How to be Happy all the time [Khush Kaise Rahe]: A Hindi Story

How to be happy all the time story in hindi

सद्गुरु से दीक्षा लेने के बाद जीवन में होने वाले परिवर्तन को समझाती हुई यह कहानी बच्चों को जरूर सुनाएँ ।

सद्गुरु मिल जाएँ तो वे अमृत स्वरूप आत्मा-परमात्मा के रस में हमें रसीला कर देते हैं ।”

एक राजा था । उसके पुत्र, परिवार, मंत्री सभी आज्ञाकारी थे । प्रजा भी उसका बहुत आदर करती थी । परंतु वह हमेशा उदास ही रहता था । उसके चेहरे से शांति व प्रसन्नता गायब हो चुकी थी ।

बुद्धिमान मंत्रियों ने राजा को सलाह दी कि ‘महाराज ! आप कभी-कभी वन-विहार भी किया करें, प्राकृतिक वातावरण में जाने से मन को शांति और आनंद मिलता है ।’

राजा को यह बात जँच गयी । एक दिन वह वन-विहार के लिए निकल पड़ा । रास्ते में उसने देखा कि एक गरीब गड़रिया भेड़ों को चराते हुए  पेड़ की छाया में बैठा बड़े आनंद से बाँसुरी बजा रहा है । राजा को हुआ कि इसके पास कुछ भी नहीं है फिर भी यह इतने आनंद में क्यों है ? राजा ने तुरंत रथ रुकवाया और पास जाकर उसे देखने लगा । गड़रिया तो बाँसुरी की मधुर धुन में खोया हुआ था, उसे राजा के आने का आभास ही नहीं हुआ ।

कुछ देर बाद राजा बोला : “तुम्हारे पास ऐसा क्या खजाना है कि तुम इतने प्रसन्न हो ?”

राजा की आवाज सुन उसकी एकाग्रता टूटी । उसने बाँसुरी बजाना बंद कर प्रसन्न मुद्रा में राजा का अभिवादन किया । फिर मुस्कराते हुए बोला : “महाराज ! पहले मैं चिंताओं से घिरा, अपनी गरीबी व अनपढ़ होने के दुःख में डूबा रहता था, परंतु जब से मुझे गुरुदेव मिले और उनसे दीक्षा मिली तब से मेरे भीतर की दरिद्रता चली गयी । गुरुज्ञान से हर परिस्थिति में सुखी रहने व उसका सदुपयोग करने की युक्ति मिल गयी है । रोज यहाँ आकर भेड़ें चराता हूँ, घर से लायी नमक-रोटी गुरु भगवान का प्रसाद समझकर पा लेता हूँ, झरने का पानी पी लेता हूँ । जब ये भेड़ें चरती हैं तो मैं बाँसुरी की मीठी धुन के साथ परमात्मा की मधुर स्मृति में खो जाता हूँ । इसमें बड़ा आनंद आता है महाराज ! गुरुकृपा से प्रसन्नता तो अपने घर का खजाना हो गयी है । अपना कर्म ईमानदारी से करता हूँ, बाकी का समय ईश्वर-चिंतन में लगाता हूँ । गुरुज्ञान से अब मैंने यह जान लिया है कि परमेश्वर ही आनंदस्वरूप हैं और उनका चिंतन-सुमिरन करनेवाले पर वे अपना आनंद-माधुर्य उड़ेल देते हैं ।”

राजा को उसकी बातों से बड़ा आनंद आ रहा था । थोड़ी देर के लिए वह भी हृदय की गहराई में खो गया । जब गड़रिये की बात पूरी हुई तो राजा को उस शांति और प्रसन्नता के आगे अपना विषय-विलास तुच्छ लगने लगा ।

उसने कहा : “तू मेरा धन, भोग ले ले और उसके बदले मुझे अपनी शांति और प्रसन्नता दे दे ।”

तब गड़रिया खिलखिलाकर हँसा और बोला :
“महाराज ! यदि प्रसन्नता पैसे से खरीदने की वस्तु होती तो मैं दे देता। यदि ऐसा होता तो धनी लोग सबसे अधिक सुखी होते, किंतु बात ऐसी नहीं है । प्रसन्नता तो हृदय की वस्तु है, जो सद्गुरु की शरण जाकर अंतर्यामी हृदयेश्वर का ज्ञान पाने से मिलती है । उस ज्ञान को सुनकर चिंतन-मनन करने से वह स्थायी हो जाती है और ज्ञान को आचरण में लाकर उसके अनुसार जीवन बनाने से वह प्रसन्नता जीवन से ऐसे अभिन्न हो जाती है कि पहाड़ों जैसी विपत्तियाँ भी उसे मिटा नहीं सकतीं ।”

उस राजा को प्रसन्नता का राजमार्ग मिल गया । उसने गड़रिये को धन्यवाद दिया और उसे अपने रथ में बिठाकर चल पड़ा उसके गुरु के आश्रम की ओर… ।

सीख : जिसके जीवन सद्गुरु का ज्ञान रहता है वह सदा आनन्दित रहता है ।

➢ लोक कल्याण सेतु, मई 2011

Shri Adi Shankaracharya: A Short Story from biography in Hindi

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Adi Shankaracharya Biography Story in Hindi: श्रीमद् आद्यशंकराचार्य उच्चकोटि के ब्रह्मनिष्ट संत थे ।एक दिन वे उत्तरकाशी में अपने शिष्यों को  ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ (शारीरिक सूत्र-भाष्य) पढ़ा रहे थे । तभी वहाँ एक वृद्ध ब्राह्मण आये । उन्होंने सेवकों से पूछा : “यहाँ कौन-सी प्रवृत्ति होती है ?”

सेवक बोले : यह हमारे गुरुजी भगवान शंकराचार्य का आश्रम है । यहाँ हमारे गुरुजी हमें ‘ब्रह्मसूत्र’ पढ़ाते है । उसका अर्थ समझाते हैं और व्याख्या करते हैं ।”

ब्राह्मण बोले : “कलियुग में ब्रह्मसूत्र ! उसकी व्याख्या करते हैं ? उसका अर्थ समझाते हैं ।
“हाँ ।”
“अच्छा ! हमें भी थोड़ा समझा देंगे तुम्हारे गुरुजी तो हमें बड़ा आनंद होगा ।”
“तो आइये हमारे साथ ।”

वे ब्राह्मण वेशधारी पुरुष बड़े महान आत्मा थे । वे शंकराचार्यजी के पास जाकर बोले : “मुझे ब्रह्मसूत्र के विषय मे कुछ शंकाए हैं, आप उनका समाधान कीजिये ।”

शंकराचार्यजी बोले : “पूछिये ब्राह्मणदेव !”

“अच्छा, बताइये तो तृतीय अध्याय के प्रथम पाद के प्रथम सूत्र का तात्पर्य क्या है ?”
शंकराचार्यजी ने उस सूत्र की उत्तम व्याख्या की । उस उत्तर में से और प्रश्न उठा और ब्राह्मण ने फिर से पूछा ।

आचार्य ने तत्काल उसका यथायोग्य उत्तर दे दिया । ब्राह्मण ने पुनः प्रश्न उठाया । आचार्य ने उसका भी जवाब दे दिया ।

ब्राह्मण एक के बाद एक प्रश्न करते जा रहे थे और शंकराचार्यजी उनका उत्तर देते जा रहे थे ।
सात दिन तक यह प्रश्नोत्तर चला और वे संतुष्ट होकर बोले : “आपसे मुझे मेरे ब्रह्मसूत्र से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर ठीक-से मिल गए हैं । आप ब्रह्मसूत्र ठीक-से समझे हैं, मैं आप पर प्रसन्न हूँ ।”

उस वृद्ध ब्राह्मण ने आशीर्वाद देते हुए अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया । शंकराचार्यजी ने उनके चरणों मे सिर झुकाया और बोले : “भगवान श्री वेदव्यासजी ! आप……”

व्यासजी बोले : “पुत्र ! तुम्हारा आयुष्य पूरा होने को है । सोलह वर्ष की उम्र है तुम्हारी । मै सोलह वर्ष तुम्हारी उम्र और बढ़ा देता हूँ ।”

आद्य शंकराचार्यजी का शरीर और सोलह साल तक रहा । वैदिक संस्कृति मानवमात्र का कल्याण करने में समर्थ है । उसका प्रचार करनेवाले इन महान आत्मा का 16 वर्ष आयुष्य बढ़ाकर भगवान व्यासजी ने भारत पर ही नहीं, बल्कि समस्त मानव समाज पर महान उपकार किया है ।

Pujya BapuJi Ki Gajab ki Yaad Shakti [Sharp Memory]

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पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है कि तीन साल की उम्र में ही हम पर वाणी देवी की ऐसी कृपा थी कि क्या बतायें ,एक बार चौथी कक्षा के बच्चों को शिक्षक ने एक कविता याद करने को दी थी परंतु कोई भी याद करके नहीं सुना पाया। अब सबको मार पड़नेवाली थी और उनमें हमारा भाई भी था।

मैं भी उनके साथ ही बैठा था तो भाई के नाते मेरा दिल पिघला और मैंने शिक्षक से कहा ‘‘इनको मत मारो ।”

शिक्षक ने कहा: “तो क्या तू सुना देगा ??”

मैंने पूरी कविता सुना दी तो शिक्षक सहित सभी लोग चकित रह गये।”हमारी १० वर्ष की उम्र में तो ऋद्धि-सिद्धि की झलकें देखी गयी थीं।”

बापूजी के बड़े भाई की दुकान पर एक व्यक्ति काम करता था। पूज्यश्री की पढाई तीसरी कक्षा तक हुई थी और वह बी.ए. तक पढ़ा था मगर बापूजी उसके द्वारा हिसाब में हुई भूल पकड़ लेते थे।

बचपन में ही ऐसी प्रतिभा के धनी थे। बापूजी छोटी उम्र में ही बड़े-बड़े लोगों की समस्याओं को हँसते-खेलते सुलझा देते थे। ऐसे एक नहीं, अनेक प्रसंग हैं। ध्यान करते थे इसलिए एकाग्रता और कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। माता-पिता व गुरु की सेवा से तथा परोपकार से बुद्धि कुशाग्र बनती है।

तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता,
त्वरित कार्य औ’ सहनशीलता ॥

Jawani Me Kuch Nahi Karenge to Budhape Me Kya Purusharth Hoga

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जवानी में कुछ नहीं करेंगे तो बुढ़ापे में क्या पुरुषार्थ होगा ?

सब काम अवसर पर होते हैं । रात को 2 बजे चोर चोरी करके भाग सकता है परंतु दिन को लोगों के सामने चोरी करके भागना उसके लिए कठिन है । सर्दियों में बोयी जानेवाली फसल यदि गर्मियों में एवं गर्मियों में बोयी जानेवाली फसल सर्दियों में बोयी जायेगी तो अच्छा फल नहीं देगी । सब काम अवसर पर ही होते हैं । ऋतुएँ किस तरह मौसम बदलती रहती हैं । चौमासा भी यथा अवसर आरम्भ होता है। वृक्ष भी ऋतु के अनुसार फल देते हैं । विद्यार्थी भी आरम्भ में बेपरवाह रहेगा तो वार्षिक परीक्षा में कभी विजय प्राप्त नहीं कर सकेगा । अतः हमें भी अवसर गंवाना नहीं चाहिए ।

यदि हम जवानी में कुछ नहीं करेंगे तो बाद में बुढ़ापे में जब पराधीन बनेंगे, पर चलने से चूकेंगे, हड्डियाँ निर्बल हो जायेंगी, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा, तब उस समय हमारा क्या पुरुषार्थ हो सकेगा तब तो ‘हाय-हाय!’ करने के अतिरिक्त कुछ न होगा । ठीक ही कहा है ~

क्यों न जपा राम, जब देह में आराम थाक्यों न किया दान, जब घर में सामान था क्यों न किया व्यापार, जब खुली रुस्तम बाजार जय होवे हड़ताल, तब सौदा याद पड़ा । इस जग विच आयके, जे भजो हरि नाम, खाना पीना पहनना, होवन सब हराम ।

– ब्रह्मलीन भगवत्पाद साईं श्री लीलाशाहजी महाराज

Srinivasa Ramanujan: Reason for his Memory/ Buddhi, Inventions

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“….यदि शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए तो भी क्या परिणाम एक ही होगा ????” यह गणित का एक बहुत महत्त्वपूर्ण सवाल था ।

एक कक्षा में अध्यापक गणित पढ़ा रहे थे । उन्होंने श्यामपट्ट पर ३ केले बनाये और छात्रों से पूछा : “यदि हमारे पास 3 केले और 3 ही विद्यार्थी हों तो प्रत्येक को कितने केले मिलेंगे ?”

एक विद्यार्थी तपाक से बोल पड़ा “एक केला मिलेगा ।”

अध्यापक बोले : “बिल्कुल ठीक ।”

अध्यापक आगे समझाने ही जा रहे थे, तभी एक विद्यार्थी ने पूछा : “गुरुजी यदि केलों को शून्य बच्चों में बराबर-बराबर बाँटा जाए, क्या तब भी प्रत्येक बच्चे को एक-एक केला मिलेगा ???”

यह सुनते ही सारे विद्यार्थी हँस पड़े कि ‘क्या मूर्खतापूर्ण प्रश्न है !!’

अध्यापक बोले : “इसमें हँसने की कोई बात नहीं है । क्या आपको मालूम है कि यह विद्यार्थी क्या पूछना चाहता है ?? यह जानना चाहता है कि यदि शून्य को शून्य से विभाजित किया जाय तो भी क्या परिणाम एक ही होगा ?”
यह गणित का एक बहुत महत्त्वपूर्ण सवाल था ।

कुछ गणितज्ञों का विचार था कि शून्य को शून्य से विभाजित करने पर उत्तर शून्य होगा जबकि अन्य लोगों का विचार था कि उत्तर एक होगा । अंत में इस समस्या का निराकरण भारतीय वैज्ञानिक भास्कर ने किया । उन्होंने सिद्ध किया कि ‘शून्य को शून्य से विभाजित करने पर परिणाम शून्य ही होगा ।’  यह विद्यार्थी इसी तथ्य की ओर हमें ले जाना चाहता है ।

इतनी छोटी उम्र में इतना सूक्ष्म सवाल पूछने वाला वह बालक था श्रीनिवास रामानुजन जो आगे चलकर भारत के विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हुए ।

अत्यंत निर्धन परिवार में जन्मे रामानुजन ने 32 वर्ष की आयु में गणित जगत में असाधारण कार्य किया । उनके बनाए गणित के एक-एक नमूने को हल करने में विश्व के बड़े बड़े गणितज्ञों को कई वर्ष लग गए । वे इतने महान कैसे बने ?

रामानुजन बचपन से ही अकेले में शांत बैठने का अभ्यास करते थे । जाने-अनजाने में उनकी वृत्ति आज्ञाचक्र में पहुंच जाती थी। संकल्प-विकल्प शांत होने से बुद्धि को बल मिलता है । वे स्वभाव से ही मननशील व मितभाषी थे । रामानुजन अपने पवित्र, सत्संगी, माता के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद पाने के बाद ही दिन की शुरुआत करते थे । उनकी माँ गंदी फिल्मों, नाटकों आदि से परे रहने वाली सत्संगी माता थी । वे सत्संग, गुरुमंत्र-जप और भूमध्य में ध्यान में आगे बढ़ी थीं । उन्होंने गुरु के सत्संग के ज्ञान से अपनी समझ को संपन्न किया था ऐसी सत्संगी माताओं के बच्चे महाधनभागी हैं ।

➢ ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015

Daily Morning: Roz Apne Lakshya/ Goal ko Repeat Karna Chahiye

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Review and Repeat your Goal/ Target/ Lakshya Every Mornig (Subha ki Prayer) : ईश्वर के साक्षात्कार जैसा सरल और कोई काम नहीं है। जो वास्तविक ‘मैं’ है उसमें टिकने के लिए ओंकार अथवा जिस देव में प्रीति है उसका गुरुप्रदत्त मंत्र (गुरुमंत्र) जपते-जपते उसके अर्थ में लीन होते जायें ताकि दूसरे अनर्थकारी संस्कार, अनर्थकारी आकर्षण हटते जायें।

यदि अनर्थकारी संस्कार ही सार दिखते हैं और सोचते हैं : ‘भजन तो करेंगे किंतु जरा इतना कर लूँ…पेंशन आयेगी फिर आराम से भजन करूँगा। ‘ तो पेंशन की पराधीनता रहेगी और बुढ़ापा आयेगा तो शरीर तो दुखेगा ही। फिर उसको ठीक करने में ही जीवन पूरा हो जायेगा। तो अब क्या करें ? अभी इसी समय आप तड़प जगाइये और अपने असली
‘मैं’ को पहचानिये।

बेठीक को ठीक करने का जो भूत घुसा है उसको निकालना ही परमात्म-प्राप्ति कहलाता है जो सोचते हैं : ‘जरा बेटी की शादी हो जाय… बेटा घर संभालने के लायक हो जाय… जरा यह हो जाय… जरा वह हो जाए… समझो, वे मूर्ख बालक की नाई आकाश की रक्षा कर रहे हैं। संसार की विघ्न-बाधाएँ, परिस्तिथियाँ अवश्यंभावी हैं। सम, शांत ‘मैं को पहचानना ही महान पौरुष है। कुटुंबी के शरीर के लिए तुम कितना भी करो, वह तो जीर्ण-शीर्ण और बीमार होता ही रहेगा ऐसे ही कुछ लोग सोचते हैं: ‘इन शरीरों की रक्षा करूँ फिर आराम से भजन करना…’ नहीं, बेटे या बेटी, पति या पत्नी का आत्मा तो शाश्वत है। उस शाश्वत आत्मा को जानने पहचानने में लग जाओ।

हम लोग गलती यह करते हैं कि शरीर के लिए सारी सुविधाएँ जुटाकर फिर भजन करना चाहते हैं। यह तो सुविधाजनित सुख है, गुलामी का सुख है, आत्मा का सुख नहीं है। सुविधाजनित सुख तो यहाँ से ज्यादा स्वर्ग में है। किंतु वहाँ सुख भोगते-भोगते पुण्य क्षीण हो जाते हैं और फिर किसी के गर्भ में आना पड़ता है। जहाँ से सुख आता है यदि उस ‘मैं’ को एक बार पहचान लें तो फिर गर्भवास का दुःख सहना नहीं पड़ेगा।

~ ऋषि प्रसाद – सितम्बर २००४

Atma Gyan/ Sakshatkar Kaise Kare [Self Realization] : A Story

atma gyan atma sakshatkar kaise kare

साक्षात्कार करने की सफलता का राज… जानिए साधु से मिली युक्ति !!

▪ एक व्यक्ति ने किसी आध्यात्मिक ग्रंथ में पढ़ा कि मनुष्य-जीवन ईश्वर-साक्षात्कार करने के लिए ही होता है। अगर वह नहीं किया तो जीवन निष्फल हो जाता है। उसने अपनी तरफ से बहुत प्रयास किया, तरह-तरह की साधना की, तीर्थों में भटका परंतु कुछ रास्ता न मिला। भगवान के लिए कोई सच्चाई से चलता है तो वे उसे अपने प्यारे संतों की संगति देते हैं।

▪ एक बार मार्ग में उसने देखा कि किन्हीं महात्मा का सत्संग हो रहा है। उसने सोचा, ‘हो सकता है यहाँ कोई उपाय मिल जाए ।’

जब द्रवै दीनदयालु राघव, साधु संगति पाइये।
(विनयपत्रिका : १३६.१०)

▪ महात्मा का सत्संग सुनने के बाद तो उसके हृदय में ईश्वर का साक्षात्कार करने की धुन सवार हो गयी। उसने सोचा,’अब तो मुझे इन्हीं की शरण में रहना है।’ सत्संग पूरा होने के बाद सब चले गये पर वह देर रात तक वहीं बैठा रहा ।

▪ महात्मा जी ने उसे अपने पास बुलाया और पूछा :”बेटा ! क्या चाहते हो?”
“स्वामीजी ! मैं ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहता हूँ। क्या मुझे वह हो सकता है ?”

“क्यों नहीं, कल सुबह आना। हम लोग सामने के पहाड़ की चोटी पर चलेंगे। वहाँ मैं तुम्हें उसके रहस्य की प्रत्यक्ष अनुभूति कराऊँगा।”

▪ अगले दिन वह एकदम सुबह-सुबह महात्मा के पास पहुँचा।

संत बोले : “तुम इस गठरी को सिर पर रख लो और मेरे साथ चलो।”

वह बड़ी उमंग से चल पड़ा। पहाड़ की चोटी काफी ऊँची थी। थोड़ी देर बाद वह बोला :”स्वामीजी ! मैं थक गया हूँ, चला नहीं जाता।”

▪ स्वामीजी ने सहज भाव से कहा : “कोई बात नहीं, गठरी में पाँच पत्थर हैं। एक निकालकर फेंक दो। इससे गठरी कुछ हलकी हो जायेगी।”

उसने एक पत्थर फेंक दिया। कुछ ऊपर चढ़ने पर फिर उसे थकान होने लगी। महात्मा ने कहा: “एक पत्थर और कम कर दो।”

▪ इस प्रकार वह ज्यों-ज्यों ऊपर की ओर बढ़ता जाता, त्यों-त्यों कम वजन भी भारी लगने लगता।
महात्मा जी ने एक-एक करके सभी पत्थर फिंकवा दिये। फिर तो केवल कपड़ा बचा। उसे कंधे पर डालकर वह बड़ी सरलता से चोटी पर पहुँच गया।

▪ उसने महात्माजी से कहा : “स्वामीजी ! हम चोटी पर तो आ गये,अब ईश्वर-साक्षात्कार कराइये।”

स्वामीजी मुस्कराते हुए बोले: “बेटे! जब पाँच पत्थर की गठरी उठाकर तू पहाड़ पर नहीं चढ़ सका तो काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद की चट्टानें सिर पर रखकर ईश्वर का साक्षात्कार कैसे कर सकता है !”

▪ उसको अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने विनम्रता से प्रार्थना करते हुए कहा: “स्वामीजी ! अब आप ही मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

महात्मा ने उसे दीक्षा दी… साधना की पद्धति बतायी और निःस्वार्थ भाव से सेवा करने को कहा।

फिर तो वह उन महात्मा की शरण में रहकर उनके बताए अनुसार साधना करके अपने महान उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो गया।

📚ऋषि प्रसाद/सितम्बर २०११

Maa Ke Sanskar | Childhood of Sant Shri Asharam Ji Bapu

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अम्मा जी ने बालक आसुमल (Balak Asumal) को लाड़-प्यार देने के साथ उनमें भक्ति के संस्कारों का सिंचन कर दिया ।

बाल्यावस्था (Childhood) में ही उनके चेहरे पर विलक्षण कांति तथा नेत्रों में अद्भुत तेज था । अम्मा जी उनको ठाकुर जी की मूर्ति के सामने बिठा देतीं व कहतीं : “बेटा ! भगवान की पूजा और ध्यान करो। प्रसन्न होकर वे तुम्हें प्रसाद देंगे।”

बापूजी ऐसा ही करते और अम्माजी अवसर पाकर चुपचाप उनके सम्मुख मक्खन-मिश्री रख जातीं। जब वे आँखे खोलकर प्रसाद देखते तो प्रभुप्रेम में पुलकित हो उठते थे ।

उन दिनों बापू जी की बड़ी बहनें खिम्मी और किस्सी बालसुलभ चपलता से बोलती थीं :”आसु ! यह प्रसाद तो अम्मा ने रखा है, भगवान ने नहीं रखा है ।”

तो भी आसुमल जी को उनकी बातों पर विश्वास नहीं होता और अम्मा जी की बात को सच मानते थे ।

अम्माजी अपनी दोनों बेटियों को डाँटती थीं कि “क्यों तोड़ती हो उसका विश्वास ? इस बहाने उसे भक्ति का रंग लगेगा।”

दे दे मक्खन मिश्री कूजा
माँ ने सिखाया ध्यान और पूजा।।

सभी माताओं को ऐसे युक्तियों से अपने बच्चों में भक्ति के संस्कार (Sanskar) डालने चाहिए। अम्माजी सत्संग सुनने जातीं और आकर अपने सुपुत्र आसुमल को सुनातीं तथा उन्हें भी सत्संग में ले जाती थीं। सत्संग के संस्कारों से बालक आसुमल कितने महान संत बने !

लोकसंत तुलसीदास जी – Lok Sant Tulsidas Ji

Lok sant Tulsi Das ji

आज हम जानेंगे : एक अभागे के जीवन में भी जब सद्गुरु आ जाते हैं तो उसका जीवन कैसे चमक जाता है ? 

संत तुलसीदास जी के पिता का नाम आत्माराम था। कहा जाता है कि वे ज्योतिष विद्या के जानकार थे। ज्योतिष के प्रति उनकी इतनी प्रबल निष्ठा थी कि जब उनके घर में बालक का जन्म हुआ तो उन्होंने उत्सव मनाने के बजाय पहले बालक की जन्मपत्री बनायी।

उसमें उन्होंने देखा कि यह बालक तो बड़ा भाग्यहीन है। यदि इसका परित्याग नहीं किया गया तो इसका दुष्परिणाम इसके माता-पिता को भोगना पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने बालक का मुँह देखे बिना ही उसका परित्याग कर दिया।

गोस्वामीजी ने अपनी बाल्यावस्था में बड़े कष्ट, दुर्भाग्य और अपमान का सामना किया। संसार में विरले ही ऐसे बालक होंगे, जिन्हें ऐसी परिस्थिति मिली होगी । आप उस बालक की स्थिति की कल्पना कीजिये, जिसे जन्म देनेवाले माँ-बाप ही नहीं अपना सके ! उसे न तो माता-पिता का प्यार मिला और न किसी अन्य की छाया ही मिली।

भूख से व्याकुल होकर वह जिस दरवाजे पहुँचता, गृहस्वामी को लगता कि ‘सुबह-सुबह यह अशुभ बालक कहाँ से आ गया ! पता नहीं इसका मुँह देखने के बाद आज का दिन कैसा बीतेगा ?’

गोस्वामीजी ने अपनी भूख के विषय में कहा है कि ‘मेरे जीवन में इतना अभाव था कि यदि भिक्षा में चने के चार दाने कोई दे देता था तो लगता था कि मानो चारों फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) ही प्राप्त हो गये हों । 
बारेतें ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन, 
जानत हो चारि फल चारि ही चनकको। 
(कवितावली, उ.कां. : 73) 

समाज जिसे ठुकरा देता है, संत उसे भी स्वीकार कर लेते हैं । संत नरहरिदास नाम के एक महापुरुष ने बालक की ऐसी दयनीय स्थिति देखी तो उसे अपने साथ रख लिया । उन्होंने उसका पालन-पोषण किया और वे नित्य उसे भगवान श्रीराम की कथा सुनाते। वहीं नरहरिदासजी के आश्रम में रहकर गोस्वामीजी ने विद्याध्ययन भी किया । 

गुरुदेव ने उनके सिर पर अपना हाथ रखा और रामनाम की महिमा बतायी । उन्होंने कहा : ‘‘पुत्र ! स्वार्थ और परमार्थ की सिद्धि एकमात्र रामनाम से होती है । तुम प्रभुनाम का ही आश्रय लो।”
 वे नित्य अपने आश्रम में रामायण की कथा सुनाया करते थे ।

यहाँ विचारणीय बात यह है कि जैसे हम यह सोचकर कि ‘नित्य के जीवन में तैरने का कोई उपयोग नहीं है’ तैरने का बचपन में अभ्यास नहीं करते,पर यदि बचपन में तैरना सीख लें तो भले ही वह प्रतिदिन उपयोगी न हो पर संकटकाल में यह कला बड़ी लाभदायी सिद्ध होती है ।  उसी तरह बाल्यावस्था में अच्छे संस्कारों के बीज हमारे अंतःकरण में डाल दिये जायें तो अवसर आने पर वे उदित होकर हमारी सहायता करते हैं, रक्षा करते हैं ।

गोस्वामीजी के जीवन में हमें यही सत्य प्रतिफलित होते हुए दिखायी देता है । कहा जाता है कि तुलसीदासजी को पत्नी ने फटकार दिया और वे संत बन गये, पर यह कहना न तो पूरी तरह न्यायसंगत है और न ही ठीक है ।

संसार में न जाने कितने व्यक्तियों को पारिवारिक जीवन में अकसर भर्त्सना और आलोचना सुनने को मिलती है पर वे सबके-सब गोस्वामी तुलसीदास तो नहीं बन जाते ! 

तुलसीदास इसलिए गोस्वामी तुलसीदास बन गये क्योंकि उनके गुरुदेव ने बाल्यावस्था में उन्हें रामकथा सुनाकर रामभक्ति के संस्कार बीजरूप में उनके अंतःकरण में डाल दिये थे । गुरुदेव ने बार-बार उन्हें जो रामकथा सुनायी थी, वह उनके अंतःकरण में विद्यमान थी ।
                  तदपि कही गुर बारहिं बारा ।

उनके जीवन में ऐसा अवसर आया, लगा कि वे भोग-वासना की नदी में पूरी तरह डूब चुके हैं । पत्नी के प्रति वे इतने आसक्त थे कि एक दिन भी उसके बिना नहीं रह पाते थे । वे पागलों की भाँति उसके पास दौड़े चले जाते हैं, जहाँ उन्हें तीखी फटकार मिलती है । 

उसके बाद उनमें जो परिवर्तन दिखायी देता है, उसे हम पत्नी की फटकार से जोड़ लेते हैं पर वस्तुतः उस फटकार का परिणाम यह होता है कि उनके भीतर गुरुदेव से सुनी रामकथा के बीज से अंकुर फूट पड़ता है ।

ठीक उसी तरह जैसे राख से ढके रहने पर उसके नीचे दबा हुआ अंगारा दिखायी नहीं देता,पर राख के हटते ही वह प्रज्वलित रूप में सामने आ जाता है । 

गोस्वामी जी ने जो बाल्यावस्था में सुना था, उसका बड़ा महत्त्व है । उससे न केवल उन्हें अपितु समाज को भी बड़ा लाभ हुआ और आज भी हो रहा है । अभाव और पीड़ा का अनुभव करनेवाले तुलसीदास जी ने गुरुकृपा और रामनाम के आश्रय से जो प्राप्त किया, उस रामकथारूपी अमृत को मुक्तहस्त से सबमें बाँट दिया । समाज से मिलनेवाले अपमान और कष्टों के विष को भगवान शंकर की तरह पी लिया और हम सबको रामकथा का अमृत पिलाकर धन्य-धन्य कर दिया !

  • सीख : संतों एवं महापुरुषों का स्वभाव ही होता है कि खुद को कितना भी कष्ट हो वह सहकर समाज को परमात्म-प्रेम का अमृत पिलाकर,जीवन को सही दिशा देकर मुक्ति की ओर ले जाते हैं। हमें ऐसे संत सद्गुरु पूज्य बापूजी के रूप में बड़े ही सौभाग्य से मिले हैं इसलिए कैसी भी परिस्थिति आ जाये हम उनकी शरण कभी नहीं छोडेंगे, क्योंकि उनके सिवा कोई भी हमें संसार दुःख से मुक्त नहीं करा सकता ।

    -प्रश्नोत्तरी 
     (1) नरहरिदासजी ने गोस्वामी को कौन-सी शिक्षा दी थी ?
    (2) सबसे बडा मूर्ख कौन है ? (उत्तर : जो सारा समय संसार के पीछे खपा देता है और भगवान के लिए समय नहीं देता ।)

~ बाल संस्कार पाठ्यक्रम : अगस्त – दूसरा सप्ताह

 

बड़ा सरल है उसे पाना | Story to Learn How to Meet God in Hindi

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कुलपति स्कंधदेव के गुरुकुल में प्रवेशोत्सव समाप्त हो चुका था। कक्षाएँ नियमित रूप से चलने लगी थीं। उनके योग और अध्यात्म संबंधित प्रवचन सुनकर विद्यार्थी उनसे बड़े प्रभावित होते थे।

एक दिन प्रश्नोत्तर काल में शिष्य कौस्तुभ ने स्कंधदेव से प्रश्न कियाः “गुरुदेव ! क्या इसी जीवन में ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है ?” [Gurudev! Can we meet the God ? How to Meet the God?]

स्कंधदेव एक क्षण तो चुप रहे, फिर कुछ विचार कर बोलेः “तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें कल मिल जायेगा और आज सायंकाल तुम सब लोग निद्रा देवी की गोद में जाने से पूर्व भगवान का ध्यान करते हुए बिना माला के 108 बार वासुदेव मंत्र का जप करना तथा प्रातःकाल उसकी सूचना मुझे देना।”

जब प्रातःकाल स्कंधदेव के प्रवचन का समय आया तो सब विद्यार्थी अनुशासनबद्ध होकर आ बैठे। स्कंधदेव ने अपना प्रवचन प्रारम्भ करने से पूर्व पूछा कि “कल सायंकाल तुम में से किस-किसने सोने से पूर्व कितने-कितने मंत्रों का उच्चारण किया ?”

कौस्तुभ को छोड़कर सब विद्यार्थियों ने अपने-अपने हाथ उठा दिये। किसी ने भी भूल नहीं की थी। सबने 108 बार वासुदेव मंत्र का जप व भगवान का ध्यान कर लिया था।

स्कंधदेव ने कौस्तुभ को बुलाया और पूछाः “क्यों कौस्तुभ ! तुमने सोने से पूर्व 108 बार मंत्र का उच्चारण क्यों नहीं किया ?”

कौस्तुभ ने सिर झुका लिया और विनीत वाणी में बोलाः “गुरुदेव ! कृपया मेरा अपराध क्षमा करें। मैंने बहुत प्रयत्न किया किंतु जब चित्त जप की संख्या गिनने में चला जाता था तो भगवान का ध्यान नहीं रहता था और जब भगवान का ध्यान करता तो गिनती भूल जाता। सारी रात ऐसे ही बीत गयी और मैं आपका दिया नियम पूरा न कर सका।”

स्कंधदेव मुस्कराये और बोलेः “कौस्तुभ ! तुम्हारे कल के प्रश्न का यही उत्तर है। जब हम संसार के सुख सम्पत्ति, भोग की गिनती में लग जाते हैं तब हम भगवान के प्रेम को भूल जाते हैं। ईश्वर ने मनुष्य-शरीर देकर हमें संसार में जिस काम के लिए भेजा है, उसे हम भोगों में आसक्त रहकर नहीं कर पाते लेकिन अगर कोई इन सबसे चित्त हटाकर भगवान में अपना चित्त लगाता है तो उसे कोई भी पा सकता है।”

📚 ऋषि प्रसाद, मार्च 2011, पृष्ठ संख्या 25, अंक 219