GaneshJi aur Parshuramji Ka Samvad : Vinayak Chaturthi 2020

GaneshJi aur Parshuramji Ka Samvad - Vinayak Chaturthi 2020

(गणेश चतुर्थी : 22 अगस्त)
एक दिन परशुरामजी अपने गुरुदेव भगवान शंकर के दर्शन की इच्छा से कैलाश पहुँचे । उस समय गणेशजी द्वार पर पहरा दे रहे थे ।

परशुरामजी ने उनसे कहा : “मैं अपने गुरु भक्तवत्सल भगवान शिवजी के दर्शन करना चाहता हूँ ।”

गणेशजी : “इस समय भगवान शिव तथा माता पार्वती अंतःपुर में हैं, अतः आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए ।”

“मैं तो जाऊँगा ही ।”

परशुरामजी के हठ करने पर भी विघ्न-विनायक ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया ।

21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन करनेवाले परशुरामजी कुपित हो गये और गणेशजी के साथ मल्लयुद्ध करने लगे । परशुरामजी द्वारा धक्का दिये जाने पर गणेशजी गिर पड़े ।

गणपतिजी को लगा कि “परशुराम के अहंकार को थोड़ा नियंत्रित करना अनिवार्य है ।

“ उन्होंने विराट रूप धारण किया और परशुरामजी को अपनी सूँड़ में लपेट लिया और घुमाने लगे ।

परशुरामजी निरुपाय हो गये ।
उन्होंने अपने गुरुदेव भगवान शिव के कवच और स्तोत्र का स्मरण किया और अपना परशु (फरसा) गणेशजी के बायें दाँत पर दे मारा ।

अपने पिता के अमोघ अस्त्र का सम्मान करने के लिए गणेशजी ने उसका प्रतिकार नहीं किया । शिवशक्ति के प्रभाव से वह तेजस्वी परशु गणेशजी के बायें दाँत को काटकर पुनः परशुरामजी के हाथ में आ गया ।

दाँत टूटते समय भयानक शब्द हुआ और गणेशजी के मुँह से खून का फव्वारा छूट पड़ा । यह देखकर यक्ष, गंधर्व, किन्नर, देवगण – सब कंपायमान हो उठे ।

पृथ्वी पर हाहाकार मच गया । किंतु गणेशजी शांत-सौम्यभाव से खड़े रहे ।

कार्तिकेय ने माता पार्वती को यह समाचार दिया । माता पार्वती अपने पुत्र गणेश की हालत देखकर कोपायमान हो उठीं और खबर भगवान शिवजी तक पहुँच गयी । शिवजी वहाँ पधारे ।

गणेशजी की दशा देखकर दयामय माँ का हृदय अपने हाथ में न रहा ।

ऐसी कौन-सी माँ है जो अपने पुत्र के रक्त के फव्वारे देखकर चुप रहती ? माता पार्वती ने कुपित होकर कहा : “परशुराम ! जितेन्द्रिय पुरुषों में श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे जैसे लाखों जंतुओं को मार डालने की शक्ति रखता है किंतु वह मक्खी पर भी हाथ नहीं उठाता ।

इस विश्व में इसके जैसा जितेन्द्रिय पुरुष दूसरा कौन है ? तभी तो इसकी अग्रपूजा होती है ।

परशुराम ! तुझे इतना अहंकार हो गया है कि ऐसे मेरे क्षमाशील, शांत और संयमी पुत्र पर तूने शिवस्तोत्र और कवच की शक्ति से अभिभूत किये अपने परशु का दुरुपयोग किया ?”


माँ पार्वती को कोपायमान हुईं देखकर परशुराम ने मन-ही-मन अपने गुरु भगवान शिवजी को प्रणाम किया और अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया ।

उसी समय भगवान श्रीकृष्ण एक ब्राह्मण बालक का रूप लेकर पधारे और बोले :
“मेरे भक्तों का कभी अमंगल नहीं होता । किंतु गुरु के रुष्ट होने पर मैं विवश हो जाता हूँ । गुरु की अवहेलना बलवती होती है ।

विद्या और मंत्र प्रदान करनेवाले गुरु इष्टदेव से सौ गुना श्रेष्ठ हैं । गुरु से बढ़कर कोई देवता नहीं है । पार्वती से बढ़कर कोई पतिव्रता नहीं है तथा गणेश से उत्तम कोई जितेन्द्रिय नहीं है ।

न पार्वतीपरा साध्वी न गणेशात्परो वशी ।”


फिर ब्राह्मण वेशधारी भगवान श्रीकृष्ण ने माता पार्वती से कहा : “आप जगज्जननी हो ।

आपके लिए गणेश और कार्तिकेय के समान ही परशुराम भी पुत्रतुल्य है । अतएव जो उचित समझें वह कीजिये ।

बालकों का यह विवाद तो दैव-दोष से ही घटित हुआ है । तुम्हारे इस प्रिय पुत्र का ‘एकदंत’ नाम वेदों में प्रसिद्ध है । पुराणों में भी तुम्हारे पुत्र के 8 नाम बताये गये हैं ।


गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननायकम् ।
लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम् ।।
गणेश, एकदंत, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज ।”
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खंड : 44.85)

पुनः श्रीकृष्ण ने परशुराम से कहा : “परशुराम ! तुमने क्रोधवश पार्वतीनंदन गणेश का दाँत तोड़कर अनुचित किया है ।

इस कारण निश्चय ही तुम अपराधी हो । ये सर्वशक्तिस्वरूपा पार्वती प्रकृति से परे और निर्गुण हैं ।

तुम स्तुति करके इन्हें प्रसन्न करो ।“
परशुराम ने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम करके माता पार्वती का स्तवन किया :

रक्ष रक्ष जगन्मातरमपराधं क्षमस्व मे ।
शिशूनामपराधेन कुतो माता हि कुप्यति ।।

‘जगज्जननी ! रक्षा करो, रक्षा करो । मेरे अपराध को क्षमा कर दो ।

भला, कहीं बच्चे के अपराध करने से माता कुपित होती है ?’
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खंड : 45.57)

परशुराम माता पार्वती के चरणों में प्रणाम करके विलाप करने लगे । परशुराम की करुण प्रार्थना से माता का हृदय द्रवित हो गया ।

उन्होंने परशुराम को अभयदान देते हुए प्रीतिपूर्वक कहा :
“बेटा ! अब तुम शांत हो जाओ । तुम अमर हो जाओ । प्रभु आशुतोष के अनुग्रह से तुम्हारी सर्वत्र विजय हो । भगवान श्रीहरि तुम पर सदा प्रसन्न रहें । गुरुदेव शिव में तुम्हारी भक्ति सुदृढ़ रहे ।”

फिर परशुरामजी ने भगवान गणेश का पूजन-अर्चन किया और अपने गुरुदेव भगवान शिव तथा माता पार्वती के चरणों में प्रणाम करके तपस्या के लिए प्रस्थान किया ।

अपना अहित करनेवाले का भी अहित न किया गजानन ने ! कैसी कर्तव्यदक्षता एवं कैसी दयादृष्टि-आत्मदृष्टि है गणेशजी में !

~ बाल संस्कार केन्द्र पाठ्यक्रम साहित्य

Nirakar Hue Sakar Jab : Ganesh Chaturthi 2020 Special

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❀ गुरु-सन्देश

जहाँ दृढ़ विश्वास एवं श्रद्धा होती है, वहाँ प्रभु स्वयं साकार रूप धारण करके भोजन स्वीकार करें, इसमें क्या आश्चर्य !

गणपति के भक्त मोरया बापा, विठ्ठल के भक्त तुकारामजी एवं श्री रघुवीर जी के भक्त श्री समर्थ – तीनों आपस में मित्र संत थे।

➠ किसी भक्त ने हक की कमाई करके,चालीस दिन के लिए अखंड कीर्तन का आयोजन करवाया । पूर्णाहुति के समय दो हजार भक्त कीर्तन कर रहे थे । उन भक्तों के लिए बड़ी सात्विकता एवं पवित्रता से भोजन बना था ।

➠ किसी ने कहा : ‘‘श्री समर्थजी को श्री सिया-राम साकार रूप में दर्शन देते हैं । तुकारामजी महाराज की भक्ति से प्रसन्न होकर विठ्ठल साकार रूप प्रगट कर देते हैं ।

गणानांपतिः इति गणपतिः ।

➠ इन्द्रिगण के जो स्वामी हैं, सच्चिदानंद आत्मदेव हैं वे गणपति मोरया बापा की दृढ उपासना के बल से निर्गुण-निराकार होकर भी सगुण-साकार गणपति के रूप में प्रगट हो जाते हैंं । ये तीनों महान संत हमारी सभा में विराजमान हैं । क्यों न हम उन्हें हृदयपूर्वक प्रार्थना करें कि वे अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान करके,उन्हें भोजन-प्रसाद करवायें, बाद में हम सब प्रसाद ग्रहण करें ?!”

➠ सबने सहमति प्रदान कर दी । तब उन्होंने श्री समर्थ से प्रार्थना की । श्री समर्थ ने मुस्कुराते हुए तुकोबा की तरफ नजर फेंकी और कहा : ‘‘यदि तुकोबा विठ्ठल को बुलायें तो मैं सियाराम का आह्वान करने का प्रयत्न करूँगा।”

➠ तुकारामजी मंद-मंद मुस्कुराते एवं विनम्रता का परिचय देते हुए बोले : ‘‘अगर समर्थ की आज्ञा है तो मैं जरूर विठ्ठल को आमंत्रित करूँगा लेकिन मैं श्री समर्थ से यह प्रार्थना करता हूँ कि वे श्री सियाराम के दर्शन करवाने की कृपा करें । फिर दोनों संतों ने मीठी नजर डाली मोरया बापा पर और बोले : ‘‘बापा ! अगर विघ्नविनाशक श्री गजानन संतुष्ट हैं तो आप उनका आह्वान करियेगा । मोरया बापा भी मुस्कुरा पड़े। उदयपुर के पास नाथद्वारा है । वहाँ वल्लभाचार्य के दृढ़ संकल्प और प्रेम के बल से भगवान श्रीनाथजी ने उनके हाथ से दूध का कटोरा लेकर पिया था । श्री रामकृष्ण परमहंस के हाथों से माँ काली भोजन को स्वीकार कर लेती थीं । धन्ना जाट के लिए भगवान ने सिलबट्टे से प्रगट होकर उसका रूखा-सूखा भोजन भी बड़े प्रेम से स्वीकार किया था ।

➠ श्री समर्थ रामदास ने आसन लगवाये । तुकारामजी एवं मोरया बापा ने सम्मति दी और तीनों संत आभ्यांतर-बाह्य शुचि करके अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान करने लगे ।

➠ श्रीरामकृष्ण परमहंस कहते हैं : ‘‘जब तुम्हारा हृदय और शब्द एक होते हैं तो प्रार्थना फलित होती है।

➠ तीनों अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान कर ही रहे थे कि इतने में देखते-ही-देखते एक प्रकाशपुंज धरती की ओर आने लगा । उस प्रकाशपुंज में सियाराम की छवि दिखने लगी और वे आसन पर विराजमान हुए । फिर विठ्ठल भी पधारे तथा गणपति दादा भी पधारे एवं अपने-अपने आसन पर विराजमान हुए ।

➠ दो हजार भक्तों ने अपने चर्मचक्षुओं से उन साकार विग्रहों के दर्शन किये एवं उन्हें प्रसाद पाते देखा । उनके प्रसाद पाने के बाद ही सब लोगों ने प्रसाद लिया।
इस घटना को महाराष्ट्र के लाखों लोग जानते-मानते हैं । कैसी दिव्य महिमा है संतों-महापुरुषों की ! कितना बल है दृढ़ विश्वास में !

✸ सीख : जहाँ दृढ़ विश्वास एवं श्रद्धा होती है वहाँ कोई भी कार्य असम्भव नहीं है । अपने को दीन-हीन दुर्बल न समझकर हमारे अंदर अथाह सामर्थ्य है उसे जगाकर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए ।

~ {बाल संस्कार पाठ्यक्रम से-सितम्बर/दूसरा सप्ताह}

GaneshJi Ka Anokha Sanyam| Vinayak Chaturthi 2020 Special Story

ganesh ji ka anokha sanyam

Ganesh Chaturthi Special Story. Vinayak Chaturthi Special Katha/ Kahani/ Story in Hindi & Marathi:

➠ “संयमशिरोणि, जितेन्द्रियों में अग्रगण्य,पार्वतीनंदन,श्रीगणेश का चंदन-विलेपित,तेजस्वी विग्रह देखकर तुलसीदेवी का मन उनकी ओर बरबस आकृष्ट हो गया।”

➠ ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड में कथा आती है : ब्रह्मकल्प की बात है । नवयौवनसंपन्ना परम लावण्यवती तुलसीदेवी भगवान नारायण का स्मरण करती हुई तीर्थों में भ्रमण कर रही थी । वे पतितपावनी श्रीगंगाजी के पावन तट पर पहुँचीं, तब उन्होंने देखा कि वहाँ पीताम्बर धारण किये नवयौवनसंपन्न, परम सुंदर निधिपति भगवान श्रीगणेश ध्यानस्थ अवस्था में बैठे हैं । उन्हें देखकर तुलसीदेवी सहसा कह उठीं :‘‘अत्यंत अद्भुत और अलौकिक रूप है आपका !”

➠ संयमशिरोणि, जितेन्द्रियों में अग्रगण्य पार्वतीनंदन श्रीगणेश का चंदन-विलेपित तेजस्वी विग्रह देखकर तुलसीदेवी का मन उनकी ओर बरबस आकृष्ट हो गया । विनोद के स्वर में उन्होंने गणेशजी से कहा : ‘‘गजवक्त्र ! शूर्पकर्ण ! एकदंत ! घटोदर ! सारे आश्चर्य आपके ही शुभ विग्रह में एकत्र हो गये हैं । किस तपस्या का फल है यह ?”

➠ उमानंदन एकदंत ने शांत स्वर में कहा : ‘‘वत्से ! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो ? यहाँ किस हेतु से आयी हो ? माता ! तपश्चरण में विघ्न डालना उचित नहीं । यह सर्वथा अकल्याण का हेतु होता है । मंगलमय प्रभु तुम्हारा मंगल करें ।

➠ तुलसीदेवी ने मधुर वाणी में उत्तर दिया : ‘‘मैं धर्मात्मज की पुत्री हूँ । मैं मनोऽनुकूल पति की प्राप्ति के लिए तपस्या में संलग्न हूँ । आप मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लीजिये ।

➠ घबराते हुए गणेशजी ने उत्तर दिया : ‘‘माता ! विवाह बड़ा दुःखदायी होता है । तुम मेरी ओर से अपना मन हटाकर किसी अन्य पुरुष को पति के रूप में वरण कर लो । मुझे क्षमा करो ।”

➠ कुपित होकर तुलसीदेवी ने गणेशजी को शाप दिया : ‘‘तुम्हारा विवाह अवश्य होगा ।”

➠ एकदंत गणेश ने भी तुरंत तुलसीदेवी को शाप देते हुए कहा : ‘‘देवी ! तुम्हें भी असुर पति प्राप्त होगा । उसके अनंतर महापुरुषों के शाप से तुम वृक्ष हो जाओगी । पार्वतीनंदन के अमोघ शाप के भय से तुलसीदेवी गणेशजी का स्तवन करने लगीं ।

➠ परम दयालु, सबके मंगल में रत गणेशजी ने तुलसीदेवी की स्तुति से प्रसन्न होकर कहा : ‘‘देवी ! तुम पुष्पों की सारभूता एवं कलांश से नारायण-प्रिया बनोगी । वैसे तो सभी देवता तुमसे संतुष्ट होंगे किंतु भगवान श्रीहरि के लिए तुम विशेष प्रिय होओगी । तुम्हारे द्वारा श्रीहरि की अर्चना कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करेंगे किंतु मेरे लिए तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी ।”

➠ इतना कहकर गणेशजी तपश्चर्या हेतु बद्रीनाथ की ओर चल दिये ।

➠ कालांतर में तुलसीदेवी वृन्दा नाम से दानवराज शंखचूड़ की पत्नी हुईं । शंखचूड़ भगवान शंकर द्वारा मारा गया और उसके बाद नारायण-प्रिया तुलसी कलांश से वृक्षभाव को प्राप्त हो गयीं ।

Ganesh Ji Pratham Pujya Kaise Bane Story Hindi : Chaturthi 2020

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Do you Know Why is Lord Ganesha worshipped first? Ganesh ji ki puja sabse pehle kyu ki Jati hai Katha/ Kahani, Aiye Jante hai :

❀ गुरु-सन्देश – जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं । अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा । 

➠ एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा ?

➠ निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा।

➠ कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने। गणपति जी चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया।

➠ फिर गणपति जी आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे।

➠ एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।

➠ शिव-पार्वती ने पूछाः “वत्स! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की ?” गणपति जीः “सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमय पिता… सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है। पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है। पिता देवस्वरूप हैं। अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर ली हैं।”

तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये।

✯ शिव-पुराण में आता हैः

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।
अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत।
तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।।
पुत्रस्य य महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम्।
अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः।।
इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम्।
पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम्।।

➠ जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता-पिता को घर पर छोड़ कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ हैं।

➠ अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं परंतु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुंदर तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं।

मातृदेवो भव पितृदेवो भव

प्रह्लाद को कष्ट देने वाले दैत्य हिरण्यकशिपु को भी प्रह्लाद कहता हैः “पिताश्री !” और तुम्हारे लिए तनतोड़ मेहनत करके तुम्हारा पालन-पोषण करने वाले पिता को नौकर बताने में तुम्हें शर्म नहीं आती !

अभी कुछ वर्ष पहले की बात है।
इलाहाबाद में रहकर एक किसान का बेटा वकालत की पढ़ाई कर रहा था। बेटे को शुद्ध घी, चीज़-वस्तु मिले, बेटा स्वस्थ रहे इसलिए पिता घी, गुड़, दाल-चावल आदि सीधा-सामान घर से दे जाते थे।

एक बार बेटा अपने दोस्तों के साथ कुर्सी पर बैठकर चाय-ब्रेड का नाश्ता कर रहा था। इतने में वह किसान पहुँचा। धोती फटी हुई, चमड़े के जूते, हाथ में डंडा, कमर झुकी हुई… आकर उसने गठरी उतारी। बेटे को हुआ, ‘बूढ़ा आ गया है, कहीं मेरी इज्जत न चली जाय !’ 

इतने में उसके मित्रों ने पूछाः “यह बूढ़ा कौन है ?”

लड़काः “He is my servant.” (यह तो मेरा नौकर है।)

लड़के ने धीरे-से कहा किंतु पिता ने सुन लिया। वृद्ध किसान ने कहाः “भाई ! मैं नौकर तो जरूर हूँ लेकिन इसका नौकर नहीं हूँ, इसकी माँ का नौकर हूँ। इसीलिए यह सामान उठाकर लाया हूँ।”

यह अंग्रेजी पढ़ाई का फल है कि अपने पिता को मित्रों के सामने ‘पिता’ कहने में शर्म आ रही है, संकोच हो रहा है ! ऐसी अंग्रजी पढ़ाई और आडम्बर की ऐसी-की-तैसी कर दो, जो तुम्हें तुम्हारी संस्कृति से दूर ले जाय !

भारत को आजाद हुए 62 साल हो गये फिर भी अंग्रेजी की गुलामी दिल-दिमाग से दूर नहीं हुई !

पिता तो आखिर पिता ही होता है चाहे किसी भी हालत में हो। प्रह्लाद को कष्ट देने वाले दैत्य हिरण्यकशिपु को भी प्रह्लाद कहता हैः “पिताश्री !” और तुम्हारे लिए तनतोड़ मेहनत करके तुम्हारा पालन-पोषण करने वाले पिता को नौकर बताने में तुम्हें शर्म नहीं आती !

भारतीय संस्कृति में तो माता-पिता को देव कहा गया हैः मातृदेवो भव, पितृदेवो भव…. उसी दिव्य संस्कृति में जन्म लेकर माता-पिता का आदर करना तो दूर रहा, उनका तिरस्कार करना, वह भी विदेशी भोगवादी सभ्यता के चंगुल में फँसकर ! यह कहाँ तक उचित है ?

भगवान गणेश माता-पिता की परिक्रमा करके ही प्रथम पूज्य हो गये। आज भी प्रत्येक धार्मिक विधि-विधान में श्रीगणेश जी का प्रथम पूजन होता है। श्रवण कुमार ने माता-पिता की सेवा में अपने कष्टों की जरा भी परवाह न की और अंत में सेवा करते हुए प्राण त्याग दिये। देवव्रत भीष्म ने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत पाला और विश्वप्रसिद्ध हो गये। महापुरुषों की पावन भूमि भारत में तुम्हारा भी जन्म हुआ है। स्वयं के सुखों का बलिदान देकर संतान हेतु अगणित कष्ट उठाने वाले माता-पिता पूजने योग्य हैं। उनकी सेवा करके अपने भाग्य को बनाओ। किन्हीं संत ने ठीक ही कहा हैः

जिन मात-पिता की सेवा की,
तिन तीरथ जाप कियो न कियो।

‘जो माता-पिता की सेवा करते हैं, उनके लिये किसी तीर्थयात्रा की आवश्यकता नहीं है।’

माता पिता व गुरुजनों की सेवा करने वाला और उनका आदर करने वाला स्वयं चिरआदरणीय बन जाता है। मैंने माता-पिता-गुरु की सेवा की, मुझे कितना सारा लाभ हुआ है वाणी में वर्णन नहीं कर सकता। नारायण….. नारायण…..

जो बच्चे अपने माता-पिता का आदर-सम्मान नहीं करते, वे जीवन में अपने लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं कर सकते। इसके विपरीत जो बच्चे अपने माता-पिता का आदर करते हैं, वे ही जीवन में महान बनते हैं और अपने माता-पिता व देश का नाम रोशन करते हैं। लेकिन जो माता-पिता अथवा मित्र ईश्वर के रास्ते जाने से रोकते हैं, उनकी वह बात मानना कोई जरूरी नहीं।

जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम,
जद्यपि परम स्नेही।।

 

GanpatiJi Ka Swaroop Deta Hai Anokhi Prerna: Ganesh Chaturthi 2020

➠ जो इन्द्रिय-गणों का, मन-बुद्धि गणों का स्वामी है, उस अंतर्यामी विभु का ही वाचक है ‘गणेश’ शब्द ।

‘गणानां पतिः इति गणपतिः ।’

➠ उस निराकार परब्रह्म को समझाने के लिए ऋषियों ने और भगवान ने क्या लीला की है !
कथा आती है, शिवजी कहीं गये थे । पार्वतीजी ने अपने योगबल से एक बालक पैदा कर उसे चौकीदारी करने रखा ।

➠ शिवजी जब प्रवेश कर रहे थे तो वह बालक रास्ता रोककर खड़ा हो गया और शिवजी से कहा : ‘‘आप अंदर नहीं जा सकते ।“
शिवजी ने त्रिशूल से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया । पार्वतीजी ने सारी घटना बतायी । शिवजी बोले : ‘अच्छा-अच्छा, यह तुम्हारा मानसपुत्र है । चलो, तुम्हारा मानसपुत्र है तो हम भी इसमें अपने मानसिक बल की लीला दिखा देते हैं ।“

➠ शिवजी ने अपने गण को कहा : ‘‘जाओ, जो भी प्राणी मिले उसका ,सिर ले आओ ।“ गण हाथी का सिर ले आये और शिवजी ने उसे बालक के धड़ पर लगा दिया ।

➠ सर्जरी की कितनी ऊँची घटना है ! बोले, ‘मेरी नाक सर्जरी से बदल दी, मेरा फलाना बदल दिया…’ अरे, सिर बदल दिया तुम्हारे भोले बाबा ने ! कैसी सर्जरी है और फिर इस सर्जरी से लोगों को कितना समझने को मिला !

➠ समाज को अनोखी प्रेरणा मिली :

● गणेशजी के कान बड़े सूपे जैसे हैं । वे यह प्रेरणा देते हैं कि जो कुटुम्ब का बड़ा हो, समाज का बड़ा हो उसमें बड़ी खबरदादरी होनी चाहिए । सूपे में अन्न-धान में से कंकड़-पत्थर निकल जाते हैं । असार निकल जाता है, सार रह जाता है । ऐसे ही सुनो लेकिन सार-सार ले लो । जो सुनो वह सब सच्चा न मानो, सब झूठा न मानो, सारसार लो । यह गणेशजी के बाह्य विग्रह से प्रेरणा मिलती है ।

● गणेशजी की सूँड लम्बी है अर्थात् वे दूर की वस्तु की भी गंध ले लेते हैं । ऐसे ही कुटुम्ब का जो अगुआ है, उसको कौन, कहाँ, क्या कर रहा है या क्या होनेवाला है इसकी गंध आनी चाहिए ।

● हाथी के शरीर की अपेक्षा उसकी आँखें बहुत छोटी हैं लेकिन सूई को भी उठा लेता है हाथी । ऐसे ही समाज का, कुटुम्ब का अगुआ सूक्ष्म दृष्टिवाला होना चाहिए । किसको अभी कहने से क्या होगा ? थोड़ी देर के बाद कहने से क्या होगा ? तोल-मोल के बोले, तोल-मोल के निर्णय करे ।

● भगवान गणेशजी की सवारी क्या है ? चूहा ! इतने बड़े गणपति चूहे पर कैसे जाते होंगे ? यह प्रतीक है समझाने के लिए कि छोटे-से-छोटे आदमी को भी अपने सेवा में रखो । बड़ा आदमी तो खबर आदि नहीं लायेगा लेकिन चूहा किसीके भी घर में घुस जायेगा । ऐसे छोटे-से-छोटे आदमी से भी कोई-न-कोई सेवा लेकर आप दूर तक की जानकारी रखो और अपना संदेश, अपना सिद्धांत दूर तक पहुँचाओ । ऐसा नहीं की चूहे पर गणपति बैठते हैं और घर-घर जाते हैं । यह संकेत है आध्यात्मिक ज्ञान के जगत में प्रवेश पाने का ।

~ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013

Ganesh Chaturthi Ko Kyu Nahi Dekhna Chaiye Chand [Moon] Ko

Why Moon is Inauspicious On Ganesh Chaturthi 2020 Story in Hindi. Kalank Chaturthi, Ganesh Chauth Chandra Darshan Nhi Karna (Chand Ko Nahi Dekhna):

गणेश चतुर्थी को ‘कलंकी चौथ’ भी कहते हैं। इस चतुर्थी का चाँद देखना वर्जित है।

➠ यदि भूल से भी चौथ का चंद्रमा दिख जाए तो ‘श्रीमद् भागवत्’ के 10वें स्कन्ध के 56-57वें अध्याय में दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी’ की कथा का आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिए।

✯ स्यमंतक मणि की कथा

➠ सत्राजित् भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था। उसकी भक्ति से खुश होकर सूर्यदेव उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान ने प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे स्यमन्तक मणि दी थी ।

➠ सत्राजित् उस मणि को गले में धारण ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। वह मणि प्रतिदिन आठ भार (बीस तोले) सोना दिया करती थी। और जहाँ पर ये रहती थी वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीड़ा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक रोग तथा मायावियों का उपद्रव आदि कोई भी अशुभ घटना नहीं होती थी ।

➠ एक बार सत्राजित ने इस मणि को अपने गले में डाला और द्वारका में आया। अत्यन्त तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान न सके । इस मणि का बहुत तेज प्रकाश था सभी ने सोचा कि सूर्य देव आ गए हैं। उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हें इस बात की सूचना दी। उस समय भगवान श्रीकृष्ण चौसर खेल रहे थे । लोगों ने कहा : “द्वारिकाधीश जी, साक्षात सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं ।”

➠ भगवान कृष्ण यह सुनकर हंसने लगे और कहते हैं- ‘अरे, ये सूर्यदेव नहीं हैं। यह तो सत्राजित् है, जो मणि के कारण इतना चमक रहा है ।’ इसके बाद सत्राजित् अपने समृद्ध घर में चला आया।

➠ एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा—‘सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो। क्योंकि ऐसी मणि तो जगत के कल्याण में बहुत लाभदायक सिद्ध होगी।’

➠ सत्राजित ने सोचा कि इस मणि को लेने की इच्छा तो खुद श्री कृष्ण की है और नाम उग्रसेन जी का ले रहे हैं।

➠ एक बार सत्राजित के भाई प्रसेन ने उस मणि को अपने गले में पहना और घोड़े पर बैठकर जंगल में शिकार करने के लिए चला गया। वहां पर एक शेर ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया। वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि ऋक्षराज जाम्बवान् ने उसे मार डाला । उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर अपनी बेटी जाम्बवती को खेलने के लिये दे दी।

➠ इधर जब प्रसेन घर नहीं लौटा तो उसके भाई सत्राजित् ने उसकी खोज करवाई। पता चला कि प्रसेन की घोड़े सहित मौत हो गई है। ये कहने लगा – ‘बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो; क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।’ सत्राजित् की यह बात सुनकर लोग आपस में काना-फूसी करने लगे ।

✯ कृष्ण पर झूठा कलंक लगना…..

➠ भगवान श्री कृष्ण को जब इस बात का पता चला तो बोले हमने भादो सुदी चौथ का चन्द्रमा देखा तो हम पर झूठा कलंक लग गया। ऐसा कहते हैं कि एक बार, इस दिन भगवान श्री कृष्ण को गाय दुहते समय गाय के मूत्र में चांद दिख गया था। परिणामस्वरूप उन पर स्यमंतक मणि की चोरी का झूठा कलंक लगा।

➠ भगवान ने सोचा कि जब मुझ पर ये झूठा कलंक लग ही गया है तो इस कलंक को धो डालते हैं।

➠ अब भगवान श्रीकृष्ण नगर के कुछ सभ्य पुरुषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूँढने के लिये वन में गये । वहां लोगों को और कृष्ण जी को पता चला कि एक सिंह (शेर) ने प्रसेन और उसके घोड़े को मारा है। जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते हुए आगे बढे, तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर एक रीछ ने सिंह को भी मार डाला है ।

➠ भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों को बाहर ही बिठा दिया और खुद अँधेरी ऋक्षराज की गुफा में प्रवेश किया। भगवान ने वहाँ जाकर देखा की इस मणि को खिलौना बनाकर खेला जा रहा है। तब भगवान ने जाम्बवती से वह मणि लेनी चाही। उसी समय जांबवती ने चिल्लाना शुरू कर दिया। उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली ऋक्षराज जाम्बवान् क्रोधित होकर वहाँ दौड़ आये । वे बड़े क्रोधित थे, उन्हें पता नहीं चला कि श्री कृष्ण भगवान हैं और उनके साथ युद्ध करना शुरू कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवान् आपस में घमासान युद्ध करने लगे। पहले तो उन्होंने आपस में अस्त्रों-शस्त्रों का प्रहार किया, फिर शिलाओं का, तत्पश्चात् वे वृक्ष उखाड़कर एक-दूसरे पर फेंकने लगे। अन्त में उनमें बाहुयुद्ध होने लगा ।

➠ व्रज-प्रहार के समान कठोर घूँसों से आपस में वे अट्ठाईस दिन तक बिना विश्राम किये रात-दिन लड़ते रहे । अन्त में भगवान श्रीकृष्ण के घूँसों की चोट से जाम्बान् के शरीर की एक-एक गाँठ टूट-फूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीने से लथपथ हो गया। भगवान ने जामवंत को इतना मारा कि मार-मार के इनकी नस-नस ढीली कर दी।

➠ अब इन्होंने चकित होकर कहा- ‘प्रभो ! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक, पुराणपुरुष भगवान विष्णु हैं। आप ही मेरे राम हैं। मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रों में तनिक-सा क्रोध का भाव लेकर तिरछी दृष्टि से समुद्र की ओर देखा था। उस समय समुद्र के अन्दर रहने वाले बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्र ने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उस पर सेतु बाँधकर सुन्दर यश की स्थापना की तथा लंका का विध्वंश किया। आपके बाणों से कट-कटकर राक्षसों के सिर पृथ्वी पर लोट रहे थे (अवश्य ही आप मेरे वे ही ‘रामजी’ श्रीकृष्ण के रूप में आये हैं)’ ।

➠ जब ऋक्षराज जाम्बवान् ने भगवान को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ने अपने करकमल (हाथों) को उनके शरीर पर फेर दिया और फिर जाम्बवान् जी से कहा— ‘ऋक्षराज! हम मणि के लिये ही तुम्हारी इस गुफा में आये हैं। इस मणि के द्वारा मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूँ’ ।

कृष्ण और जाम्बवती का विवाह

➠ फिर जांबवान जी कहते हैं – “प्रभु, सारी बात ठीक है पर एक बात बताइये, आप मणि तो बिना युद्ध किये भी ले सकते थे। आप मुझे पहले ही बता देते कि आप ही श्री राम हैं।”

➠ ये बात सुनकर कृष्ण जी मुस्कराये और कहा- जामवंत, तुम्हे याद होगा कि जब मेरा (राम) और रावण का युद्ध हो रहा था। कितना भयंकर युद्ध था। जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। लेकिन तुम उस समय सोच रहे थे कि “ये भी कोई युद्ध है। अगर राम की जगह मैं होता तो रावण को बताता।

बस तुम्हारी इसी बात को पूर्ण करने के लिए आज मैंने तुमसे युद्ध किया।”

➠ जब जामवंत जी ने ये सुना तो उनकी आँखों से आंसू आ गए। और कहते हैं “प्रभु, आप तो अंतर्यामी हो। मुझ पर एक कृपा करो मेरी एक बेटी है जाम्बवती। तुम इसके साथ विवाह कर लो।” ऐसा कहकर जाम्बवान् ने बड़े आनन्द से अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया ।

➠ भगवान श्रीकृष्ण जिन लोगों को गुफा के बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिन तक उनकी प्रतीक्षा की। परन्तु जब उन्होंने देखा कि अब तक वे गुफा से नहीं निकले, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर द्वारका को लौट आये । वहाँ जब माता देवकी, रुक्मिणी, वसुदेवजी तथा अन्य सम्बन्धियों और कुटुम्बियों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफा में से नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ । सभी द्वारकावासी अत्यन्त दुःखित होकर सत्राजित् को भला-बुरा कहने लगे और भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिये महामाया दुर्गा देवी की शरण में गये, उनकी उपासना करने लगे।

उनकी उपासना से दुर्गा देवी प्रसन्न हुईं और उन्होंने आशीर्वाद दिया। उसी समय उनके बीच में मणि और नववधु जाम्बवती के साथ श्रीकृष्ण सबको प्रसन्न करते हुए प्रकट हो गये । सभी द्वारकावासी भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी के साथ और गले में मणि देखकर बहुत खुश हुए, मानो कोई मरकर लौट आया हो ।

➠ फिर भगवान ने सत्राजित् को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित् को सौंप दी । सत्राजित् बहुत लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, लेकिन उसका मुँह नीचे की ओर लटक गया। अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चाताप हो रहा था।

➠ किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा । उसके मन में आँखों के सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। अब वह यही सोचता रहता कि ‘मैं अपने अपराध का मार्जन कैसे करूँ ? मुझ पर भगवान श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्न हों ?? मैंने भगवान पर शक करके ठीक नहीं किया।’

➠ ‘क्यों ना अब मैं अपनी कन्या सत्यभामा और वह स्यमन्तकमणि दोनों ही श्रीकृष्ण को दे दूँ। यह उपाय बहुत अच्छा है।’ ऐसा मन में विचार करके सत्राजित् ने अपनी कन्या तथा स्यमन्तक मणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्ण को अर्पण कर दीं । सत्यभामा शील-स्वभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सद्गुणों से सम्पन्न थीं। बहुत से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिलें और उन लोगों ने उन्हें माँगा भी था। परन्तु अब भगवान श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया ।

➠ भगवान श्रीकृष्ण ने सत्राजित् से कहा—‘हमको स्यमन्तकमणि नहीं चाहिए क्योंकि इसके कारण बहुत बवाल हुआ है। आप सूर्य भगवान के भक्त हैं, इसीलिये वह आपके ही पास रहे। आप केवल इतना कर दीजिये कि इस मणि से जो सोना निकलता है आप मुझे वो दे दीजिये।’ सत्राजित को ये बात अच्छी लगी। इस प्रकार भगवन की ससुराल से बीस तोला सोना प्रतिदिन आता है। जिसे भगवान राज-काज और धर्म के काम में लगाते थे।

➢ यदि अनिच्छा से चन्द्रदर्शन हो जाए तो निम्नलिखित मंत्र से पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए।

मंत्र इस प्रकार हैः

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।

‘सुन्दर, सलोने कुमार ! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा अधिकार है।’ (ब्रह्मवैवर्त पुराणः अध्याय 78)

➠ चौथ के चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है। इस मंत्र-प्रयोग अथवा उपर्युक्त पाठ से उसका प्रभाव कम हो जाता है।