आध्यात्मिक दृष्टि से रक्षाबंधन – Raksha Bandhan 2020

adhyatmik drishti se raksha bandhan

➠ लौकिक रक्षाबंधन तो हर कोई मनाता है किन्तु इस दिन शिष्य भी अपने सद्गुरु को मन-ही-मन राखी बाँधकर रक्षा की प्रार्थना करता है । पूज्य बापूजी कहते हैं : “राखी बँधवाना तो सरल काम है लेकिन राखी का बदला चुकाना बड़ा कठिन है ।”

➠ लौकिक भाई को राखी बाँध दोगे, 100-200 रुपये दे देगा, उसकी छुट्टी, तुम्हारी छुट्टी लेकन यहाँ जल्दी से छुट्टी नहीं होती ।

➠ राखी बाँधने का मतलब है कि हमारी रक्षा करना और तुम्हारी रक्षा तो बाबा मैं शरीर से तो हमेशा न कर पाऊँगा । शरीर तुम्हारा कहीं होगा और मैं कहीं होऊँगा और तुम्हारी शारीरिक रक्षा के लिए तो तुम्हारे पास बहुत लोग हैं । सिर्फ शारीरिक रक्षा नहीं लेकिन मैं चाहता हूँ तुम्हारी आध्यात्मिकता की रक्षा हो, आध्यात्मिकता का ह्रास न हो ।

➠ लक्ष्मीजी कुछ दिन बलि के घर रहीं और बलि से अपनी बात मनवा ली । ऐसे हम भी तुम्हारी बातें मानते हैं ताकि तुम भी कभी हमारी बातें मानो ।

➠ ऐसी चेष्टा न करो कि तुम्हारा देह-अभिमान बढे । ऐसा आहार न करो कि तुम्हारी भक्ति पर चोट लगे । ऐसा व्यवहार न करो कि तुम्हारा समय व्यर्थ की बातों में जाए । ऐसा न सोचो कि तुम्हारी शक्ति का ह्रास हो। मैं ऐसा चाहता हूँ कि मेरा शरीर न रहे, मैं तुम्हारे पास न होऊँ तब भी तुम्हारी सुरक्षा होती रहे ।

➠ ऐसा तुम्हारे पास चरित्र का बल, तपस्या, साधना, पवित्रता का बल, ज्ञान का भंडार होना चाहिए कि दुःख के बादल गरजने लग जायें और बरसने भी लग जायें फिर भी तुम्हारा चित्त चलित न हो ।

रक्षा से रक्षा : Raksha Bandhan Story 2020 in Hindi

Raksha bandhan story

➠ ग्रीक सम्राट सिकंदर जब विजय हासिल करते-करते पुरु के राज्य में पहुँचा पुरु, उसकी राज्य व्यवस्था व सेना के मनोबल के बारे में अपने गुप्तचरों से सुना तो सिर खुजलाने लगा ।

➠ “पुरु का राज्य है तो छोटा-सा लेकिन राजासाहब ! इससे लोहा लेना मौत के मुंह में जाना है ।” किसी गुप्तचर ने कहा ।

➠ सिकंदर आगे-पीछे का तोल-मोल करता था । जानकार गुप्तचरों में से एक ने कहा :

➠ “राजासाहब ! हिन्दुओं में एक ऐसा त्यौहार है कि उस दिन कोई भी औरत किसी मर्द को राखी बाँध दे तो वह मर्द उसका भाई हो जाता है । इससे उसके पति की रक्षा आराम से हो जाती है ।” सिकंदर की पत्नी यह सुन रही थी ।

➠ पुरु ने घोषणा करवा दी कि रक्षाबंधन के दिन नगर की कन्या बिना रोक-टोक के राजमहल में आ सकती है एवं अपने राजा को राखी बाँध सकती है और शुभकामनाओं का तोहफा उन्हें ईश्वर दिलायेगा ।

➠ पुरु ‘उन्हें तोहफा दिया जायेगा… मैं दूँगा…’ ऐसा नहीं कह रहा है । भारतीय संस्कृति कितनी महान है ! कर्म में ईश्वर को रख दिया, अहंकार को हटा दिया ।

➠ आज तक तो राजमहल में साधारण कन्या, साधारण महिला नहीं जा सकती थी किंतु अब तो अनुमति मिल चुकी थी । रक्षाबंधन के दिन महिलाओं की भीड़ में एक विदेशी महिला भी राजमहल में प्रवेश कर गयी । सैनिक चौकन्ने तो हुए किंतु करें क्या ? आज किसी नारी को रोकना नहीं है ऐसा उन्हें आदेश मिला था ।

➠ वह विदेशी नारी पहुँच गयी राजा के पास और धर्मवीर पुरुष के दायें हाथ पर बाँध दिया धागा । बुद्धिमान पुरु ने पहचान लिया कि यह कौन है और कहा : “आप कौन हैं मैं जान गया हूँ । आप सम्राट सिकंदर की पत्नी हैं । क्या चाहती हैं आप ?”

➠ सिकंदर की पत्नी : “युद्ध होगा और उसका परिणाम क्या आएगा, पता नहीं । आपका राज्य और योद्धा भी कम नहीं हैं । मैं राखी लेकर आयी हूँ । यहाँ की संस्कृति के अनुसार नारी किसीको भाई मानकर राखी बांधती है तो वह उसकी मनोवांछा पूरी करता है । मेरे सुहाग की आप रक्षा करना ।”

➠ सिकंदर की पत्नी एक धागा बाँधकर कितना सारा मांग रही है और यह भारत का वीर देने में कितना उदार है !

➠ पुरु ने कहा : “युद्ध में किसकी जीत होगी यह तो मैं नहीं कह सकता । लेकिन अगर मेरी जीत होती है तो तुम्हारे पति की सुरक्षा निश्चित है ।”

➠ फिर क्या हुआ ? पुरु व उसके बलवान योद्धा जान हथेली पर लिये आगे बढ़े जा रहे थे । पुरु के हाथी ने सिकंदर के रथ को ऐसी टक्कर मारी कि रथ टूट गया और सिकंदर नीचे गिर पड़ा ।

➠ पुरु नीचे उतरा, म्यान में से तलवार खींची । एक झटका ही तो मारना था लेकिन भारत का यह रक्षाबंधन महोत्सव…! पुरु हाथ में तलवार लिये वहीं खड़ा रहा ।

➠ सिकंदर ने करवट लेकर देखा कि ‘मुझे यह मार सकता था किंतु अभी तक खड़ा है ।’ इतने में सिकंदर के सैनिक आये और पुरु को बंदी बना लिया ।

➠ युद्ध का शिविर लगा था । वहीं सिकंदर के सामने पुरू को बंदी बनाकर लाया गया । सिकंदर ने राजवी अन्दाज में पुछा : “मैं आपके साथ क्या सलुक करुँ ?”

➠ पुरु : “एक सम्राट दूसरे सम्राट के साथ जैसा इज्जत भरा व्यवहार करता है, वैसा ही तुम्हें मेरे साथ करना चाहिए ।”

➠ क्या मनोबल है पुरु का ! शत्रु ने बंदी बनाया था , अपनी लाचारी के कारण बंदी नहीं बना था । सिकंदर का मन बदल गया । वह उठ खड़ा हुआ और बोला : “आइये सम्राट !” उसने पुरु को अपने पास बिठाया ।

➠ पुरु ने धर्म की रक्षा की थी, अतः धर्म ने उनकी रक्षा की ।

धर्मो रक्षति रक्षितः ।

➠ सिकंदर ने धीरे-से पुरु से पूछा : “मैं रथ से गिर पड़ा था और आपके हाथ में तलवार थी । मेरी गर्दन उड़ाना दो सेकंड का काम था और कई मिनट आपके पास थे । लेकिन आप तलवार लिये गंभीरता से खड़े थे और फिर बंदी बनाये गये । इतने समय तक आप किस विचार में थे ? कैसे धोखा खाया आपने ?”

पुरु : “मैंने धोखा नहीं खाया ।”

➠ सिकंदर की पत्नी से रहा नहीं गया । उसने कहा: “मैंने इन्हें राखी बाँधी थी । इन्होंने मेरे सुहाग की रक्षा के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी दी है ।”

कैसी है भारतीय संस्कृति ! केवल एक धागे ने सिकंदर की रक्षा की !

➠ वैसे तो रक्षाबंधन भाई-बहन का त्यौहार है । भाई-बहन के बीच प्रेमतंतु को निभाने का वचन देने का दिन है, अपने विकारों पर प्रतिबंध लगाने का दिन है व बहन के लिए अपने भाई के द्वारा संरक्षण पाने का दिन है । किंतु व्यापक अर्थ में आज का दिन शुभ संकल्प करने का दिन है, परमात्मा के सान्निध्य का अनुभव करने का दिन है, ऋषियों को प्रणाम करने का दिन है । भाई तो हमारी लौकिक संपत्ति का रक्षण करते हैं किंतु संतजन हमारे आध्यात्मिक खजाने का संरक्षण करते हैं ।

➠ उत्तम साधक बाह्य चमत्कारों से प्रभावित होकर नहीं, अपितु अपने दिल की शांति और आनंद के अनुभव से ही गुरुओं को मानते हैं । साधक को जो आध्यात्मिक संस्कारों का खजाना मिला है वह कहीं बिखर न जाए, काम-क्रोध-लोभ आदि लुटेरे कहीं उसे लूट न लें इसलिए साधक गुरुओं द्वारा उसकी रक्षा चाहता है । उस रक्षा की याद ताजा करने का दिन है रक्षाबंधन-पर्व ।

➠ ऋषिपूजन का पर्व है रक्षाबंधन । यह यज्ञोपवित बदलने का विशेष दिवस है । यह स्व-अध्ययन व आत्मिक शुद्धि के लिए अनुष्ठान करने तथा उसे संपन्न करने का भी दिवस है । रक्षाबंधन का यह पर्व आपकी आत्मा की जागृति का पैगाम देता है ।

➢ ऋषि प्रसाद, अगस्त 2004

युवाधन की सुरक्षा | सुरक्षा का सूत्र Raksha Bandhan Special

yuvadhan ki suraksha ka sutra rakshabandhan

Yuvadhan Ki Suraksha | Rakhi ka Sutra | Raksha Bandhan Special on Brahmacharya :

➠ कैसी दिव्य है भारतीय संस्कृति ! पड़ोस के भाई या बहन के प्रति मन में थोड़ा-सा विकारी भाव उत्पन्न हुआ तो यह ऋषि-परंपरा से चला आया, ऋषियों की प्रसादी ले आया, रक्षा के संकल्प से संपन्न नन्हा-सा, पतला-सा, दिव्य भावना से भरा राखी का धागा बहन ने भाई को बाँधा ( रक्षाबंधन ) और भाव अच्छे हो गये ।

नजरें बदलीं तो नजारे बदले ।
किश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदले ॥

➠ राखी कितनी कीमती है इसका महत्व नहीं है ।  बाँधने वाले का भाव और बंधवानेवाले की दृढ़ता जितनी अधिक है, उतना ही अधिक फल होता है । आप अगर ईमानदारी से चाहें तो इस सुरक्षा के धागे का फायदा ( आज का युवान जो पड़ोस की बहन को बहन कहने की योग्यता खो बैठा है, युवती पड़ोस के भाई को भाई कहने की योग्यता खो बैठी है ), वह योग्यता फिर से विकसित हो सकती है । इससे संयम बढ़ेगा, ब्रह्मचर्य एवं युवाधन की रक्षा होगी ।

➠ आपके अंदर ब्रह्मचर्य, स्वास्थ्य और देश की रक्षा करने का ऋषि-ज्ञान नहीं है तो दूसरे लोग आपको क्या ऊपर उठायेंगे ??

➠ कोई भी आपको ऊपर नहीं उठायेगा; ऊपर तो आपको आपका आत्मा उठायेगा, आपकी संस्कृति उठाएगी – आपका ज्ञान उठायेगा । इसलिए आप अपनी दिव्य संस्कृति की प्रसादी को, ऋषियों के ज्ञान को जीवन में लायें और जीवन को उन्नत बनायें ।

➢ ऋषि प्रसाद, अगस्त 2005

शुभ संकल्पों का पर्व रक्षाबंधन – Raksha Bandhan 2020

shubh sankalpon ka parv rakshabandhan

रक्षाबंधन अर्थात् शुद्ध प्रेम का बंधन… Raksha Bandhan 2021 Special 

➠ भाई का बहन के प्रति व साधक का सद्गुरु के प्रति स्नेह प्रकट करने तथा सद्गुरु का साधक के प्रति सुरक्षा-संकल्प करने का दिवस । यह महोत्सव शुभ संकल्प, व्रत और नियम लेने तथा स्वाध्याय व आत्मिक शुद्धि के लिए अनुष्ठान करने का दिवस है । पर्व-त्यौहारों में किये गये शुभ कर्म विशेष आनंददायी, फलदायी व सुख-शांतिदायी होते हैं । इसलिए आप इस दिन मन-ही-मन अपने इष्टदेव, गुरुदेव को राखी बाँधना और प्रार्थना करना कि ‘हे इष्टदेव ! हे गुरुदेव ! हम सांसारिक विकारों से सुरक्षित रहें, चिंताओ से बचे रहें ।’ बाह्य पूजा की अपेक्षा मानसिक पूजा विशेष लाभदायी होती है ।

➠ रक्षाबंधन के दिन स्नान के समय गौधूलि और गौ-गोबर एवं जौ-तिल आदि का उबटन शरीर पर लगायें शारीरिक शुद्धि हो जायेगी ।

➠ रक्षाबंधन यह सत्प्रेरणा देता है कि आप अपने दाहिने हाथ पर बहन या किसी हितैषी से सुरक्षा के भाव से भरी राखी बँधवा लेना और ऐसी भावना करना कि ‘मेरी विकारों से रक्षा हो, मेरी भक्ति बढे व भगवत्प्राप्ति की सन्मति मुझे प्राप्त हो ।’ साथ ही दृढ संकल्प करें कि ‘मुझे इसी जन्म में समता के सुख को पाना है । मैं जरा-जरा सी बात में दुःखी क्यों होऊँ, मैं तो दुःखहारी श्रीहरि के रस को पाऊँगा ।’

➠  इस दिन बहन भाई के मस्तक पर तिलक-अक्षत लगाते समय संकल्प करे कि ‘मेरे भाई का मन अक्षय ज्ञान में, अक्षय शांति में, अक्षय आनंद में प्रवेश पाये । उसे प्रत्येक कार्य में सफलता मिले । मेरा भाई त्रिलोचन बने अर्थात् दो नेत्रों से जगत को देखकर साधारण जीव की तरह आयुष्य नष्ट न करे, अपितु परमात्म ज्ञान संपन्न तीसरा नेत्र खोले ।’

➠ भाई बहन के शील, स्वास्थ्य और मनोभावों की रक्षा करने का संकल्प करे । राखी कितनी कीमती है इसका महत्त्व नहीं है । बाँधने वाले का भाव और बँधवाने वाले की दृढता जितनी अधिक है उतना ही अधिक फल होता है । आप अगर ईमानदारी से इस सुरक्षा के धागे का फायदा उठाते हैं तो इससे संयम बढेगा, ब्रह्मचर्य एवं युवाधन की रक्षा होगी । 

Bal Sanskar Kendra Me Kaise Manaye Raksha Bandhan – Rakhi 2020

bal sanskar kendra mein kaise manaye raksha bandhan

Bal Sanskar Kendra Me Kaise Manaye Rakhi – Raksha Bandhan 2021 Special :

➠ रक्षाबंधन शुभ संकल्प करने का दिन है । इस पर्व पर शुभ भावों के विकास हेतु सबसे पहले केन्द्र में आये बच्चों से गुरुदेव का मानसिक पूजन करवायें । बच्चों को सुखासन में आँखें बंद करके बिठायें ।

➠ मन-ही-मन इस प्रकार भावना करने को कहें : ‘हम गुरुदेव के श्रीचरण धो रहे हैं…
जल से उनके पादारविंदों को स्नान करा रहे हैं । श्रीचरणों को प्यार करते हुए उनको नहला रहे हैं…
गुरुदेव के तेजोमय ललाट पर शुद्ध चंदन का तिलक लगा रहे हैं…
अक्षत चढ़ा रहे हैं…
अपने हाथों से बनायी हुई गुलाब के सुंदर फूलों की सुहावनी माला अर्पित करके अपना हृदय पवित्र कर रहे हैं…
हाथ जोड़कर सिर झुका के अपना अहंकार उनको समर्पित कर रहे हैं…
गुरुदेव मंद-मंद मुस्कुराते हुए हमें देख रहे हैं…
प्रेम भरी निगाहों से कृपा बरसा रहे हैं…
सभी से संकल्प करायें कि ‘हमारे पूज्य बापूजी स्वस्थ रहें…
हमारे गुरुदेव दीर्घायु हों, चिरंजीवी हों…
ॐ… ॐ… ॐ… ।’
फिर सभी बच्चे पूज्य बापूजी के श्रीविग्रह को राखी बाँधें ।

Sadhako Ne bandhi Prem ki Doori – Raksha Bandhan 2020 Special

Sadhako Ne bandhi Prem ki Doori (Rakhi) – Vedic Raksha Bandhan 2021 Special.

साधकों ने है बाँधी प्रेम की डोरी सदगुरु आयेंगे ।
हम सबकी लगी है प्रीत की डोरी कि सद्गुरु आयेंगे ।।
अपना बनाते दर पे बुलाते गिरते हुओं को उठाते हैं ।
मेरे सद्गुरु हैं इतने महान कि रखते हैं सबका ध्यान ।।

गहरा पावन दुर्लभ सत्संग सबको सहज में सुनाते हैं गुरुवर ।
नाम की दौलत मोक्ष की कुंजि हम सबको दे देते हैं गुरुवर ।
सबसे निराले सबको सँभालें हम सबके रखवाले हैं ।

मेरे सदगुरु हैं….. ।। टेक ।।

धन दौलत और मान-बड़ाई इनका मोह छुड़ाते हैं गुरुवर ।
भीतर का सुख आनंद शांति अंतर घट में दिलाते हैं गुरुवर ।
तन भी है तेरा मन भी है तेरा तुम ही केवल हमारे हो ।

मेरे सदगुरु हैं….. ।। टेक ।।

द्वार पे इनके जो भी आता खाली नहीं लौटाते हैं गुरुवर ।
झोली भरते दुःख भी हरते दाता सभी के कहाते हैं गुरुवर ।
विघ्न विनाशी सब ओर वासी तुम ही जग से न्यारे हो ।

मेरे सदगुरु हैं….. ।। टेक ।।

जब आजाद को बांधी राखी | Chandra Shekhar Azad

Chandra Shekhar Azad

➠ अधिकतर हम राखी के दिन एक छोटी-सी भेंट ले-देकर खुशियाँ मनाते हैं । किंतु रक्षाबंधन तो एक-दूसरे की उन्नति के शुभ संकल्प का दिन है ।

➠ रक्षाबंधन आपसी स्नेह-सौहार्द बढ़ाने व परस्पर मंगलकारी शुभ संकल्प करने का पावन पर्व है । पहले रक्षाबंधन (Raksha Bandhan) बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयुष्य और आरोग्य की वृद्धि के लिए किसीको भी रक्षासूत्र बाँधा और भेजा जाता था ।

➠ श्रीकृष्ण-द्रौपदी, हुमायूँ-कर्मावती की कहानी तो सभी ने सुनी होगी परंतु आजादी के आंदोलन में भी कुछ ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ राखी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है ।

➠ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण के लिए भी इस पर्व का सहारा लिया गया । रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बंग-भंग का विरोध करते समय बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता
के प्रतीक रूप में रक्षाबंधन का त्यौहार मनाने की शुरुआत की थी ।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) के जीवन की एक मार्मिक घटना रक्षाबंधन से जुड़ी है…. ।

➠ आजाद एक बार तूफानी रात में शरण लेने हेतु एक विधवा के घर पहुँचे । पहले तो उसने उन्हें डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया, परंतु जब आजाद ने अपना परिचय दिया तब वह ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गयी ।

➠ बातचीत के दौरान जब आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जवान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानियाँ उठानी पड़ रही हैं तो उन्होंने द्रवित होकर उससे कहा : “मेरी गिरफ्तारी पर 5,000 रुपये का ईनाम है, तुम मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस ईनाम से बेटी की शादी कर लो ।”

➠ यह सुनकर विधवा रो पड़ी और बोली : “भैया ! तुम देश की आजादी के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है । न मैं इतनी स्वार्थी हूँ और न ही गद्दार जो कि अपनी बेटी के लिए हजारों बेटियों का गला घोंट दूँ । मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती ।”

➠ यह कहते हुए उसने एक रक्षासूत्र आजाद के हाथ में बाँधकर उनसे देश-सेवा का वचन लिया ।

➠रात बीती, सुबह जब उस विधवा की आँखें खुलीं तो आजाद जा चुके थे और तकिये के नीचे 5,000 रुपये रखे हुए थे । उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था – ‘अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी-सी भेंट’ – आजाद ।

सीख : राखी केवल एक मामूली धागा नहीं होता । राखी मतलब निःस्वार्थ, निष्काम प्रेम का सूत्र !
अधिकतर हम राखी के दिन एक छोटी-सी भेंट ले-देकर खुशियाँ मनाते हैं । किंतु रक्षाबंधन तो एक-दूसरे की उन्नति के शुभ संकल्प का दिन है ।