होलिकोत्सव पर एक अनोखी भेंट… | Holi Wishes & Gift

Holi gift

▪होली के दिन लक्ष्मण जी को श्री राम की चरणसेवा मिली थी। इस बारे में एक लोककथा प्रचलित है : श्री राम विवाह के बाद अयोध्या पधारे, तब उनकी चरणसेवा लक्ष्मण जी के स्थान पर सीताजी करने लगीं। लक्ष्मण चरणसेवा करने जायें तो सीता जी ना तो नहीं कहतीं लेकिन मर्यादा के अनुसार जब तक वे स्वयं बुलाये नहीं तब तक लक्ष्मण जी को वहाँ जाना उचित नहीं लगता था। अतः लक्ष्मण जी इधर-उधर चक्कर काटते रहते थे । न सीता जी लक्ष्मण जी को बुलातीं और न उन्हें चरणसेवा का मौका मिलता। परिणामस्वरूप लक्ष्मण दुःखी रहने लगे कि प्रभु श्री राम की चरणसेवा न मिले तो जीने का क्या अर्थ? इसी विचार से उनका शरीर सूखने लगा।

▪एक बार राम जी ने पूछा : “लक्ष्मण ! तुम्हारा शरीर क्यों सूखता जा रहा है ?”
लक्ष्मण जी : “प्रभु ! आप तो जानते ही हैं कि मुझे कई दिनों से आपकी चरणसेवा नहीं मिली।” रामजी : “जब तुम मेरी सेवा के लिए यहाँ आने तो तुम्हें कौन ना कहता है ?”
लक्ष्मणजी : “माताजी मुझे देखती तो हैं लेकिन बुलाती नहीं है। मैं आपकी चरणसेवा बिना नहीं जी सकूँगा, प्रभु !”

रामजी : “इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ? वह धर्मपत्नी है, उसका प्रथम अधिकार है।”

लक्ष्मणजी : “प्रभु ! कुछ तो उपाय करें।”

रामजी : “लखन ! एक उपाय है। चार दिन के बाद होली का त्यौहार आ रहा है। तू तो जानता ही है कि अपने रघुकुल में यह रीति है कि इस दिन देवर भाभी के साथ होली खेलते हैं और शाम को बड़ों की उपस्थिति में देवर भाभी से जो कुछ भी माँगता है वह भाभी को देना ही पड़ता है। इस बार तुम, शत्रुघ्न और भरत सीता के साथ होली खेलकर शाम को सीता से माँगने जाओ, तब अपनी इच्छा पूरी कर लेना।”

प्रभु की बतायी युक्ति से लक्ष्मण जी नाचने लगे और अधीर होकर कहने लगे :”बस अब होली जल्दी आये ऐसा कुछ करो ।”

रामजी : “होली तो जब आयेगी तभी आयेगी न।”

लक्ष्मणजी ने तो ‘होली’ का जप करना शुरू कर दिया कि होली जल्दी आये।

▪चार दिन पूरे हुए। होली का सूर्योदय हुआ। रंगों के दर्शन होने लगे। सीताजी के साथ लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न पवित्रता से होली खेले। शाम होते ही सर्वप्रथम भरत सीताजी के पास आये और उनके चरण स्पर्श कर बोले : “मुझे तो यह वरदान दीजिये कि मैं जन्म-जन्मांतर तक प्रभु श्रीराम के चरणों में रहूँ, उनकी भक्ति पाऊँ।”

सीताजी : “तथाऽस्तु।” अर्थात् ऐसा ही हो। फिर शत्रुघ्न की बारी आयी।

उन्होंने कहा : “भरतजी ने जन्म-जन्मांतर तक प्रभु श्रीराम की भक्ति माँगी है तो मुझे जन्म-जन्मांतर तक भरतजी की भक्ति मिले, मैं उनकी सेवा करूँ। श्रीराम के सेवक का सेवक बनूँ।”

सीता जी : “तथास्तु।

तत्पश्चात् सीताजी ने लक्ष्मण जी से कहा : “माँगो।”

लक्ष्मणजी : “माताजी ! होली की और कोई भेंट तो मुझे नहीं चाहिए, केवल श्री राम की चरण सेवा का अधिकार मेरा बने।”

▪प्रभु श्रीराम के चरणों की सेवा का अधिकार माँगने की बात सुनते ही सीताजी बेहोश हो गयीं क्योंकि वे रघुवंश की पुत्रवधु होने से वचन तोड़ नहीं सकती थीं। वैद्यों-हकीमों ने औषधियाँ दीं, फिर भी उनकी मूर्छा न टूटी। तब लक्ष्मण जी दौड़े श्री राम के पास। श्रीराम ने लक्ष्मणजी को एक युक्ति बताई। उसके अनुसार लक्ष्मणजी सीताजी के पास गये और उनके कान में धीरे से कहा : “माताजी ! चरण सेवा के अधिकार में हम दोनों बँटवारा कर लें। दायाँ चरण मेरा और बायाँ चरण आपका । जब आप चरणों की सेवा करने जाओगी तो मुझे सामने से बुला लिया करेंगी।”

यह सुनकर सीता जी की मूर्च्छा उतर गयी। प्रभु द्वारा बतायी गयी युक्ति से सीता जी और लक्ष्मण, दोनों खुश हो गये।

~लोक कल्याण सेतु / फरवरी 2004

मंत्र-साफल्य दिवस : होली | Mantra Siddhi aur Holi

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होली के दिन किया हुआ जप लाख गुना फलदायी होता है। यह साफल्य-दिवस है, घुमक्कड़ों की नाई भटकने का दिन नहीं है। मौन रहना, उपवास पर रहना, फलाहार करना और अपना-अपना गुरु मंत्र जपना।

इस दिन जिस निमित्त से भी जप करोगे वह सिद्ध होगा। ईश्वर को पाने के लिए जप करना। नाम-जप की कमाई बढ़ा देना ताकि दुबारा माँ की कोख में उलटा होकर न टँगना पड़े। पेशाब के रास्ते से बहकर नाली में गिरना न पड़े। होली के दिन लग जाना लाला-लालियाँ ! आरोग्य मंत्र की भी कुछ मालाएँ कर लेना।

अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारणभेषजात् । नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
है अच्युत ! हे अनंत ! हे गोविंद! – इस नामोच्चारणरूप औषध से जाते हैं, यह मैं सत्य कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। तमाम रोग नष्ट हो (धन्वंतरि महाराज)

दोनों नथुनों से श्वास लेकर करीब सवा से डेढ मिनट तक रोकते हुए मन-ही-मन दुहराना नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा।

फिर ५० से ६० सेकंड श्वास बाहर रोककर मंत्र दुहराना। इस दिन जप-ध्यान का फायदा उठाना, काम-धंधे तो होते रहेंगे। अपने-अपने कमरे में गोझरण मिश्रित पानी से पोता मारकर थोडा गंगाजल छिड़क के बैठ जाना। हो सके तो इस दिन गोझरण मल के स्नान कर लेना। लक्ष्मी स्थायी रखने की इच्छा रखनेवाले गाय का दही शरीर पर रगड़ के स्नान कर लेना । लेकिन वास्तविक तत्त्व ( सदा स्थायी है, उसमें अपने में को मिला दो बस, हो गया काम ! ब्रह्मचर्य पालन में मदद के लिए ‘ॐ अर्यमायै नमः’ मंत्र का जप बड़ा महत्त्वपूर्ण है।

~पूज्य बापूजी

-ऋषि प्रसाद / मार्च २०१३

होली के कृत्रिम रंगों के खतरे | Holi Colours Disadvantages

सन् २००१ में दिल्ली के ‘टॉक्सिक लिंक’ तथा ‘वातावरण’ नामक संगठनों ने अध्ययन के दौरान पाया कि आजकल होली के रंग जिन तीन रूपों में आते हैं (पेस्ट, सूखे रंग (Gulal) और पानी के रंग) वे तीनों ही शरीर के लिए खतरा पैदा करते हैं। पेस्टों में जहरीले रसायन होते हैं, जिनसे स्वास्थ्य के लिए होने सम्भाव्य खतरे निम्न प्रकार हैं:

सूखे रंगों में ‘एस्बेस्टस’ या ‘सिलिका’ होते हैं, ये दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। गीले रंगों में ‘जेंसियन वॉयलेट’ का प्रयोग होता है, जिससे त्वचा बदरंग होने तथा ‘डर्मेटाइटिस’त्वचारोग होने का खतरा पैदा होता है। लखनऊ स्थित ‘इंडस्ट्रियल टॉक्सिक रिसर्च सेंटर’ के उपनिदेशक डॉ. मुकुल दास के अनुसार होली के अवसर पर प्रयुक्त अधिकांश रंग रासायनिक पदार्थों तथा अभक्ष्य पदार्थों जैसे कपड़ा, कागज, चमड़े आदि से बने होते हैं।
कृत्रिम रंग बनाने हेतु विभिन्न रसायन इस्तेमाल होते हैं, जैसे – गुलाबी व लाल रंग बनाने हेतु ‘रोडमिना’, हरे रंग हेतु ‘मेलाकाइट’, बैंगनी रंग हेतु ‘मेथिल वायलेट’, संतरी रंग हेतु ऑरेंज -II’ तथा पीले रंग हेतु ‘ऑरामाइन’ इस्तेमाल होता है । ये सभी स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। कई दुकानदार ऐसे रंग भी बेचते हैं जिन पर साफ तौर पर लिखा होता है : ‘केवल औद्योगिक उपयोग के लिए’, फिर भी लोग उनसे होली खेलते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिप्रद है।
प्राकृतिक रंगों की महत्ता बताते हुए डॉक्टर दास कहते हैं कि ‘होली के समय ऋतु-परिवर्तन के प्रभाव से हानिकारक असंतुलन उत्पन्न हो जाते हैं । प्राकृतिक रंग अपने विशिष्ट गुणों के कारण सूर्य-प्रकाश की उपस्थिति में इन विकृतियों को नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं।’
अतः रासायनिक रंगों की हानियों से बचने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें।

आओ खेलें ज्ञान की होली ! Let’s Play Real Holi ( Holi Of Knowledge )

aao khele gyan ki holi

aao khele gyan ki holi

आओ खेलें ज्ञान की होली !
आओ खेलें ज्ञान की होली, राग-द्वेष भुलायें।
समता-स्नेह बढ़ा के दिल में, प्रेम का रंग लगायें।
नहीं उछालें कीचड़-मिट्टी, ना अपशब्द बुलायें।
रंग पलाश से होली खेलें, ना गंदे रंग लगायें।
रासायनिक रंगों का त्याग करें, प्राकृतिक रंग लगायें।
बड़े बुजुर्गों को तिलक लगायें, भक्ति आशीष पायें।
नहीं पियें हम भाँग और मदिरा, पंचामृत बनायें।
जिससे रहे मन में प्रसन्नता, ऐसा प्रसाद खाएं ।
ठाकुरजी को भोग लगा के, अतिथि को भी खिलाएं ।
आयी बसंत में प्यारी होली, आनंद-आनंद छाये।
गुरुवर की न्यारी होली, परमानंद लुटाये ।
जैसे कहते सद्गुरु प्यारे, वैसी होली मनाएं
सबका मंगल सबका भला हो, प्रेम प्रभु से बढ़ायें।
जैसे बदलें ऋतुएँ सारी, सहज बदल हम जायें।
गुरुज्ञान में गोते लगाकर, निज को सहज बनायें।
गुरु आज्ञा में शीश झुकाकर, गुरुसेवा अपनाएं।
गुरु रंग में जीवन रेखा के, आत्मज्ञान को पायें ।

साधक गुरुशरण, अहमदाबाद ।

होली अर्थात् हो…ली | Meaning of Holi in Hindi

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‘होली’ अर्थात हो… ली…। जो हो गया उसे भूल जाओ। निंदा हो ली सो हो ली… प्रशंसा हो ली सो हो ली… तुम तो रहो मस्ती और आनंद में । -पूज्य बापूजी

Happy Holi Message | होलिकोत्सव संदेश -पूज्य बापूजी

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Holi Sandesh

हिरण्यकशिपु की आसुरी वृत्ति के पराभव तथा होलिका रूपी कपट के पराजय का दिन है होली। आज के दिन सत्य, शांति, परमेश्वरीय प्रेम, दृढ़ता की विजय होती है। जो भक्त परम पुरुष परमात्मा में दृढ़ निष्ठावान हैं, उनके आगे प्रकृति अपना नियम बदलती है। अग्नि उन्हें जला नहीं सकती, पानी उन्हें डुबा नहीं सकता, हिंसक पशु उनके मित्र बन जाते हैं। समस्त प्रकृति उनकी दासी बनती है, उनके अनुकूल बनती है……उनकी याद दिलानेवाला यह होली का पवित्र दिन है। मानव को विघ्न-बाधाओं के बीच भी प्रह्लाद की तरह भगवन्निष्ठा टिकाये रखकर संसार से पार होने का संदेश देनेवाला यह दिन है।

ध्यान से अहंकार पिघलता है, चित्त निर्मल बनता है तथा आत्मविश्रांति का द्वार खुलता है। संसार-प्रेम का पल्ला न पकड़ना, ईश्वर का पल्ला पकड़ना। लोभी धन के लिए हँसता-रोता है, मोही परिवार के लिए हँसता-रोता है परंतु भगवान का भक्त तो भगवान के लिए ही हँसता रोता है। वह भगवान को अपना बनाता है। अहंकार का पोषण करने के लिए नहीं किंतु ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए जीवन मिला है, यह बात भूलना नहीं। हिरण्यकशिपु अहंकारी है और भक्त प्रह्लाद शरणागति का स्वरूप है। ईश्वर शरणागति अंत में अहंकार पर विजय दिलाती है। आज तो सबके हृदय में अहंकार की होली है। उसे शांत करने के लिए सत्संग रूपी शरणागति और प्रहलाद जैसी भक्ति करनी चाहिए।

परदुःखकातरता से आत्मबल का विकास होता है। मनुष्य में इतनी शक्ति है कि वह मुर्दे को जीवित कर सकता है। सती सावित्री ने यमराज को प्रसन्न कर अपने मृतक पति को पुनः जीवित किया था। राजा ऋतध्वज ने मदालसा रानी को जीवित किया था। अर्जुन, मुचुकुन्द, खट्वांग, नारद वगैरह स्वर्ग में सदेह आ-जा सकते थे उनके पास स्वर्ग की सीढ़ी थी। आज का मनुष्य भी यदि चाहे तो स्वर्ग में जा सकता है परंतु उसे अपने जीवन को सदाचार, सत्य, परहित-परायणता, सेवा, संयम, निर्भयता आदि पुष्पों से सुशोभित करना चाहिए। भगवान के भक्त को सुख में आसक्त और दुःख में भयभीत नहीं होना चाहिए। प्रह्लाद अग्नि में जला नहीं, समुद्र में डूबा नहीं।

आइये, आज से एक नया जीवन शुरू करें। जो दीन-हीन हैं, शोषित हैं, उपेक्षित हैं, पीड़ित हैं, अशिक्षित हैं, समाज के उस अंतिम व्यक्ति को भी सहारा दें। जिंदगी का क्या भरोसा ? कोई कार्य ऐसा कर लें कि जिससे हजारों हृदय आशीर्वाद देते रहें। चल निकलें ऐसे पथ पर कि जिस पर चलकर कोई दीवाना प्रह्लाद बन जाय।

होली (Holi) अर्थात् हो ली… अर्थात् जो हो गया सो गया… कल तक जो होना था वह हो चुका… उसे भूल जाओ । निंदा हो गयी सो हो गयी, प्रशंसा हो गयी सो हो गयी, जो कुछ हो गया सो हो गया । तुम रहो मस्ती में, आनंद में।

भक्ति, ज्ञान की विजय का उत्सव ! | Happy Holi in Hindi

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Holi Festival

विषय विकार एवं वासना पर भक्ति, ज्ञान की विजय का उत्सव…
स्वास्थ्य की सुरक्षा का उत्सव और पुराने राग-द्वेष को भूलकर, उसे आग में जलाकर पुनः अपना दिल जोड़ने का उत्सव है, वही होलिकोत्सव है ।

|| Happy Holi in Hindi ||

प्राकृतिक रंग कैसे बनाएं ? | Natural Colours for Holi

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◆ चटक केसरिया रंग :
(१) पलाश के फूलों को रातभर भिगोकर उबाल लें।

आयुर्वेद ने प्राकृतिक रंगों में पलाश के रंग को बहुत महत्त्वपूर्ण माना है। यह कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, मूत्रकृच्छ, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। यह प्राकृतिक केसरिया रंग रक्तसंचार की वृद्धि करता है, मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ-साथ मानसिक शक्ति, इच्छा शक्ति को बढ़ाता है।

(२) चुटकी भर चंदन चूर्ण एक लीटर पानी में मिला लें।

◆ पीला गुलाल :

(१) ४ चम्मच बेसन, २ चम्मच हल्दी चूर्ण मिलायें।
(२) अमलतास या गेंदा के फूलों के चूर्ण के साथ कोई भी आटा या मुल्तानी मिट्टी मिला लें।

◆ पीला रंग :
(१) २ चम्मच हल्दी चूर्ण लीटर पानी में उबालें।
(२) अमलतास, गेंदा फूलों को रातभर भिगोकर उबाल लें।

◆ जामुनी रंग :
चुकंदर उबालकर पीस पानी में मिला लें।

◆ काला रंग :
आंवला चूर्ण लोहे के बर्तन में रातभर भिगोयें।

◆ लाल रंग :
(१) आधे कप पानी में चम्मच हल्दी चूर्ण व चुटकीभर चूना मिलाकर १० लीटर पानी में डाल दें। २-२ चम्मच लाल चंदन चूर्ण १ लीटर पानी में उबालें।

◆ लाल गुलाल :
(१) सूखे लाल गुड़हल के फूलों का चूर्ण उपयोग करें।

◆ हरा रंग :
(१) पालक, धनिया या पुदीने की पत्तियों के पेस्ट को पानी में मिला लें ।
(२) गेहूँ की हरी बालियों को पीस लें।

◆ हरा गुलाल :
(१) गुलमोहर अथवा रातरानी की पत्तियों को सुखाकर पीस लें।

◆ भूरा हरा गुलाल :
(१) मेंहदी चूर्ण में आंवला चूर्ण मिला लें।

~ऋषि प्रसाद / मार्च २०१३

होली विशेष – यह सावधानी है बहुत जरूरी… | Holi Special

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ऐसे उत्सव में अगर असावधान रहते हैं तो स्त्री-पुरुष, देवर-भाभी, पड़ोसी-पड़ोसन, युवान-युवती छूटछाट लेकर एक-दूसरे के अंगों को स्पर्श कर लेते हैं तो जो विकार सुषुप्त हैं वे उत्तेजित हो जाते हैं और होली बाहर जलती है पर उनके हृदय में कामुकता की होली जलने लग जाती है। लाभ होने के बजाय हानि हो जाती है। ऐसे उत्सव अगर संतों, ऋषियों व शास्त्र के निर्देशानुसार मनाये जायें तो ये उत्सव जीवन में उत्साह-आनंद लाते हैं, हृदय की क्षुद्रता मिटाते हैं और देर-सवेर जीव को शिव से मिलाने का सामर्थ्य रखते हैं। ~ऋषि प्रसाद / फरवरी २०२०

होली की सावधानियाँ | Special Holi Safety Tips in Hindi

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प्राचीन काल में पलाश के फूलों से तैयार सात्त्विक रंग अथवा गुलाल, कुमकुम, हल्दी से होली खेली जाती थी। लेकिन आज के परिवर्तन-प्रधान युग में अनेक प्रकार के रासायनिक तत्वों से बने पक्के रंगों का तथा कई स्थानों पर तो वार्निश, ऑईल, पेंट व चमकीले पेंट्स का भी होली खेलने में उपयोग किया जाता है।

होली खेलते समय निम्नलिखित सावधानियाँ बरतने से आप हानिकारक रसायनयुक्त रंगों के दुष्प्रभाव से बच सकते हैं:

● सावधानी रखिये कि कहीं होली का रंग आँख या मुँह में न चला जाय अन्यथा आँखों की ज्योति अथवा फेफड़ों व आँतों में हानि पहुँचा सकता है। अतः जब कोई रंग लगाये तब मुँह व आँखें बंद रखिये।

● होली खेलने से पहले ही अपने शरीर पर नारियल, सरसों अथवा खाद्य तेल की अच्छी तरह से मालिश कर लीजिये ताकि त्वचा पर पक्के रंगों का प्रभाव न पड़े और साबुन लगानेमात्र से ही वे रंग निकल जायें। अपने बालों में भी तेल की अच्छी तरह से मालिश कर लीजिये ताकि रासायनिक रंगों का सिर पर कोई प्रभाव न पड़े।

इस प्रकार की मालिश के अभाव में रासायनिक रंग त्वचा पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं तथा त्वचा में कुछ दिनों तक जलन एवं शुष्कता बनी रहती है।

● जो लोग होली खेलने में वार्निश,आईल पेंट या अन्य किसी प्रकार के चमकदार पेंट का उपयोग करते हैं, ऐसे लोगों से सावधान रहिये। भूलकर भी उस टोली में शामिल न होइये जिसमें इस प्रकार के घातक पदार्थों से होली खेली जाती हो। ये रंग चेहरे की त्वचा के लिए अत्याधिक हानिकारक साबित हुए हैं । कभी-कभी तो इनसे पूरा चेहरा ही काला या दागदार बन जाता है। यदि कोई आप पर ऐसा रंग जबरन लगा भी दे तो तुरंत ही घर पहुँचकर रुई के फाहे को मिट्टी के तेल में डुबोकर उससे धीरे-धीरे रंग साफ कर लीजिये। फिर साबुन से चेहरा धो डालिये ।

● त्वचा पर लगे पक्के रंग को बेसन, आटा, दूध, हल्दी व तेल के मिश्रण से बना उबटन बार-बार लगाकर एवं उतारकर साफ किया जा सकता है । यदि उबटन के पूर्व उस स्थान को नींबू से रगड़कर साफ कर लिया जाए तो और भी लाभ होगा । नाखूनों के आस-पास की त्वचा में जमे रंग को नींबू द्वारा घिसकर साफ किया जा सकती है।

● होली घर के बजाय बरामदे में या सड़क पर ही खेलें ताकि घर के भीतर रखी वस्तुओं पर उनका दुष्प्रभाव न पड़े और होली खेलते समय फटे या घिसे हए पतले वस्त्र न पहने ताकि किसी भी प्रकार की लज्जाजनक स्थिति का सामना न करना पड़े।

● होली के अवसर पर देहातों में भाँग व शहरों में शराब पीने का अत्याधिक प्रचलन है। पर नशे के मद में चूर होकर व्यक्ति विवेकहीन पशुओं जैसे कृत्य करने लगता है। क्योंकि नशा मस्तिष्क से विवेक नियंत्रण हटा देता है, बुद्धि में उचित निर्णय लेने की क्षमता का ह्रास कर देता है और मनुष्य मन, वचन व कर्म से अनेक प्रकार के असामाजिक कार्य कर बैठता है। अतः इस पर्व पर किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ का सेवन न करें ।

शिष्टता व संयम का पालन करें। भाई सिर्फ भाइयों की व बहनें सिर्फ बहनों की ही टोली में होली खेलें। बहनें घर के परिसर में ही होली खेल लें तो और भी अच्छा है ताकि दुष्ट प्रवृति के लोगों की कुदृष्टि उन पर न पड़े।

-जो लोग कीचड़-गंदगी व पशुओं के मल-मूत्र जैस दूषित पदार्थों से होली खेलते हैं, वे खुद तो अपवित्र होते ही हैं औरों को भी अपवित्र करने का पाप अपने सिर पर चढ़ाते हैं । अत: होली खेलते समय इनका प्रयोग न करें।

होली खेलते समय शरीर पर गहने आदि कीमती आभूषण धारण न करें, अन्यथा भीड़ में उनके चोरी या गुम हो जाने की संभावना बनी रहती है।

~लोक कल्याण सेतु / फरवरी २००४