Maa Sharda Devi Biography Story: RamaKrishna Paramhansa’s Wife

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RamaKrishna Paramhansa’s Wife; Maa Sharda Devi Biography Story/ Kahani in Hindi:

(पूज्य बापू जी अपनी सारगर्भित वाणी में समझा रहे हैं माँ शारदा देवी के भाव-बल की शक्ति )

 रामचन्द्र मुखर्जी की सुपुत्री शारदा देवी का बाल्यकाल में ही विवाह हो गया था। वह 5 वर्ष की थी और 23 साल के दुल्हा थे रामकृष्ण परमहंस। शारदा थोड़े दिन ससुराल रहकर फिर 17 साल मायके रही। लोग उसके पति के लिए कुछ-का-कुछ सुनाते थे कि ʹवे पागल हैं, कभी हँसते हैं, कभी रोते हैं, कभी क्या करते हैं !ʹ लोग नहीं समझते थे तो उनको पागल कहते थे लेकिन शारदा देवी मानती थी कि मेरे पति उच्चकोटि के संत हैं।

शारदा देवी 22 साल की हो गयी। जब गंगा स्नान के मौके पर लोग कलकत्ता जा रहे थे तो इस देवी ने कहाः “मैं भी अपने प्राणनाथ के, माँ के दर्शन करने दक्षिणेश्वर जाऊँगी।”

पैदल का जमाना था। शारदा को उन यात्रियों के साथ 60 मील की यात्रा में कीचड़-काँटे वाली जगह से पसार होना था। तेलो-भेलो जंगल बीच में था। वह जंगल इतना भयंकर और खूँखार डाकुओं से आतंकग्रस्त था कि कोई अकेले जाने की हिम्मत नहीं करता था। पूरे झुंड के झुंड लोग जाते और फिर भी लुटे जाते, बलात्कार होते, क्या-क्या होता ! बागदी डाकू खूँखार ऐसे की एक सेर अन्न या एक कपड़े के लिए किसी की गर्दन काट दें अथवा कोई स्त्री जँच गयी तो दिन-दहाड़े दुष्कर्म कर डालें।

शारदा लोगों के ताने सुन-सुनकर थोड़ी अस्वस्थ अवस्था में धीरे-धीरे चल रही थी, उसके पाँव में मोच भी आ गयी थी। साथ में जो लोग थे उन्होंने कहाः “ऐसे चलोगी तो रात को इस जंगल में हमारी जान जायेगी। यहाँ डाकू लोग शराब पीकर बड़ी बेरहमी से लूटते हैं।”

शारदा ने कहाः “मुझ अकेली के कारण आप सबका जान-माल कष्ट में न पड़े, आप लोग निकल जाओ।”

मरते क्या न करते, उसको छोड़कर वे लोग निकल गये। सूर्य ढल गया था। अँधेरे में दिखे भी क्या और थकी हुई ! जोरों की बारिश, आँधी आयी। पेड़ का सहारा लेकर बैठ गयी। इतने में खूँखार डकैत शिकार खोजते-खोजते पहुँच गये और चारों तरफ से घेर लिया। पूछाः “तुम्हारे साथ कोई नहीं है ?”

शारदा ने सब कुछ सच-सच बता दिया और पास में जो कुछ कपड़े पैसे थे, उनके सामने रख दिये। मुखिया ने पूछाः “तू कौन है और अकेली किधर जा रही है ?”

शारदा बोलीः “पिता जी ! क्या आपने मुझे पहचाना नहीं है ? मैं आपकी बेटी शारदा हूँ और आपके जमाई दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पुजारी हैं, उनके पास जा रही हूँ। और मैं अकेली कहाँ हूँ, मेरे पिता जी और ये मेरे भाई तो मेरे साथ हैं।”

मुखिया के चेहरे के भाव बदल गये। साथी डकैत भी पानी-पानी हो गये।

मुखिया बोलाः “हम लोग पापी हैं, तुम हमको पिता और भाई बोलती हो ?”

“नहीं, आप पापी नहीं हो, मेरी काली माँ की संतानें हो। गलती तो आपके मन में है पिता जी !”

भावविभोर होकर डकैतों का मुखिया बोलाः “बेटी ! आज की रात इस पापी पिता का घर पावन कर मेरी पुत्री !”

शारदाः “चलिये पिता जी !”

डकैतों की पत्नियाँ इकट्ठी हो गयीं और मुखिया की पत्नी ने शारदा को पलकों पर बिठा लिया। बोलीः “हम लोग छोटी जात के हैं। मैं गाँव की ब्राह्मणी को बुला लाती हूँ। तेरे लिए वे बनायेंगी भोजन।”

शारदाः “तुम मेरी माँ हो, तुम ही ब्राह्मणी हो। हम दोनों मिलकर भोजन बना लेती हैं।”

माँ पानी-पानी हो गयी। भोजन के बाद कुछ देर आराम करके शारदा बोलीः “पिताजी ! हमारे संग के लोग तारकेश्वर पहुँच गये होंगे और अब वे मेरी बाट देखते होंगे। आप कुछ भी करो, मुझे वहाँ पहुँचाओ।”

उन डकैतों ने डोली सजायी और उस सुंदर युवती को डोली में बिठाया। डाकू डोली उठाकर ले जा रहे हैं। ज्यों ही तारकेश्वर नजदीक आया त्यों ही उस डकैत पिता ने कहाः “बेटी ! अब हम उधर नहीं जा सकते हैं। हमको पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इनाम घोषित किया है।”

शारदाः “पिताजी ! आपने मेरी बहुत सेवा की है और मेरे इन भाइयों ने मुझे कंधे पर उठाया है। आज से डाकुओं के नाम में आप लोगों का नाम नहीं रहेगा। आपके जमाई काली माँ के भक्त हैं, आप भी गाँव में माँ काली की पूजा शुरु करो।”

शारदा सकुशल चली गयी और डकैतों ने तब से डाका डालना छोड़ दिया। वे खेती आदि करके जीवनयापन करने लगे। दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति के अंदर भी अच्छाई छुपी है। आप अच्छाई को विकसित करो बस !

~ स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 29, 30 अंक 242

Power of Brahmacharya : A Short Story of Anandamayi Ma in Hindi

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Power of Brahmacharya [Sanyam Shakti] A Short Story of Anandamayi Ma in Hindi: संयम में अद्भुत सामर्थ्य है । जिसके जीवन में संयम है, जिसके जीवन में ईश्वरोपासना है…. उसका जीवन सहज ही में महान हो जाता है । आनंदमयी माँ का जब विवाह हुआ तब उनका व्यक्तित्व अत्यंत आभा सम्पन्न था । शादी के बाद उनके पति उन्हें संसार-व्यवहार में ले जाने का प्रयास करते रहते थे किंतु आनंदमयी माँ ‘संयम’ और ‘सत्संग’ की महिमा सुनाकर, पति की थोड़ी सेवा करके, विकारों से उनका मन हटा देतीं थीं । इस प्रकार कई दिन बीते, हफ्ते बीते, कई महीने बीत गये लेकिन आनंदमयी माँ ने अपने पति को विकारी जीवन में गिरने नहीं दिया ।

आखिरकार कई महीनों के पश्चात् एक दिन उनके पति ने कहा : ‘‘तुमने मुझसे शादी की है फिर भी क्यों मुझे इतना दूर-दूर रखती हो ?’’

तब आनंदमयी माँ ने जवाब दिया : ‘‘शादी तो जरूर की है लेकिन शादी का वास्तविक मतलब तो इस प्रकार है : शाद अर्थात् खुशी । वास्तविक खुशी प्राप्त करने के लिए पति-पत्नी एक-दूसरे के सहायक बनें न कि शोषक । काम-विकार में गिरना यह कोई शादी का फल नहीं ।’’

इस प्रकार अनेक युक्तियों से और अत्यंत विनम्रता से उन्होंने अपने पति को समझा दिया ।

आनंदमयी माँ संसार के कीचड़ में न गिरते हुए भी अपने पति की बहुत अच्छी तरह से सेवा करतीं थीं । पति नौकरी करके घर आते तो गर्म-गर्म भोजन बनाकर खिलाती थीं ।

आनंदमयी माँ घर में भी ध्यानाभ्यास किया करती थीं । कभी-कभी स्टोव पर दाल चढ़ाकर, छत पर खुले आकाश में चन्द्रमा की ओर त्राटक करते-करते ध्यानस्थ हो जातीं । इतनी ध्यानमग्न हो जातीं कि स्टोव पर रखी हुई दाल कोयला हो जाती । घर के लोग डाँटते तो चुपचाप अपनी भूल स्वीकार कर लेतीं लेकिन अंदर से तो समझती कि : ‘मैं कोई गलत मार्ग पर तो नहीं जा रही हूँ…’ इस प्रकार उनके ध्यान-भजन का क्रम चालू ही रहा । घर में रहते हुए ही उनके पास एकाग्रता का कुछ सामर्थ्य आ गया ।

एक रात्रि को वे उठीं और अपने पति को भी उठाया । फिर स्वयं महाकाली का चिंतन करके अपने पति को आदेश दिया : ‘‘महाकाली की पूजा करो ।’’ उनके पति ने इनका पूजन कर दिया । आनंदमयी माँ में उन्हें महाकाली के दर्शन होने लगे । उन्होंने आनंदमयी माँ को प्रणाम किया ।

तब आनंदमयी माँ बोलीं : ‘‘अब महाकाली को तो माँ की नजर से ही देखना है न ?’’

पति : ‘‘यह क्या हो गया ?’’

आनंदमयी माँ : ‘‘तुम्हारा कल्याण हो गया ।’’

कहते हैं कि उन्होंने अपने पति को दीक्षा दे दी और साधु बनाकर उत्तरकाशी के आश्रम में भेज दिया ।

कैसी दिव्य नारी रही होंगी माँ आनंदमयी ! उन्होंने अपने पति को भी परमात्मा के रंग में रंग दिया । जो संसार की माँग करता था, उसे भगवान की माँग का अधिकारी बना दिया । इस भारत भूमि में ऐसी भी अनेकों सन्नारियाँ हो गयीं ! कुछ वर्ष पूर्व ही आनंदमयी माँ ने अपना शरीर त्यागा है । अभी हरिद्वार में उनकी समाधि बनी है ।

ऐसी तो अनेकों बंगाली लड़कियाँ थीं, जिन्होंने शादी की, पुत्रों को जन्म दिया, पढ़ाया-लिखाया और मर गईं । शादी करके संसार-व्यवहार चलाओ उसकी ना नहीं है लेकिन पति को विकारों में गिराना या पत्नी के जीवन को विकारों में खत्म करना यह एक-दूसरे के मित्र के रूप में एक-दूसरे के शत्रु का कार्य है । संयम से संतति को जन्म दिया यह अलग बात है किंतु विषय-विकारों में फँस मरने के लिए थोड़े ही शादी की जाती है ।

बुद्धिमान नारी वही है जो अपने पति को ब्रह्मचर्य-पालन में मदद करे और बुद्धिमान पति वही है जो विषय-विकारों से अपनी पत्नी का मन हटाकर निर्विकारी नारायण के ध्यान में लगाये । इस रूप में पति-पत्नी दोनों सही अर्थों में एक-दूसरे के पोषक होते हैं, सहयोगी होते हैं । फिर उनके घर में जो बालक जन्म लेते हैं वे भी ध्रुव जैसे, गौरांग जैसे, रमण महर्षि जैसे, रामकृष्ण जैसे, विवेकानंद जैसे बन सकते हैं ।

– पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

(ऋषि प्रसाद : जुलाई 1998)

Youth of India can become Teenage Time Bomb (Savdhaan Yuva)!!

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▣ विदेशों में बच्चों द्वारा हो रहे अपराधों में काफी वृद्धि हुई है। अपराध करने वाले बच्चों की आयु बहुत कम है लेकिन ये अपराध वैज्ञानिकों ( Criminologists ) को अभी से भयभीत और चिंतित कर रहे हैं । इनका अधिकतर समय गलियों में भटकने और हिंसात्मक टीवी कार्यक्रम देखने में गुजरता है।

➠  नॉर्थ-ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध ‘अपराध वैज्ञानिक’ जेम्स फॉक्स का कहना है कि- “कुछ वर्षों के बाद ये बच्चे ऐसे मानसिक रोगी बन जायेंगे जो आक्रामक, हिंसक और असामाजिक विचार व व्यवहार करने वाले तथा पश्चात्ताप एवं सहानुभूति की भावना से रहित होंगे। यदि इनको बंदूकें व नशीली दवाएँ प्राप्त हो जायेंगी तो ये अत्यंत खतरनाक साबित हो सकते हैं।”

➠ वेलेंटाइन डे की परम्परा को बढ़ाने वाले देशों की बाल-युवा पीढ़ी की दुर्दशा के बारे में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के राजनीति के प्रोफेसर डिलुलियो कहते हैं: “ये बच्चे ‘नैतिक दरिद्रता’ में पलकर विकसित हुए हैं क्योंकि इनको माता-पिता, शिक्षकों, धर्मगुरुओं से यह ज्ञान नहीं मिला कि सही क्या है ? और गलत क्या है ? और उनका नि:स्वार्थ प्रेम नहीं मिला।”

▣ तबाही की ओर…

➠ कैथरीन मेयर ( पत्रकार, टाइम मैगजीन ) लिखती हैं : ‘हिंसात्मक अपराध,अविवाहित गर्भवती किशोरियाँ, शराब और नशीली दवाओं के व्यसन की महामारी युवाओं को तबाही की ओर ले जाने का भय दिखा रहीं हैं। अविवाहित गर्भवती किशोरियों व यौन संक्रमित रोगों में ब्रिटेन पूरे यूरोप में सबसे आगे है।’ किड्स कंपनी, जो लंदन के दरिद्रतम बच्चों की सेवा करने वाली एक संस्था है, की संस्थापक कैमिला कहती हैं : “यदि मैं सरकार में होती तो आतंकवादियों के बम से नहीं, इस ( टीनेज टाइम बम ) से चिंतित होती।” ( टीनेज = किशोर )

▣ इस ‘टीनेज टाइम बम को निष्क्रिय करने का उपाय क्या है ?

➠ प्रोफेसर डिलुलियो का कहना है कि “धार्मिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाया जाये जिससे बच्चों और युवाओं के जीवन में अच्छे संस्कार डाले जायें।” इसलिए यदि पूज्य बापूजी जैसे संतों-महापुरुषों द्वारा दिये जा रहे संस्कारों, शिक्षाओं का लाभ समाज लेगा तो ही यह ‘टीनेज टाइम बम’ निष्क्रिय हो सकेगा अन्यथा विदेशों की जो स्थिति है वही स्थिति भारत की भी हो सकती है।

➠ भारत में ऐसे ज्ञानी महापुरुष सिर्फ उपदेश ही नहीं देते बल्कि हजारों ‘बाल संस्कार केन्द्रों’ के द्वारा बच्चों में दिव्य संस्कारों का सिंचन भी करते हैं, ‘दिव्य-प्रेरणा-प्रकाश’ जैसी पुस्तकों के राष्ट्रव्यापी प्रचार के द्वारा युवा पीढ़ी को पाश्चात्य कुसंस्कारों की आँधी से चरित्रभ्रष्ट होने से बचाते भी हैं और युवा वर्ग को वेलेंटाइन-डे जैसी महामारी से बचाने के लिए ‘मातृ-पित पूजन दिवस’ जैसा अक्सीर इलाज भी बताते हैं-

❀ “१४ फरवरी को लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे को फूल देते हैं । एक-दूसरे को फूल देना, ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूँ / करती हूँ….’ कहना बड़ी बेशर्मी की बात है। इसलिए लोफर-लोफरियाँ पैदा हो रहे हैं। यह गंदगी विदेश से आई है। इस विदेशी गंदगी से बचाकर हमें भारतीय संस्कृति की सुगंध से बच्चे-बच्चियों को सुसज्ज करना है ।”  – परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

~लोक कल्याण सेतु /फरवरी २०१४

Bhishma Pitamah Pratigya on Akhanda Brahmacharya

akhanda brahmacharya

महाभारत में ब्रह्मचर्य संबंधित भीष्म पितामह (Bhishma Pitamah)  का एक प्रसंग आता है :~

भीष्म पितामह बालब्रह्मचारी (Bal Brahmachari) थे, इसलिए उनमें अथाह सामर्थ्य था ।

 भगवान श्रीकृष्ण (Shri krishna) का यह व्रत था कि ‘मैं युद्ध शस्त्र नहीं उठाऊँगा ।’ किंतु यह भीष्म पितामह की ब्रह्मचर्यशक्ति का ही चमत्कार था कि उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना व्रत भंग करने के लिए मजबूर कर दिया । 

उन्होंने अर्जुन पर ऐसी बाणवर्षा की कि दिव्यास्त्रों से सुसज्जित अर्जुन जैसा धुरंधर धनुर्धारी भी उसका प्रतिकार करने में असमर्थ हो गया, जिससे उसके रक्षार्थ भगवान श्रीकृष्ण को रथ का पहिया लेकर भीष्म की ओर दौड़ना पड़ा। यह ब्रह्मचर्य (Akhanda Brahmacharya) का ही प्रताप था कि भीष्म मौत पर भी विजय प्राप्त कर सके । उन्होंने ही यह स्वयं तय किया कि उन्हें कब शरीर छोड़ना है । अन्यथा शरीर में प्राणों का टिके रहना असम्भव था परंतु भीष्म की बिना आज्ञा के मौत भी उनसे प्राण कैसे छीन सकती थी ! भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से शुभ मुहूर्त में अपना शरीर छोड़ा ।

 

ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः | Bodhkatha: Brahmachari & General Man in Hindi

Brahmachari & General man

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से …..

एक युवक ने यह बात पढ़ी~ “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ।”

“ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है।” (योग दर्शन साधन पाद: ३८) 

इतने में एक पतला-दुबला संन्यासी सामने से आता दिखाई दिया। उसे देखकर युवक हँसा और बोला ‘ब्रह्मचर्य का पालन करके साधु बन गया और शरीर देखो तो दुबला-पतला….. पतंजलि महाराज के ये वचन पुराने हो गये हैं। वे अतीत के लिए होंगे, अभी के युग के लिए नहीं….
यह देखो दुबले-पतले संन्यासी और हम कितने मोटे-ताजे !

युवक बुद्धिजीवी रहा होगा, जमानावादी रहा होगा।
भोग-रस्सी में बंधा हुआ कुतर्की रहा होगा। वर्तमान में बचाव की कला सीखा हुआ, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला रहा होगा। 

वह संन्यासी से बोला :
”महाराज ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । कहा है पतंजलि महाराज ने, लेकिन आपका शरीर तो देखो, कैसा दुबला-पतला है ? महाराज ! कैसे हैं ?”

फिर आगे कहा : ‘देखो, हम कैसे मजे से जी रहे हैं ? सुधरा हुआ जमाना है, चार दिन की जिंदगी है। मजे से जीना चाहिए…..’ ऐसा करके उसने अपना मज़ा लेने की बेवकूफी की डींग हाकी ।

संन्यासी ने सारी बेवकूफी की बातें सुनते हुए भी कहा :”चलो, मेरे पीछे-पीछे आओ।”
संन्यासी ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) के तेज से संपन्न था। निर्भीकता थी, वचन सामर्थ्य था। वह युवक ठगा-सा साधु के पीछे-पीछे चल पड़ा।
चलते-चलते दोनों पहुँचे एकांत अरण्य की उस गुफा में, जहाँ संन्यासी का निवासस्थान था। संन्यासी उस युवक को पास की एक गुफा में ले गया तो तीन शेर दहाड़ते हुए आये। ब्रह्मचर्य की मखौल उड़ानेवाला युवक तो संन्यासी के पैरों से लिपट गया।

संन्यासी ने शेरों पर नजर डाली….. नज़र डाली और शेर पूंछ हिलाते हुए पालतू पिल्ले की नाईं  बैठ गए।

युवक अभी तक थर-थर काँप रहा था। वह देखता ही रह गया ब्रह्मचर्य (Brahmacharya)  की महिमा का प्रताप ! अब उसे पता चला कि ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) के तेज में कितना सामर्थ्य छुपा है ।
 युवक ने क्षमा माँगी।

कहाँ तो पतला-दुबला दिखनेवाला संन्यासी और और ‘कहाँ तीन-तीन शेरों को पालतू पिल्ले की तरह शांति से बैठा देना !
 यह संन्यासी के ब्रहाचर्य (Brahmacharya) का प्रताप नहीं तो और क्या था ?

~ऋषि प्रसाद/जुलाई २००१/१०३/२६

 

संयम और दृढ़ संकल्प की शक्ति-पूज्य बापूजी

‘संयम’ और ‘दृढ़ संकल्प’ विद्यार्थी-जीवन की नींव है । जिसके जीवन में संयम है, वह हँसते-खेलते बड़े बड़े कार्य कर सकता है।
हे मानव !! तू अपने को अकेला मत समझ, ईश्वर और गुरु, दोनों का ज्ञान तेरे साथ है। जो महान बनना चाहते हैं, वे कभी फरियादात्मक चिन्तन नहीं करते । हे मानव तू दृढ़ संकल्प कर कि मैं अपना समय व्यर्थ नहीं गवाऊँगा। अगर युवती है तो युवान की तरफ और युवान है तो किसी युवती की तरफ विकारी निगाह नहीं उठायेंगे ।

१३ वर्ष के बालक रणजीत सिंह में पिता महासिंह ने संकल्प भर दिया कि मेरा बेटा तो कोहिनूर हीरा ही पहनेगा। उस समय कोहिनूर अफगानिस्तान में था। इस दृढ़ संकल्प के बल से ही बालक रणजीत सिंह ने बड़ा होने पर अफगानिस्तान में जाकर शत्रुओं को परास्त किया और वहाँ से कोहिनूर लाया और पहनकर दिखा दिया।
ऐसे ही ५ वर्ष के दृढ़ निश्चयी बालक ध्रुव को जब देवर्षि नारदजी से मंत्र मिला तो वह मंत्रजप में इतनी दृढ़ता से लगा रहा कि ६ महीने में ही उसने सारे विश्व के स्वामी भगवान नारायण को प्रकट करके दिखा दिया ।
हे शिष्यों ! हलके व संस्कारविहीन बच्चों और विद्यार्थियों का अनुकरण मत करना, बल्कि तुम तो संयमी-सदाचारी वीर पुरुषों एवं पवित्र भक्त आत्माओं, योगी, महात्माओं का अनुसरण करना।
मीरा के जीवन में कितने विघ्न और बाधाएँ आयीं, फिर भी उसने भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। गार्गी को कितनी कठिनाइयाँ सहनी पड़ीं, फिर भी उसने आत्म-साक्षात्कार कर लिया। ऐसे ही हजार-हजार विघ्न बाधाएँ आ जाने पर भी जो संयम, सदाचार, ध्यान, भगवान की भक्ति व सेवा का रास्ता नहीं छोड़ता, वह संसार में बाजी जरूर मार लेता है।
आप भी अपनी महानता को जगायें। भगवान एवं भगवत्प्राप्त महापुरुषों का आशीर्वाद आपके साथ है!!
हरि ॐ… हरि ॐ….

परस्पर संयमी जीवन-(पूज्य बापूजी के मित्रसंत श्री लालजी महाराज द्वारा बताया गया अनोखा प्रसंग)

मधुर संस्मरण – परस्पर संयमी जीवन !!!

( पूज्य बापूजी के मित्रसंत श्री लालजी महाराज द्वारा बताया गया अनोखा प्रसंग )

एकांत-साधना हेतु पूज्य बापूजी का कभी हरिद्वार, नारेश्वर (गुज.), माउंट आबू (राज.) तो कभी मोटी कोरल (गुज.) जाना होता रहता था।
एक बार बापूजी मोटी कोरल में रुके हुए थे तो वहाँ उनकी माँ व धर्मपत्नी आ पहुंचीं। उस समय का एक प्रसंग है।

प्रतिदिन शाम को ५ बजे मैं ( लालजी महाराज ) और आशारामजी नर्मदा किनारे जाते थे। नर्मदा में स्नान करके आशारामजी नदी के तट पर प्रवाह के पास ही बैठकर ध्यान करते थे।
एक बार लक्ष्मीदेवी ( पूज्य बापूजी की धर्मपत्नी ) निवास पर ही चबूतरे पर बैठकर कोई ग्रंथ पढ़ रही थीं । मैंने सोचा कि शायद मेरी उपस्थिति के कारण ये लोग एक-दूसरे से बात नहीं करते; इन्हें बातचीत का मौका देना चाहिए। इसलिए मैंने युक्ति की। एक दिन मैं आशारामजी के साथ नर्मदा-स्नान हेतु नहीं जा सका, बाद में गया। वहाँ आशारामजी एक फर्लांग (२२० गज) दूर ध्यान में बैठे हुए दिखे। आशारामजी की माँ के साथ आयी हुई उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मीदेवी को मैंने ईशारे से कहा कि ‘आप भी वहाँ जाइये।’ मगर मैंने देखा कि लक्ष्मीदेवी उस ओर गयीं तो सही परंतु आशारामजी से भी आगे बहुत दूर चली गयीं। आशारामजी के नजदीक भी नहीं गयीं और फिर बाद में अपनी कुटीर में वापस चली गईं।

रात को जब आशारामजी मिलने आये तब मैंने उनसे पूछा “आपके पास शाम को कोई आया था क्या ?”
उन्होंने कहा ”नहीं, मैं तो ध्यान में बैठा था।” बाद में जब लक्ष्मीदेवी से बापूजी के पास न जाने व बातचीत न करने का कारण पूछा गया, तब उन्होंने बहुत ही सुंदर जवाब दिया : ‘इनके (बापूजी
के) ध्यान-भजन में विघ्न डालना तो पाप ही है न ! मुझे तो सेवा करनी है। इनके अवलम्बन से अपनी साधना सिद्ध करना यही मेरा धर्म है।”

*मुझे हुआ कि कैसे सुंदर विचार हैं उनके चित्त में !! मिलना, बात करना अथवा साथ में बैठना ऐसे कोई भी संस्कार नहीं थे इसलिए वे तो दूर से निकलकर सीधी चली गयीं। इससे स्पष्ट होता है कि लक्ष्मीदेवी वैराग्य की मूर्ति हैं, साधना में सहयोग देनेवाली पतिव्रता नारी हैं।
बाद में एक बार अकेले में आशारामजी ने मुझसे कहा था : ‘‘मेरी यह जो आत्मनिष्ठा व इन्द्रिय-विजय का भाव साधना में उच्च गति पा रहा है, इसका श्रेय मेरी धर्मपत्नी को भी जाता है।”
दोनों का परस्पर का कैसा अनोखा संयमी जीवन है !! हमारे लिए तो दोनों ही परम वंदनीय हैं। (इतना कहकर लालजी महाराज ने अहोभाव में भरकर आँखें बंद कर लीं ।) –

*ऋषि प्रसाद /अप्रैल २०१४*

मरने से पहले नाड़ा ना खुले

एक दिन शेख फरीद के एक शिष्य ने कहा : ” हुजूर ! मेरी सलवार फट गई है पहनने योग्य नहीं रही । ” 

” कोई बात नहीं ।  मेरे पास एक सलवार रखी है । जाओ, उसे पहन लो……. किंतु रूको….!!!! ” 

शिष्य रुक गया ।

” कहिए हुजूर !!! “

” इसे पहन तो लो मगर नाड़ा इतना कसकर बांधना कि मरने से पहले ना खुले । “

अन्य शिष्यों को बात बड़ी अजीब-सी लगी किंतु इस शिष्य ने सोचा कि ” मुर्शिद (सद्गुरु) कभी निरर्थक आज्ञा कर ही नहीं सकते । मुझे अपनी मति को सूक्ष्म बनाकर अर्थ लगाना होगा और उसके लिए मुझे अपने मुर्शिद की ही शरण जाना होगा । ” 

शिष्य अपने गुरु का ध्यान करते करते ध्यानस्थ हो गया । कुछ ही समय में उसकी मति में प्रकाश हुआ कि मुर्शिद का संकेत ब्रह्मचर्य-व्रत पालन की ओर है । 

उसने ईमानदारी एवं तत्परतापूर्वक ब्रह्मचर्य का आजीवन पालन किया । शिष्य की सूक्ष्म मति, गुरुवचनों को पालने की दृढ़ता व समर्पण ने उसे शेख फरीद के आध्यात्मिक खजाने का अधिकारी बना दिया । 

विद्यार्थियों को ये संस्कार मिल जाएं और ये बात लग जाये तो कितना मंगल हो उनका…!!!!!

 – लोक कल्याण सेतु /अप्रैल २०१८/२५०

ब्रह्मचर्य का प्रताप

एक युवक ने यह बात पढ़ी

ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ।।

” ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है । ” (योग दर्शन साधन पाद : ३८ ) 

इतने में एक पतला-दुबला संन्यासी सामने से आता दिखाई दिया । उसे देखकर युवक हँसा और बोला ‘ ब्रह्मचर्य का पालन करके साधु बन गया और शरीर देखो तो दुबला-पतला पतंजलि महाराज के ये वचन पुराने हो गये हैं । वे अतीत के लिए होंगे, अभी के युग के लिए नहीं….!!!!

यह देखो दुबले-पतले संन्यासी और हम कितने मोटे-ताजे !

युवक बुद्धिजीवी रहा होगा, जमानावादी रहा होगा । भोग-रस्सी में बंधा हुआ कुतर्की रहा होगा । वर्तमान में बचाव की कला सीखा हुआ, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला रहा होगा । 

वह संन्यासी से बोला : ”महाराज ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । कहा है पतंजलि महाराज ने, लेकिन आपका शरीर तो देखो, कैसा दुबला-पतला है !!! महाराज ! कैसे हैं ? “

फिर आगे कहा : ‘ देखो, हम कैसे मजे से जी रहे हैं ??? सुधरा हुआ जमाना है, चार दिन की जिंदगी है । मजे से जीना चाहिए…..” ऐसा करके उसने अपनी मज़ा लेने की बेवकूफी की डींग हाकी । “

संन्यासी ने सारी बेवकूफी की बातें सुनते हुए भी कहा :- ” चलो, मेरे पीछे-पीछे आओ । “

संन्यासी ब्रह्मचर्य के तेज से संपन्न था । निर्भीकता थी…… वचन सामर्थ्य था ….। वह युवक ठगा-सा साधु के पीछे-पीछे चल पड़ा ।

चलते-चलते दोनों पहुँचे एकांत अरण्य की उस गुफा में, जहाँ संन्यासी का निवासस्थान था । संन्यासी उस युवक को पास की एक गुफा में ले गया तो तीन शेर दहाड़ते हुए आये । ब्रह्मचर्य की मखौल उड़ानेवाला युवक तो संन्यासी के पैरों से लिपट गया ।

संन्यासी ने शेरों पर नज़र डाली और शेर पूंछ हिलाते हुए पालतू पिल्ले की नाईं  बैठ गए ।

युवक अभी तक थर-थर काँप रहा था । वह देखता ही रह गया ब्रह्मचर्य की महिमा का प्रताप ! अब उसे पता चला कि ब्रह्मचर्य के तेज में कितना सामर्थ्य छुपा है ।

युवक ने क्षमा माँगी । 

कहाँ तो पतला-दुबला दिखनेवाला संन्यासी और कहाँ तीन-तीन शेरों को पालतू पिल्ले की तरह शांति से बैठा देना !

यह संन्यासी के ब्रह्मचर्य का प्रताप नहीं तो और क्या था ?????

 

-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

ऋषि प्रसाद /जुलाई २००१ /१०३ /२६

संयम जीवन का बल

संयम जीवन का बल है…… !!

संयम सफल जीवन की नींव है…… !!

संयम उन्नति की पहली शर्त है…… !!

अतः इंद्रियों का संयम, मन का संयम एवं विचारों का संयम करके जीवन को उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर करते जाओ । 

हे भारत के नौजवानों ! उठो, आप जगो, औरों को जगाओ अभी भी वक्त है ।

-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
ऋषि प्रसाद /जुलाई २००१ /१०३ /२६