Holi Jali to Kya Jali 2
adwait holi path Holi Jali to Kya Jali holi bhajan

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होली जली तो क्या जली पापिन अविद्या नहीं जली ।
आशा जली नहीं राक्षसी, तृष्णा पिशाची नहीं जली ।।

झुलसा न मुख आसक्ति का, नहीं भस्म ईर्ष्या की हुई ।
ममता न झोंकी अग्नि में, नहीं वासना फूँकी गई ।।

न ही धूल डाली दम्भ पर, न ही दर्प में जूते दीये ।
दुर्गति न की अभिमान की, न ही क्रोध में घूँसे पीये ।।

अज्ञान को खर पर चढ़ा करमुख नहीं काला किया ।
ताली न पीटी काम की, तो खेल होली क्या लिया ।।

छाती मिलाते शत्रु से, सन्मित्र से मुख मोड़ते ।
हितकारी ईश्वर छोड़ कर, नाता जगत से जोड़ते ।।

होली भली है देश की अच्छी नहीं परदेस की ।
सुनते हुए बहरे हुए, नहीं याद करते देश की ।।

माजून खाई भंग की, बौछार कीन्हीं रंग की ।
बाजार में जूता उछाला, या किसी से जंग की ।।

गाना सुना या नाच देखा, ध्वनि सुनी मौचंग की ।
सुध बुध भुलाई आपनी, बलिहारी ऐसे रंग की ।।

होली अगर हो खेलनी, तो संत सम्मत खेलिये ।
सन्तान शुभ ऋषि मुनिन की, मत संत आज्ञा पेलिये ।।

सच को ग्रहण कर लीजिए, जो झूठ हो तज दीजिये ।
सच झूठ के निर्णय बिना, नहीं काम कोई कीजिये ।।

होली हुई तभ जानिये, संसार जलती आग हो ।
सारे विषय फीके लगें, नहीं लेश उनमें राग हो ।।

हो शांति कैसे प्राप्त निश दिन, एक यह ही ध्यान हो ।
संसार दुःख कैसे मिटे, किस भाँति से कल्याण हो ।।

होली हुई तब जानिये, पिचकारी सदगुरु की लगे ।
सब रंग कच्चे जांय उड़, यक रंग पक्के में रंगे ।।

नहीं रंग चढ़े फिर द्वैत का अद्वैत में रंग जाय मन ।
है सेर जो चालीस सो ही जानियेगा एक मन ।।

होली हुई तब जानिये, श्रुति वाक्य जल में स्नान हो ।
विक्षेप मल सब जाय धुल, निश्चिन्त मन अम्लान हो ।।

शोकाग्नि बुझ निर्मल हो, मति स्वस्थ निर्मल शांत हो ।
शीतल हृदय आनन्दमय, तिहूँ पाप का पूर्णान्त हो ।।

होली हुई तब जानिये, सब दृश्य जल कर छार हो ।
अज्ञान की भस्मी उड़े, विज्ञानमय संसार हो ।।

हो मांहि हो लवलीन सब, है अर्थ होली का यही ।
बाकी बचे सो तत्त्व अपना, आप सबका है वही ।।

भोला ! भली होली भयी, भ्रम भेद कूड़ा बह गया ।
नहीं तू रहा नहीं मैं रहा, था आप सो ही रह गया ।।

अद्वैत होली चित्त देकर, नित्य जो नर गायेगा ।
निश्चय अमर हो जायेगा, नहीं गर्भ में फिर आयेगा ।।

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Vedic Holi Bhajan - Holi Jali To Kya Jali