Benefit of Mata Pita Sanskar on Anandmayi Maa: MPPD 2021 Special

Shri Anandmayi Maa Sanskar

Benefit of Mata Pita Sanskar on Anandmayi Maa: Matru Pitru Pujan Divas 2021 Special

आओ मनाएँ मातृ-पितृ पूजन दिवस : 14th February

माता-पिता, दादा-दादी आदि के संस्कारों का ही प्रभाव संतान पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षरूप से पड़ता है।

श्री आनंदमयी माँ के पिता विपिनबिहारी भट्टाचार्य एवं माता श्रीयुक्ता मोक्षदासुंदरी देवी (विधुमुखी देवी) – दोनों ही ईश्वर-विश्वासी,भक्तहृदय थे। माता जी के जन्म से पहले व बहुत दिनों बाद तक इनकी माँ को सपने में तरह-तरह के देवी-देवीताओं की मूर्तियाँ दिखती थीं और वे देखतीं कि उन मूर्तियों की स्थापना वे अपने घर में कर रही हैं। आनंदमयी माँ के पिताजी में ऐसा वैराग्यभाव था कि इनके जन्म के पूर्व ही वे घर छोड़कर कुछ दिन के लिए बाहर चले गये थे और साधुवेश में रह के हरिनाम-संकीर्तन,जप आदि में समय व्यतीत किया करते थे।

माता जी के माता-पिता बहुत ही समतावान थे। इनके तीन छोटे भाइयों की मृत्यु पर भी इनकी माँ को कभी किसी ने दुःख में रोते हुए नहीं देखा। माता-पिता, दादा-दादी आदि के संस्कारों का ही प्रभाव संतान पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षरूप से पड़ता है। माता जी बचपन से ही ईश्वरीय भावों से सम्पन्न, समतावान व हँसमुख थीं।

आनंदमयी माँ को आध्यात्मिक संस्कार तो विरासत में ही मिले थे अतः बचपन से ही कहीं भगवन्नाम-कीर्तन की आवाज सुनाई देती तो इनके शरीर की एक अनोखी भावमय दशा हो जाती थी। आयु के साथ इनका यह ईश्वरीय प्रेमभाव भी प्रगाढ़ होता गया। लौकिक विद्या में तो माता जी का लिखना-पढ़ना मामूली ही हुआ। वे विद्यालय बहुत कम ही गयीं। परंतु संयम, नियम-निष्ठा से व गृहस्थ के कार्यों को ईश्वरीय भाव से कर्मयोग बनाकर इन्होंने सबसे ऊँची विद्या – आत्मविद्या, ब्रह्मविद्या को भी हस्तगत कर लिया।

~आनन्दमयी माँ को विरासत में क्या मिला था ?

 

माँ के दिए संस्कार – A Moral Story of Vinoba Bhave in Hindi

maa ke diye sanskar - vinoba bhave

विनोबा भावे की माँ रुक्मणी भावे भगवान के आगे हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है :’अनंत ब्रम्हांड नायक प्रभु ! तू मेरे दोषों का शमन कर दे । मेरे प्यारे ! तू मुझे अपनी प्रीति दे दे ।’
इस प्रकार की पुकार करते-करते रुक्मणी का हृदय भीग जाता था। आंखें भी भीग जाती थी।
 इससे माँ को उन्नत हुई लेकिन नन्हा सपूत विनोबा माँ को देखते-देखते इतने बड़े संत बन गए कि गाँधीजी से भी दो कदम आगे की यात्रा विनोबा भावे की हुई।
 
एक बार पत्रकारों ने विनोबाजी से पूछा :”आपको ईश्वर मिले हैं ?
“नहीं।”
“आप ईश्वर को चाहते हैं?”
 “नहीं”
 “आप ईश्वर को मानते हैं ?”
“नहीं । मानना तो दूसरे को पड़ता है । चाहना तो दूसरे को होता है । ईश्वर तो मेरा आत्मा है। मैं ही ब्रह्म हूँ।”
 
ऐसा तो गांधीजी भी नहीं बोलते ! वे तो आपके गुरु थे।
 “गाँधीजी मेरे गुरु थे। ठीक है,वे ऐसा नहीं बोलते थे परंतु बाप के कंधे पर बेटा बैठता है तो बाप से भी ज्यादा दूर का देख सकता है।

 -जो ब्रह्मनिष्ठा गाँधीजी की नहीं हो सकी,वह माँ के द्वारा किए गए संस्कार-सिंचन से विनोबाजी ने कर दिखायी।

~ऋषि प्रसाद/नवम्बर २००५

 

राम जी ने कराया बीमा

( १४ फरवरी ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ विशेष )

राम जी रावण को तीरों का निशाना बनाते हैं और रावण का सिर कटता है, फिर से लगता है क्योंकि उसे वरदान मिला था। लेकिन रावण दंग रह गया कि जब वह रामजी पर बाण छोड़ता है तो बाण रामजी की तरफ जाते-जाते उनके सिर में लगता ही नहीं था। रामजी के सिर की तरफ रावण का बाण जाय ही नहीं रावण सोचे-… ‘आखिर क्या है, क्या है ?…’ शिवजी ने प्रेरणा की कि इनके सिर का तो बीमा किया हुआ है। रामजी तो अपने सिर का बीमा करा चुके थे और रावण का बीमा था नहीं!

क्या बीमा है ? दुनिया के सारे विद्यालय महाविद्यालय, सारे विश्वविद्यालयों द्वारा प्रमाणपत्र प्राप्त करके ट्रक भरकर घूमो तो भी उतना फायदा नहीं होता जितना सत्संग से ज्ञान और सच्चा सुख मिलता है। रामजी ने बीमा क्या करवाया था, पता है ?? शिवाजी ने भी बीमा कराया था…।

रामी रामदास का भी बीमा था। मेरे गुरुदेव भगवत्पाद लीलाशाहजी बापू ने भी बीमा कराया था। मैंने भी बीमा कराया है। अब तुम ढूँढते हो किधर बीमा कराते हैं कैसा बीमा होता है? जरा सोचो। अरे…

प्रातकाल उठि के रघुनाथा ।
मातु पिता गुरु नावहिं माथा ।।
(श्री रामचरितमानस)

जैसे रामजी प्रातः काल उठकर माता-पिता और गुरु को प्रणाम करते, मत्था नाते तो ‘पुत्र चिरंजीवी भव । यशस्वी भव ।’ आशीर्वाद मिलता है । माँ-बाप और गुरु के आशीर्वाद से बड़ा कोई बीमा होता है क्या तो तुम भी बीमा करा लिया करो और तुम्हारे बच्चों को भी यह बात बताया करो कि रामजी ने ऐसा बीमा करा लिया था।

१४ फरवरी ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ से बहुत-बहुत सूखे हृदय रसमय हुए हैं, उजड़ी उमंगें फिर पल्लवित हुई हैं । काँटे फूल में बदल गये, वैर प्रीत में बदल गये । हार जीत में बदल गयी और महाराज ! मौत मोक्ष में बदल जाती है माता-पिता और गुरु के संग और आशीर्वाद से।

~ ऋषि प्रसाद/फरवरी २०१३

मातृदेवो भव पितृदेवो भव

प्रह्लाद को कष्ट देने वाले दैत्य हिरण्यकशिपु को भी प्रह्लाद कहता हैः “पिताश्री !” और तुम्हारे लिए तनतोड़ मेहनत करके तुम्हारा पालन-पोषण करने वाले पिता को नौकर बताने में तुम्हें शर्म नहीं आती !

अभी कुछ वर्ष पहले की बात है।
इलाहाबाद में रहकर एक किसान का बेटा वकालत की पढ़ाई कर रहा था। बेटे को शुद्ध घी, चीज़-वस्तु मिले, बेटा स्वस्थ रहे इसलिए पिता घी, गुड़, दाल-चावल आदि सीधा-सामान घर से दे जाते थे।

एक बार बेटा अपने दोस्तों के साथ कुर्सी पर बैठकर चाय-ब्रेड का नाश्ता कर रहा था। इतने में वह किसान पहुँचा। धोती फटी हुई, चमड़े के जूते, हाथ में डंडा, कमर झुकी हुई… आकर उसने गठरी उतारी। बेटे को हुआ, ‘बूढ़ा आ गया है, कहीं मेरी इज्जत न चली जाय !’ 

इतने में उसके मित्रों ने पूछाः “यह बूढ़ा कौन है ?”

लड़काः “He is my servant.” (यह तो मेरा नौकर है।)

लड़के ने धीरे-से कहा किंतु पिता ने सुन लिया। वृद्ध किसान ने कहाः “भाई ! मैं नौकर तो जरूर हूँ लेकिन इसका नौकर नहीं हूँ, इसकी माँ का नौकर हूँ। इसीलिए यह सामान उठाकर लाया हूँ।”

यह अंग्रेजी पढ़ाई का फल है कि अपने पिता को मित्रों के सामने ‘पिता’ कहने में शर्म आ रही है, संकोच हो रहा है ! ऐसी अंग्रजी पढ़ाई और आडम्बर की ऐसी-की-तैसी कर दो, जो तुम्हें तुम्हारी संस्कृति से दूर ले जाय !

भारत को आजाद हुए 62 साल हो गये फिर भी अंग्रेजी की गुलामी दिल-दिमाग से दूर नहीं हुई !

पिता तो आखिर पिता ही होता है चाहे किसी भी हालत में हो। प्रह्लाद को कष्ट देने वाले दैत्य हिरण्यकशिपु को भी प्रह्लाद कहता हैः “पिताश्री !” और तुम्हारे लिए तनतोड़ मेहनत करके तुम्हारा पालन-पोषण करने वाले पिता को नौकर बताने में तुम्हें शर्म नहीं आती !

भारतीय संस्कृति में तो माता-पिता को देव कहा गया हैः मातृदेवो भव, पितृदेवो भव…. उसी दिव्य संस्कृति में जन्म लेकर माता-पिता का आदर करना तो दूर रहा, उनका तिरस्कार करना, वह भी विदेशी भोगवादी सभ्यता के चंगुल में फँसकर ! यह कहाँ तक उचित है ?

भगवान गणेश माता-पिता की परिक्रमा करके ही प्रथम पूज्य हो गये। आज भी प्रत्येक धार्मिक विधि-विधान में श्रीगणेश जी का प्रथम पूजन होता है। श्रवण कुमार ने माता-पिता की सेवा में अपने कष्टों की जरा भी परवाह न की और अंत में सेवा करते हुए प्राण त्याग दिये। देवव्रत भीष्म ने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत पाला और विश्वप्रसिद्ध हो गये। महापुरुषों की पावन भूमि भारत में तुम्हारा भी जन्म हुआ है। स्वयं के सुखों का बलिदान देकर संतान हेतु अगणित कष्ट उठाने वाले माता-पिता पूजने योग्य हैं। उनकी सेवा करके अपने भाग्य को बनाओ। किन्हीं संत ने ठीक ही कहा हैः

जिन मात-पिता की सेवा की,
तिन तीरथ जाप कियो न कियो।

‘जो माता-पिता की सेवा करते हैं, उनके लिये किसी तीर्थयात्रा की आवश्यकता नहीं है।’

माता पिता व गुरुजनों की सेवा करने वाला और उनका आदर करने वाला स्वयं चिरआदरणीय बन जाता है। मैंने माता-पिता-गुरु की सेवा की, मुझे कितना सारा लाभ हुआ है वाणी में वर्णन नहीं कर सकता। नारायण….. नारायण…..

जो बच्चे अपने माता-पिता का आदर-सम्मान नहीं करते, वे जीवन में अपने लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं कर सकते। इसके विपरीत जो बच्चे अपने माता-पिता का आदर करते हैं, वे ही जीवन में महान बनते हैं और अपने माता-पिता व देश का नाम रोशन करते हैं। लेकिन जो माता-पिता अथवा मित्र ईश्वर के रास्ते जाने से रोकते हैं, उनकी वह बात मानना कोई जरूरी नहीं।

जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम,
जद्यपि परम स्नेही।।

 

बच्चों को माता-पिता कैसे बनायें महान | Parenting tips hindi

बालक सुधरे तो जग सुधरा। बालक-बालिकाएँ घर, समाज व देश की धरोहर हैं। इसलिए बचपन से ही उनके जीवन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि बचपन से ही उनके रहन-सहन, खान-पान, बोल-चाल, शिष्टता और सदाचार पर सूक्ष्म दृष्टि से ध्यान दिया जाय तो उनका जीवन महान हो जायगा, इसमें कोई संशय नहीं है।

लोग यह नहीं समझते कि आज के बालक कल के नागरिक हैं। बालक खराब अर्थात् समाज और देश का भविष्य खराब।

बालकों को नन्हीं उम्र से ही उत्तम संस्कार देने चाहिए। उन्हें स्वच्छताप्रेमी बनाना चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त में उठना, बड़ों की तथा दीन-दुःखियों की सेवा करना, भगवान का नामजप एवं ध्यान-प्रार्थना करना आदि उत्तम गुण बचपन से ही उनमें भरने चाहिए। ब्राह्ममुहूर्त में उठने से आयु, बुद्धि, बल एवं आरोग्यता बढ़ती है। उन्हें सिखाना चाहिए कि खाना चबा-चबाकर खायें। समझदारों का कहना है कि प्रत्येक ग्रास को 32 बार चबाकर ही खायें तो अति उत्तम है।

उनके चरित्र-निर्माण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। क्योंकि धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ-कुछ गया परंतु चरित्र गया तो सब कुछ गया। यह चरित्र ही है जिससे दो पैरवाला प्राणी मनुष्य कहलाता है। सिनेमा के कारण बालकों का चरित्र बिगड़ रहा है। यदि इसकी जगह पर उन्हे ऊँची शिक्षा मिले तो रामराज्य हो जाय।

प्राचीन काल में बचपन से ही धार्मिक शिक्षाएँ दी जाती थीं। माता जीजाबाई ने शिवाजी को बचपन से ही उत्तम संस्कार दिये थे, इसीलिए तो आज भी वे सम्मानित किये जा रहे हैं।
रानी मदालसा अपने बच्चों को त्याग और ब्रह्मज्ञान की लोरियाँ सुनाती थीं।

जबकि आजकल की अधिकांश माताएँ तो बच्चों को चोर, डाकू और भूत की बातें सुनाकर डराती रहती है। वे बालकों को डाँटकर कहती हैं- ‘सो जा नहीं तो बाबा उठाकर ले जायेगा…. चुप हो जा नहीं तो पागल बुढ़िया को दे दूँगी।’ बचपन से ही उनमें भय के गलत संस्कार भर देती हैं। ऐसे बच्चे बड़े होकर कायर और डरपोक नहीं तो और क्या होंगे ? माता-पिता को चाहिए कि बच्चों के सामने कभी बुरे वचन न बोलें। उनसे कभी विवाद की बातें न करें।

बच्चों को सुबह-शाम प्रार्थना-वंदना, जप-ध्यान आदि सिखाना चाहिए। उनके भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्हें शुद्ध, सात्त्विक और पौष्टिक आहार देना चाहिए तथा लाल-मिर्च, तेज मसालेदार भोजन एवं बाजारू हलकी चीजें नहीं खिलानी चाहिए। आजकल लोग बच्चों को चाट-पकौड़े खिलाकर उन्हें चटोरा बना देते हैं।

उन्हें समझाना चाहिए कि सत्संग तारता है और कुसंग डुबाता है। समय के सदुपयोग, सत्शास्त्रों के अध्ययन और संयम-ब्रह्मचर्य की महिमा उन्हें समझानी चाहिए। मधुर भाषण, बड़ों का आदर, आज्ञापालन, परोपकार, सत्यभाषण एवं सदाचार आदि दैवी संपदावाले सदगुण उनमें प्रयत्नतः विकसित करने चाहिए।

अध्यापकों को भी विद्यालय में उनका सूक्ष्म दृष्टि से ध्यान रखना चाहिए। अध्यापक के जीवन का भी विद्यार्थियों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। शिक्षक ऐसा न समझें कि पुस्तकों में लिखी पेटपालू शिक्षा देकर हमने अपना कर्त्तव्य पूरा कर लिया। लौकिक विद्या के साथ-साथ उन्हें चरित्र-निर्माण की, आदर्श मानव बनने की शिक्षा भी दीजिये।

आपकी इस सेवा से यदि भारत का भविष्य उज्जवल बनता है तो आपके द्वारा सुसंस्कारी बालक बनाने की राष्ट्रसेवा, मानवसेवा हो जायेगी।

विद्यालय में अच्छे बच्चों के साथ कुछ उद्दण्ड एवं उच्छ्रंखल बच्चे भी आते हैं। उन पर यदि अंकुश नहीं लगाया गया तो अच्छे बच्चे भी उनके कुसंग में आकर बिगड़ जाते है। याद रखिये ‘एक सड़ा हुआ आम पूरे टोकरे के आमों को खराब कर देता है।’ इसलिए ऐसे बच्चों को सुसंस्कारवान बनाना चाहिए। बालक तो गीली मिट्टी जैसे होते हैं। शिक्षक एवं माता पिता उन्हें जैसा बनाना चाहें बना सकते हैं।

बालक इंजिन के समान है तथा माता पिता एवं गुरूजन ड्राइवर जैसे हैं। अतः उन्हें ध्यान रखना चाहे कि बालक कैसा संग करता है ? प्रातः जल्दी उठता है कि देर से ? कहीं वह समय व्यर्थ तो नहीं गँवाता ? उन्हें बच्चों की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक उन्नति का भी ध्यान रखना चाहिए। कई माता पिता अपने बच्चों को उल्टी सीधी कहानियो की पुस्तकें देते हैं, जिनसे बच्चों के मन, बुद्धि चंचल हो जाते हैं। उनका यह शौक उन्हें आगे चलकर गंदे उपन्यास एवं फिल्मी पत्रिकाएँ पढ़ने का आदी बना देता है और उनका चरित्र गिरा देता है।
इसलिए बच्चों को सदैव सत्संग की पुस्तकें गीता, भागवत, रामायण आदि ग्रन्थ पढ़ने के लिए उत्साहित करना चाहिए।

उनके जीवन में दैवी गुणों का उदय होगा। उन्हें ध्रुव, प्रह्लाद, मीराबाई आदि की इस प्रकार कथा-कहानियाँ सुनानी चाहिए, जिनसे वे भी अपने जीवन को महान बनाकर सदा के लिए अमर हो जायें।

अंत में बालकों से मुझे यही कहना है कि माता, पिता एवं गुरूजनों की सेवा करते रहें, यही उत्तम धर्म है। गरीब एवं दीन दुःखियों को सँभालते रहें तथा ईश्वर को सदैव याद रखें जिसने हम सभी को बनाया है, भले कर्म करने की योग्यताएँ दी हैं। उसे स्मरण करने से सच्ची समृद्धि की प्राप्ति होगी।