंतु रानी रासमणि ने पुलिस वालों की एक न सुनी ।

वे बोलीं : “यह तो हमारे उत्सव का दिन है। हम तुम्हारी तरह केवल मोमबत्ती जलाकर उत्सव नहीं मानते । हम तो ढोल-नगाड़े, मृदंग-मंजीरे बजाकर सारी दुनिया को चैतन्यमय, भक्तिभावमय करते हैं। धर्म के मामले में ऐसी दखलअंदाजी हम जरा भी बर्दाश्त नहीं करेंगे । “

रानी रासमणि ने वाद्य यंत्रों की संख्या दूनी कर देने का आदेश दिया । सेवकों ने तदनुसार ही किया । चाँदी के भव्य रथ में माँ दुर्गा की श्रृंगार-सुशोभित मूर्ति बिठाकर बड़े उत्साह से शोभायात्रा प्रारंभ हुई । विविध वाद्यों की गगनभेदी ध्वनि से इलाका गूँज उठा ।

वह गोरा कान में उँगली डाले अपने घर की खिड़की से झाँक रहा था और कुछ-का-कुछ बके जा रहा था ।

अपनी हँसी होते देखकर उसके अभिमान को करारी ठेस लगी ।

अपने ४-५ साथियों को लेकर वह गंगाघाट गया और वहाँ मंदिर के कबूतरों को बंदूक से मारने लगा । वहाँ से गुजर रहे लोगों को भी वह परेशान कर रहा था। रानी तक यह खबर पहुँची तो वे बोलीं : “लगता है इस उद्दंड को कड़ा सबक सिखाना पड़ेगा ।”

दूसरे दिन भी वह अंग्रेज हाथ में बंदूक लेकर बड़े रुआब से रानी की हवेली के सामने से निकला। कुछ कदम आगे गया तो देखा, रास्ता बंद ! रास्ते पर तो ऊँची दीवार खड़ी हुई है । उसका गुस्सा और भड़का : “हमारे ही राज में हमसे ही बैर ! इस रानी की शान ठिकाने लानी पड़ेगी !”

अंग्रेज ने कोर्ट में फरियाद कर दी । रानी कोर्ट में हाजिर हुई और भरी अदालत में अंग्रेज की भर्त्सना करते हुए कड़क शब्दों में कहा “यह रास्ता हमने अपने खर्चे से बनवाया है । इस पर हमारा पूरा-पूरा अधिकार है । वहाँ दीवार खड़ी करनी या नहीं यह हमारा विषय है । यदि मेरी बात आपको गैरवाजिब लगती हो तो ये कागजात आप देख सकते हैं ।”

हाथ कंगन को आरसी क्या ? न्यायाधीश क्या कहता ? रानी की जीत हुई और अंग्रेज की अच्छी फजीहत हो गयी ।

पूरे कोलकाता में रानी रासमणि की प्रशंसा होने लगी । उस जमाने में….. जबकि लोग अंग्रेजों के नाम से डरे-सहमे रहते थे, एक विधवा नारी का अंग्रेजों से टक्कर लेना बड़े साहस की बात थी ।

नारी अबला नहीं है, आदिशक्ति का परम सामर्थ्य उसमें छुपा हुआ है । उसमें पालिनी शक्ति है तो विध्वंसिनी शक्ति भी है । भक्तों के लिए जो वात्सल्यमयी है वह दुष्टों के लिए काली-कराली भी है । माँ अनसूइया, सती सावित्री, माँ सीता, गार्गी जैसी सन्नारियाँ इस धरा पर हो चुकी हैं, जिन पर भारत को आज भी गर्व है।

इसीलिए तो ‘दुर्गा सप्तशती’ में आता है :

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

~ लोक कल्याण सेतु / नव.-दिस. 2008

Importance of Fasting during Navratri 2020| Navratri Vrat Katha

importance of fasting during navratri

Benefits of Navratri Fast/ Vrat/ Upvas [The importance of fasting during Navratri]

नवरात्र-व्रत पापनाशक हैइसमें उपवास करके देवी भगवती की पूजा,जप व होम करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती हैधर्म,अर्थ, काम व मोक्षइन चारों की अभिलाषा करने वाले को यह उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिए । -परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

प्राचीन समय की बात है- एक वैश्य निर्धनता के कारण बहुत दुःखी था। बड़ी कठिनाई से वह कुटुम्ब का भरण-पोषण करता था। इस कारण उसके मन में अपार चिंता रहती पर वह धर्म में सदैव तत्पर रहता था। वह कभी भी असत्य भाषण नहीं करने वाला व बड़ा ही सदाचारी था । वह सदैव धैर्य से कार्य करता व मन में अहंकार, डाह तथा क्रोध नहीं आने देता था । इन्हीं उत्तम गुणों के कारण उसका नाम सुशील रख दिया गया था।

एक दिन दरिद्रता से अत्याधिक घबराकर उसने एक शांत स्वभाव मुनि से पूछा :”ब्राह्मण देवता ! आपकी बुद्धि बड़ी विलक्षण है । कृपा करके आप यह बताइये कि मेरी दरिद्रता कैसे दूर हो सकती है? मेरी छोटी बच्ची और बच्चे भोजन के लिए रोते रहते हैं। मेरी एक लड़की विवाह के योग्य हो गयी है । मेरे पास धन नहीं है, मैं क्या करूँ ? कोई भी ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं अपने आश्रित-जनों का भरण-पोषण सुचारु रूप से कर सकूँ । बस, मुझे इतना ही धन चाहिए । दयानिधे ! आपकी कृपा से मेरा परिवार सुखी हो जाए ।”

मुनि ने कहा :”वैश्यवर ! तुम श्रेष्ठ नवरात्र-व्रत करो । भगवान श्रीराम राज्य से च्युत हो गये थे व उन्हें सीताजी का वियोग हो गया था । उस समय किष्किन्धा में उन्होंने यह व्रत कर भगवती जगदम्बा की उपासना की । फिर महाबली रावण का वध किया तथा जनकनन्दिनी सीताजी व निष्कंटक राज्य को पाया । यह सब नवरात्र- व्रत के प्रभाव से ही हुआ था।”

मुनि की बात सुनकर सुशील ब्राम्हण ने उन्हें अपना गुरु बना लिया और उनसे भगवती के मंत्र की दीक्षा ले ली । फिर नवरात्र-व्रत करके संयमपूर्वक उत्तम भक्ति के साथ उसने जप का आरंभ कर दिया । आदरपूर्वक माँ भवानी की आराधना की ।

नौ वर्षों के प्रत्येक नवरात्र में देवी का पूजन करके उसने मंत्र का जप किया । नौवें वर्ष के नवरात्र में अष्टमी के दिन आधी रात के समय भगवती ने प्रकट होकर उस वैश्य को दर्शन दिये तथा विविध प्रकार के वर देकर कृतकृत्य कर दिया ।

किसी कठिन परिस्थिति में पड़ने पर व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिए । विश्वामित्र,भृगु ऋषि, वसिष्ठजी और कश्यप ऋषि ने भी इस व्रत का अनुष्ठान किया था । वृत्रासुर का वध करने के लिए इन्द्र तथा त्रिपुर-वध के लिए भगवान शंकर भी इस उत्कृष्ट व्रत का अनुष्ठान कर चुके हैं । मधु दैत्य को मारने के लिए भगवान श्रीहरि ने सुमेरु गिरि पर यह व्रत किया था ।

~ लोक कल्याण सेतु/सित.-अक्टू. २००५

Navratri Puja Vidhi at Home For Students, Businessman & Others

navratri puja vidhi at home

Navratri 2020 Puja Path Vidhi at Home in Hindi

नवरात्रि के 9 दिनों में विद्यार्थी सुबह 1 कटोरी खीर लेकर यज्ञ कुंड में गायत्री मंत्र बोलते हुए थोड़ी-थोड़ी खीर की 108 आहुति डालें तो बच्चे खूब होशियार होंगे ।

अगर काम धंधे में सफलता नहीं मिलती हो या विघ्न आते हों तो शुक्ल पक्ष की अष्टमी हो.. बेल के कोमल-कोमल पत्तों पर लाल चन्दन लगाकर माँ जगदम्बा को अर्पण करें…. ।  मंत्र बोलें ” ॐ ह्रीं नमः । ॐ श्रीं नमः “ और थोड़ी देर बैठकर प्रार्थना और जप करेंगे तो उससे राजयोग बनता है ।

गुरुमंत्र का जप और कभी-कभी ये प्रयोग करें । नवरात्रियों में तो खास करें । देवी भागवत में वेद व्यास जी ने बताया है:
दुःख दर्द बढ़ गए, परेशानियाँ बढ़ गईं, रोग बीमारियाँ बढ़ गईं, महंगाई बढ़ गयी, तो क्या करना चाहिए ?

देवी भागवत के तीसरे स्कन्द में नवरात्रि का महत्व वर्णित किया है । मनोवांछित सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए देवी की महिमा सुनायी है, नवरात्रि के 9 दिन उपवास करने के शारीरिक लाभ बताये हैं ।

1. शरीर में आरोग्य के कण बढ़ते हैं ।

2. जो उपवास नहीं करता वो रोगों का शिकार हो जाता है, जो नवरात्रि का उपवास करता है, तो भगवान की आराधना होती है, पुण्य तो बढ़ता ही है, लेकिन शरीर का स्वास्थ्य भी वर्ष भर अच्छा रहता है ।

3. प्रसन्नता बढ़ती है ।

4. द्रव्य की वृद्धि होती है ।

5. लंघन और विश्रांति से रोगी के शरीर से रोग के कण ख़त्म होते हैं ।
नौ दिन नहीं तो कम से कम 7 दिन / 6 दिन /5 दिन या आख़िरी के 3 दिन तो जरुर उपवास रख लेना चाहिए ।

देवी भागवत में आता है कि देवी की स्थापना करनी चाहिए । नौ हाथ लम्बा भण्डार ( मंडप/स्थापना का स्थान) हो ।

मकान बनवाते समय याद रहे…मकान बनवाते हों तो~

1. कमरा साड़े तेरह फ़ीट (13.5 फ़ीट) लम्बा और साड़े दस फ़ीट ( 10.5 फ़ीट) आड़ा बनाओ ।

2. खिड़की बनाओ तो दक्षिण की तरफ हो उत्तम- ज्यादा फायदा, पश्चिम की तरफ हो थोड़ी खुले, आरोग्य के लिए पश्चिम की हवा अच्छी नहीं । पूरब की तरफ हो तो ठीक-ठीक लेकिन दक्षिण से हवा आये और उत्तर से जाये तो उत्तम 

3. भगवती रुप में कन्या का पूजन हो (पूजन करने के लिए कन्या कैसी हो इसका वर्णन बापूजी ने किया) और प्रेरणा देने वाली ऐसी कन्या को भगवती समझ कर पूजन करने से दुःख मिटता है, दरिद्रता मिटती है ।

● नवरात्रि के पहले दिन स्थापना, देव वृत्ति की कुंवारी कन्या का पूजन हो ।

● नवरात्रि के दूसरे दिन 3 वर्ष की कन्या का पूजन हो, जिससे धन आएगा ,कामना की पूर्ति के लिए ।

● नवरात्रि के तीसरे दिन 4 वर्ष की कन्या का पूजन करें, भोजन करायें तो कल्याण होगा, विद्या मिलेगी, विजय प्राप्त होगा, राज्य मिलता है ।

● नवरात्रि के चौथे दिन 5 वर्ष की कन्या का पूजन करें और भोजन करायें । रोग नाश होते हैं ।

या देवी सर्व भूतेषु आरोग्य रुपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

इस मंत्र का जप करें; पूरे साल आरोग्य रहेगा ।

● नवरात्रि के पांचवे दिन 6 वर्ष की कन्या को काली का रुप मानकर पूजन करके भोजन कराएँ तो शत्रुओं का दमन होता है ।

● नवरात्रि के छठें दिन 7 वर्ष की कन्या का चंडी का रुप मानकर पूजन करके भोजन कराएँ तो ऐश्वर्य और धन सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ।

● नवरात्रि के सातवें दिन 8 वर्ष की कन्या का शाम्भवी रुप में पूजन कर के भोजन कराएँ तो किसी महत्वपूर्ण कार्य करने में , शत्रु पर धावा बोलने में सफलता मिलती है ।

● नवरात्रि की अष्टमी को दुर्गा पूजा करनी चाहिए । सभी संकल्प सिद्ध होते हैं । शत्रुओं का संहार होता है ।

● नवरात्रि की नवमी को 9 से 17 साल की कन्या का पूजन भोजन कराने से सर्वमंगल होगा, संकल्प सिद्ध होंगे, सामर्थ्यवान बनेंगे, इस लोक के साथ परलोक को भी प्राप्त कर लेंगे, पाप दूर होते हैं, बुद्धि में औदार्य आता है, नारकीय जीवन छुट जाता है, हर काम में, हर दिशा में सफलता मिलती है । नवरात्रि में पति-पत्नी का व्यवहार नहीं, संयम से रहें ।

( परम पूज्य सदगुरूदेव बताते हैं कि संत लालजी महाराज को नवरात्रि में देवी माँ ने प्रत्यक्ष दर्शन दिए थे ।

जब महाराज जी ने देवी माता को पूछा कि ‘रातभर लोग जागकर गरबा करते हैं… वहाँ नहीं जाती और मुझे दर्शन देती हैं तो माता मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए अंतर्धान हो गयीं..’)

देवी-देवता, गन्धर्व, किन्नर ये होते हैं । कश्मीर में सरस्वती माता का एक मंदिर है, उसके ४ दरवाजे हैं । पूरब, पश्चिम और उत्तर का दरवाजा खुला रखते हैं , लेकिन दक्षिण का दरवाजा तभी खुलेगा जब दक्षिण से कोई महापुरुष आएगा ।

तो शंकराचार्य जी गए और उन्होंने पूजन करके दरवाजा खोला और अन्दर जाकर गद्दी पर बैठने लगे तो सरस्वती माँ स्वयं प्रगट हो गयीं और बोलीं कि ‘तुम कैसे इसके अधिकारी हो गए, तुमने तो ऐसा काम किया है कि विद्वान और मूर्ख का भी ।’

तो शंकराचार्य जी बोले कि, “वो मूर्खता नहीं थी माँ, वो तो सूक्ष्म शरीर का उपयोग करके अनुभव कराने के लिए ऐसा किया था । मैं तो तुम्हारा बालक हूँ माँ” ।

माँ ने कहा कि “धन्य हो” ! वो दरवाजा कश्मीर के मंदिर में आज अभी भी खुला है !