(गणेश चतुर्थी : 22 अगस्त)
एक दिन परशुरामजी अपने गुरुदेव भगवान शंकर के दर्शन की इच्छा से कैलाश पहुँचे । उस समय गणेशजी द्वार पर पहरा दे रहे थे ।

परशुरामजी ने उनसे कहा : “मैं अपने गुरु भक्तवत्सल भगवान शिवजी के दर्शन करना चाहता हूँ ।”

गणेशजी : “इस समय भगवान शिव तथा माता पार्वती अंतःपुर में हैं, अतः आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए ।”

“मैं तो जाऊँगा ही ।”

परशुरामजी के हठ करने पर भी विघ्न-विनायक ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया ।

21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन करनेवाले परशुरामजी कुपित हो गये और गणेशजी के साथ मल्लयुद्ध करने लगे । परशुरामजी द्वारा धक्का दिये जाने पर गणेशजी गिर पड़े ।

गणपतिजी को लगा कि “परशुराम के अहंकार को थोड़ा नियंत्रित करना अनिवार्य है ।

“ उन्होंने विराट रूप धारण किया और परशुरामजी को अपनी सूँड़ में लपेट लिया और घुमाने लगे ।

परशुरामजी निरुपाय हो गये ।
उन्होंने अपने गुरुदेव भगवान शिव के कवच और स्तोत्र का स्मरण किया और अपना परशु (फरसा) गणेशजी के बायें दाँत पर दे मारा ।

अपने पिता के अमोघ अस्त्र का सम्मान करने के लिए गणेशजी ने उसका प्रतिकार नहीं किया । शिवशक्ति के प्रभाव से वह तेजस्वी परशु गणेशजी के बायें दाँत को काटकर पुनः परशुरामजी के हाथ में आ गया ।

दाँत टूटते समय भयानक शब्द हुआ और गणेशजी के मुँह से खून का फव्वारा छूट पड़ा । यह देखकर यक्ष, गंधर्व, किन्नर, देवगण – सब कंपायमान हो उठे ।

पृथ्वी पर हाहाकार मच गया । किंतु गणेशजी शांत-सौम्यभाव से खड़े रहे ।

कार्तिकेय ने माता पार्वती को यह समाचार दिया । माता पार्वती अपने पुत्र गणेश की हालत देखकर कोपायमान हो उठीं और खबर भगवान शिवजी तक पहुँच गयी । शिवजी वहाँ पधारे ।

गणेशजी की दशा देखकर दयामय माँ का हृदय अपने हाथ में न रहा ।

ऐसी कौन-सी माँ है जो अपने पुत्र के रक्त के फव्वारे देखकर चुप रहती ? माता पार्वती ने कुपित होकर कहा : “परशुराम ! जितेन्द्रिय पुरुषों में श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे जैसे लाखों जंतुओं को मार डालने की शक्ति रखता है किंतु वह मक्खी पर भी हाथ नहीं उठाता ।

इस विश्व में इसके जैसा जितेन्द्रिय पुरुष दूसरा कौन है ? तभी तो इसकी अग्रपूजा होती है ।

परशुराम ! तुझे इतना अहंकार हो गया है कि ऐसे मेरे क्षमाशील, शांत और संयमी पुत्र पर तूने शिवस्तोत्र और कवच की शक्ति से अभिभूत किये अपने परशु का दुरुपयोग किया ?”


माँ पार्वती को कोपायमान हुईं देखकर परशुराम ने मन-ही-मन अपने गुरु भगवान शिवजी को प्रणाम किया और अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया ।

उसी समय भगवान श्रीकृष्ण एक ब्राह्मण बालक का रूप लेकर पधारे और बोले :
“मेरे भक्तों का कभी अमंगल नहीं होता । किंतु गुरु के रुष्ट होने पर मैं विवश हो जाता हूँ । गुरु की अवहेलना बलवती होती है ।

विद्या और मंत्र प्रदान करनेवाले गुरु इष्टदेव से सौ गुना श्रेष्ठ हैं । गुरु से बढ़कर कोई देवता नहीं है । पार्वती से बढ़कर कोई पतिव्रता नहीं है तथा गणेश से उत्तम कोई जितेन्द्रिय नहीं है ।

न पार्वतीपरा साध्वी न गणेशात्परो वशी ।”


फिर ब्राह्मण वेशधारी भगवान श्रीकृष्ण ने माता पार्वती से कहा : “आप जगज्जननी हो ।

आपके लिए गणेश और कार्तिकेय के समान ही परशुराम भी पुत्रतुल्य है । अतएव जो उचित समझें वह कीजिये ।

बालकों का यह विवाद तो दैव-दोष से ही घटित हुआ है । तुम्हारे इस प्रिय पुत्र का ‘एकदंत’ नाम वेदों में प्रसिद्ध है । पुराणों में भी तुम्हारे पुत्र के 8 नाम बताये गये हैं ।


गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननायकम् ।
लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम् ।।
गणेश, एकदंत, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज ।”
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खंड : 44.85)

पुनः श्रीकृष्ण ने परशुराम से कहा : “परशुराम ! तुमने क्रोधवश पार्वतीनंदन गणेश का दाँत तोड़कर अनुचित किया है ।

इस कारण निश्चय ही तुम अपराधी हो । ये सर्वशक्तिस्वरूपा पार्वती प्रकृति से परे और निर्गुण हैं ।

तुम स्तुति करके इन्हें प्रसन्न करो ।“
परशुराम ने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम करके माता पार्वती का स्तवन किया :

रक्ष रक्ष जगन्मातरमपराधं क्षमस्व मे ।
शिशूनामपराधेन कुतो माता हि कुप्यति ।।

‘जगज्जननी ! रक्षा करो, रक्षा करो । मेरे अपराध को क्षमा कर दो ।

भला, कहीं बच्चे के अपराध करने से माता कुपित होती है ?’
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खंड : 45.57)

परशुराम माता पार्वती के चरणों में प्रणाम करके विलाप करने लगे । परशुराम की करुण प्रार्थना से माता का हृदय द्रवित हो गया ।

उन्होंने परशुराम को अभयदान देते हुए प्रीतिपूर्वक कहा :
“बेटा ! अब तुम शांत हो जाओ । तुम अमर हो जाओ । प्रभु आशुतोष के अनुग्रह से तुम्हारी सर्वत्र विजय हो । भगवान श्रीहरि तुम पर सदा प्रसन्न रहें । गुरुदेव शिव में तुम्हारी भक्ति सुदृढ़ रहे ।”

फिर परशुरामजी ने भगवान गणेश का पूजन-अर्चन किया और अपने गुरुदेव भगवान शिव तथा माता पार्वती के चरणों में प्रणाम करके तपस्या के लिए प्रस्थान किया ।

अपना अहित करनेवाले का भी अहित न किया गजानन ने ! कैसी कर्तव्यदक्षता एवं कैसी दयादृष्टि-आत्मदृष्टि है गणेशजी में !

~ बाल संस्कार केन्द्र पाठ्यक्रम साहित्य