रक्षाबंधन : 3 अगस्त

➠ रक्षाबंधन महोत्सव अर्थात् भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक-पर्व। इस पर्व से सम्बंधित एक सुंदर ऐतिहासिक प्रसंग है…. :-

➠ ग्रीक सम्राट सिकंदर जब विजय हासिल करते – करते पुरु के राज्य में पहुँचा पुरु, उसकी राज्य व्यवस्था व सेना के मनोबल के बारे में अपने गुप्तचरों से सुना तो सिर खुजलाने लगा।

➠ “पुरु का राज्य है तो छोटा-सा लेकिन राजासाहब ! इससे लोहा लेना मौत के मुंह में जाना है।” किसी गुप्तचर ने कहा।

➠ सिकंदर आगे-पीछे का तोल-मोल करता था। जानकार गुप्तचरों में से एक ने कहा:

➠ “राजासाहब ! हिन्दुओं में एक ऐसा त्यौहार है कि उस दिन कोई भी औरत किसी मर्द को राखी बाँध दे तो वह मर्द उसका भाई हो जाता है। इससे उसके पति की रक्षा आराम से हो जाती है।” सिकंदर की पत्नी यह सुन रही थी।

➠ पुरु ने घोषणा करवा दी कि रक्षाबंधन के दिन नगर की कन्या बिना रोक-टोक के राजमहल में आ सकती है एवं अपने राजा को राखी बाँध सकती है और शुभकामनाओं का तोहफा उन्हें ईश्वर दिलायेगा।

➠ पुरु ‘उन्हें तोहफा दिया जायेगा… मैं दूँगा…’ ऐसा नहीं कह रहा है। भारतीय संस्कृति कितनी महान है! कर्म में ईश्वर को रख दिया, अहंकार को हटा दिया।

➠ आज तक तो राजमहल में साधारण कन्या, साधारण महिला नहीं जा सकती थी किंतु अब तो अनुमति मिल चुकी थी। रक्षाबंधन के दिन महिलाओं की भीड़ में एक विदेशी महिला भी राजमहल में प्रवेश कर गयी। सैनिक चौकन्ने तो हुए किंतु करें क्या ? आज किसी नारी को रोकना नहीं है ऐसा उन्हें आदेश मिला था।

➠ वह विदेशी नारी पहुँच गयी राजा के पास और धर्मवीर पुरुष के दायें हाथ पर बाँध दिया धागा। बुद्धिमान पुरु ने पहचान लिया कि यह कौन है और कहा: “आप कौन हैं मैं जान गया हूँ। आप सम्राट सिकंदर की पत्नी हैं। क्या चाहती हैं आप?”

➠ सिकंदर की पत्नी : “युद्ध होगा और उसका परिणाम क्या आएगा, पता नहीं। आपका राज्य और योद्धा भी कम नहीं हैं। मैं राखी लेकर आयी हूँ। यहाँ की संस्कृति के अनुसार नारी किसीको भाई मानकर राखी बांधती है तो वह उसकी मनोवांछा पूरी करता है। मेरे सुहाग की आप रक्षा करना।”

➠ सिकंदर की पत्नी एक धागा बाँधकर कितना सारा मांग रही है और यह भारत का वीर देने में कितना उदार है!

➠ पुरु ने कहा: “युद्ध में किसकी जीत होगी यह तो मैं नहीं कह सकता। लेकिन अगर मेरी जीत होती है तो तुम्हारे पति की सुरक्षा निश्चित है।”

➠ फिर क्या हुआ ? पुरु व उसके बलवान योद्धा जान हथेली पर लिये आगे बढ़े जा रहे थे । पुरु के हाथी ने सिकंदर के रथ को ऐसी टक्कर मारी कि रथ टूट गया और सिकंदर नीचे गिर पड़ा।

➠ पुरु नीचे उतरा, म्यान में से तलवार खींची। एक झटका ही तो मारना था लेकिन भारत का यह रक्षाबंधन महोत्सव…! पुरु हाथ में तलवार लिये वहीं खड़ा रहा।

➠ सिकंदर ने करवट लेकर देखा कि ‘मुझे यह मार सकता था किंतु अभी तक खड़ा है।’ इतने में सिकंदर के सैनिक आये और पुरु को बंदी बना लिया।

➠ युद्ध का शिविर लगा था। वहीं सिकंदर के सामने पुरू को बंदी बनाकर लाया गया। सिकंदर ने राजवी अन्दाज में पुछा: “मैं आपके साथ क्या सलुक करुँ ?”

➠ पुरु :”एक सम्राट दूसरे सम्राट के साथ जैसा इज्जत भरा व्यवहार करता है, वैसा ही तुम्हें मेरे साथ करना चाहिए।”

➠ क्या मनोबल है पुरु का ! शत्रु ने बंदी बनाया था , अपनी लाचारी के कारण बंदी नहीं बना था। सिकंदर का मन बदल गया। वह उठ खड़ा हुआ और बोला: “आइये सम्राट!” उसने पुरु को अपने पास बिठाया।

➠ पुरु ने धर्म की रक्षा की थी, अतः धर्म ने उनकी रक्षा की।

धर्मो रक्षति रक्षितः।

➠ सिकंदर ने धीरे-से पुरु से पूछा: “मैं रथ से गिर पड़ा था और आपके हाथ में तलवार थी। मेरी गर्दन उड़ाना दो सेकंड का काम था और कई मिनट आपके पास थे। लेकिन आप तलवार लिये गंभीरता से खड़े थे और फिर बंदी बनाये गये। इतने समय तक आप किस विचार में थे ? कैसे धोखा खाया आपने ?”

पुरु : “मैंने धोखा नहीं खाया।”

➠ सिकंदर की पत्नी से रहा नहीं गया। उसने कहा: “मैंने इन्हें राखी बाँधी थी। इन्होंने मेरे सुहाग की रक्षा के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी दी है।”

कैसी है भारतीय संस्कृति ! केवल एक धागे ने सिकंदर की रक्षा की !

➠ वैसे तो रक्षाबंधन भाई-बहन का त्यौहार है। भाई-बहन के बीच प्रेमतंतु को निभाने का वचन देने का दिन है, अपने विकारों पर प्रतिबंध लगाने का दिन है व बहन के लिए अपने भाई के द्वारा संरक्षण पाने का दिन है। किंतु व्यापक अर्थ में आज का दिन शुभ संकल्प करने का दिन है, परमात्मा के सान्निध्य का अनुभव करने का दिन है, ऋषियों को प्रणाम करने का दिन है। भाई तो हमारी लौकिक संपत्ति का रक्षण करते हैं किंतु संतजन हमारे आध्यात्मिक खजाने का संरक्षण करते हैं।

➠ उत्तम साधक बाह्य चमत्कारों से प्रभावित होकर नहीं, अपितु अपने दिल की शांति और आनंद के अनुभव से ही गुरुओं को मानते हैं। साधक को जो आध्यात्मिक संस्कारों का खजाना मिला है वह कहीं बिखर न जाए, काम-क्रोध-लोभ आदि लुटेरे कहीं उसे लूट न लें इसलिए साधक गुरुओं द्वारा उसकी रक्षा चाहता है। उस रक्षा की याद ताजा करने का दिन है रक्षाबंधन-पर्व।

➠ ऋषिपूजन का पर्व है रक्षाबंधन। यह यज्ञोपवित बदलने का विशेष दिवस है। यह स्व-अध्ययन व आत्मिक शुद्धि के लिए अनुष्ठान करने तथा उसे संपन्न करने का भी दिवस है। रक्षाबंधन का यह पर्व आपकी आत्मा की जागृति का पैगाम देता है।

~ ऋषि प्रसाद / अगस्त २००४

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