Bankim Chandra Chatterjee: Bhagwad Geeta Par Dridh Shraddha

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Bankim Chandra Chatterjee Bhagwat Geeta Par Shraddha :

▪ ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत के रचयिता बंकिमचंन्द्र चट्टोपाध्याय प्रतिदिन नियमित रूप से गीता का पाठ करते थे ।

▪ एक बार वे बीमार पड़ गये । डॉक्टर ने उन्हें दवा दी, किंतु बंकिम बाबू ने वह दवा बाहर फेंक दी । उन्हें दवा की अपेक्षा गीता में ज्यादा श्रद्धा थी । वे गीता पढ़ने लगे । डॉक्टर यह देखकर चिढ़ते हुए बोला : ‘‘आप आत्महत्या कर रहे हैं ।”

बंकिम बाबू : ‘‘वह कैसे ?”

▪ ‘‘जो मरीज नियमित रूप से दवा नहीं लेता, वह अपने प्राणों से अवश्य हाथ धो बैठता है ।

बंकिम बाबू ने गीता दिखाते हुए कहा : ‘‘किसने कहा मैं दवाई नहीं लेता ? यह रही मेरी दवा ।”

▪ थोड़े ही दिनों में बंकिम बाबू पूर्णरूप से स्वस्थ हो गये । गीता पर उनकी कैसी दृढ़ श्रद्धा थी !

~ बाल संस्कार पाठ्यक्रम से

Nirakar Hue Sakar Jab : Ganesh Chaturthi 2020 Special

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❀ गुरु-सन्देश

जहाँ दृढ़ विश्वास एवं श्रद्धा होती है, वहाँ प्रभु स्वयं साकार रूप धारण करके भोजन स्वीकार करें, इसमें क्या आश्चर्य !

गणपति के भक्त मोरया बापा, विठ्ठल के भक्त तुकारामजी एवं श्री रघुवीर जी के भक्त श्री समर्थ – तीनों आपस में मित्र संत थे।

➠ किसी भक्त ने हक की कमाई करके,चालीस दिन के लिए अखंड कीर्तन का आयोजन करवाया । पूर्णाहुति के समय दो हजार भक्त कीर्तन कर रहे थे । उन भक्तों के लिए बड़ी सात्विकता एवं पवित्रता से भोजन बना था ।

➠ किसी ने कहा : ‘‘श्री समर्थजी को श्री सिया-राम साकार रूप में दर्शन देते हैं । तुकारामजी महाराज की भक्ति से प्रसन्न होकर विठ्ठल साकार रूप प्रगट कर देते हैं ।

गणानांपतिः इति गणपतिः ।

➠ इन्द्रिगण के जो स्वामी हैं, सच्चिदानंद आत्मदेव हैं वे गणपति मोरया बापा की दृढ उपासना के बल से निर्गुण-निराकार होकर भी सगुण-साकार गणपति के रूप में प्रगट हो जाते हैंं । ये तीनों महान संत हमारी सभा में विराजमान हैं । क्यों न हम उन्हें हृदयपूर्वक प्रार्थना करें कि वे अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान करके,उन्हें भोजन-प्रसाद करवायें, बाद में हम सब प्रसाद ग्रहण करें ?!”

➠ सबने सहमति प्रदान कर दी । तब उन्होंने श्री समर्थ से प्रार्थना की । श्री समर्थ ने मुस्कुराते हुए तुकोबा की तरफ नजर फेंकी और कहा : ‘‘यदि तुकोबा विठ्ठल को बुलायें तो मैं सियाराम का आह्वान करने का प्रयत्न करूँगा।”

➠ तुकारामजी मंद-मंद मुस्कुराते एवं विनम्रता का परिचय देते हुए बोले : ‘‘अगर समर्थ की आज्ञा है तो मैं जरूर विठ्ठल को आमंत्रित करूँगा लेकिन मैं श्री समर्थ से यह प्रार्थना करता हूँ कि वे श्री सियाराम के दर्शन करवाने की कृपा करें । फिर दोनों संतों ने मीठी नजर डाली मोरया बापा पर और बोले : ‘‘बापा ! अगर विघ्नविनाशक श्री गजानन संतुष्ट हैं तो आप उनका आह्वान करियेगा । मोरया बापा भी मुस्कुरा पड़े। उदयपुर के पास नाथद्वारा है । वहाँ वल्लभाचार्य के दृढ़ संकल्प और प्रेम के बल से भगवान श्रीनाथजी ने उनके हाथ से दूध का कटोरा लेकर पिया था । श्री रामकृष्ण परमहंस के हाथों से माँ काली भोजन को स्वीकार कर लेती थीं । धन्ना जाट के लिए भगवान ने सिलबट्टे से प्रगट होकर उसका रूखा-सूखा भोजन भी बड़े प्रेम से स्वीकार किया था ।

➠ श्री समर्थ रामदास ने आसन लगवाये । तुकारामजी एवं मोरया बापा ने सम्मति दी और तीनों संत आभ्यांतर-बाह्य शुचि करके अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान करने लगे ।

➠ श्रीरामकृष्ण परमहंस कहते हैं : ‘‘जब तुम्हारा हृदय और शब्द एक होते हैं तो प्रार्थना फलित होती है।

➠ तीनों अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान कर ही रहे थे कि इतने में देखते-ही-देखते एक प्रकाशपुंज धरती की ओर आने लगा । उस प्रकाशपुंज में सियाराम की छवि दिखने लगी और वे आसन पर विराजमान हुए । फिर विठ्ठल भी पधारे तथा गणपति दादा भी पधारे एवं अपने-अपने आसन पर विराजमान हुए ।

➠ दो हजार भक्तों ने अपने चर्मचक्षुओं से उन साकार विग्रहों के दर्शन किये एवं उन्हें प्रसाद पाते देखा । उनके प्रसाद पाने के बाद ही सब लोगों ने प्रसाद लिया।
इस घटना को महाराष्ट्र के लाखों लोग जानते-मानते हैं । कैसी दिव्य महिमा है संतों-महापुरुषों की ! कितना बल है दृढ़ विश्वास में !

✸ सीख : जहाँ दृढ़ विश्वास एवं श्रद्धा होती है वहाँ कोई भी कार्य असम्भव नहीं है । अपने को दीन-हीन दुर्बल न समझकर हमारे अंदर अथाह सामर्थ्य है उसे जगाकर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए ।

~ {बाल संस्कार पाठ्यक्रम से-सितम्बर/दूसरा सप्ताह}

Surya Grahan Kyu Hota hai – An Interesting Story in Hindi

Surya Grahan June 2020 Special Story.

Surya Grahan Kyu Hota hai – An Interesting Story in Hindi: एक राजा बड़ा सनकी था। एक बार सूर्यग्रहण हुआ तो उसने राजपंडितों से पूछा : “सूर्यग्रहण क्यों होता है?”

पंडित बोले :”राहु के सूर्य को ग्रसने से।”

“राहु क्यों और कैसे ग्रसता है? बाद में सूर्य कैसे छूटता है?” जब उसे इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले तो उसने आदेश दिया :”हम खुद सूर्य तक पहुँचकर सच्चाई पता करेंगे। एक हजार घोडे और घुड़सवार तैयार किये जायें।”

राजा की इस बिना सिर-पैर की बात का विरोध कौन करे? उसका वफादार मंत्री भी चिंतित हुआ। मंत्री का बेटा था वज्रसुमन । उसे छोटी उम्र में ही सारस्वत्य मंत्र मिल गया था, जिसका वह नित्य श्रद्धा पूर्वक जप करता था। गुरुकुल में मिले संस्कारों, मौन व एकांत के अवलम्बन से तथा नित्य इश्वारोपासना से उसकी मति इतनी सूक्ष्म हो गयी थी मानो दूसरा बीरबल हो।

वज्रसुमन को जब पिता की चिंता का कारण पाता चला तो उसने कहा: “पिताजी ! मैं भी आपके साथ यात्रा पर चलूंगा ।

पिता : “बेटा ! राजा की आज्ञा नहीं है। तू अभी छोटा है।”

“नहीं पिताजी ! पुरुषार्थ व विवेक उम्र के मोहताज नहीं है । मुसीबतों का सामना बुद्धि से किया जाता है, उम्र से नहीं। मैं राजा को आनेवाली विपदा से बचाकर ऐसी सीख दूंगा जिससे वह दुबारा कभी ऐसी सनकभरी आज्ञा नहीं देगा।”

मंत्री : “अच्छा ठीक है पर जब सभी आगे निकल जाएँ, तब तू धीरे से पीछे-पीछे आना।”

राजा सैनिकों के साथ निकल पड़ा। चलते- चलते काफिला एक घने जंगल में फंस गया। तीन दिन बीत गए। भूखे-प्यासे सैनिकों और राजा को अब मौत सामने दिखने लगी । हताश होकर राजा ने कहा: “सौ गुनाह माफ है, किसी के पास कोई उपाय हो तो बताओ।”

मंत्री : “महाराज ! इस काफिले में मेरा बेटा भी है। उसके पास इस समस्या का हल है। आपकी आज्ञा हो तो…”

“हाँ-हाँ, तुरंत बुलाओ उसे।”

वज्रसुमन बोला: “महाराज ! मुझे पहले से पता था कि हम लोग रास्ता भटक जायेंगे, इसीलिए मैं अपनी प्रिय घोड़ी को साथ लाया हूँ। इसका दूध पीता बच्चा घर पर है। जैसे ही मैं इसे लगाम से मुक्त करूंगा, वैसे ही यह सीधे अपने बच्चे से मिलने के लिए भागेगी और हमें रास्ता मिल जायेगा।” ऐसा ही हुआ और सब लोग सकुशल राज्य में पहुँच गये।

राजा ने पूछा: “वज्रसुमन ! तुमको कैसे पता था कि हम राह भटक जायेंगे और घोड़ी को रास्ता पता है? यह युक्ति तुम्हें कैसे सूझी?”

“राजन् ! सूर्य हमसे करोड़ों कोस दूर है और कोई भी रास्ता सूरज तक नहीं जाता। अतः कहीं न-कहीं फंसना स्वाभाविक था।

दूसरा, पशुओं को परमात्मा ने यह योग्यता दी है कि ये कैसी भी अनजान राह में हों उन्हें अपने घर का रास्ता ज्ञात होता है। यह मैंने सत्संग में सुना था।

तीसरा, समस्या बाहर होती है, समाधान भीतर होता है। जहाँ बड़ी-बड़ी बुद्धियाँ काम करना बंद करती हैं वहाँ गुरु का ज्ञान, ध्यान व सुमिरन राह दिखाता है। आप बुरा न मानें तो एक बात कहूँ ?”

“बिल्कुल, निःसंकोच कहो।”

“यदि आप ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनते, उनके मार्गदर्शन में चलते तो ऐसा कदम कभी नहीं उठाते। अगर राजा सत्संगी होगा तो प्रजा भी उसका अनुसरण करेगी और उन्नत होगी, जिससे राज्य में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ेगी।”

राजा उसकी बातों से बहुत प्रभावित हुआ, बोला : “मैं तुम्हें एक हजार स्वर्ण मोहरें पुरस्कार में देता हूँ और आज से अपना सलाहकार मंत्री नियुक्त करता हूँ। अब मैं भी तुम्हारे गुरुजी के सत्संग में जाऊँगा, उनकी शिक्षा को जीवन में लाऊँगा।” इस प्रकार एक सत्संगी किशोर की सूझबूझ के कारण पूरे राज्य में अमन-चैन और खुशहाली छा गयी।

📚ऋषि प्रसाद मार्च 2015

Tulsi Se Sadgati -Know Why Tulsi is used at time of Death Hindi

Tulsi Holy basil

राजस्थान में जयपुर के पास एक इलाका है – लदाणा। पहले वह एक छोटी सी रियासत थी। उसका राजा एक बार शाम के समय बैठा हुआ था। उसका एक मुसलमान नौकर किसी काम से वहाँ आया। राजा की दृष्टि अचानक उसके गले में पड़ी तुलसी की माला पर गयी। राजा ने चकित होकर पूछाः

“क्या बात है, क्या तू हिन्दू बन गया है ?”

“नहीं, हिन्दू नहीं बना हूँ।”

“तो फिर तुलसी की माला क्यों डाल रखी है ?”

“राजासाहब ! तुलसी के माला की बड़ी महिमा है।”

“क्या महिमा है ?”

“राजासाहब ! मैं आपको एक सत्य घटना सुनाता हूँ। एक बार मैं अपने ननिहाल जा रहा था। सूरज ढलने को था। इतने में मुझे दो छाया-पुरुष दिखाई दिये, जिनको हिन्दू लोग यमदूत बोलते हैं। उनकी डरावनी आकृति देखकर मैं घबरा गया।”

तब उन्होंने कहाः ‘तेरी मौत नहीं है। अभी एक युवक किसान बैलगाड़ी भगाता-भगाता आयेगा। यह जो गड्ढा है उसमें उसकी बैलगाड़ी का पहिया फँसेगा और बैलों के कंधे पर रखा जुआ टूट जायेगा। बैलों को प्रेरित करके हम उद्दंड बनायेंगे, तब उनमें से जो दायीं ओर का बैल होगा, वह विशेष उद्दंड होकर युवक किसान के पेट में अपना सींग घूसा देगा और इसी निमित्त से उसकी मृत्यु हो जायेगी। हम उसी का जीवात्मा लेने आये हैं।’

राजासाहब ! खुदा की कसम, मैंने उन यमदूतों से हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि ‘यह घटना देखने की मुझे इजाजत मिल जाय।’ उन्होंने इजाजत दे दी और मैं दूर एक पेड़ के पीछे खड़ा हो गया। थोड़ी ही देर में उस कच्चे रास्ते से बैलगाड़ी दौड़ती हुई आयी और जैसा उन्होंने कहा था ठीक वैसे ही बैलगाड़ी को झटका लगा, बैल उत्तेजित हुए युवक किसान उन पर नियंत्रण पाने में असफल रहा। बैल धक्का मारते-मारते उसे दूर ले गये और बुरी तरह से उसके पेट में सींग घुसेड़ दिया और वह मर गया।”

राजाः “फिर क्या हुआ ?”

नौकरः “हुजूर ! लड़के की मौत के बाद मैं पेड़ की ओट से बाहर आया और दूतों से पूछाः ‘इसकी रूह (जीवात्मा) कहाँ है, कैसी है ?’

वे बोलेः ‘वह जीव हमारे हाथ नहीं आया। मृत्यु तो जिस निमित्त से थी, हुई किंतु वहाँ हुई जहाँ तुलसी का पौधा था। जहाँ तुलसी होती है वहाँ मृत्यु होने पर जीव भगवान श्रीहरि के धाम में जाता है।’

हुजूर ! तब से मुझे ऐसा हुआ कि मरने के बाद मैं बिहिश्त में जाऊँगा कि दोजख में यह मुझे पता नहीं, इसलिए तुलसी की माला तो पहन लूँ ताकि कम-से-कम आपके भगवान नारायण के धाम में जाने का तो मौका मिल ही जायेगा और तभी से मैं तुलसी की माला पहनने लगा।”

कैसी दिव्य महिमा है तुलसी माला धारण करने की ! इसीलिए हिन्दुओं में किसी का अंत समय उपस्थित होने पर उसके मुख में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डाला जाता है ताकि जीव की सद्गति हो जाय।

~ तुलसी रहस्य साहित्य से

 

जाको राखे साँइयाँ…. Moral Story of Ancient Time – Mahabharata Story in Hindi

Mahabharata Story

परमात्मा में आस्था व विश्वास दृढ़ करने वाली यह कहानी बच्चों (Story for Kids) को सुनायें और दोहा याद करवायें। 

ऋषि शमीक अपने शिष्यों के साथ कुरुक्षेत्र में महाभारत (Mahabharata) के संग्राम के बाद का दृश्य देखने को निकले।वहाँ लाशों के ढेर पड़े हुए थे। उन्हीं ढेरों के बीच एक जगह गजराज के घण्ट के नीचे किसी पक्षी के दो बच्चे बैठे थे।

 उन्हें देखकर शिष्य बोल उठे : “गुरुवर! बड़े-बड़े योद्धा नष्ट हो गये, उनकी लाशों से बदबू आ रही है किन्तु ऐसे घोर संग्राम के बाद भी ये पक्षी के बच्चे जीवित हैं।

 ऋषि शमीक ने ध्यान करके देखा, फिर कहा: ‘‘हाँ, पक्षी के अण्डे जमीन पर पड़े थे और गजराज का घंट ऊपर से आ गिरा। बचानेवाले अंतर्यामी परमेश्वर की इच्छा से ही ऐसा हुआ है। उन्हीं अण्डों से ये बच्चे निकले हैं। इन्हें आश्रम ले चलो और दाना-पानी दो।”

 शिष्य : “गुरुवर जिन परमात्मा ने इनको ऐसे घोर युद्ध में भी बचाकर रखा है, वही आगे भी इनकी रक्षा करेगा तो क्यों इन्हें ले चलें?”

ऋषि शमीक : “भगवान का काम पूरा हुआ। भगवान ने ही हमें यहाँ भेजा है ताकि इनकी आगे की परवरिश हो सके।”

पक्षी के बच्चे वहाँ से उठा लिये गये एवं आश्रम में उनके दाना-पानी की समुचित व्यवस्था भी हो गयी। 

सच ही है:
जाको राखे साँइयाँ, मार सके ना कोय।
बाल न बांका हो सके,चाहे जग वैरी हो।।

Jako Rakhe Saiyan, Maar Sake Na Koi.

Baal Na Banka Ho Sake, Chahe jag vairi Hoi. 

 -प्रश्नोत्तरी 
 १. भगवान ने ऋषि और शिष्यों को वहाँ युद्ध के मैदान में क्यों भेजा था? 
 २. घोर संग्राम में कौन जीवित था? 
 ३. महाभारत युद्ध कहाँ हुआ था और यह घटना कहाँ हुई? 

 ~ऋषि प्रसाद/जनवरी २००१

गीता माता के संस्कार | Shrimad Bhagavad Gita And Lokmanya Tilak

Lokmanya Tilak

आज हम जानेंगे : विद्यार्थियों में गीता ग्रंथ के अध्ययन से सच्चाई, निर्भयता व आत्मा की स्वतंत्रता के संस्कार हृदय में दृढ़ हो सकते हैं !!

बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) , जिन्होंने जुल्मी अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी, उनकी इस महानतम छवि के पीछे गीता माता के ही संस्कार थे । वे बचपन से ही ‘गीता’ का अध्ययन कर उनके अर्थों पर गहनता से विचार करके अपने जीवन में चरितार्थ करने का प्रयत्न करते थे ।

 विद्यार्थीकाल में एक दिन उनके अध्यापक ने कक्षा के सभी छात्रों को गृहकार्य में गणित का एक कठिन सवाल हल करने को दिया । अध्यापक देखना चाहते थे कि कितने छात्र ईमानदारी से स्वयं गृहकार्य करते हैं और कितने अभिभावकों की मदद लेकर उनकी आँखों में धूल झोंकते हैं । दूसरे दिन जब अध्यापक ने सभी छात्रों से उस सवाल के बारे में पूछा तो पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया ।

अध्यापक ने मुस्कराते हुए कहा : ‘‘मुझे मालूम था, तुम लोग उसे हल नहीं कर पाओगे ।’’

‘‘नहीं गुरुजी ! मैंने यह सवाल हल किया है ।’’ इतना कहकर तिलकजी खड़े हो गये । अध्यापक ने जाँचा तो ठीक निकला । उन्हें शंका हुई कि ‘जरूर इसने किसीकी मदद से सवाल हल किया है ।’ उन्होंने तिलक से पूछा : ‘‘किसकी मदद से तुमने इसे हल किया है ?’’

‘‘इसे मैंने स्वयं ही हल किया है ।’’

‘‘तुम झूठ बोल रहे हो । तुमने अपने पिता की मदद से इसे हल किया है, इसलिए पूरा पीरियड तुम खड़े रहोगे ।’’

‘‘गुरुजी ! मैं जानता हूँ कि गुरुजनों की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए पर यह आज्ञा मानने से मैं इनकार करता हूँ । क्योंकि जो सजा आप मुझे दे रहे हैं, मैं उसका हकदार नहीं और जो मैं कह रहा हूँ, वह सच है ।’’

अब तो अध्यापक महोदय का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा । तिलकजी के पिताजी पास के ही एक स्कूल में अध्यापक थे । अध्यापक ने चपरासी भेजकर उन्हें बुलवाया और पूछताछ की ।

वे बोले : ‘‘तिलक अपने पढ़ने-लिखने में मुझसे कोई मदद नहीं लेता । वह जो कुछ करता है, अपनी बुद्धि और स्वयं के प्रयास से करता है ।’’

यह सुनकर अध्यापक लज्जित हो गये ।

 – ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के अध्ययन-मनन का ही यह दिव्य प्रभाव था कि वे सत्य पर निर्भयतापूर्वक अडिग रहे । गीता के दिव्य संस्कारों ने ही आगे चलकर उन्हें महान क्रांतिकारी व लोकप्रिय नेता के रूप में समाज के सम्मुख खड़ा किया । आज के राजनेता लोकमान्य तिलक (Lokmanya Tilak) , लालबहादुर शास्त्री, गांधीजी जैसे गीता, सनातन धर्म, राष्ट्र व संस्कृति के प्रति निष्ठा रखनेवाले पूर्वकालीन आदर्श राजनेताओं के जीवन का अनुसरण करें तो भारत की गरीब व शोषित जनता को बड़ा भारी लाभ होगा । 

-प्रश्नोत्तरी : विद्यार्थी तिलक ने कठिन सवाल हल करने के लिए अपने पिताजी की मदद क्यों नहीं ली ?

~लोक कल्याण सेतु : अप्रैल-जून 2006

 

जैसा विश्वास और जैसी श्रद्धा वैसा ही फल प्राप्त होगा | Elephant And Mahout Story

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…वह व्यक्ति आश्चर्य में पड़ गया कि यह ताकतवर  प्राणी सिर्फ इसलिए बंधन में पड़ा है क्योंकि इसे विश्वास हो गया है कि यह मुक्त नहीं हो सकता।

एक आदमी रास्ते से गुजर रहा था। उसने देखा कि पेड़ के नीचे कुछ हाथी बँधे हैं। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतने बड़े हाथी (Elephants) और छोटी-छोटी रस्सियो से बँधे हैं!  ये जरा-सा भी झटका मारें तो रस्सियों टूट जायेंगी।

उसने महावत (Mahout) से कहा ”क्या तुमने इतना खयाल नहीं किया कि इतने बड़े हाथियों को इतनी पतली रस्सियों से बाँधे नहीं रख सकते! ये तो कभी भी तोड़कर चले जायेंगे!”

महावत (Mahout) हँसा और बोला :”ऐसा नहीं है। ये छोटे-छोटे थे न, तब से इन्हें ऐसी ही रस्सियों से बाँधते आये हैं । तब बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी न तोड़ पाने के कारण  इन्हें धीरे-धीरे विश्वास हो गया है कि ये इन रस्सियों को तोड़ नहीं सकते । अब भले ये ऐसी दसों रस्सियाँ तोड़ सकते हैं लेकिन ये कभी इन्हें तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते।”

वह व्यक्ति आश्चर्य में पड़ गया कि यह ताकतवर  प्राणी सिर्फ इसलिए बंधन में पड़ा है क्योंकि इसे विश्वास हो गया है कि यह मुक्त नहीं हो सकता। विश्वास बहुत बड़ी चीज है। विश्वासो फलदायकः। जैसा विश्वास और जैसी श्रद्धा होगी,वैसा ही होने लगता है। हम जैसा मन में ठान लेते हैं वैसा ही होने लगता है।
सच ही कहा है : “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।

उन हाथियों की तरह ही हममें से कितने ही लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण यह मान बैठते हैं कि अब हमसे यह काम हो ही नहीं सकता। अब हम सफल नहीं हो सकते ।’ और अपनी ही बनायी हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं। अगर आपने मन में ठान लिया कि ‘मैं यह नहीं कर सकता तो फिर ब्रह्माजी भी आपकी कोई मदद नहीं कर सकते । याद रखिये, असफलता जीवन का एक शिक्षाप्रद पड़ाव है जो हमें यह महान सीख देता है कि शांत होकर अपने भीतर गोता मारो । गलत मान्यताओं,दुर्बल विचारों को खोजो और तत्परता से शास्त्र-सम्मत निश्चय व पुरुषार्थ करो तो सफलता जरूर मिलेगी।

कई लोग मान्यता बना लेते हैं कि ‘हम संसारी हैं, हमें ईश्वरप्राप्ति हो ही नहीं सकती । और ऐसी हीन मान्यताओं के कारण वे दुर्लभ मानव-जीवन को यों ही गँवा देते हैं। यदि इस मान्यता को छोड़ दें और किन्हीं ब्रह्मज्ञानी महापुरुष के मार्गदर्शन में इस मार्ग का अवलम्बन लें तो जिस लक्ष्य को पाने के लिए मनुष्य-जीवन मिला है उसे अवश्य ही पा सकते हैं।

पूज्य बापूजी कहते हैं ‘वेदांत का यह सिद्धांत है कि हम बद्ध नहीं हैं बल्कि नित्य मुक्त हैं। इतना ही नहीं, ‘बद्ध हैं। यह सोचना भी अनिष्टकारी है, भ्रम है। ज्यों ही आपने सोचा कि ‘मैं बद्ध हूँ, दुर्बल हूँ, असहाय हूँ, त्यों ही अपना दुर्भाग्य शुरू हुआ समझो आपने अपने पैरों में एक जंजीर और बाँध दी । अतः सदा मुक्त होने का विचार करो। हीन विचारों को तिलांजलि दे दो और अपने संकल्पबल को बढ़ाओ। शुभ संकल्प करो । जैसा आप सोचते हो वैसे ही हो जाते हो। यह सारी सृष्टि ही संकल्पमय है। जैसा विश्वास और जैसी श्रद्धा होगी वैसा ही फल प्राप्त होगा।”

~ऋषि प्रसाद/दिसम्बर २०१४

 

आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता

दैव उन्हीं की सहायता करते हैं, जो दृढ़ पुरुषार्थ करते हैं । -पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता सभी कार्य में सफलता का साधन हैं । दूसरे का सहारा लेने वाले व्यक्ति हर कार्य में असफल होते देखे गए हैं और जिन्होंने अपने पुरुषार्थ व विवेक का सहारा लिया है वे ही चमके हैं तथा उनका ही नाम इतिहास में दर्ज हुआ है। केशवराव उन्हीं लोगों में से एक थे । उनके जीवन की एक घटना उनके आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता का पुख्ता सबूत है । 

अढ़ेगाँव में केशवराव के मित्र का घर था ।
उनके पुत्र का व्रतबन्धन-समारोह था जिसमें केशवराव भी आमन्त्रित थे। केशवराव अपने चार स्वयंसेवकों सहित वहाँ पहुँचे, समारोह के अंत में भोजन की व्यवस्था की गयी थी । भोजन करने में काफी विलम्ब हो गया, शाम भी होने लगी। दूसरे दिन नागपुर में संघ की सभा आयोजित की गयी थी, जिसमें केशवराव की उपस्थिति अनिवार्य थी!  यातायात के साधनों का भी अभाव था…। नागपुर को जानेवाली अंतिम गाड़ी भी निकल चुकी थी ।

काफी इंतजारी के बाद भी जब कोई साधन न मिला तो स्वयंसेवक उदास हो गए परंतु केशवराव के चेहरे पर परेशानी की एक शिकन भी नहीं थी ।

उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा :”हमें अपना सफर पैदल ही तय करना होगा।”
एक सज्जन ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा :”परंतु यहाँ से नागपुर की दूरी 32 मील है, इतना लम्बा मार्ग पैदल नहीं जाया जा सकता।”

लेकिन केशवराव ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा :”तो क्या हुआ ? हम रातभर चलेंगे और सुबह संघ की सभा में अवश्य पहुँचेंगे।”
लोगों ने बहुत समझाया परंतु वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। सबसे विदा लेकर स्वयंसेवकों सहित पैदल ही नागपुर की ओर चल पड़े ।

परम दयालु परमात्मा भी सहायता किये बिना कैसे रह सकते थे ? अभी मुश्किल से वे दस मील ही चले होंगे कि एक अनजान ड्राइवर ने अपनी गाड़ी रोकी…

इनके पास आया और बोला :”अरे ! इतनी रात पैदल कहाँ जा रहे हैं ?”
केशवराव ने उत्तर दिया :”मित्र के निमंत्रण से आ रहे हैं । कल नागपुर में सभा है,पहुँचना जरुरी है। मोटर नहीं मिली सो पैदल ही चल पड़े।”
ड्राइवर ने कहा : “आइये,बैठिये ! मैं भी उधर ही जा रहा हूँ।”

केशवराव आगे बैठ गए और चारों स्वयंसेवक पीछे के हिस्से में। रात को 1 बजे वे नागपुर पहुँचे और सुबह सभा को संबोधित किया । 
सत्य ही है – दैव उन्हीं की सहायता करते हैं,जो दृढ़ पुरुषार्थ करते हैं ।

शिक्षा : “महाभारत” के अनुसार भाग्यवादियों के पास तो हमेशा असफलता ही आती है । पुरुषार्थ खेत है और बीज के संयोग से ही अनाज पैदा होता है ।
समर्थ रामदास ने कहा है कि हमें अपने जीवन में पुरुषार्थी बनना होगा तभी हम अपने जीवन संग्राम में सफल हो सकेंगे। उद्यमहीन व्यक्ति तो मरे हुए के समान है । प्रयत्न देवता है और भाग्य दैव !! इसलिए प्रयत्न देव की उपासना करना ही श्रेयस्कर है।

~लोक कल्याण सेतु/अगस्त-सित. २००४/८६