Benefits/ Advantages of Gurukul Education in Hindi

benefits of gurukul education system

मैं कक्षा ५ वी से गुरुकुल में पढ़ रहा हूँ। गुरुकुल आने के पहले मैंने बापूजी से मंत्र दीक्षा तो ली थी परंतु मेरी उनमें बिल्कुल भी श्रद्धा नहीं थी और नाही मैं नियम करता था। माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना, बाजारू चीजें जैसे पिज्जा, बर्गर, फास्ट फूड आदि खाना, टी.वी., मोबाइल पर घंटों लगे रहना…यही मेरा जीवन था। लेकिन गुरुकुल में आने के पश्चात मुझमें चमत्कारिक रूप से परिवर्तन हुआ। पतन की ओर जा रही मेरी जीवनरूपी गाड़ी को सही दिशा मिली।

गुरुकुल में आने के बाद पूज्य बापूजी की महानता समझ में आयी और अब मेरी उनके प्रति श्रद्धा बहुत बढ़ गयी है… यहाँ गुरुकुल में हम पढ़ाई के साथ नियमित रूप से जप-ध्यान व त्रिकाल संध्या करते हैं। इससे मेरा आत्मबल भी खूब बढ़ा है, पढ़ाई में भी पहले की तुलना में अच्छे अंक आते हैं। माता-पिता की आज्ञा का पालन करने से वे भी मुझसे प्रसन्न रहते हैं । पहले मेरे जीवन में कोई लक्ष्य नहीं था लेकिन पूज्य बापूजी का सत्संग सुनकर अब मेरा ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य बन गया है।

– हिमांशु बामनिया ( ७वी ), इंदौर गुरुकुल

नर्तकी की देशभक्ति

उरु प्रदेश में एक नर्तकी थी, जिसका नाम था मृदुला। वह इतनी खूबसूरत थी और उसकी नृत्य कला इतनी मोहक थी कि बड़े-बड़े मंत्री, सेनाधिकारी वगैरह भी उसके नृत्य के चाहक थे। उसका नृत्य और हास्य तो क्या, उसके नेत्रों के एक कटाक्षमात्र से भी अनेकों घायल हो जाते थे ! उसके सौंदर्य पर मुग्ध होकर इतने राजवी पुरुष वहाँ आते थे कि कभी-कभी तो उन्हें मृदुला से मिले बिना ही लौट जाना पड़ता था।

उसके रूप-लावण्य एवं नृत्य कला की प्रशंसा वहाँ के राजा करुष तक पहुँची । एक दिन राजा स्वयं मृदुला के पास आया। मृदुला ने देखा कि राजा खुद आये हैं वह सोचने लगी : अगर राजा ही नर्तकी के चक्कर में पड़कर विलासी हो जायेंगे तो प्रजा का तो सत्यानाश हो जाएगा…, फिर मेरे देश का क्या होगा ?’ भले, वह एक नर्तकी थी लेकिन देशभक्ति उसके अंदर कूट-कूटकर भरी हुई थी।

मृदुला : ‘राजन्! आप और मेरे जैसी, लोगों को विलासिता की खाई में धकेलनेवाली, लोगों की जिंदगी बर्बाद करने वाली एक तुच्छ नर्तकी के पास ?”

राजा : ”हे प्रिये तेरे सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर मैं खिंचा चला आया हूँ। तेरा रूप-लावण्य अप्सराओं को भी लज्जित करने वाला है। तू मेरी रानी से भी अधिक सुंदर है। अब दूसरी बातें छोड़ और मेरे साथ अपने भवन में चल।”

मृदुला : ”अगर आप जैसे प्रजापालक भी फिसलने लगे तो देश का क्या होगा, राजन ?”

राजा: ‘‘अब इन फालतू बातों में समय नष्ट न कर। मैं कुछ सुनना नहीं चाहता। मैं जो अभिलाषा लेकर आया हूँ उसे पूरी कर। इसी में तेरी भलाई है।”

राजा पर तो कामविकार हावी हो चुका था। चतुर मृदुला समझ गयी कि अब इन्हें समझाना मुश्किल है। उसने बात बदल दी।

मृदुला : ‘‘राजन् आप मेरे रूप-लावण्यव सौन्दर्य पर इतने मोहित हैं तो ठीक है। मैं आपके ही राज्य की एक नर्तकी हूँ, अबला हूँ। आपकी आज्ञा का उल्लंघन मैं कैसे कर सकती हूँ ? लेकिन उरु प्रदेश के सर्वेसर्वा ! मैं अभी रजोदर्शन में हूँ। स्त्री अगर रजस्वला हो और पुरुष उसे छुए तो पुरुष की बुद्धि, ओज, तेज और तंदुरुस्ती का नाश होता है, यह आप जानते ही हैं। इसलिए मेरे मासिक धर्म के पाँच दिन बीत जायें फिर मैं अपने रूप-लावण्य और सौन्दर्य को सजा-धजाकर चैत्य सरोवर पर आपसे मिलूंगी।”

मृदुला रजस्वला है यह जानकर राजा ने अपने-आपको सँभाला। अब उसके इंतजार में राजा का एक-एक दिन मानो एक-एक वर्ष के समान बीत रहा था। पहले तो उसने मृदुला के रूप लावण्य-सौन्दर्य के विषय में सुना था लेकिन अभी तो वह स्वयं देखकर आया था। राजा बस यही सोचता रहता कि ‘कब उसके पाँच दिन पूरे होंगे ?’ पाँच दिन पूरे हुए मानो पाँच साल बीत गये। छठे दिन राजा चैत्य सरोवर पर आया। उसे मृदुला तो मिली लेकिन जीवित नहीं, मृतावस्था में।

उसकी लाश के साथ एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था: ‘देश का राजा ही यदि एक नर्तकी के चक्कर में पड़कर विलासिता में डूब जायेगा तो देश पतन के गर्त में चला जायेगा। उसकी अपेक्षा एक नर्तकी की कुर्बानी को मैं अधिक अच्छा समझती हूँ। हालाँकि राजा को बचाने के लिए आत्महत्या जैसा घृणित पाप करने की अपेक्षा वह किसी संत-महात्मा की शरण में जाती तो उसे दूसरे अनेक सुंदर उपाय मिलते।

BapuJi Jaisi Sanyam Ki Siksha Koi Nahi De Sakta: Teacher’s Day

मैंने पूज्य बापूजी से २०१० में दीक्षा ली और नर्सरी कक्षा से ही मैं संत श्री आशारामजी गुरुकुल, रायपुर(छ.ग.) में पढ़ रहा हूँ। गुरुकुल में रोज दोपहर १२ बजे संध्या करवायी जाती है जिसमें बुद्धि व यादशक्ति बढ़ाने के प्रयोग जैसे टंक विद्या, भ्रामरी प्राणायाम, ॐकार गुंजन आदि करते हैं जिससे हमारा मन एकाग्र होता है और पढ़ाई में अच्छे नम्बर आते हैं।

प्रतियोगी परीक्षा के लिए मैं एक कोचिंग क्लास में जाता हूँ। वहाँ पर कुछ बच्चे ऐसे आते हैं जो शिक्षक के पढ़ाते समय भी मोबाइल पर चैटिंग करते रहते हैं, शिक्षक भी उनसे परेशान हो जाते हैं। उन्हें देखकर मुझे अपने आप पर गर्व होता है कि मैं बापूजी का शिष्य हूँ, मुझे बापूजी के सत्संग से ही यह ज्ञान मिला है कि किस समय क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए तथा अपने मन पर संयम कैसे रखा जाता है। बापूजी ने आज की युवा पीढ़ी को जो संयम की शिक्षा दी है वह कोई और दे ही नहीं सकता।

– ज्ञानेंद्र साहू (१०वीं, रायपुर गुरुकुल)

गुरुकुल दर्पण

अभिभावकों से – बच्चों को उच्च शिक्षा के साथ उत्तम संस्कार दिलवाने के लिए उन्हें गुरुकुल में प्रवेश जरूर दिलवाएं।

ऋषि पति-पत्नी का यौवन में १६-१६ साल ब्रह्मचर्य पालन

वैदिक युग में आदर्शनिष्ठा की मूर्तिमंत नमूनेदार एक घटना भी मिलती है ।

पंडित वाचस्पति मिश्र वेदांत के एक महान ग्रंथ की रचना कर रहे थे। नवोढ़ा पत्नी एकासन में कार्यरत अपने पति को उनके स्थान पर ही भोजन-पानी वगैरह देती थी ।

सूर्यास्त होने पर दीया प्रकटा-कर, हाथ में रखकर पति के पीछे खड़ी रहती थी। जिससे उसके प्रकाश में पंडितजी का लेखन कार्य चलता रहे ।धर्मपत्नी की ऐसी अविरत सेवा और ऋषि के लेखन-साधना के 16 साल बीत गए। एक शाम संध्या को दीपक प्रकटाते ही बुझ गया । इससे काम अटक गया, तब ऋषि की नजर पीछे घूम कर ऊपर की ओर जाती है । स्त्री को वहाँ खड़ी देखते हैं और परिचय पूछते हैं, क्योंकि 16 साल से उसे देखा ही नहीं था । उत्तर मिला कि “मैं आपकी सहधर्मिणी हूँ। सेवा में क्षति आ गई उसे क्षम्य मानना।”

ऋषि को चोट लगती है कि मेरी पत्नी को विवाह करके आए हुए 16 साल बीत गए मैंने उसकी तरफ देखा भी नहीं, फिर भी नहीं फरियाद की…ना ही कोई विषाद… उल्टे प्रसन्नतापूर्वक कैसी सेवा की और इसमें कैसा संयम है ! उनकी महानता को वंदन करके,अभिनंदन करके अपने उस ग्रंथ को पत्नी का नाम ‘भामती’ देकर उसे अर्पण करते हैं।

ऋषि की उत्कट लेखन-साधना, ऋषि पत्नी की पति-सेवा का पुनित आदर्श – ऐसी दोनों की अपने-अपने कार्य की धुन ने यौवन में 16-16 साल ब्रह्मचर्यपालन किस सहजता से, सरलता से कर दिखाया – इसका यह एक प्रेरक उदाहरण है।

लोक कल्याण सेतु/जन.-फर.२००६

धन्वंतरि महाराज ने कहा

” हे मेरे शिष्यों! आयुर्वेद में सफलता पाने के लिए और अपने सद्गुणों को विकसित करने के लिए यौवन की रक्षा करो। ब्रह्मचर्य व्रत वह रत्न है, वह अमृत की खान है जो जीवात्मा का परमात्मा से भी मिलाने का सामर्थ्य रखता है। यौवन-सुरक्षा के नियम समझोगे तो तुम आयुर्वेद में तो सफल होगे ही, साथ में आत्मा-परमात्मा को पाने में भी सफल हो जाओगे ।

हे मेरे शिष्यों ! हलकी मति के विद्यार्थियों का अनुकरण मत करना,तुम तो संयमी-सदाचारी एवं वीर पुरुषों, योगी पुरुषों, पवित्र भक्त आत्माओं का अनुसरण करना।”

Akhand Brahmacharya Ki Vajah se Mili 105 Years Ki Long Life

हाल ही में ब्रिटेन की एक जवान वृद्धा ने संयमी जीवन की महत्ता का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया है ।
ब्रिटेन की 105 वर्षीय कुमारी मीडमोर अपनी दीर्घायु का रहस्य ब्रह्मचर्य (Brahmcharya) बताती हैं।
सन 1903 में ग्लासगो में जन्मी क्लारा मीडमोर कहती हैं कि *’मेरा कभी कोई बॉयफ्रेंड नहीं रहा । मैंने 12 साल की उम्र में शादी ना करने का फैसला किया और अपने इस निर्णय पर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।’*

लोक कल्याण सेतु – अप्रैल-मई 2009/142/6