परिश्रम-का-महत्त्व | Parishram ka fal – Swami Nityananda ji

mehnat, parishram ka fal

निरन्तर परिश्रम (Parishram) करते रहने का संदेश देती हुई यह कहानी बच्चों को जरूर सुनाएँ।

एक दिन अपने शिष्यों की परीक्षा लेने की इच्छा से महात्मा नित्यानंदजी (Swami Nityananda ji) ने अपने सभी शिष्यों को बुलाकर कहा : ‘‘आश्रम की सफाई हेतु आप ये बाल्टियाँ ले जाकर नदी से पानी ले आओ।’’

बाँस की बाल्टियों को देखकर सभी शिष्यों को आश्चर्य हुआ, वे एक-दूसरे की तरफ देखने लगे कि इन बाल्टियों से पानी कैसे लाया जा सकता है ! फिर भी सभी शिष्य बाल्टियाँ उठाकर नदी-तट पर पानी भरने गये । जब वे बाल्टियाँ भरते तो सारा जल निकल जाता ।

अंततः सारे शिष्य निराश हो गये व अपनी सेवा छोड़कर लौट आये तथा गुरुजी को अपनी दुविधा बतायी परंतु एक शिष्य तो जल भरने की सेवा में लगा ही रहा । वह जल भरता और जल रिसता तो पुनः भरने लगता । गुरुजी अन्य शिष्यों से वह क्या कर रहा है, इसकी जानकारी ले रहे थे ।

शाम होने तक वह इसी प्रकार करता रहा । इसका परिणाम यह हुआ कि बाँस की शलाकाएँ फूल गयीं और छिद्र बंद हो गये । तब वह बहुत प्रसन्न हुआ और बाल्टी में जल भरकर गुरुजी के पास पहुँचा । उसे देखकर गुरुजी का हृदय प्रसन्न हो गया ।

अन्य शिष्यों को सम्बोधित करते हुए गुरुजी ने कहा :
‘‘विवेक, धैर्य, निष्ठा,ईमानदारी व सातत्य से दुर्गम कार्य भी सुगम हो जाता है । असम्भव कुछ नहीं, सब सम्भव है।”

संकल्प : “हम भी निरन्तर अभ्यास करते रहेंगे।”

गंगा जल पीकर प्रेत की हुई मुक्ति

एक ब्राह्मण प्रयागराज से 5 कोस ( 1 कोस = करीब 2 मील ) की दूरी पर रहता था । वह प्रत्येक संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए प्रयाग में जाया करता था । माघ मास की संक्रांति के दिन तो वह अपने परिवारसहित अवश्य ही वहाँ जाता था ।

जब वह ब्राह्मण बूढ़ा और चलने में असमर्थ हो गया, तब एक बार माघ की संक्रांति आने पर उसने अपने पुत्र को बुलाकर कहा :- ‘‘ हे पुत्र ! तुम प्रयागराज जाओ, त्रिवेणी में स्नान करके मेरे लिए भी त्रिवेणी के जल की गागर भरकर लाना और संक्रांति के पुण्यकाल में मुझे स्नान कराना, देर मत करना ।

पिता के वचन का पालन करते हुए उसका पुत्र प्रयाग के लिए चल पड़ा । त्रिवेणी में स्नान कर जब वह जल से भरी गागर पिता के स्नान के लिए ला रहा था तो रास्ते में उसे एक प्रेत मिला । वह प्यास के कारण बहुत व्याकुल हो रहा था और गंगाजल पीने की इच्छा से रास्ते में पड़ा था ।

लड़के ने प्रेत से कहा :- ‘‘ मुझे रास्ता दो । “

प्रेत :- ‘‘ तुम कहाँ से आये हो ? तुम्हारे सिर पर क्या है ?

लड़का :- ‘‘ त्रिवेणी का जल है । “

प्रेत :- ” मैं इसी इच्छा से रास्ते में पड़ा हूँ कि कोई दयालु मुझे गंगाजल पिलाये तो मैं इस प्रेत-योनि से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि मैंने गंगाजल का प्रभाव अपने नेत्रों से देखा है ।

लड़का :- ‘‘ क्या प्रभाव देखा है ? “

प्रेत :- एक ब्राह्मण बड़ा विद्वान था । उसने शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय करके बहुत धन उपार्जित कर रखा था । लेकिन क्रोधवश उसने किसी ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण को मार दिया । उस पाप के कारण मरने पर वह ब्रह्मराक्षस हुआ और हमारे साथ 8 वर्षों तक रहा ।

8 वर्षों के बाद उसके पुत्र ने उसकी हड्डियाँ लाकर श्रीगंगाजी के निर्मल तीर्थ कनखल में डालकर गंगाजी से प्रार्थना की :- ‘ हे पापनाशिनी गंगा माते ! मेरे पिता को सद्गति प्रदान कीजिये । ‘

तब तत्काल ही वह ब्राह्मण ब्रह्मराक्षस भाव से मुक्त हो गया….

उसीने मरते समय मुझे गंगाजल का माहात्म्य सुनाया था । मैं उसको मुक्त हुआ देखकर गंगाजल-पान की इच्छा से यहाँ पड़ा हूँ । अतः मुझको भी गंगाजल पिलाकर मुक्त कर दे… तुझे महान पुण्य होगा ।

लड़का :- ” मैं लाचार हूँ क्योंकि मेरे पिता बीमार हैं और उनका संक्रांति को स्नान का नियम है…. यदि मैंने यह गंगाजल तुझे पिला दिया तो स्नान के पुण्यकाल तक न पहुँचने के कारण मेरे पिता का नियम भंग हो जायेगा । “

प्रेत :- ‘‘ तुम्हारे पिता का नियम भी भंग न हो और मेरी भी सद्गति हो जाय, ऐसा उपाय करो । पहले मुझे जल पिला दो, फिर नेत्रबंद करने पर मैं तुम्हें तत्काल श्रीगंगाजी के तट पर पहुँचाकर तुम्हारे पिता के पास पहुँचा दूँगा । “

ब्राह्मणपुत्र ने प्रेत की दुर्दशा पर दया करके उसे जल पिला दिया । तब प्रेत ने कहा :- ‘‘अब नेत्रबंद करो और त्रिवेणी का जल लिये हुए स्वयं को अपने पिता के पास पहुँचा हुआ पाओ…. ब्राह्मणपुत्र ने नेत्रबंद किये, फिर देखा कि वह त्रिवेणी के जल से गागर भरकर पिताजी के पास पहुँच गया है ।

गंगाजी की महिमा के विषय में भगवान व्यासजी ‘पद्म पुराण में कहते हैं :- ‘‘ अविलंब सद्गति का उपाय सोचनेवाले सभी स्त्री-पुरुषों के लिए गंगाजी ही एक ऐसी तीर्थ हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

भगवान शंकर नारदजी से कहते हैं :- ‘‘ समुद्र सहित पृथ्वी का दान करने से मनीषी पुरुष जो फल पाते हैं, वही फल गंगा-स्नान करनेवाले को सहज में प्राप्त हो जाता है । राजा भगीरथ ने भगवान शंकर की आराधना करके गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था । जिस दिन वे गंगाजी को पृथ्वी पर लेकर आये वही दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से जाना जाता है । गंगा दशहरे के दिन गंगाजी में गोता लगाने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है । 

परोपकार का बदला

उसी में इनका ट्यूमर निकल गया है । अब ये बिल्कुल ठीक हैं । ऑपरेशन की जरूरत नहीं है ।
एक सत्य घटना है ।
एक शिक्षक के पेट में ट्यूमर (गाँठ) हो गया । उन्हें अस्पताल में भर्ती कर दिया गया । अगले दिन ऑपरेशन होना था । वे जिस वॉर्ड में थे उसमें एक रोगी की मृत्यु हुई । उसकी पत्नी विलाप करने लगी : ‘अब मैं क्या करूँ, इनको कैसे गाँव ले जाऊँ ? मेरे पास पैसे भी नहीं हैं… कैसे इनका क्रियाकर्म होगा ?’

Continue reading

सेवा की सुवास

उड़ीसा में कटक है। एक बार वहाँ प्लेग फैला। मच्छर और गंदगी के कारण लोग बहुत दुःखी थे। उड़िया बाजार में भी प्लेग फैला था। केवल बापूपाड़ा इससे बचा था। बापूपाड़ा में बहुत सारे वकील लोग, समझदार लोग रहते थे। वे घर के आँगन व आसपास में गंदगी नहीं रहने देते थे। वहाँ के कुछ लड़कों ने सेवा के लिए एक दल बनाया, जिसमें कोई 10 साल का था तो कोई 11 का, कोई 15 का तो कोई 18 साल का था। उस दल का मुखिया था एक 12 साल का किशोर।

Continue reading

परदुःखकातरता के साक्षात विग्रह

महानिर्वाणी अखाड़ा (मेहसाणा,गुजरात) के महंत श्री रामगिरि महाराज परदुःखकातरता के साक्षात विग्रह पूज्य बापूजी के सान्निध्य में बीते सुनहरे पलों की स्मृतियाँ ताजी करते हुए कहते हैं : “पूज्य बापूजी रात को अक्सर देखते थे कि कहीं किसी को तकलीफ तो नहीं है। जो टॉर्चवाली बात टी वी पर दिखाते हैं न,कि बापूजी के पास में टॉर्च होती है, उनको पता नहीं हैं कि टॉर्च क्यों रखते थे बापूजी। आज मैं बताता हूँ टॉर्च क्यों रखते थे बापूजी।

Continue reading