Napoleon Bonaparte Short Story in Hindi| Sanyami Jeevan Ke Fayde

Napoleon Bonaparte short story in hindi

Napoleon Bonaparte Short Story in Hindi| Sanyami Jeevan Ke Fayde: नेपोलियन के हाथ में सत्ता आने से पहले वहाँ लुई सोलहवें (louis XVI )तथा उसके बोरबोर वंश का राज्य था । उसमें भी वासना और विलासिता काफी बढ़ चुकी थी ।

राजा के प्रमुख सरदारों और सामंतों में भी ‘काम’ रूपी भेड़िया अच्छी तरह से  घुस चुका था । आखिर सन् 1789 में वहाँ राज्य-क्रांति हुई और लोगों ने विलासी राजा-रानी और उसके प्रमुख सहायकों को मार डाला ।

इधर नेपोलियन के हाथ में राज्य की बागडोर आ रही थी । वह एक के बाद एक विजय प्राप्त करता जा रहा था । जब नेपोलियन 26 वर्ष का था तब वह एक 36 वर्षीया सुंदरी, जिसका नाम जोजेफीन था और जो चरित्रहीन एवं निर्दयी थी, उसके रूप-लावण्य में गिरफ्तार हो चुका था । उसने उससे विवाह भी कर लिया ।

सन् 1804 में जब उसका राज्याभिषेक हुआ तो उसने जोजेफीन के सिर पर राजमुकुट भी पहनाया ।

उसके कुछ समय बाद नेपोलियन ने उसे तलाक देकर ‘मेरी लूसी’ नामक युवती से विवाह किया । फिर भी वह जोजेफीन के आकर्षण-पाश से मुक्त नहीं हो सका । उसकी वासना की आग बढ़ती ही गयी ।

इतिहास कहता है कि अंत में वाटरलू के युद्ध में जाने से पहले सायं को नेपोलियन स्वयं को पतित बना चुका था । उसका मन उन मलिन विचारों के कारण युद्ध की योजना तथा निर्देशन कार्य में सही रीति से नहीं जुट सका ।

इसका परिणाम यह हुआ कि नेपोलियन के भाग्य का तारा टूट गया । वह बुरी तरह परास्त हुआ और संसार के इतने महान सेनापति का दयनीय अंत हुआ ।

इस हार के जहाँ सैनिक तथा अन्य कारण थे, वहीं काम वासना भी एक कारण थी क्योंकि इससे उसकी मानसिक एकाग्रता में और शारीरिक क्षमता इत्यादि पर बुरा प्रभाव पड़ा था ।

युवावस्था की उम्र तक वह बहुत संयमी रहा जिससे वह सफलता के शिखर पर पहुँचा, परंतु बाद में असंयमी जीवन जीने के कारण उसका पतन हो गया ।

A True Story of Bhagat Sadhna Kasai (Butcher) in Hindi

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Bhagat Sadhna Kasai Story in Hindi: बहुत समय पहले एक कसाई जाति के “सदना” नाम के एक भक्त हुए थे । बचपन से ही इनको भगवान के नाम और हरि कीर्तन में बहुत रुचि थी । भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर हर समय रहता था । ये जाति से कसाई थे फिर भी ये दयावान बहुत थे । 

इनका हृदय दया से परिपूर्ण था । जीव-वध तो इनसे देखा नहीं जाता था । जीव वध देखकर बहुत दुःखी हो जाते थे इसीलिए वे स्वयं पशु वध कभी नहीं करते थे । आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, इस काम में भी इनका मन लगता नहीं था पर मन मारकर जाति-व्‍यवसाय होने से करते थे ।

सदा नाम-जप, भगवान के गुणगान और लीलामय पुरुषोत्तम के चिन्‍तन में लगे रहते थे । सदना का मन श्रीहरि के चरणों में रम गया था । रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे ।

भगवान अपने भक्त से कभी दूर नहीं रह सकते । भक्त को जैसे उनके बिना चैन नहीं, वैसे ही उन्‍हें भी भक्त के बिना चैन नहीं । Sadna Kasai के घर में भगवान शालिग्राम रूप में विराजमान थे । सदना को इसका पता नहीं था । वे तो शालिग्राम को पत्‍थर का एक बाट समझते थे और उनसे मांस तौला करते थे ।

Sadhna Kasai Story/ Kahani in Hindi

एक दिन एक साधु Sadhna Kasai की दुकान के सामने से जा रहे थे । दृष्टि पड़ते ही वे शालिग्राम जी को पहचान गये । मांस-विक्रेता कसाई के यहाँ अपवित्र स्‍थल में शालिग्राम जी को देखकर साधु को बड़ा क्‍लेश हुआ । सदना से माँगकर वे शालिग्राम को ले गये ।

सदना ने भी प्रसन्नतापूर्वक साधु को अपना वह चमकीला बाट दे दिया । साधु बाबा कुटिया पर पहुँचे । उन्‍होंने विधिपूर्वक शालिग्राम जी की पूजा की परंतु भगवान को न तो पदार्थों की अपेक्षा है न मंत्र या विधि की । वे तो प्रेम के भूखे हैं, प्रेम से रीझते हैं । 

रात में उन साधु को स्‍वप्‍न में भगवान ने कहा – “तुम मुझे यहाँ क्‍यों ले आये ? मुझे तो अपने भक्त सदना के घर में ही बड़ा सुख मिलता था। जब वह मांस तौलने के लिये मुझे उठाता था तब उसके शीतल स्‍पर्श से मुझे अत्‍यन्‍त आनन्‍द मिलता था । मुझे उसके तराजू में झूले बिना नींद नहीं आती है । जब वह मेरा नाम लेकर कीर्तन करता था, नाचने लगता था, तब आनन्‍द के मारे मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता था । तुम मुझे वहीं पहुँचा दो । मुझे सदना के बिना एक क्षण चैन नहीं पड़ता है ।”

साधु महराज जगे । उन्‍होंने शालिग्राम जी को उठाया और सदना के घर जाकर उसे दे आये । साथ ही उसको भगवत्‍कृपा का महत्व भी बता आये । सदना को जब पता लगा कि उनका यह बटखरा तो भगवान शालिग्राम हैं तब उन्‍हें बड़ा पश्चाताप हुआ। 

वे मन-ही-मन कहने लगे – “देखो, मैं कितना बड़ा पापी हूँ । मैंने भगवान को निरादरपूर्वक अपवित्र मांस के तराजू का बाट बनाकर रखा । प्रभो ! अब मुझे क्षमा करो ।” अब सदना को अपने व्‍यवसाय से घृणा हो गयी।

सदना कसाई शालिग्राम जी को लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्र श्री जगन्नाथ पुरी को चल पड़े । मार्ग में सन्‍ध्‍या-समय सदना जी एक गाँव में एक गृहस्‍थ के घर ठहरे । उस घर में स्‍त्री-पुरुष दो ही व्‍यक्ति थे । स्‍त्री का आचरण अच्‍छा नहीं था । वह अपने घर ठहरे हुए इस स्‍वस्‍थ, सुन्‍दर, सबल पुरुष पर मोहित हो गयी । आधी रात के समय सदना जी के पास आकर वह अनेक प्रकार की अशिष्‍ट चेष्‍टाएं करने लगी । सदना जी तो भगवान के परमभक्त थे । उन पर काम की कोई चेष्‍टा सफल न हुई ।

सदना जी उठकर, हाथ जोड़कर बोले – “तुम मेरी माता हो ! अपने बच्‍चे की परीक्षा मत लो, माँ ! मुझे आप आशीर्वाद दो ।”

भगवान के सच्‍चे भक्त परस्‍त्री को माता ही देखते हैं । स्‍त्री का मोहक रूप उनको भ्रम में नहीं डालता । वे हड्डी, मांस, चमड़ा, मल-मूत्र, थूक-पीब की पुतली को सुन्‍दर मानने की मूर्खता कर ही नहीं सकते; परंतु जो काम के वश हो जाता है, उसकी बुद्धि मारी जाती है । 

वह न सोच-समझ पाता है, न कुछ देख पाता है । वह निर्लज्‍ज और निर्दयी हो जाता है । उस कामातुरा स्‍त्री ने समझा कि मेरे पति के भय से ही यह मेरी बात नहीं मानता । वह गयी और तलवार लेकर सोते हुए अपने पति का सिर उसने काट दिया । 

कामान्‍ध कौन-सा पाप नहीं कर सकता !!

अब वह कहने लगी- “प्‍यारे ! अब डरो मत । मैंने अपने खूसट पति का सिर काट डाला है । हमारे सुख का कण्‍टक दूर हो गया । अब तुम मुझे स्‍वीकार करो ।”

सदना भय से काँप उठे। स्‍त्री ने अनुनय-विनय करके जब देख लिया कि उसकी प्रार्थना स्‍वीकार नहीं हो सकती तब द्वार पर आकर छाती पीट-पीट कर रोने लगी । लोग उसका रुदन सुनकर एकत्र हो गये । 

उसने कहा- “इस यात्री ने मेरे पति को मार डाला है और यह मेरे साथ बलात्‍कार करना चाहता था ।”

लोगों ने सदना को खूब भला बुरा कहा, कुछ ने मारा भी; पर सदना ने कोई सफाई नहीं दी । मामला न्‍यायाधीश के पास गया । सदना तो अपने प्रभु की लीला देखते हुए अन्‍त तक चुप ही बने रहे । अपराध सिद्ध हो गया । न्‍यायाधीश की आज्ञा से उनके दोनों हाथ काट लिये गये ।

सदना के हाथ कट गये, रुधिर की धारा चलने लगी; उन्‍होंने इसे अपने प्रभु की कृपा ही माना । उनके मन में भगवान के प्रति तनिक भी रोष नहीं आया । भगवान के सच्‍चे भक्त इस प्रकार निरपराध कष्‍ट पाने पर भी अपने स्‍वामी की दया ही मानते हैं । 

भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए सदना जगन्नाथपुरी चल पड़े । उधर पुरी में प्रभु ने पुजारी को स्‍वप्‍न में आदेश दिया – “मेरा भक्त सदना मेरे पास आ रहा है । उसके हाथ कट गये हैं । पालकी लेकर जाओ और उसे आदरपूर्वक ले आओ ।” 

पुजारी पालकी लेकर गये और आग्रहपूर्वक सदना को उसमें बैठाकर ले आये ।

सदना ने जैसे ही श्री जगन्नाथ जी को दण्‍डवत् करके कीर्तन के लिये भुजाएँ उठायीं, उनके दोनों हाथ पूर्ववत् ठीक हो गये । प्रभु की कृपा से हाथ ठीक तो हुए पर मन में शंका बनी ही रही कि वे क्‍यों काटे गये ?

भगवान के राज्‍य में कोई निरपराध तो दण्‍ड पाता नहीं । रात में स्‍वप्‍न में भगवान ने सदना जी को बताया – “तुम पूर्वजन्‍म में काशी में सदाचारी विद्वान ब्राह्मण थे । एक दिन एक गाय कसाई के घेरे से भागी जाती थी । उसने तुम्‍हें पुकारा । तुमने कसाई को जानते हुए भी गाय के गले में दोनों हाथ डालकर उसे भागने से रोक लिया । वही गाय वह स्‍त्री थी और कसाई उसका पति था । पूर्वजन्‍म का बदला लेने के लिये उसने उसका गला काटा । तुमने भयातुरा गाय को दोनों हाथों से पकड़कर कसाई को सौंपा था, इस पाप से तुम्‍हारे हाथ काटे गये । इस दण्‍ड से तुम्‍हारे पाप का नाश हो गया ।”

सदना ने भगवान की असीम कृपा पाई । वे भगवत्‍प्रेम में विह्वल हो गये । बहुत काल तक नाम-कीर्तन, गुणगान तथा भगवान के ध्‍यान में तल्‍लीन रहते हुए समय व्यतीत किया और अन्‍त में श्री जगन्‍नाथ जी के चरणों में देह त्‍यागकर वे परमधाम पधार गये ।

A Short Story of Tanhaji in Hindi [ShivaJi Maharaj Ke Veer]

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Tanhaji Story in Hindi [ShivaJi Maharaj Ke Veer Tanaji Malusare Kahani] ~ पूज्य बापूजी के सत्संग-प्रवचन से 

एक दिन सुबह शिवाजी महाराज की माँ दातुन कर रही थीं । उन्होंने शिवाजी महाराज से हाथ का इशारा करते हुए कहाः “शिवा ! ये देखो, मैं रोज सुबह दुष्टों का झंडा देखती हूँ । इसका कुछ उपाय करो ।”

शिवाजी महाराज ने सोचा, ‘यह ताना जी का काम है और वे छुट्टी पर हैं । कोई दूसरा इसे नहीं कर सकता ।’ ताना जी शिवाजी महाराज के खास आदमी थे । उनके लड़के की शादी थी इसलिए वे छुट्टी लेकर घर गये थे । शिवाजी महाराज ने आदमी भेजा । तानाजी अपने बेटे को घोड़े पर बिठाकर शादी के लिए भेज रहे थे । 

आदमी ने आकर कहाः “शिवाजी महाराज आपको याद कर रहे थे । कोंढाणा का किला जीतने जाना था लेकिन आपको मैं कैसे बोलूँ ? आपके लड़के की शादी तो आज ही है ।”

ताना जी ने कहाः “शादी है तो वह करता रहेगा । मेरे मालिक ने बुलाया है तो अब कैसे रुकूँ !”

तानाजी नौकर थे, शिष्य तो नहीं थे । इतना वफादार नौकर ! लड़के की शादी होनी होगी तो होगी, नहीं होनी होगी तो नहीं होगी । वापस शिवाजी महाराज के पास चले गये । 

शिवाजी महाराज ने कहाः “तुम शादी छोड़कर आ गये ??”

ताना जी ने कहाः “जब आपने याद किया तो मुझे रुकने की क्या जरूरत ??”

देखो, कैसे-कैसे लोग हो गये ! ताना जी फौज को लेकर गये । पहले के जमाने में किले होते थे । पतली गोह को चढ़ाया…. नहीं चढ़ी । दूसरी बार भी नहीं चढ़ी । 

तीसरी बार बोला कि “नहीं जायेगी तो काट डालूँगा ।” 

वह चढ़ गयी । फिर रस्सा बाँधा और सेना कूद पड़ी किले में । ये लोग तो गिने-गिनाये थे और मुगलों की संख्या ज्यादा थी ।

युद्ध का सारा सामान उनके पास था । वे इन पर टूट पड़े । ताना जी के कुछ सैनिक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, बाकी घबरा गये । एक बूढ़ा सैनिक गया और जिस रस्से के सहारे वे किले में आये थे, उसे काटकर आ गया । 

आकर सैनिकों को कहाः “रस्सा काटकर आ गया हूँ । अब तो उतरने की गुँजाइश भी नहीं है । दीवार से कूदोगे तब भी मरोगे । लड़कर मरो अथवा कूदकर ।”

सैनिकों ने देखा, किसी भी हाल में मरना ही है तो लड़कर मरेंगे । जोश आ गया । लग पड़े और किला जीत लिया ।

ऐसे ही जो लोग संन्यास ले लेते हैं, दीक्षा ले लेते हैं, उन्हें दृढ़ता से आसक्ति रूपी रस्से को काट डालना चाहिए । जैसे हमने भी दाढ़ी रखी और साधुताई के वस्त्र पहन लिये, पूँछड़ा काट दिया तो हमारा काम बन गया । 

मुझे गुरु जी कुछ कहते अथवा थोड़ी प्रतिकूलता लगती तब यदि हम बोलतेः ‘अच्छा गुरु जी ! जाता हूँ ।’ तो हमारा क्या भला होता ! हम गुरु जी के चरणों में कैसे-कैसे रहते थे हमारा दिल जानता है !

हमें कभी ऐसा विचार नहीं आया कि चलो अहमदाबाद चलकर शक्कर बेचें और भजन करें । जब आये हैं तो अपना काम ‘साक्षात्कार’ करके ही जायें । ईश्वर के लिए कदम रख दिया तो फिर कायर होकर क्या भागना ! देर-सवेर संसार से तो रोकर ही जाना है ।

“हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं ।

हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं ।।”

 ऐसे दृढ़ निश्चय से व्यक्ति चलेगा  तब परमात्मा मिलेगा । नहीं तो न इधर का, न उधर का । संसार दुःखों का घर है । दुःख नहीं देखा है तो संसार में जाओ । ऐसा कौन संसारी है जिसने दुःख नहीं देखा है ?

दो आदमियों को दुःख नहीं दिखता है । एक तो ज्ञानी को नहीं दिखता है और दूसरा जो अत्यंत बेवकूफ है, जिसमें संवेदना नहीं है, उसको आदत पड़ जाती है । नाली के कीड़े को बदबू नहीं आती है । कसाईखाने में कसाई को बदबू नहीं आती है । तुम वहाँ से पसार होओ तो दिमाग खराब हो जाए । कसाई तो वहीं मजे से चाय पियेंगे । आदत पड़ जाती है न !

जैसे जिसे नासूर हो जाए उसे बदबू का असर नहीं होता है, ऐसे ही संसार की परेशानियाँ सहते-सहते लोग नकटे हो जाते हैं । फिर उसी में रचे-पचे रहते हैं और अपने को सुखी भी मानते हैं । जो भगवान के रास्ते चल रहा है उसे कहेंगे कि ‘इसने तो अपना जीवन बिगाड़ लिया । हमारा तो इतना लाख दुकान में है, यह है, वह….’ लेकिन जब मरेगा तो पेड़ बनेगा, कुल्हाड़े सहेगा तब पता चलेगा ।

भैंसा बनेगा, चौरासी लाख शीर्षासन करेगा तब पता चलेगा । कमाया तो क्या किया !

जैसे मटमैले पानी में मुँह नहीं दिखता, ऐसे ही विषय भोगों से सुख लेने की जिसकी रूचि है, समझो उसकी बुद्धि मलिन है, उस मलिन बुद्धि में आत्मा का सुख नहीं आता, श्रद्धा भी नहीं टिकती ।

अपवित्र बुद्धि डाँवाडोल हो जाती है परंतु दृढ़ निश्चय वाले को प्रतिकूलता में भी राह मिल जाती है । दृढ़ संकल्प के बल से मीराबाई ने विष को अमृत में बदल दिया था और विषधर सर्प भी नौलखा हार बन गया था । स्वामी रामतीर्थ भी दृढ़ता से लगे तो अपने परम लक्ष्य तक पहुँच गये ।

कहते हैं कि महात्मा बुद्ध भी वृक्ष के नीचे दृढ़ संकल्प करके बैठे और अंत में लक्ष्यप्राप्ति करके ही उठे । ऐसे ही आप भी ईश्वरप्राप्ति का दृढ़ संकल्प करें और संसार की आसक्ति रूपी रस्सा काट दें तो निश्चित ही आपकी विजय होगी ।

~ स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 28,29 अंक 225

Power of Brahmacharya [Celibacy Superpowers] Sanyam bal

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Power of Brahmacharya [Celibacy Superpowers]. Miracles of Brahmacharya in Hindi.

हैहयवंशी क्षत्रिय राजकुमार परपुरंजय एक दिन वन में आखेट के लिए गये । उस गहन वन में घूमते हुए राजकुमार ने एक काले रंग के हिंसक पशु को देखा और बाण छोड़ दिया ।

पास जाने पर उन्होंने पाया कि अनजाने में उन्होंने हिंसक पशु का चर्म ओढ़े हुए एक मुनि को मार डाला है । अज्ञानवश हुए इस पापकर्म से राजकुमार व्यथित हो मूर्च्छित हो गये।

             होश आने पर परपुरंजय ने सुविख्यात हैहयवंशी राजाओं के पास जाकर इस दुर्घटना का यथावत् वर्णन किया । ‘फल-मूल का आहार करनेवाले एक मुनि की हिंसा हो गयी ।’

यह सुनकर वे सभी क्षत्रिय मन-ही- मन बहुत दुःखी हुए तथा जहाँ-तहाँ यह पता लगाते हुए कि ये मुनि किनके पुत्र हैं,शीघ्र ही कश्यपनंदन अरिष्टनेमि के आश्रम पर पहुँचे । वहाँ नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करनेवाले ऋषि को प्रणाम करके वे सब खड़े हो गये।

जब ऋषि उनका सत्कार करने लगे, तब उन्होंने कहा : ‘हम अपने दूषितकर्म के कारण आपसे सत्कार पाने योग्य नहीं रह गये हैं । हमसे एक ब्राह्मण की हत्या हो गयी है ।’

ऋषि ने पूछा : ‘आप लोगों से ब्राह्मण की हत्या कैसे हुई और वह मरा हुआ ब्राह्मण कहाँ है ?’

              तब क्षत्रियों ने मुनि के वध का सारा समाचार उनसे सच-सच कह दिया और ऋषि को साथ लेकर सभी उस स्थान पर आये, जहाँ मुनि की हत्या हुई थी । किंतु क्षत्रियों को वहाँ मरे हुए मुनि की लाश नहीं मिली ।

अपनी असावधानी के लिए उन्हें और भी ग्लानि हुई । वे सब लज्जित होकर इधर-उधर उसकी खोज करने लगे । उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी । उन क्षत्रियों को अत्यंत दुःखी देखकर ऋषि अरिष्टनेमि ने अपने पुत्र को बुलाया और बोले : ‘परपुरंजय ! तुमने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण तो नहीं है ? राजाओ ! यह तपस्वी मेरा ही पुत्र है ।’

             मुनि को जीवित हुआ देख क्षत्रिय बड़े विस्मित हुए और कहने लगे :‘यह तो बड़े आश्चर्य की बात है । ये मरे हुए मुनि यहाँ कैसे लाये गये और किस प्रकार इन्हें जीवन मिला ? क्या यह तपस्या की ही शक्ति है,जिससे ये फिर जीवित हो गये ? ब्रह्मन् ! हम सब यह रहस्य सुनना चाहते हैं ? यदि हम सुनने योग्य हों तो कहिये ।’

             तब महर्षि ने उन क्षत्रियों से कहा : ‘राजाओ ! हम लोगों पर मृत्यु का वश नहीं चलता, इसका कारण संक्षेप से बताता हूँ । हम शुद्ध आचार-विचार से रहते हैं, आलस्य से रहित हैं, प्रतिदिन संध्योपासन के परायण रहते हैं, शुद्ध अन्न खाते हैं और शुद्ध रीति से न्यायपूर्वक धनोपार्जन करते हैं ।

हम लोग सदा ब्रह्मचर्यव्रत के पालन में लगे रहते हैं तथा केवल सत्य को ही जानते हैं, कभी झूठ में मन नहीं लगाते और सदा अपने धर्म का पालन करते हैं । अतः मृत्यु से हमें कोई भय नहीं है । हम विद्वानों तथा ब्राह्मणों के गुण ही प्रकट करते हैं, उनके अवगुण पर दृष्टि नहीं डालते । हम अतिथियों को अन्न-जल से तृप्त करते हैं । हमारे ऊपर जिनके भरण-पोषण का भार है, उन्हें हम पूरा भोजन देते हैं और उन्हें भोजन कराने से बचा हुआ अन्न हम खाते हैं ।

हम सदा शम, दम, क्षमा,तीर्थ-सेवन और दान में तत्पर रहनेवाले हैं एवं पवित्र देश में निवास करते हैं ।

हम सदा तेजस्वी सत्पुरुषों का ही संग करते हैं, इसलिए हमें मृत्यु से भय नहीं होता । ईर्ष्यारहित राजाओ ! अब तुम सब लोग यहाँ से जाओ,तुम्हें ब्रह्महत्या के पाप से भय नहीं रहा ।’

                यह सुनकर उन हैहयवंशी क्षत्रियों ने महामुनि अरिष्टनेमि का सम्मानव पूजन किया और प्रसन्न होकर अपने स्थान को चले गये ।

Maa Sharda Devi Biography Story: RamaKrishna Paramhansa’s Wife

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RamaKrishna Paramhansa’s Wife; Maa Sharda Devi Biography Story/ Kahani in Hindi:

(पूज्य बापू जी अपनी सारगर्भित वाणी में समझा रहे हैं माँ शारदा देवी के भाव-बल की शक्ति )

 रामचन्द्र मुखर्जी की सुपुत्री शारदा देवी का बाल्यकाल में ही विवाह हो गया था। वह 5 वर्ष की थी और 23 साल के दुल्हा थे रामकृष्ण परमहंस। शारदा थोड़े दिन ससुराल रहकर फिर 17 साल मायके रही। लोग उसके पति के लिए कुछ-का-कुछ सुनाते थे कि ʹवे पागल हैं, कभी हँसते हैं, कभी रोते हैं, कभी क्या करते हैं !ʹ लोग नहीं समझते थे तो उनको पागल कहते थे लेकिन शारदा देवी मानती थी कि मेरे पति उच्चकोटि के संत हैं।

शारदा देवी 22 साल की हो गयी। जब गंगा स्नान के मौके पर लोग कलकत्ता जा रहे थे तो इस देवी ने कहाः “मैं भी अपने प्राणनाथ के, माँ के दर्शन करने दक्षिणेश्वर जाऊँगी।”

पैदल का जमाना था। शारदा को उन यात्रियों के साथ 60 मील की यात्रा में कीचड़-काँटे वाली जगह से पसार होना था। तेलो-भेलो जंगल बीच में था। वह जंगल इतना भयंकर और खूँखार डाकुओं से आतंकग्रस्त था कि कोई अकेले जाने की हिम्मत नहीं करता था। पूरे झुंड के झुंड लोग जाते और फिर भी लुटे जाते, बलात्कार होते, क्या-क्या होता ! बागदी डाकू खूँखार ऐसे की एक सेर अन्न या एक कपड़े के लिए किसी की गर्दन काट दें अथवा कोई स्त्री जँच गयी तो दिन-दहाड़े दुष्कर्म कर डालें।

शारदा लोगों के ताने सुन-सुनकर थोड़ी अस्वस्थ अवस्था में धीरे-धीरे चल रही थी, उसके पाँव में मोच भी आ गयी थी। साथ में जो लोग थे उन्होंने कहाः “ऐसे चलोगी तो रात को इस जंगल में हमारी जान जायेगी। यहाँ डाकू लोग शराब पीकर बड़ी बेरहमी से लूटते हैं।”

शारदा ने कहाः “मुझ अकेली के कारण आप सबका जान-माल कष्ट में न पड़े, आप लोग निकल जाओ।”

मरते क्या न करते, उसको छोड़कर वे लोग निकल गये। सूर्य ढल गया था। अँधेरे में दिखे भी क्या और थकी हुई ! जोरों की बारिश, आँधी आयी। पेड़ का सहारा लेकर बैठ गयी। इतने में खूँखार डकैत शिकार खोजते-खोजते पहुँच गये और चारों तरफ से घेर लिया। पूछाः “तुम्हारे साथ कोई नहीं है ?”

शारदा ने सब कुछ सच-सच बता दिया और पास में जो कुछ कपड़े पैसे थे, उनके सामने रख दिये। मुखिया ने पूछाः “तू कौन है और अकेली किधर जा रही है ?”

शारदा बोलीः “पिता जी ! क्या आपने मुझे पहचाना नहीं है ? मैं आपकी बेटी शारदा हूँ और आपके जमाई दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पुजारी हैं, उनके पास जा रही हूँ। और मैं अकेली कहाँ हूँ, मेरे पिता जी और ये मेरे भाई तो मेरे साथ हैं।”

मुखिया के चेहरे के भाव बदल गये। साथी डकैत भी पानी-पानी हो गये।

मुखिया बोलाः “हम लोग पापी हैं, तुम हमको पिता और भाई बोलती हो ?”

“नहीं, आप पापी नहीं हो, मेरी काली माँ की संतानें हो। गलती तो आपके मन में है पिता जी !”

भावविभोर होकर डकैतों का मुखिया बोलाः “बेटी ! आज की रात इस पापी पिता का घर पावन कर मेरी पुत्री !”

शारदाः “चलिये पिता जी !”

डकैतों की पत्नियाँ इकट्ठी हो गयीं और मुखिया की पत्नी ने शारदा को पलकों पर बिठा लिया। बोलीः “हम लोग छोटी जात के हैं। मैं गाँव की ब्राह्मणी को बुला लाती हूँ। तेरे लिए वे बनायेंगी भोजन।”

शारदाः “तुम मेरी माँ हो, तुम ही ब्राह्मणी हो। हम दोनों मिलकर भोजन बना लेती हैं।”

माँ पानी-पानी हो गयी। भोजन के बाद कुछ देर आराम करके शारदा बोलीः “पिताजी ! हमारे संग के लोग तारकेश्वर पहुँच गये होंगे और अब वे मेरी बाट देखते होंगे। आप कुछ भी करो, मुझे वहाँ पहुँचाओ।”

उन डकैतों ने डोली सजायी और उस सुंदर युवती को डोली में बिठाया। डाकू डोली उठाकर ले जा रहे हैं। ज्यों ही तारकेश्वर नजदीक आया त्यों ही उस डकैत पिता ने कहाः “बेटी ! अब हम उधर नहीं जा सकते हैं। हमको पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इनाम घोषित किया है।”

शारदाः “पिताजी ! आपने मेरी बहुत सेवा की है और मेरे इन भाइयों ने मुझे कंधे पर उठाया है। आज से डाकुओं के नाम में आप लोगों का नाम नहीं रहेगा। आपके जमाई काली माँ के भक्त हैं, आप भी गाँव में माँ काली की पूजा शुरु करो।”

शारदा सकुशल चली गयी और डकैतों ने तब से डाका डालना छोड़ दिया। वे खेती आदि करके जीवनयापन करने लगे। दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति के अंदर भी अच्छाई छुपी है। आप अच्छाई को विकसित करो बस !

~ स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 29, 30 अंक 242

Power of Brahmacharya : A Short Story of Anandamayi Ma in Hindi

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Power of Brahmacharya [Sanyam Shakti] A Short Story of Anandamayi Ma in Hindi: संयम में अद्भुत सामर्थ्य है । जिसके जीवन में संयम है, जिसके जीवन में ईश्वरोपासना है…. उसका जीवन सहज ही में महान हो जाता है । आनंदमयी माँ का जब विवाह हुआ तब उनका व्यक्तित्व अत्यंत आभा सम्पन्न था । शादी के बाद उनके पति उन्हें संसार-व्यवहार में ले जाने का प्रयास करते रहते थे किंतु आनंदमयी माँ ‘संयम’ और ‘सत्संग’ की महिमा सुनाकर, पति की थोड़ी सेवा करके, विकारों से उनका मन हटा देतीं थीं । इस प्रकार कई दिन बीते, हफ्ते बीते, कई महीने बीत गये लेकिन आनंदमयी माँ ने अपने पति को विकारी जीवन में गिरने नहीं दिया ।

आखिरकार कई महीनों के पश्चात् एक दिन उनके पति ने कहा : ‘‘तुमने मुझसे शादी की है फिर भी क्यों मुझे इतना दूर-दूर रखती हो ?’’

तब आनंदमयी माँ ने जवाब दिया : ‘‘शादी तो जरूर की है लेकिन शादी का वास्तविक मतलब तो इस प्रकार है : शाद अर्थात् खुशी । वास्तविक खुशी प्राप्त करने के लिए पति-पत्नी एक-दूसरे के सहायक बनें न कि शोषक । काम-विकार में गिरना यह कोई शादी का फल नहीं ।’’

इस प्रकार अनेक युक्तियों से और अत्यंत विनम्रता से उन्होंने अपने पति को समझा दिया ।

आनंदमयी माँ संसार के कीचड़ में न गिरते हुए भी अपने पति की बहुत अच्छी तरह से सेवा करतीं थीं । पति नौकरी करके घर आते तो गर्म-गर्म भोजन बनाकर खिलाती थीं ।

आनंदमयी माँ घर में भी ध्यानाभ्यास किया करती थीं । कभी-कभी स्टोव पर दाल चढ़ाकर, छत पर खुले आकाश में चन्द्रमा की ओर त्राटक करते-करते ध्यानस्थ हो जातीं । इतनी ध्यानमग्न हो जातीं कि स्टोव पर रखी हुई दाल कोयला हो जाती । घर के लोग डाँटते तो चुपचाप अपनी भूल स्वीकार कर लेतीं लेकिन अंदर से तो समझती कि : ‘मैं कोई गलत मार्ग पर तो नहीं जा रही हूँ…’ इस प्रकार उनके ध्यान-भजन का क्रम चालू ही रहा । घर में रहते हुए ही उनके पास एकाग्रता का कुछ सामर्थ्य आ गया ।

एक रात्रि को वे उठीं और अपने पति को भी उठाया । फिर स्वयं महाकाली का चिंतन करके अपने पति को आदेश दिया : ‘‘महाकाली की पूजा करो ।’’ उनके पति ने इनका पूजन कर दिया । आनंदमयी माँ में उन्हें महाकाली के दर्शन होने लगे । उन्होंने आनंदमयी माँ को प्रणाम किया ।

तब आनंदमयी माँ बोलीं : ‘‘अब महाकाली को तो माँ की नजर से ही देखना है न ?’’

पति : ‘‘यह क्या हो गया ?’’

आनंदमयी माँ : ‘‘तुम्हारा कल्याण हो गया ।’’

कहते हैं कि उन्होंने अपने पति को दीक्षा दे दी और साधु बनाकर उत्तरकाशी के आश्रम में भेज दिया ।

कैसी दिव्य नारी रही होंगी माँ आनंदमयी ! उन्होंने अपने पति को भी परमात्मा के रंग में रंग दिया । जो संसार की माँग करता था, उसे भगवान की माँग का अधिकारी बना दिया । इस भारत भूमि में ऐसी भी अनेकों सन्नारियाँ हो गयीं ! कुछ वर्ष पूर्व ही आनंदमयी माँ ने अपना शरीर त्यागा है । अभी हरिद्वार में उनकी समाधि बनी है ।

ऐसी तो अनेकों बंगाली लड़कियाँ थीं, जिन्होंने शादी की, पुत्रों को जन्म दिया, पढ़ाया-लिखाया और मर गईं । शादी करके संसार-व्यवहार चलाओ उसकी ना नहीं है लेकिन पति को विकारों में गिराना या पत्नी के जीवन को विकारों में खत्म करना यह एक-दूसरे के मित्र के रूप में एक-दूसरे के शत्रु का कार्य है । संयम से संतति को जन्म दिया यह अलग बात है किंतु विषय-विकारों में फँस मरने के लिए थोड़े ही शादी की जाती है ।

बुद्धिमान नारी वही है जो अपने पति को ब्रह्मचर्य-पालन में मदद करे और बुद्धिमान पति वही है जो विषय-विकारों से अपनी पत्नी का मन हटाकर निर्विकारी नारायण के ध्यान में लगाये । इस रूप में पति-पत्नी दोनों सही अर्थों में एक-दूसरे के पोषक होते हैं, सहयोगी होते हैं । फिर उनके घर में जो बालक जन्म लेते हैं वे भी ध्रुव जैसे, गौरांग जैसे, रमण महर्षि जैसे, रामकृष्ण जैसे, विवेकानंद जैसे बन सकते हैं ।

– पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

(ऋषि प्रसाद : जुलाई 1998)

Youth of India can become Teenage Time Bomb (Savdhaan Yuva)!!

youth of india can become teenage bomb

▣ विदेशों में बच्चों द्वारा हो रहे अपराधों में काफी वृद्धि हुई है। अपराध करने वाले बच्चों की आयु बहुत कम है लेकिन ये अपराध वैज्ञानिकों ( Criminologists ) को अभी से भयभीत और चिंतित कर रहे हैं । इनका अधिकतर समय गलियों में भटकने और हिंसात्मक टीवी कार्यक्रम देखने में गुजरता है।

➠  नॉर्थ-ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध ‘अपराध वैज्ञानिक’ जेम्स फॉक्स का कहना है कि- “कुछ वर्षों के बाद ये बच्चे ऐसे मानसिक रोगी बन जायेंगे जो आक्रामक, हिंसक और असामाजिक विचार व व्यवहार करने वाले तथा पश्चात्ताप एवं सहानुभूति की भावना से रहित होंगे। यदि इनको बंदूकें व नशीली दवाएँ प्राप्त हो जायेंगी तो ये अत्यंत खतरनाक साबित हो सकते हैं।”

➠ वेलेंटाइन डे की परम्परा को बढ़ाने वाले देशों की बाल-युवा पीढ़ी की दुर्दशा के बारे में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के राजनीति के प्रोफेसर डिलुलियो कहते हैं: “ये बच्चे ‘नैतिक दरिद्रता’ में पलकर विकसित हुए हैं क्योंकि इनको माता-पिता, शिक्षकों, धर्मगुरुओं से यह ज्ञान नहीं मिला कि सही क्या है ? और गलत क्या है ? और उनका नि:स्वार्थ प्रेम नहीं मिला।”

▣ तबाही की ओर…

➠ कैथरीन मेयर ( पत्रकार, टाइम मैगजीन ) लिखती हैं : ‘हिंसात्मक अपराध,अविवाहित गर्भवती किशोरियाँ, शराब और नशीली दवाओं के व्यसन की महामारी युवाओं को तबाही की ओर ले जाने का भय दिखा रहीं हैं। अविवाहित गर्भवती किशोरियों व यौन संक्रमित रोगों में ब्रिटेन पूरे यूरोप में सबसे आगे है।’ किड्स कंपनी, जो लंदन के दरिद्रतम बच्चों की सेवा करने वाली एक संस्था है, की संस्थापक कैमिला कहती हैं : “यदि मैं सरकार में होती तो आतंकवादियों के बम से नहीं, इस ( टीनेज टाइम बम ) से चिंतित होती।” ( टीनेज = किशोर )

▣ इस ‘टीनेज टाइम बम को निष्क्रिय करने का उपाय क्या है ?

➠ प्रोफेसर डिलुलियो का कहना है कि “धार्मिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाया जाये जिससे बच्चों और युवाओं के जीवन में अच्छे संस्कार डाले जायें।” इसलिए यदि पूज्य बापूजी जैसे संतों-महापुरुषों द्वारा दिये जा रहे संस्कारों, शिक्षाओं का लाभ समाज लेगा तो ही यह ‘टीनेज टाइम बम’ निष्क्रिय हो सकेगा अन्यथा विदेशों की जो स्थिति है वही स्थिति भारत की भी हो सकती है।

➠ भारत में ऐसे ज्ञानी महापुरुष सिर्फ उपदेश ही नहीं देते बल्कि हजारों ‘बाल संस्कार केन्द्रों’ के द्वारा बच्चों में दिव्य संस्कारों का सिंचन भी करते हैं, ‘दिव्य-प्रेरणा-प्रकाश’ जैसी पुस्तकों के राष्ट्रव्यापी प्रचार के द्वारा युवा पीढ़ी को पाश्चात्य कुसंस्कारों की आँधी से चरित्रभ्रष्ट होने से बचाते भी हैं और युवा वर्ग को वेलेंटाइन-डे जैसी महामारी से बचाने के लिए ‘मातृ-पित पूजन दिवस’ जैसा अक्सीर इलाज भी बताते हैं-

❀ “१४ फरवरी को लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे को फूल देते हैं । एक-दूसरे को फूल देना, ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूँ / करती हूँ….’ कहना बड़ी बेशर्मी की बात है। इसलिए लोफर-लोफरियाँ पैदा हो रहे हैं। यह गंदगी विदेश से आई है। इस विदेशी गंदगी से बचाकर हमें भारतीय संस्कृति की सुगंध से बच्चे-बच्चियों को सुसज्ज करना है ।”  – परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

~लोक कल्याण सेतु /फरवरी २०१४

Bhishma Pitamah Pratigya on Akhanda Brahmacharya

akhanda brahmacharya

महाभारत में ब्रह्मचर्य संबंधित भीष्म पितामह (Bhishma Pitamah)  का एक प्रसंग आता है :~

भीष्म पितामह बालब्रह्मचारी (Bal Brahmachari) थे, इसलिए उनमें अथाह सामर्थ्य था ।

 भगवान श्रीकृष्ण (Shri krishna) का यह व्रत था कि ‘मैं युद्ध शस्त्र नहीं उठाऊँगा ।’ किंतु यह भीष्म पितामह की ब्रह्मचर्यशक्ति का ही चमत्कार था कि उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना व्रत भंग करने के लिए मजबूर कर दिया । 

उन्होंने अर्जुन पर ऐसी बाणवर्षा की कि दिव्यास्त्रों से सुसज्जित अर्जुन जैसा धुरंधर धनुर्धारी भी उसका प्रतिकार करने में असमर्थ हो गया, जिससे उसके रक्षार्थ भगवान श्रीकृष्ण को रथ का पहिया लेकर भीष्म की ओर दौड़ना पड़ा। यह ब्रह्मचर्य (Akhanda Brahmacharya) का ही प्रताप था कि भीष्म मौत पर भी विजय प्राप्त कर सके । उन्होंने ही यह स्वयं तय किया कि उन्हें कब शरीर छोड़ना है । अन्यथा शरीर में प्राणों का टिके रहना असम्भव था परंतु भीष्म की बिना आज्ञा के मौत भी उनसे प्राण कैसे छीन सकती थी ! भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से शुभ मुहूर्त में अपना शरीर छोड़ा ।

 

ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः | Bodhkatha: Brahmachari & General Man in Hindi

Brahmachari & General man

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से …..

एक युवक ने यह बात पढ़ी~ “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ।”

“ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है।” (योग दर्शन साधन पाद: ३८) 

इतने में एक पतला-दुबला संन्यासी सामने से आता दिखाई दिया। उसे देखकर युवक हँसा और बोला ‘ब्रह्मचर्य का पालन करके साधु बन गया और शरीर देखो तो दुबला-पतला….. पतंजलि महाराज के ये वचन पुराने हो गये हैं। वे अतीत के लिए होंगे, अभी के युग के लिए नहीं….
यह देखो दुबले-पतले संन्यासी और हम कितने मोटे-ताजे !

युवक बुद्धिजीवी रहा होगा, जमानावादी रहा होगा।
भोग-रस्सी में बंधा हुआ कुतर्की रहा होगा। वर्तमान में बचाव की कला सीखा हुआ, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला रहा होगा। 

वह संन्यासी से बोला :
”महाराज ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । कहा है पतंजलि महाराज ने, लेकिन आपका शरीर तो देखो, कैसा दुबला-पतला है ? महाराज ! कैसे हैं ?”

फिर आगे कहा : ‘देखो, हम कैसे मजे से जी रहे हैं ? सुधरा हुआ जमाना है, चार दिन की जिंदगी है। मजे से जीना चाहिए…..’ ऐसा करके उसने अपना मज़ा लेने की बेवकूफी की डींग हाकी ।

संन्यासी ने सारी बेवकूफी की बातें सुनते हुए भी कहा :”चलो, मेरे पीछे-पीछे आओ।”
संन्यासी ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) के तेज से संपन्न था। निर्भीकता थी, वचन सामर्थ्य था। वह युवक ठगा-सा साधु के पीछे-पीछे चल पड़ा।
चलते-चलते दोनों पहुँचे एकांत अरण्य की उस गुफा में, जहाँ संन्यासी का निवासस्थान था। संन्यासी उस युवक को पास की एक गुफा में ले गया तो तीन शेर दहाड़ते हुए आये। ब्रह्मचर्य की मखौल उड़ानेवाला युवक तो संन्यासी के पैरों से लिपट गया।

संन्यासी ने शेरों पर नजर डाली….. नज़र डाली और शेर पूंछ हिलाते हुए पालतू पिल्ले की नाईं  बैठ गए।

युवक अभी तक थर-थर काँप रहा था। वह देखता ही रह गया ब्रह्मचर्य (Brahmacharya)  की महिमा का प्रताप ! अब उसे पता चला कि ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) के तेज में कितना सामर्थ्य छुपा है ।
 युवक ने क्षमा माँगी।

कहाँ तो पतला-दुबला दिखनेवाला संन्यासी और और ‘कहाँ तीन-तीन शेरों को पालतू पिल्ले की तरह शांति से बैठा देना !
 यह संन्यासी के ब्रहाचर्य (Brahmacharya) का प्रताप नहीं तो और क्या था ?

~ऋषि प्रसाद/जुलाई २००१/१०३/२६

 

संयम और दृढ़ संकल्प की शक्ति-पूज्य बापूजी

‘संयम’ और ‘दृढ़ संकल्प’ विद्यार्थी-जीवन की नींव है । जिसके जीवन में संयम है, वह हँसते-खेलते बड़े बड़े कार्य कर सकता है।
हे मानव !! तू अपने को अकेला मत समझ, ईश्वर और गुरु, दोनों का ज्ञान तेरे साथ है। जो महान बनना चाहते हैं, वे कभी फरियादात्मक चिन्तन नहीं करते । हे मानव तू दृढ़ संकल्प कर कि मैं अपना समय व्यर्थ नहीं गवाऊँगा। अगर युवती है तो युवान की तरफ और युवान है तो किसी युवती की तरफ विकारी निगाह नहीं उठायेंगे ।

१३ वर्ष के बालक रणजीत सिंह में पिता महासिंह ने संकल्प भर दिया कि मेरा बेटा तो कोहिनूर हीरा ही पहनेगा। उस समय कोहिनूर अफगानिस्तान में था। इस दृढ़ संकल्प के बल से ही बालक रणजीत सिंह ने बड़ा होने पर अफगानिस्तान में जाकर शत्रुओं को परास्त किया और वहाँ से कोहिनूर लाया और पहनकर दिखा दिया।
ऐसे ही ५ वर्ष के दृढ़ निश्चयी बालक ध्रुव को जब देवर्षि नारदजी से मंत्र मिला तो वह मंत्रजप में इतनी दृढ़ता से लगा रहा कि ६ महीने में ही उसने सारे विश्व के स्वामी भगवान नारायण को प्रकट करके दिखा दिया ।
हे शिष्यों ! हलके व संस्कारविहीन बच्चों और विद्यार्थियों का अनुकरण मत करना, बल्कि तुम तो संयमी-सदाचारी वीर पुरुषों एवं पवित्र भक्त आत्माओं, योगी, महात्माओं का अनुसरण करना।
मीरा के जीवन में कितने विघ्न और बाधाएँ आयीं, फिर भी उसने भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। गार्गी को कितनी कठिनाइयाँ सहनी पड़ीं, फिर भी उसने आत्म-साक्षात्कार कर लिया। ऐसे ही हजार-हजार विघ्न बाधाएँ आ जाने पर भी जो संयम, सदाचार, ध्यान, भगवान की भक्ति व सेवा का रास्ता नहीं छोड़ता, वह संसार में बाजी जरूर मार लेता है।
आप भी अपनी महानता को जगायें। भगवान एवं भगवत्प्राप्त महापुरुषों का आशीर्वाद आपके साथ है!!
हरि ॐ… हरि ॐ….