Daily Morning: Roz Apne Lakshya/ Goal ko Repeat Karna Chahiye

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Review and Repeat your Goal/ Target/ Lakshya Every Mornig (Subha ki Prayer) : ईश्वर के साक्षात्कार जैसा सरल और कोई काम नहीं है। जो वास्तविक ‘मैं’ है उसमें टिकने के लिए ओंकार अथवा जिस देव में प्रीति है उसका गुरुप्रदत्त मंत्र (गुरुमंत्र) जपते-जपते उसके अर्थ में लीन होते जायें ताकि दूसरे अनर्थकारी संस्कार, अनर्थकारी आकर्षण हटते जायें।

यदि अनर्थकारी संस्कार ही सार दिखते हैं और सोचते हैं : ‘भजन तो करेंगे किंतु जरा इतना कर लूँ…पेंशन आयेगी फिर आराम से भजन करूँगा। ‘ तो पेंशन की पराधीनता रहेगी और बुढ़ापा आयेगा तो शरीर तो दुखेगा ही। फिर उसको ठीक करने में ही जीवन पूरा हो जायेगा। तो अब क्या करें ? अभी इसी समय आप तड़प जगाइये और अपने असली
‘मैं’ को पहचानिये।

बेठीक को ठीक करने का जो भूत घुसा है उसको निकालना ही परमात्म-प्राप्ति कहलाता है जो सोचते हैं : ‘जरा बेटी की शादी हो जाय… बेटा घर संभालने के लायक हो जाय… जरा यह हो जाय… जरा वह हो जाए… समझो, वे मूर्ख बालक की नाई आकाश की रक्षा कर रहे हैं। संसार की विघ्न-बाधाएँ, परिस्तिथियाँ अवश्यंभावी हैं। सम, शांत ‘मैं को पहचानना ही महान पौरुष है। कुटुंबी के शरीर के लिए तुम कितना भी करो, वह तो जीर्ण-शीर्ण और बीमार होता ही रहेगा ऐसे ही कुछ लोग सोचते हैं: ‘इन शरीरों की रक्षा करूँ फिर आराम से भजन करना…’ नहीं, बेटे या बेटी, पति या पत्नी का आत्मा तो शाश्वत है। उस शाश्वत आत्मा को जानने पहचानने में लग जाओ।

हम लोग गलती यह करते हैं कि शरीर के लिए सारी सुविधाएँ जुटाकर फिर भजन करना चाहते हैं। यह तो सुविधाजनित सुख है, गुलामी का सुख है, आत्मा का सुख नहीं है। सुविधाजनित सुख तो यहाँ से ज्यादा स्वर्ग में है। किंतु वहाँ सुख भोगते-भोगते पुण्य क्षीण हो जाते हैं और फिर किसी के गर्भ में आना पड़ता है। जहाँ से सुख आता है यदि उस ‘मैं’ को एक बार पहचान लें तो फिर गर्भवास का दुःख सहना नहीं पड़ेगा।

~ ऋषि प्रसाद – सितम्बर २००४

Atma Gyan/ Sakshatkar Kaise Kare [Self Realization] : A Story

atma gyan atma sakshatkar kaise kare

साक्षात्कार करने की सफलता का राज… जानिए साधु से मिली युक्ति !!

▪ एक व्यक्ति ने किसी आध्यात्मिक ग्रंथ में पढ़ा कि मनुष्य-जीवन ईश्वर-साक्षात्कार करने के लिए ही होता है। अगर वह नहीं किया तो जीवन निष्फल हो जाता है। उसने अपनी तरफ से बहुत प्रयास किया, तरह-तरह की साधना की, तीर्थों में भटका परंतु कुछ रास्ता न मिला। भगवान के लिए कोई सच्चाई से चलता है तो वे उसे अपने प्यारे संतों की संगति देते हैं।

▪ एक बार मार्ग में उसने देखा कि किन्हीं महात्मा का सत्संग हो रहा है। उसने सोचा, ‘हो सकता है यहाँ कोई उपाय मिल जाए ।’

जब द्रवै दीनदयालु राघव, साधु संगति पाइये।
(विनयपत्रिका : १३६.१०)

▪ महात्मा का सत्संग सुनने के बाद तो उसके हृदय में ईश्वर का साक्षात्कार करने की धुन सवार हो गयी। उसने सोचा,’अब तो मुझे इन्हीं की शरण में रहना है।’ सत्संग पूरा होने के बाद सब चले गये पर वह देर रात तक वहीं बैठा रहा ।

▪ महात्मा जी ने उसे अपने पास बुलाया और पूछा :”बेटा ! क्या चाहते हो?”
“स्वामीजी ! मैं ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहता हूँ। क्या मुझे वह हो सकता है ?”

“क्यों नहीं, कल सुबह आना। हम लोग सामने के पहाड़ की चोटी पर चलेंगे। वहाँ मैं तुम्हें उसके रहस्य की प्रत्यक्ष अनुभूति कराऊँगा।”

▪ अगले दिन वह एकदम सुबह-सुबह महात्मा के पास पहुँचा।

संत बोले : “तुम इस गठरी को सिर पर रख लो और मेरे साथ चलो।”

वह बड़ी उमंग से चल पड़ा। पहाड़ की चोटी काफी ऊँची थी। थोड़ी देर बाद वह बोला :”स्वामीजी ! मैं थक गया हूँ, चला नहीं जाता।”

▪ स्वामीजी ने सहज भाव से कहा : “कोई बात नहीं, गठरी में पाँच पत्थर हैं। एक निकालकर फेंक दो। इससे गठरी कुछ हलकी हो जायेगी।”

उसने एक पत्थर फेंक दिया। कुछ ऊपर चढ़ने पर फिर उसे थकान होने लगी। महात्मा ने कहा: “एक पत्थर और कम कर दो।”

▪ इस प्रकार वह ज्यों-ज्यों ऊपर की ओर बढ़ता जाता, त्यों-त्यों कम वजन भी भारी लगने लगता।
महात्मा जी ने एक-एक करके सभी पत्थर फिंकवा दिये। फिर तो केवल कपड़ा बचा। उसे कंधे पर डालकर वह बड़ी सरलता से चोटी पर पहुँच गया।

▪ उसने महात्माजी से कहा : “स्वामीजी ! हम चोटी पर तो आ गये,अब ईश्वर-साक्षात्कार कराइये।”

स्वामीजी मुस्कराते हुए बोले: “बेटे! जब पाँच पत्थर की गठरी उठाकर तू पहाड़ पर नहीं चढ़ सका तो काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद की चट्टानें सिर पर रखकर ईश्वर का साक्षात्कार कैसे कर सकता है !”

▪ उसको अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने विनम्रता से प्रार्थना करते हुए कहा: “स्वामीजी ! अब आप ही मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

महात्मा ने उसे दीक्षा दी… साधना की पद्धति बतायी और निःस्वार्थ भाव से सेवा करने को कहा।

फिर तो वह उन महात्मा की शरण में रहकर उनके बताए अनुसार साधना करके अपने महान उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो गया।

📚ऋषि प्रसाद/सितम्बर २०११

Maa Ke Sanskar | Childhood of Sant Shri Asharam Ji Bapu

asharam ji bapu childhood

अम्मा जी ने बालक आसुमल (Balak Asumal) को लाड़-प्यार देने के साथ उनमें भक्ति के संस्कारों का सिंचन कर दिया ।

बाल्यावस्था (Childhood) में ही उनके चेहरे पर विलक्षण कांति तथा नेत्रों में अद्भुत तेज था । अम्मा जी उनको ठाकुर जी की मूर्ति के सामने बिठा देतीं व कहतीं : “बेटा ! भगवान की पूजा और ध्यान करो। प्रसन्न होकर वे तुम्हें प्रसाद देंगे।”

बापूजी ऐसा ही करते और अम्माजी अवसर पाकर चुपचाप उनके सम्मुख मक्खन-मिश्री रख जातीं। जब वे आँखे खोलकर प्रसाद देखते तो प्रभुप्रेम में पुलकित हो उठते थे ।

उन दिनों बापू जी की बड़ी बहनें खिम्मी और किस्सी बालसुलभ चपलता से बोलती थीं :”आसु ! यह प्रसाद तो अम्मा ने रखा है, भगवान ने नहीं रखा है ।”

तो भी आसुमल जी को उनकी बातों पर विश्वास नहीं होता और अम्मा जी की बात को सच मानते थे ।

अम्माजी अपनी दोनों बेटियों को डाँटती थीं कि “क्यों तोड़ती हो उसका विश्वास ? इस बहाने उसे भक्ति का रंग लगेगा।”

दे दे मक्खन मिश्री कूजा
माँ ने सिखाया ध्यान और पूजा।।

सभी माताओं को ऐसे युक्तियों से अपने बच्चों में भक्ति के संस्कार (Sanskar) डालने चाहिए। अम्माजी सत्संग सुनने जातीं और आकर अपने सुपुत्र आसुमल को सुनातीं तथा उन्हें भी सत्संग में ले जाती थीं। सत्संग के संस्कारों से बालक आसुमल कितने महान संत बने !

लोकसंत तुलसीदास जी – Lok Sant Tulsidas Ji

Lok sant Tulsi Das ji

आज हम जानेंगे : एक अभागे के जीवन में भी जब सद्गुरु आ जाते हैं तो उसका जीवन कैसे चमक जाता है ? 

संत तुलसीदास जी के पिता का नाम आत्माराम था। कहा जाता है कि वे ज्योतिष विद्या के जानकार थे। ज्योतिष के प्रति उनकी इतनी प्रबल निष्ठा थी कि जब उनके घर में बालक का जन्म हुआ तो उन्होंने उत्सव मनाने के बजाय पहले बालक की जन्मपत्री बनायी।

उसमें उन्होंने देखा कि यह बालक तो बड़ा भाग्यहीन है। यदि इसका परित्याग नहीं किया गया तो इसका दुष्परिणाम इसके माता-पिता को भोगना पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने बालक का मुँह देखे बिना ही उसका परित्याग कर दिया।

गोस्वामीजी ने अपनी बाल्यावस्था में बड़े कष्ट, दुर्भाग्य और अपमान का सामना किया। संसार में विरले ही ऐसे बालक होंगे, जिन्हें ऐसी परिस्थिति मिली होगी । आप उस बालक की स्थिति की कल्पना कीजिये, जिसे जन्म देनेवाले माँ-बाप ही नहीं अपना सके ! उसे न तो माता-पिता का प्यार मिला और न किसी अन्य की छाया ही मिली।

भूख से व्याकुल होकर वह जिस दरवाजे पहुँचता, गृहस्वामी को लगता कि ‘सुबह-सुबह यह अशुभ बालक कहाँ से आ गया ! पता नहीं इसका मुँह देखने के बाद आज का दिन कैसा बीतेगा ?’

गोस्वामीजी ने अपनी भूख के विषय में कहा है कि ‘मेरे जीवन में इतना अभाव था कि यदि भिक्षा में चने के चार दाने कोई दे देता था तो लगता था कि मानो चारों फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) ही प्राप्त हो गये हों । 
बारेतें ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन, 
जानत हो चारि फल चारि ही चनकको। 
(कवितावली, उ.कां. : 73) 

समाज जिसे ठुकरा देता है, संत उसे भी स्वीकार कर लेते हैं । संत नरहरिदास नाम के एक महापुरुष ने बालक की ऐसी दयनीय स्थिति देखी तो उसे अपने साथ रख लिया । उन्होंने उसका पालन-पोषण किया और वे नित्य उसे भगवान श्रीराम की कथा सुनाते। वहीं नरहरिदासजी के आश्रम में रहकर गोस्वामीजी ने विद्याध्ययन भी किया । 

गुरुदेव ने उनके सिर पर अपना हाथ रखा और रामनाम की महिमा बतायी । उन्होंने कहा : ‘‘पुत्र ! स्वार्थ और परमार्थ की सिद्धि एकमात्र रामनाम से होती है । तुम प्रभुनाम का ही आश्रय लो।”
 वे नित्य अपने आश्रम में रामायण की कथा सुनाया करते थे ।

यहाँ विचारणीय बात यह है कि जैसे हम यह सोचकर कि ‘नित्य के जीवन में तैरने का कोई उपयोग नहीं है’ तैरने का बचपन में अभ्यास नहीं करते,पर यदि बचपन में तैरना सीख लें तो भले ही वह प्रतिदिन उपयोगी न हो पर संकटकाल में यह कला बड़ी लाभदायी सिद्ध होती है ।  उसी तरह बाल्यावस्था में अच्छे संस्कारों के बीज हमारे अंतःकरण में डाल दिये जायें तो अवसर आने पर वे उदित होकर हमारी सहायता करते हैं, रक्षा करते हैं ।

गोस्वामीजी के जीवन में हमें यही सत्य प्रतिफलित होते हुए दिखायी देता है । कहा जाता है कि तुलसीदासजी को पत्नी ने फटकार दिया और वे संत बन गये, पर यह कहना न तो पूरी तरह न्यायसंगत है और न ही ठीक है ।

संसार में न जाने कितने व्यक्तियों को पारिवारिक जीवन में अकसर भर्त्सना और आलोचना सुनने को मिलती है पर वे सबके-सब गोस्वामी तुलसीदास तो नहीं बन जाते ! 

तुलसीदास इसलिए गोस्वामी तुलसीदास बन गये क्योंकि उनके गुरुदेव ने बाल्यावस्था में उन्हें रामकथा सुनाकर रामभक्ति के संस्कार बीजरूप में उनके अंतःकरण में डाल दिये थे । गुरुदेव ने बार-बार उन्हें जो रामकथा सुनायी थी, वह उनके अंतःकरण में विद्यमान थी ।
                  तदपि कही गुर बारहिं बारा ।

उनके जीवन में ऐसा अवसर आया, लगा कि वे भोग-वासना की नदी में पूरी तरह डूब चुके हैं । पत्नी के प्रति वे इतने आसक्त थे कि एक दिन भी उसके बिना नहीं रह पाते थे । वे पागलों की भाँति उसके पास दौड़े चले जाते हैं, जहाँ उन्हें तीखी फटकार मिलती है । 

उसके बाद उनमें जो परिवर्तन दिखायी देता है, उसे हम पत्नी की फटकार से जोड़ लेते हैं पर वस्तुतः उस फटकार का परिणाम यह होता है कि उनके भीतर गुरुदेव से सुनी रामकथा के बीज से अंकुर फूट पड़ता है ।

ठीक उसी तरह जैसे राख से ढके रहने पर उसके नीचे दबा हुआ अंगारा दिखायी नहीं देता,पर राख के हटते ही वह प्रज्वलित रूप में सामने आ जाता है । 

गोस्वामी जी ने जो बाल्यावस्था में सुना था, उसका बड़ा महत्त्व है । उससे न केवल उन्हें अपितु समाज को भी बड़ा लाभ हुआ और आज भी हो रहा है । अभाव और पीड़ा का अनुभव करनेवाले तुलसीदास जी ने गुरुकृपा और रामनाम के आश्रय से जो प्राप्त किया, उस रामकथारूपी अमृत को मुक्तहस्त से सबमें बाँट दिया । समाज से मिलनेवाले अपमान और कष्टों के विष को भगवान शंकर की तरह पी लिया और हम सबको रामकथा का अमृत पिलाकर धन्य-धन्य कर दिया !

  • सीख : संतों एवं महापुरुषों का स्वभाव ही होता है कि खुद को कितना भी कष्ट हो वह सहकर समाज को परमात्म-प्रेम का अमृत पिलाकर,जीवन को सही दिशा देकर मुक्ति की ओर ले जाते हैं। हमें ऐसे संत सद्गुरु पूज्य बापूजी के रूप में बड़े ही सौभाग्य से मिले हैं इसलिए कैसी भी परिस्थिति आ जाये हम उनकी शरण कभी नहीं छोडेंगे, क्योंकि उनके सिवा कोई भी हमें संसार दुःख से मुक्त नहीं करा सकता ।

    -प्रश्नोत्तरी 
     (1) नरहरिदासजी ने गोस्वामी को कौन-सी शिक्षा दी थी ?
    (2) सबसे बडा मूर्ख कौन है ? (उत्तर : जो सारा समय संसार के पीछे खपा देता है और भगवान के लिए समय नहीं देता ।)

~ बाल संस्कार पाठ्यक्रम : अगस्त – दूसरा सप्ताह

 

बड़ा सरल है उसे पाना | Story to Learn How to Meet God in Hindi

meet god

कुलपति स्कंधदेव के गुरुकुल में प्रवेशोत्सव समाप्त हो चुका था। कक्षाएँ नियमित रूप से चलने लगी थीं। उनके योग और अध्यात्म संबंधित प्रवचन सुनकर विद्यार्थी उनसे बड़े प्रभावित होते थे।

एक दिन प्रश्नोत्तर काल में शिष्य कौस्तुभ ने स्कंधदेव से प्रश्न कियाः “गुरुदेव ! क्या इसी जीवन में ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है ?” [Gurudev! Can we meet the God ? How to Meet the God?]

स्कंधदेव एक क्षण तो चुप रहे, फिर कुछ विचार कर बोलेः “तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें कल मिल जायेगा और आज सायंकाल तुम सब लोग निद्रा देवी की गोद में जाने से पूर्व भगवान का ध्यान करते हुए बिना माला के 108 बार वासुदेव मंत्र का जप करना तथा प्रातःकाल उसकी सूचना मुझे देना।”

जब प्रातःकाल स्कंधदेव के प्रवचन का समय आया तो सब विद्यार्थी अनुशासनबद्ध होकर आ बैठे। स्कंधदेव ने अपना प्रवचन प्रारम्भ करने से पूर्व पूछा कि “कल सायंकाल तुम में से किस-किसने सोने से पूर्व कितने-कितने मंत्रों का उच्चारण किया ?”

कौस्तुभ को छोड़कर सब विद्यार्थियों ने अपने-अपने हाथ उठा दिये। किसी ने भी भूल नहीं की थी। सबने 108 बार वासुदेव मंत्र का जप व भगवान का ध्यान कर लिया था।

स्कंधदेव ने कौस्तुभ को बुलाया और पूछाः “क्यों कौस्तुभ ! तुमने सोने से पूर्व 108 बार मंत्र का उच्चारण क्यों नहीं किया ?”

कौस्तुभ ने सिर झुका लिया और विनीत वाणी में बोलाः “गुरुदेव ! कृपया मेरा अपराध क्षमा करें। मैंने बहुत प्रयत्न किया किंतु जब चित्त जप की संख्या गिनने में चला जाता था तो भगवान का ध्यान नहीं रहता था और जब भगवान का ध्यान करता तो गिनती भूल जाता। सारी रात ऐसे ही बीत गयी और मैं आपका दिया नियम पूरा न कर सका।”

स्कंधदेव मुस्कराये और बोलेः “कौस्तुभ ! तुम्हारे कल के प्रश्न का यही उत्तर है। जब हम संसार के सुख सम्पत्ति, भोग की गिनती में लग जाते हैं तब हम भगवान के प्रेम को भूल जाते हैं। ईश्वर ने मनुष्य-शरीर देकर हमें संसार में जिस काम के लिए भेजा है, उसे हम भोगों में आसक्त रहकर नहीं कर पाते लेकिन अगर कोई इन सबसे चित्त हटाकर भगवान में अपना चित्त लगाता है तो उसे कोई भी पा सकता है।”

📚 ऋषि प्रसाद, मार्च 2011, पृष्ठ संख्या 25, अंक 219

नामोच्चारण का फल -Mantra Jap ka Prabhav | Importance of Chanting in Hindi

naam jap

श्रीमदभागवत [Shrimad Bhagwat] में आता है: 

 सांकेत्यं पारिहास्यं वा स्तोत्रं हेलनमेव वा | 
 वैकुण्ठनामग्रहणमशेषधहरं विटुः || 
 पतितः स्खलितो भग्नः संदष्टस्तप्त आहतः | 
 हरिरित्यवशेनाह पुमान्नार्हति यातनाम् || 

‘भगवान का नाम चाहें जैसे लिया जाए- किसी बात का संकेत करने के लिए, हँसी करने के लिए अथवा तिरस्कारपूर्वक ही क्यों न हो, वह संपूर्ण पापों का नाश करनेवाला होता है | पतन होने पर, गिरने पर, कुछ टूट जाने पर, डँसे जाने पर, बाह्य या आन्तर ताप होने पर और घायल होने पर जो पुरुष विवशता से भी ‘हरि’ ये नाम का उच्चारण करता है, वह यम-यातना के योग्य नहीं | (श्रीमदभागवत: 6.2.14,15) 

 मंत्र जाप (Mantra Jap | Naam Jap) का प्रभाव सूक्ष्म किन्तु गहरा होता है | 

 जब लक्ष्मण जी ने मंत्र जप कर सीता जी की कुटीर के चारों तरफ भूमि पर एक रेखा खींच दी तो लंकाधिपति रावण तक उस लक्ष्मण रेखा को न लाँघ सका | हालाँकि रावण मायावी विद्याओं का जानकार था, किंतु ज्यों ही वह रेखा को लाँघने की इच्छा करता त्यों ही उसके सारे शरीर में जलन होने लगती थी |

 मंत्रजप (Mantra Jap) से पुराने संस्कार हटते जाते हैं, जापक में सौम्यता आती जाती है और उसका आत्मिक बल बढ़ता जाता है |

 मंत्रजप (Mantra Jap) से चित्त पावन होने लगता है | रक्त के कण पवित्र होने लगते हैं | दुःख, चिंता, भय, शोक, रोग आदि निवृत होने लगते हैं | सुख-समृद्धि और सफलता की प्राप्ति में मदद मिलने लगती है |

 जैसे, ध्वनि-तरंगें दूर-दूर जाती हैं, ऐसे ही नाम जप की तरंगें हमारे अंतर्मन में गहरे उतर जाती हैं तथा पिछले कई जन्मों के पाप मिटा देती हैं | इससे हमारे अंदर शक्ति-सामर्थ्य प्रकट होने लगता है और बुद्धि का विकास होने लगता है | अधिक मंत्र जप से दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि सिद्धयाँ आने लगती हैं, किन्तु साधक को चाहिए कि इन सिद्धियों के चक्कर में न पड़े, वरन् अंतिम लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति में ही निरंतर संलग्न रहे |

अभावग्रस्त बालक कैसे बना ‘विद्या का सागर’ [ Childhood of Vidyasagar in Hindi]

ishwar chandra vidyasagar

[Childhood of Vidyasagar in Hindi]

सच्ची लगन व दृढ़ पुरुषार्थ का संदेश देती हुई यह कहानी बच्चों को अवश्य सुनाएँ।

एक होनहार बालक था।
घर में आर्थिक तंगी… पैसे-पैसे को मोहताज…  न किताबें खरीद सके न विद्यालय का शिक्षण शुल्क भर सके…. ऐसी स्थिति फिर भी विद्याप्राप्ति के प्रति उसकी अद्भुत लगन थी ।

पिता की विवशता को देख के उसने अपनी पढ़ाई के लिए खुद ही रास्ता निकाल लिया।

आसपास के लड़कों की पुस्तकों के सहारे उसने अक्षर-ज्ञान प्राप्त कर लिया तथा एक दिन कोयले से जमीन पर लिख के पिता को दिखाया। पिता ने विद्या के प्रति बच्चे की लगन देख के तंगी का जीवन जीते हुए भी उसे गाँव की पाठशाला में भर्ती करा दिया।

विद्यालय की सभी परीक्षाओं में उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया। आगे की पढ़ाई के लिए उसने माता-पिता से आशीर्वाद माँगा तथा कहा कि “आप मुझे किसी विद्यालय में भर्ती करा दें फिर मैं आपसे किसी प्रकार का खर्च नहीं माँगूंगा।”

कोलकाता के एक संस्कृत विद्यालय में उसने प्रवेश लिया और अपनी लगन व प्रतिभा से शिक्षकों को प्रसन्न कर लिया। उसका शिक्षण शुल्क माफ हो गया।

इस बालक ने केवल पेटपालू लौकिक विद्या को ही सब कुछ नहीं माना अपितु सर्वोपरि विद्या आत्मविद्या को आदर व रुचि पूर्वक पाने हेतु प्रयास किये ।

ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसने इतना परिश्रम किया कि १९ वर्ष की आयु तक वह व्याकरण, स्मृति, वेद-शास्त्र तथा अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों के ज्ञान में निपुण हो गया।

आगे चलकर यही बालक सुप्रसिद्ध समाजसेवी एवं विद्वान ईश्वरचंद्र विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar) के नाम से सुविख्यात हुए।
ये ‘यथा नाम तथा गुण’ थे।

सीख : आत्मनिर्भरता, परोपकारिता, परदुःखकातरता, करुणा, चंद्रमा-सा सौम्य व शीतलताप्रद स्वभाव एवं आत्मविद्या के अध्ययन से सुशोभित उदात्त व्यक्तितत्व के धनी आपने यह प्रत्यक्ष कर दिखाया कि लक्ष्य को पाने के दृढ़ निश्चय और पुरुषार्थ की कितनी भारी महिमा है।

🙌🏻संकल्प : हम भी सच्ची लगन से दृढ़ पुरुषार्थ करेंगे।

बचपन के संस्कार ही जीवन का मूल ! Mukund Life Story – Good Habits for kids

bachpan ke sanskar - Good Habits for kids

सन् १८९३ में गोरखपुर (उ.प्र.) में भगवती बाबू एवं ज्ञान प्रभा देवी के घर एक बालक का जन्म हुआ, नाम रखा गया मुकुंद ।

मुकुंद (Mukund) के माता-पिता ब्रह्मज्ञानी महापुरुष योगी श्यामाचरण लाहिड़ी जी के शिष्य थे। माँ मुकुंद को रामायण-महाभारत आदि सद्ग्रंथों की कथाएँ सुनाती व अच्छे संस्कार देतीं।

बालक को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा में बड़ी रुचि हो गयी। एक दिन नियम पूरा करने के बाद उसके मन में गरीबों की सहायता करने का विचार आया। उसने कुछ धन एकत्र किया और अपने भाई व मित्रों के साथ गरीबों में बाँटने गया।

धन बाँटकर वापस आने के लिए ये लोग गाड़ी पकड़ने जा रहे थे तभी इनकी भेंट दयनीय कुष्ठ रोगियों से हुई जो कुछ पैसे माँग रहे थे।

यद्यपि इनके पास केवल गाड़ी के भाड़े के लिए ही पैसे थे फिर भी मुकुंद (Mukund) ने एक क्षण का भी विचार किये बिना गरीबों को पैसे दे दिये। वहाँ से मुकुंद का घर १० कि.मी. की दूरी पर था । किराये के पैसे न होने के कारण वह सहयोगियों के साथ पैदल चल के घर आया। किसी को भी थकान का अनुभव नहीं हुआ अपितु निःस्वार्थ सेवा से हृदय में गजब का आनंद आया।

सर्दियों की ठंड में एक रात मुकुंद (Mukund) को केवल एक धोती लपेटे व ऊपर का शरीर पूर्ण नग्न देखकर उनके पिता ने पूछाः- “तुम्हारे वस्त्र कहाँ हैं ?
तुम ठंडी हवा में ऐसे बाहर क्यों घूम रहे हो?”

मुकुंद  (Mukund):-“घर आते समय रास्ते में मैंने एक गरीब वृद्ध व्यक्ति को काँपते हुए देखा, उसके पास चिथड़े के अतिरिक्त कुछ भी न था। यह देखते ही मुझसे रहा न गया और मैंने उसे अपने कपड़े दे दिये और मुझे भी यह समझने का अवसर मिला कि जिनके पास स्वयं को ढकने के लिए साधन नहीं होते हैं वे कैसा अनुभव करते हैं।’

करुणा और समता का सद्गुण जीवन में संजोने का अभ्यास करने वाले पुत्र के इस कार्य का अनुमोदन करते हुए पिता ने कहा ”तुमने बहुत अच्छा काम किया।”

इस प्रकार बचपन से ही माता-पिता से प्राप्त भक्ति, परमात्मा प्रीति, सेवा-परोपकार के संस्कारों ने मुकुंद के मन में ऐसी आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने की जिज्ञासा जगा दी जो स्कूली कक्षाओं में नहीं मिल सकती थी। और वह ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति की जिज्ञासा सद्गुरु युक्तेश्वर गिरि की कृपा से पूर्ण हुई। यही बालक मुकुंद (Mukund) आगे चलकर विश्व प्रसिद्ध परमहंस योगानंदजी के नाम से सुविख्यात हुए।

📚ऋषि प्रसाद/अप्रैल २०१८/१८

परीक्षा के दिनों में विद्यार्थी क्या करें ? Exam Time Me Padhai Kaise Kare

pariksha ke dinon mein vidyarthi kya karein

परीक्षा के दिनों में जो विद्यार्थी अधिक चिंतित और परेशान रहते हैं, वे साल भर मेहनत करने के बाद भी अच्छे अंकों से पास नहीं हो पाते। नीचे दी गई बातों का ध्यान रखकर पढ़ाई करने से सफलता अवश्य मिलेगी :

(१) समय नियोजन : कब क्या करना- इसका नियोजन करने से सब व्यवस्थित होता है इसलिए हर विद्यार्थी को अपनी समय सारणी बनानी ही चाहिए। जप, त्राटक, खेल, भोजन, नींद पढ़ाई आदि का समय निश्चित करके समय-सारणी बना लें। रात को देर तक ना जाग के सुबह जल्दी उठकर पढ़ें। इसके साथ ही पाठ्यक्रम के अनुसार प्राथमिकता तय करें, जिससे सभी विषयों का अध्ययन हो सके। सुनियोजित कार्य सर्व सफलताओं की कुंजी है।

(२) थकावट महसूस हो तो क्या करें – पढ़ाई करते समय हर दो-तीन घंटे में 5-10 मिनट मस्तिष्क को आराम दें। इस दौरान थोड़ा भगवान नाम उच्चारण करें कीर्तन गुनगुनायें और शांत एकाग्र हो जाएँ । 5-6 घंटे बैठक होने पर थोड़ा कूदे-फाँदे, खुली हवा में टहलें अथवा कोई शारीरिक कार्य करें। इससे मानसिक थकावट दूर हो जाएगी और फिर नए उत्साह से मन पढ़ने में लगेगा।

(३) घबराहट महसूस हो तो क्या करें : परीक्षा के दिनों में घबराहट महसूस हो तो खुली जगह में बैठ जाए। ‘देव-मानव-हास्य प्रयोग’ करें । फिर 5-10 मिनट ॐकार का गुंजन करें और दृढ़ संकल्प करें। गुरुकृपा-भगवतकृपा पर भरोसा रखकर पुरुषार्थ करें। इससे सकारात्मक विचारों का उदय होता है। आत्मविश्वास बढ़ता है और घबराहट चली जाती है।

📶सफलता की महाकुंजियां🔑

🔑पढ़ने के पहले जीभ तालु में लगाकर कल के पढ़े हुए का स्मरण कर लें और पढ़ने के बाद आज पढ़े हुए का स्मरण करने तथा पढ़ते-पढ़ते बीच-बीच में भी जीभ तालु में लगाते जाएँ तो पढ़ा हुआ सहज में याद हो जायेगा।
जीभ तालु में लगाकर पढ़ने वाले गजब की सफलता पाते हैं

🔑’श्री आशारामायण’ के पाठ में आता है~

108 जो पाठ करेंगे, उनके सारे कारज सरेंगे।।

दाहोद-इंदौर के बीच स्थित अमझेरा गांव में जब बारिश की तंगी होती है तब 108 पाठ पूरे होने के पहले ही बारिश हो जाती है । हजारों किसानों का असंख्य बार अनुभव है। किसान बारिश कराते हैं तो अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने में तुम्हारे बाप का क्या जाता है ? बापू के बच्चे, नहीं रहते कच्चे !…
है ना याद …..?

शाबाश !!!

ॐ ॐ ॐ….
हा हा हा….

📚लोक कल्याण सेतु/फरवरी२०१५

क्या आप दे सकते हैं रामतीर्थ जी के प्रश्न का उत्तर ? – Question of Swami Ramtirth

ram tirth ji ke prashn

जब स्वामी रामतीर्थ (Swami Ramtirth) प्राध्यापक थे, वे छात्रों को बड़ी लगन और तन्मयता से पढ़ाते थे। छात्रों की जिज्ञासा बढ़ाने के लिए उनसे कई तरह के प्रश्न पूछा करते थे और उत्तर उनसे ही निकलवाते थे।

‘सफलता कैसे प्राप्त करनी चाहिए?’ – इस विषय पर एक दिन तीर्थरामजी ( स्वामी रामतीर्थजी (Swami Ramtirth) का पूर्व नाम ) को कक्षा में पाठ पढ़ाना था। उन्होंने विद्यार्थियों से कई तरह के प्रश्न पूछे तुरंत छात्रों से वैसा उत्तर नहीं मिला जैसा उन्हें अपेक्षित था। वे कुछ क्षण शांत हुए, फिर श्यामपट पर एक लम्बी लकीर खींची और बोले :”विद्यार्थियों ! आज आपकी बुद्धि की परीक्षा है। आपमें से कोई इस लकीर को बिना मिटाये छोटी कर सकता है ?”

सब छात्र असमसंज में पड़ गये। तभी एक छात्र ने पहली लकीर से बड़ी दूसरी लकीर खींच दी। इससे पहली लकीर छोटी नज़र आने लगी।

उस लकीर के पास बड़ी लकीर खींचनेवाले विद्यार्थी को शाबाशी देते हुए तीर्थरामजी बोले : “देखो विद्यार्थियों ! इसका एक गूढा़र्थ भी है। सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो मनुष्य-जीवन भी सृष्टिकर्ता द्वारा खींची गयी एक लकीर है। अपने जीवनरूपी लकीर को बड़ी बनाने के लिए ईश्वर की खींची दूसरी लकीर को मिटाना अनुचित है।

 अपने को महान बनाने के लिए दूसरों को गिराने, मिटाने या परनिंदा करके दूसरों को नीचा दिखाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है और यह उचित भी नहीं है। हमारी निपुणता तो इसमें है कि हम अपने जीवन में सद्गुणों के और विवेक की लकीर को बढ़ायें । हम किसी को पीछे धकेलने के चक्कर में न रहें बल्कि ईमानदारी, सच्चाई,पुरुषार्थ आदि दैवी गुणों का सहारा लेकर आगे बढ़ें। हमारी भारतीय संस्कृति का यह सिद्धांत है। सफलता प्राप्त करने का यही सच्च मार्ग है और दूसरे सब मार्ग भटकाने वाले हैं।”

भारतीय संस्कृति कहती है: ‘सर्वस्तर दुर्गाणि…’ अर्थात् एक-दूसरे को उन्नत करते हुए सभी संकीर्ण मान्यताओं रूपी दुर्ग को पार कर जायें। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में भगवान अर्जुन को बताते हैं कि सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करने के बाद प्राणिमात्र को बड़ा हितकारी संदेश दिया है। 

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ । 

‘तुम लोग निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करो। ऐसा करते हुए तुम परम कल्याण (ईश्वर-साक्षात्कार) को प्राप्त हो जाओगे ।’ (गीता ३.११)

पूज्य बापूजी कहते हैं~ ”अगर किसी का उत्कर्ष देखकर चित्त में ईर्ष्या होती है तो समझो अपना चित्त मलिन है। किसी को ऊँचे आसन बैठा देखकर उससे ईर्ष्या करने के बजाय तुम भी ऊँचे कर्म करो तो तुम भी ऊँचाई पर पहुँच जाओगे। ऊँचे आसन पर बैठने से आदमी ऊँचा नहीं हो जाता, नीचे आसन पर बैठने से आदमी नीचा नहीं हो जाता। नीची समझ है तो आदमी नीचा हो जाता है, ऊँची समझ है तो आदमी ऊँचा हो जाता है और सत्संग के श्रवण-मनन से प्राप्त होने वाली सर्वोच्च समझ है तो आदमी ऊँचे-में-ऊँचे परम पद, आत्मपद में भी प्रतिष्ठित हो जाता है,जहाँ बाह्य ऊँचा-नीचापन कोई महत्त्व नहीं रखता।”