जिनको ब्रह्मचर्य रखना हो…

उत्तरायण महापर्व ( मकर संक्रांति )

ब्रह्मचर्य से बहुत बुद्धिबल बढ़ता है । जिनको ब्रह्मचर्य रखना हो, संयमी जीवन जीना हो, वे उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण का सुमिरन करें, जिससे बुद्धि में बल बढ़े ।
ॐ सूर्याय नमः… ॐ शंकराय नमः… ॐ गं गणपतये नमः… ॐ हनुमते नमः… ॐ भीष्माय नमः… ॐ अर्यमायै नमः… ॐ… ॐ…

ब्रह्मचर्यासन

साधारणतया योगासन भोजन के बाद नहीं किये जाते परंतु कुछ ऐसे आसन हैं जो भोजन के बाद भी किये जाते हैं । उन्हीं आसनों में से एक है ‘ब्रह्मचर्यासन’ । यह आसन रात्रि-भोजन के बाद, सोने से पहले करने से विशेष लाभ होता है । ब्रह्मचर्यासन के नियमित अभ्यास से ब्रह्मचर्य-पालन में खूब सहायता मिलती है अर्थात् इसके अभ्यास से अखंड ब्रह्मचर्य की सिद्धि होती है इसलिए योगियों ने इसका नाम ‘ब्रह्मचर्यासन’ रखा है ।

लाभ : इस आसन के अभ्यास से वीर्यवाहिनी नाड़ी का प्रवाह शीघ्र ही ऊर्ध्वगामी हो जाता है और सिवनी नाड़ी की उष्णता कम हो जाती है, जिससे यह आसन स्वप्नदोषादि बीमारियों को दूर करने में परम लाभकारी सिद्ध हुआ है ।जिन व्यक्तियों को बार-बार स्वप्नदोष होता है, उन्हें सोने से पहले पाँच से दस मिनट तक इस आसन का अभ्यास अवश्य करना चाहिए । इससे उपस्थ इन्द्रिय में काफी शक्ति आती है और एकाग्रता में भी वृद्धि होती है ।

विधि : जमीन पर घुटनों के बल बैठ जायें । तत्पश्चात् दोनों पैरों को अपनी-अपनी दिशा में इस तरह फैला दें कि नितम्ब और गुदा का भाग जमीन से लगा रहे । हाथों को घुटनों पर रख के शांतचित्त से बैठे रहें ।

ब्रह्मचर्य पालन के नियम | Practice of Brahmacharya

brahmacharya, CELIBACY

गृहस्थ दंपति के लिए ब्रह्मचर्य-व्रत (Brahmacharya) की सफलता हेतु निम्नलिखित नियमों का पालन करना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा :

* पति-पत्नी को अलग-अलग कमरों में सोना चाहिए और सम्पूर्ण एकांत में साथ-साथ नहीं रहना चाहिए ।

* पारिवारिक प्रार्थना : दोनों को अथवा परिवार के सभी लोगों को साथ मिलकर दिन में दो बार प्रार्थना-स्तवन, शास्त्र-पठन आदि करना चाहिए । इससे पति-पत्नी एक-दूसरे को भोग के साधन के रूप में न देखकर जगतरूपी धर्मशाला में कुछ समय के लिए मिलनेवाले दो पथिकों के रूप में अनुभव करेंगे । इससे पति-पत्नी के बीच भोगप्रधान संबंध छूट जायेगा और परस्पर निर्मल, दिव्य प्रेमसंबंध सरलता से जन्मेगा व स्थिर होगा ।

* भूतकाल की रतिक्रीडाएँ और शृंगार-चेष्टाओं की स्मृति को मिटा देना चाहिए ।

* एक-दूसरे को स्त्री या पुरुष रूप में देखने के बदले देह के साथ रहनेवाले देही (परमात्मा) रूप में देखने का प्रयत्न करना चाहिए ।

* शरीर और मन को निरन्तर सत्कार्य या सेवाकार्य में जोडे रखना चाहिए । अपने इष्टमंत्र के जप में मन को रत रखना चाहिए । इससे कामवृत्ति नहीं जगेगी, साथ ही कामवासना पर विजय करानेवाली आध्यात्मिक शक्ति बढती जायेगी ।

* संयमी जीवन शुरू करने पर पति को कभी स्वप्नदोष हो जाय तो उसे क्षुब्ध नहीं होना चाहिए । इस समय पत्नी के साथ क्रीडा कर लेना उचित है, ऐसा समझना योग्य नहीं है । ऐसा सोचने पर तो ब्रह्मचर्य की उपासना हो ही नहीं सकती ।

(ऐसी अनेक हितभरी बातों को जानने हेतु पढें मासिक समाचार पत्र ‘लोक कल्याण सेतु’)

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

‘श्री योग वशिष्ठ महारामायण’ में आता है कि : “हे रामजी ! यह चित्त जो संसार के भोग की ओर जाता है, उस भोग
रूपी खाई में चित्त को गिरने मत दो । भोग को बिसर जाने दो, त्याग दो । वह त्याग तुम्हारा परम् मित्र होगा और
त्याग भी ऐसा करो कि फिर उसका ग्रहण न हो ।

– ऋषि प्रसाद / मई २००१ / २३

नियम में निष्ठा | Nitya Niyam se Manobal Badhaen

Nitay Niyam, Niyam nisthha, Manobal badhaen

केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो उन्नति कर सकता है । मगर सावधान नहीं रहा तो अवनत भी हो सकता है । या तो उसका उत्थान होता है या पतन होता है, वहीं का वहीं नहीं रहता। अगर मनुष्य उन्नति के कुछ नियम जान ले और निष्ठापूर्वक उसमें लगा रहे तो पतन से बच जायेगा और अपने कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता जायेगा । आध्यात्मिक पतन न हो, इसलिए हर रोज कम-से-कम भगवन्नाम जप की दस माला करनी ही चाहिए।

दूसरी बात त्रिबन्ध प्राणायाम करने चाहिए । इससे माला में एकाग्रता बढ़ेगी और जप करने में भी आनंद आयेगा।

माला आसन पर बैठकर ही करनी चाहिए जिससे मंत्रजाप से उत्पन्न होने वाली विद्युतशक्ति जमीन में न चली जाये । अर्थिंग मिलने से तुम्हारी साधना का प्रभाव वहीं क्षीण हो जाता है ।

यदि आसन पर बैठकर जप करते हो और अर्थिंग नहीं होने देते हो तो भजन के बल से आध्यात्मिक विद्युत के कण पैदा होते हैं जो तुम्हारे शरीर के वात, पित्त और कफ के दोषों को क्षीण करके स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं। यही कारण है कि हमारे ऋषि मुनि प्रायः ज्यादा बीमार नहीं पड़ते थे।

नियम (Nitay Niyam) में अडिग रहने से अपना बल बढ़ता है जिससे हम अपने जीवन की बुरी आदतों को मिटा सकते हैं । जैसे- कइयों को आदत होती है ज्यादा बोलने की…. उस बेचारे को पता ही नहीं होता है कि ज्यादा बोलने से उसकी कितनी शक्ति नष्ट होती है । वाणी का व्यय नहीं करना चाहिए। गुजराती में कहा गया है कि- न बोलने में नौ गुण होते हैं ( ʹन बोलवामां नव गुण !!ʹ ) कम बोलने से या नहीं बोलने से ये लाभ है कि- झूठ बोलने से बचेंगे, निंदा करने से बचेंगे, राग-द्वेष से बचेंगे, ईर्ष्या से बचेंगे, क्रोध और अशांति से बचेंगे, कलह से बचेंगे और वाणीक्षय के दोष से बचेंगे । इस प्रकार छोटे-मोटे नौ लाभ होते हैं ।

अधिक बोलने की आदत साधक को बहुत हानि पहुँचाती है। साधक से बड़े-में-बड़ी गलती यह होती है कि यदि कुछ शक्ति आ जाती है या कुछ अनुभव होते हैं तो उसका उपयोग करने लगता है, दूसरों को बता देता है । उससे वह  एकदम गिर जाता है । फिर वह अवस्था लाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है । इसलिए साधकों को अपना अनुभव किसी को नहीं कहना चाहिए । अगर साधक किसी को ईश्वर की ओर मोड़ने में सहयोगी होता हो, अपने अनुभव से उसकी श्रद्धा (Shraddha) में असर होता हो तो फिर थोड़ा-बहुत ऊपर-ऊपर से बता देना चाहिए किन्तु पूरा नहीं बताना चाहिए ।

जिस तरह वाणी पर संयम लाया जा सकता है और बुरी आदतें भी मिटायी जा सकती हैं उसी तरह यदि ज्यादा खाने का, काम विकार का या शराब आदि का दोष है तो उसे भी दूर किया जा सकता है ।

जब कामुकता जग रही हो तो उससे होने वाली हानियों पर नजर डालनी चाहिए व संयम से होने वाले लाभ पर दृष्टि डालनी चाहिए । मन को समझाना चाहिए कि :- ʹशरीर में है क्या ? दो आड़ी हड्डियाँ और दो खड़ी हड्डियाँ, मांस, मल-मूत्र, रक्त और ऊपर से चमड़े का कवर । फिर यह हाड़-मांस का शरीर उस परम सुंदर चैतन्य के कारण सुंदर लगता है ।  तू उसी चैतन्य से प्रेम कर, अपनी आत्मा में आ । हे मेरे प्रभु ! अब मैं विकारों में नहीं गिरूँगा, काम में नहीं गिरूँगा वरन् मैं तो तेरे शुद्ध चैतन्यस्वरूप में, राम में रहूँगा….. ૐ…. ૐ…..ૐ…..

इस तरह एक सप्ताह तक का नियम (Nitay Niyam) ले लिया काम-विकार में न गिरने का….. और सप्ताह पूरा होने के पहले ही दूसरा सप्ताह बढ़ा दिया।

अपने मस्तिष्क में दिव्य विचार भरना और पोसना नितांत आवश्यक है । डण्डे के बल से या पुचकार से बन्दर, शेर आदि पशुओं को भी वश में किया जा सकता है । इसी तरह अपने मन को कभी कठोर प्रतिज्ञा से तो कभी पुचकार से वश में करने के संस्कार रोज डालते रहो।

लोभ के विचार आने पर विचारो कि :- ʹआखिर में कौन अपने साथ क्या ले गया ? ʹ

क्या करिये क्या जोड़िये, थोड़े जीवन काज ।

छोड़ि छोड़ि सब जात है, देह गेह धन राज ।।

जो लोभ के दलदल में फँसे, उन्होंने आनंद, शांति, माधुर्य खोया । अतः लोभ से बचने के लिए दान-पुण्य आदि सत्कर्म करो । औदार्य-सुख पाने में मन को लगाओ ।

छोटी-छोटी बातों में भय सताता हो तो प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर शान्त मन से चिन्तन करो कि :- ʹनिर्भय नारायण मेरे साथ हैं। अब मैं जरा-जरा बात में भयभीत न होऊँगा । पाप से…. दुश्चारित्र्य से…. भय कर, लेकिन हे मेरे मन ! अच्छे रास्ते पर चलने में भय किस बात का ???

ૐ….. ૐ……ૐ…. मैं निर्भय हूँ ।

ૐ……ૐ……ૐ….. मैं निर्भय नारायण का अंग हूँ ।ʹ ये विचार बार-बार मन में भरो ।

ʹचटोरेपन, स्वादलोलुपता की आदत अकारण रोग लाती है, स्वास्थ्य बिगाड़ती है और आयुष्य क्षीण करती है । जो जिह्वा एक दिन जल जाने वाली है, उसके पीछे मैं अपना जीवन क्यों नष्ट करूँ ??? अब मैं स्वादलोलुपता से बचूँगा…. अब मैं कम नमक-मिर्च-मसालेवाला सादा सात्त्विक भोजन ही करूँगा…. स्वस्थ रहूँगा व दीर्घजीवी होऊँगा…. चटोरेपन का शिकार होकर अकाल नहीं मरूँगा ।ʹ

ऐसे दिव्य विचार भरने के लिए थोड़ा समय अवश्य निकालना चाहिए, अन्यथा पुरानी आदतें साधन-भजन में बरकत नहीं आने देंगी और अपने को असमर्थ समझकर हम दैवी लाभ से वंचित होते रहेंगे।

बीड़ी-सिगरेट, गाँजा, शराब आदि के सेवन की बुरी आदतें एक दिन में नहीं आती अपितु बार-बार ऐसे प्रयोग से बुराइयाँ जीवन का अंग बन जाती हैं । ऐसे ही बुराइयों को निकालते हुए अच्छाइयों को अपनाओ तो अच्छाइयाँ भी जीवन का अंग हो जायेंगी । जो भी दुर्गुण हों उनसे होने वाली हानियों पर नजर डालो और सदगुण के महान फायदों पर नजर डालो । केवल मंदिरों में जाने से या माला घुमाने से ही काम नहीं चलता अपितु रोज थोड़े दुर्गुण हटाते जाओ और थोड़े सदगुण भरते जाओ । इससे आप शान्ति, प्रसन्नता, संतोष, आरोग्यता, उत्साह आदि सदगुणों के धनी बन जाओगे ।

जैसे खेत में निंदाई-गुड़ाई करते हैं, वैसे ही मन रूपी खेत से हल्के विचार निकालकर दिव्य विचार भरने का रोज अभ्यास करो । मस्तिष्क की तिजोरी में जितने दिव्य विचार भरते जाओगे, दृढ़ (Dridhh Nishchay) बनाते जाओगे…. उतने ही सच्चे अर्थों में आप धनवान बनते जाओगे । वास्तव में तुम ईश्वर की सनातन संतान हो । बुरी आदतों में फँस मरने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है ।

– पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 13,14, 25 , अंक 51

जैसा संग वैसा रंग

संग का बड़ा प्रभाव पड़ता है । यदि संत, सद्गुरु एवं भगवान का संग मिलता है तो वह उन्नति के शिखर पर ले जाता
है और यदि दुर्भाग्य से किसी स्वार्थी-दुराचारी का संग मिल जाता है तो वह पतन की गहरी खाई में ले जाता है ।


आज कल दोस्त भी ऐसे ही मिलते हैं । कहते है :- ” चलो मित्र ! सिनेमा देखते हैं । मैं खर्च करता हूँ….चलो  ‘ ब्लू
फिल्म ‘ देखते हैं । “

दस…बारह साल के लड़के ‘ ब्लू फिल्म ‘ देखने लग जाते हैं । इससे उनकी मानसिक दुर्दशा हो जाती है, वे ऐसी कुचेष्टाओं से ग्रस्त हो जाते हैं कि हम उसे व्यासपीठ पर बोल भी नहीं सकते ।

वे लड़के बेचारे अपना इतना सर्वनाश कर डालते हैं कि बाप तो धन, मकान, धन्धा आदि दे जाते हैं…. फिर भी कोमलवय में चरित्रभ्रष्ट व उर्जानाश के
कारण वे उन्हें संभाल नहीं पाते हैं । वे न तो अपना स्वास्थ्य संभाल पाते हैं, न माता-पिता की सेवा कर पाते हैं, न
ही उनका आदर कर पाते हैं, और आगे चलकर ठीक से उनका श्राद्धकर्म भी नहीं कर पाते हैं ।

अपने ही विकारी सुख में वे इतना खप जाते हैं कि इनके जीवन में कुछ सत्व नहीं बचता । उनको जरा सा समझाओ तो वे चिढ़ जाते हैं….कुछ बोलो तो
नाराज हो जाते हैं…. घर छोड़कर भाग जाते हैं… डांटो  तो आत्महत्या का विचार करने लगते हैं ।

-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू