Sushupt Shakti Kaise Jagaye: Tips for Students to be Successful

sushupt shakti kaise jagaye success tips

Tips for Students to be Successful [Success tips for school students in Hindi]

➠ एकाग्रता स्वयं एक अदभुत सामर्थ्य है। यह सब धर्मों में श्रेष्ठ है।

तप तु सर्वेषु एकाग्रता परं तपः।

अर्थात् ʹसब तपों में एकाग्रता परम तप है।ʹ

➠ श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने कहा हैः

मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्रयं परमं तपः।
तज्जयः सर्व धर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते।।

अर्थात् ʹमन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तप है। उसका जय सब धर्मों से महान है।ʹ

➠ जिसके जीवन में जितनी एकाग्रता होती है वह अपने कार्यक्षेत्र में उतना ही सफल होता है। चाहें वैज्ञानिक हो, डॉक्टर हो, न्यायाधीश हो अथवा विद्यार्थी हो लेकिन जब किसी गहरे विषय को खोजना हो तो सभी लोग शांत हो जाते हैं। मन को शांत तथा स्थिर करने का जितना अधिक अभ्यास होता है, उतनी ही उस क्षेत्र में सफलता मिलती है।

Tips to Increase Concentration [एकाग्रता] in Hindi

✯ त्राटकः त्राटक अर्थात् दृष्टि को जरा भी हिलाये बिना एक ही स्थान पर स्थिर करना

➠ इष्टदेव या गुरुदेव के श्रीचित्र पर त्राटक करने से एकाग्रता में विलक्षण वृद्धि होती है एवं विशेष लाभ होता है। स्वास्तिक, ૐ या दीपक की ज्योति पर त्राटक किया जा सकता है। त्राटक के नियमित अभ्यास से पढ़ाई में अद्भुत लाभ होता है। त्राटक करने वालों की आँखों में एक विशेष प्रकार का आकर्षण एवं तेज आ जाता है। उसकी स्मरणशक्ति तथा विचारशक्ति में विलक्षणता आ जाती है। त्राटक एकाग्रता को सिद्ध करने की एक सरल एवं सचोट साधना है।

Silence [Maun Vrat Ke Fayde, Labh] for Students in Hindi

 मौनः न बोलने में नौ गुण 

➠ निंदा करने से बचेंगे, असत्य बोलने से बचेंगे, किसी से वैर नहीं होगा। क्षमा माँगने की परिस्थिति नहीं आयेगी, समय का दुरुपयोग नहीं होगा, अज्ञान ढका रहेगा। अंतःकरण की शांति बनी रहेगी, शक्ति का ह्रास नहीं होगा, क्रोध से बच सकेंगे।

➠ प्रतिदिन कुछ समय मौन रखने वाला श्रेष्ठ विचारक व दीर्घजीवी बनता है। गांधी जी हर सोमवार को मौन रखते थे। उस दिन वे अधिक कार्य कर पाते थे।

जीवनशक्ति का विकास ! Tips to Increase Your Life Energy

jeevan shakti ka vikas

Tips to Increase Your Life Energy {जीवन शक्ति Kaise Badhaye} : हमारे शारीरिक व मानसिक आरोग्य का आधार हमारी जीवनशक्ति (Life Energy) है। यह प्राणशक्ति भी कहलाती है।

छात्रों के महान आचार्य पूज्य बापू जी द्वारा सूक्ष्म विश्लेषण…!!

हमारे जीवन जीने के ढंग के अनुसार हमारी जीवनशक्ति का ह्रास या विकास होता है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने योगदृष्टि से, अंतदृष्टि से और जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण करके जीवनशक्ति विषयक गहनतम रहस्य खोज लिये थे। डॉ. डायमंड ने उन मनीषियों की खोज को कुछ हद तक समझने की कोशिश कीः

भाव का अभाव

ईर्ष्या, घृणा, तिरस्कार, भय, कुशंका आदि कुभावों से जीवनशक्ति क्षीण होती है। भगवत्प्रेम, श्रद्धा, विश्वास, हिम्मत और कृतज्ञता जैसे सदभावों से जीवनशक्ति पुष्ट होती है।

किसी प्रश्न के उत्तर में ʹहाँʹ कहने के लिए सिर को आगे-पीछे हिलाने से जीवनशक्ति का विकास होता है। नकारात्मक उत्तर में सिर को दायें-बायें घुमाने से जीवनशक्ति कम होती है।

हँसने और मुस्कराने से जीवनशक्ति बढ़ती है। रोते हुए, उदास, शोकातुर व्यक्ति को या उसके चित्र को देखने से जीवनशक्ति का ह्रास होता है।

ʹहे भगवान ! हे खुदा ! हे मालिक ! हे ईश्वर….ʹ ऐसा अहोभाव से कहते हुए हाथों को आकाश की ओर उठाने से जीवनशक्ति बढ़ती है।

धन्यवाद देने से, धन्यवाद के विचारों से हमारी जीवनशक्ति का विकास होता है। ईश्वर को धन्यवाद देने से अंतःकरण में खूब लाभ होता है।

~ हम भारत के लाल 

सफलता का महामंत्र | Success Mantra of Life of Albert Einstein in Hindi

Albert Einstein

“रूचि, लगन और एकाग्रता से निरंतर अभ्यास द्वारा कोई भी आदमी महान बन सकता है ।” -परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन (Albert Einstein) बचपन में पढ़ने में कमजोर थे । उनकी इस कमजोरी का उनके साथी मजाक उड़ाया करते थे।

एक दिन उन्होंने अध्यापक से गम्भीरतापूर्वक पूछा :-“क्या मैं किसी प्रकार महान बन सकता हूँ ?”

अध्यापक : “रूचि, लगन और एकाग्रता से निरंतर अभ्यास द्वारा कोई भी आदमी महान बन सकता है ।”

यह शिक्षा मानो आइंस्टीन के लिए महामंत्र थी । उन्होंने इसे मन में बैठाया और दृढ़ संकल्प के साथ अध्ययन में जुट गये । रूचि और लगन के लिए एकाग्रता का धन कमाने के लिए आइंस्टीन ने भारतीय योग-पद्धति का आश्रय लिया और पूरा विश्व जानता है कि उन्होंने “अणु विज्ञान पुरोधा” और “सापेक्षवाद के जनक” के रूप में ख्याति प्राप्त की।

यदि आइंस्टीन (Albert Einstein) जैसे जिज्ञासु व प्रयत्नशील विद्यार्थी को किन्हीं ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु का मार्गदर्शन व दीक्षा-शिक्षा मिलती तो ऐसा व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करके सर्व से ऊँचा आत्मपद पाकर मुक्तात्मा, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मस्वरूप हो सकता था।

शिक्षा : विद्यार्थियों को अध्ययनकाल में आत्मज्ञानी महापुरुषों की शिक्षा-दीक्षा का लाभ अवश्य लेना चाहिए। उनके बताये
एकाग्रता, लगन, उत्साह एवं कार्य में रूचि बढ़ाने के प्रयोगों का लाभ लेकर अपने जीवन का सर्वांगीण विकास करना चाहिए । इससे विद्यार्थी व्यवहार- जगत एवम् दिव्य आत्मिक अनुभव दोनों क्षेत्रों में बाजी मार लेता है ।

~लोक कल्याण सेतु/अप्रैल २०१४

 
 

जिज्ञासु बनो | Story of Student ‘Thomas Alva Edison’ in School in Hindi

jigyasu bano - Thomas Alva Edison Story

jigyasu bano - Thomas Alva Edison Story

जानिये सफलता का विज्ञान- पूज्य बापूजी से…..

उत्सुकता हमें वरदानरूप में मिली है। उसी को जो ʹजिज्ञासा बना लेता है वह है पुरुषार्थी। सफलता ऐसे उद्यमी को विजयश्री की माला पहनाती है।

एक लड़के ने शिक्षक से पूछाः “मैं महान कैसे बनूँ ?”

शिक्षक बोलेः “महान बनने की जिज्ञासा है ?”

“है।”

“जो बताऊँ वह करेगा ?”

“करूँगा।”

“लेकिन कैसे करेगा ?”

“मैं मार्ग खोज लूँगा।”

शिक्षक ने कहाः “ठीक है, फिर तू महान बन सकता है।”

थामस अल्वा एडिसन (Thomas Alva Edison) तुम्हारे जैसे बच्चे थे। वे बहरे भी थे। पहले रेलगाड़ियों में अखबार, दूध की बोतलें आदि बेचा करते थे परंतु उनके जीवन में जिज्ञासा थी, अतः आगे जाकर उन्होंने अनेक आविष्कार किये। बिजली का बल्ब आदि 1093 खोजें उनकी देन हैं।

* “जहाँ चाह वहाँ राह !” जिसके जीवन में जिज्ञासा है वह उन्नति के शिखर जरूर पार कर सकता है।

किसी कक्षा में पचास विद्यार्थी पढ़ते हैं, जिसमें शिक्षक तो सबके एक ही होते हैं, पाठ्यपुस्तकें भी एक ही होती हैं किंतु जो बच्चे शिक्षकों की बातें ध्यान से सुनते हैं एवं जिज्ञासा करके प्रश्न पूछते हैं, वे ही विद्यार्थी माता-पिता एवं विद्यालय का नाम रोशन कर पाते हैं और जो विद्यार्थी पढ़ते समय ध्यान नहीं देते, सुना-अनसुना कर देते हैं, वे थोड़े से अंक लेकर अपने जीवन की गाड़ी बोझीली बनाकर घसीटते रहते हैं।

अतः जिज्ञासु बनो, तत्पर बनो। ऐहिक जगत के जिज्ञासु होते-होते ʹमैं कौन हूँ ? शरीर मरने के बाद भी मैं रहता हूँ, मैं आत्मा हूँ तो आत्मा का परमात्मा के साथ क्या संबंध है ? ब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति कैसे हो ? जिसको जानने से सब जाना जाता है, जिसको पाने से सब पाया जाता है वह तत्त्व क्या है ?ʹ ऐसी जिज्ञासा करो। इस प्रकार की ब्रह्मजिज्ञासा करके ब्रह्मज्ञानी करके ब्रह्मज्ञानी-जीवन्मुक्त होने की क्षमताएँ तुममें भरी हुई हैं । शाबाश वीर ! शाबाश !!…..

सोचें व जवाब दें-

🔹मैं कौन हूँ ? – यह किस प्रकार की जिज्ञासा है ?

🔹किस तरह के विद्यार्थी माता-पिता एवं विद्यालय का नाम रोशन कर सकते हैं ?

🔹क्रियाकलापः आप सफलता पाने के लिए क्या करोगे ? लिखें और उपरोक्त विषय पर आपस में चर्चा करें।

सफलता की कुंजी | Success Story Tips

Safalta success story in hindi

हिम्मत करो, आगे बढ़ो । दृढ़ निश्चय करो, प्रयत्न करो ।

शास्त्र और संत-महापुरुषों के वचनों पर श्रद्धा रखकर उनके ज्ञान के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल, सफलता (Success Story) तेरे चरण चूमने को तेरा इंतजार कर रही है।

जीवन में यदि उन्नति व प्रगति के पथ पर अग्रसर होना हो तो आलस्य, प्रमाद, भोग, दुर्व्यसन, दुर्गुण और दुराचार को विष के समान समझकर त्याग दो एवं सदगुण-सदाचार का सेवन, विद्या का अभ्यास, ब्रह्मचर्य का पालन, माता-पिता व गुरुजनों एवं दुःखी-अनाथ प्राणियों की निःस्वार्थ भाव से सेवा तथा ईश्वर की भक्ति को अमृत के समान समझकर उनका श्रद्धापूर्वक सेवन करो। यदि इनमें से एक का भी निष्काम भाव से पालन किया जाय तो भी कल्याण हो सकता है, फिर सबका पालन करने से तो कल्याण होने में संदेह ही क्या है ?

सुबह सूर्योदय से पहले उठकर, स्नानादि से निवृत्त हो के स्वच्छ वातावरण में प्राणायाम करो। तदुपरांत तुलसी के 5-7 चबाकर एक गिलास पानी ऐसे ढंग से पीना चाहिए कि तुलसी के पत्तों के टुकड़े मुँह में रह न जायें। इन सबसे बुद्धिशक्ति में गजब की वृद्धि होती है। लेकिन ध्यान रहे कि तुलसी सेवन और दूध सेवन के बीच दो घंटे का अंतर होना चाहिए।

छः घंटे से अधिक सोना, दिन में सोना, काम में सावधानी न रखना, आवश्यक कार्य में विलम्ब करना आदि सब ʹआलस्यʹ ही है। इन सबसे हानि ही होती है।
मन, वाणी और शरीर के द्वारा न करने योग्य व्यर्थ चेष्टा करना तथा करने योग्य कार्य की अवहेलना करना ʹप्रमादʹ है।

ऐश, आराम, स्वाद-लोलुपता, फैशन, फिल्में, अधर्म को बढ़ावा देने वाले टीवी चैनल, अश्लील वेबसाइटें देखना, क्लबों में जाना आदि सब ʹभोगʹ हैं।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, अहंकार, ईर्ष्या आदि ʹदुर्गुणʹ हैं।

संयम, क्षमा, दया, शांति, समता, सरलता, संतोष, ज्ञान, वैराग्य, निष्कामता आदि ʹसदगुणʹ हैं। यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत और सेवा-पूजा करना तथा अहिंसा, सत्य,
ब्रह्मचर्य का पालन करना आदि ʹसदाचारʹ है।

इन शास्त्रीय वचनों को बार-बार पढ़ो, विचारो और उन्नति के पथ पर अग्रसर बनो।
– पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

सुबह नींद में से उठते ही क्या करें | Shubh Suprabhat

बल ही जीवन है,दुर्बलता मौत है और सब बलों का मूल स्थान आत्मा-परमात्मा है। इसलिए सुबह नींद में से उठके किसका ध्यान करोगे ?

आत्मा-परमात्मा का !!

सुबह (Suprabhat) नींद में से उठते ही थोड़ी देर चुप बैठो। फिर अंतर्यामी को कहना कि: ‘अंतर्यामी हम तुम्हारे, तुम हमारे । तुम्हारी शक्ति से रात्रि को नींद आयी। अब हमारी
सद्बुद्धि बढ़े, भक्ति बढ़े, हमारा उद्यम, साहस आदि बढ़े।

ऐसा करके अपने हाथ मुँह पर घुमाकर भगवान व धरती को प्रणाम करके धरती पर पैर रखना चाहिए अथवा सुबह नींद में से उठकर भ्रूमध्य (दोनों भौंहों के मध्य) में ॐकार का, शिवजी का या अपने सद्गुरु का ध्यान करो। इससे बहुत चमत्कार होगा।

आँखें बंद रहें, दबाव न पड़े। दबाव पड़ेगा तो आँखों में अथवा सिर में तकलीफ हो सकती है।

जैसे भोजन करने में २५-३० मिनट लगते हैं। लेकिन वह ८-१० घंटे पुष्टि देता है, ऐसे ही कुछ मिनट भृकुटी (भूमध्य) में ध्यान तुमको १०-१२ घंटे सूझबूझ, प्रसन्नता पाने में बड़ी मदद करेगा। विचारशक्ति, निर्णयशक्ति और रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाने में मदद करेगा, आनंद बना रहेगा। फिर जरा-जरा बात में राग-द्वेष नहीं सतायेगा, विरोधियों की अवहेलना, द्वेषी, ईर्ष्याखोरों की ईर्ष्या तुम पर हावी नहीं होगी। तुम्हारी सूझबूझ बढ़ जायेगी।