Guru Vachan Karte hai Raksha : With a short Story of Raghu Raja

guruvachan karte hain rakshan

गुरुवचन करते हैं रक्षण !! – पूज्य संत श्री आशाराम बापू जी

➠ ‘राजवैभव में, घर-बार में काम, क्रोध, लोभ वासनाओं की बहुलता होती है और ईश्वर को पाना ही मनुष्य जीवन का सार है।’ – ऐसा सोचकर रघु राजा अपने पुत्र अज को राज्यवैभव देकर ब्रह्म-परमात्मा की प्राप्ति के लिए एकांत जंगल में चले गये।

➠ एक दिन जब रघु राजा तप कर रहे थे तो एक विप्र (ब्राह्मण) के पीछे राक्षस पड़ा।

➠ राक्षस कह रहा था :- ‘तू मेरा प्रिय भोजन है। मैं भूखा हूँ और ब्रह्मा जी ने तुझे मेरे लिए ही भेजा है।’

➠ विप्र को तो प्राण बचाने थे, वह खूब दौड़ा-खूब दौड़ा और राक्षस को भी प्राण बचाने थे क्योंकि भूख का मारा था।

➠ विप्र दौड़ते-दौड़ते राजा रघु के चरणों में आया, बोलाः “महाराज ! मैं आपकी शरण में हूँ।”

रघु राजा ने कहाः “क्या बात है ?”

“महाराज ! मुझे बड़ा डर लग रहा है।”

“निर्भय हो जाओ।”

➠ सबसे बड़ा अभयदान है। सत्संग सुनने से अभयदान मिलता है। राजा ने उसे निर्भयता का दान दे दिया। अब जो शरण आया है और जिसे अभयदान दे दिया है, उसकी रक्षा तो अपने प्राणों की बाजी लगा के भी करना कर्तव्य हो जाता है, शरणागतवत्सलता का यह सिद्धान्त है। रघु राजा इस सिद्धान्त को जानते थे।

➠ इतने में वह राक्षस ‘छोड़ो-छोड़ो’ कहता हुआ वहाँ आ पहुँचा। बोलाः “महाराज ! आप इसे छोड़ दो। मैं भूखा हूँ। यह आहार ब्रह्मा जी ने मेरे लिए तय कर रखा है।”

“यह मेरी शरण आया है। मैं इसका त्याग नहीं करूँगा।”

“मैं भूखा हूँ। आप इसको शरण देंगे तो मैं भूख से मर जाऊँगा। आप तपस्वी, प्राणिमात्र में भगवान को देखने वाले, सबके लिए निर्वैरता रखने वाले हैं तो फिर मेरा शिकार छीनकर मेरे लिए वैरी जैसा व्यवहार क्यों करते हो राजन् ? आप इसको बचाओगे तो मुझे मारने का पाप आपको लगेगा।”

“मैं इसका त्याग नहीं करूँगा। तुम अपनी पसंद का कोई भी दूसरा आहार माँग लो।”

“मैं राक्षस हूँ। मांस मेरा प्रिय आहार है। आप तो शास्त्रज्ञ हैं, जानते हैं कि अपने कारण कोई भूख से पीड़ित होकर मरे तो पाप लगता है। इसको शरण दे बैठे हैं तो क्या आप मुझे मारने का पाप करेंगे ?”

रघु राजा असमंजस में पड़ गये कि “मेरा व्रत है ‘निर्वैरः सर्वभूतेषु……’ किसी से वैर न करना, किसी का बुरा न चाहना। अब ब्राह्मण की रक्षा करता हूँ तो यह बेचारा राक्षस भूखा मरता है और राक्षस की रक्षा करता हूँ तो ब्राह्मण को जान देनी पड़ती है। अब क्या करूँ ?”

➠ तब उन्हें गुरु वशिष्ठ जी का सत्संग याद आ गया कि ‘कठिनता के समय में हरिनाम-स्मरण ही एकमात्र रास्ता है।’

➠ आप सत्संग सुनते हो… उस समय ही आपका भला होता है, ऐसी बात नहीं है। सत्संग के शब्द आपको बड़ी-बड़ी विपदाओं से बचायेंगे और बड़े-बड़े आकर्षणों से, मुसीबतों से भी बचायेंगे।

➠ मनुष्य जब असमंजस में पड़े तो उसे क्या करना चाहिए ? भगवान का नाम लेकर शांत हो जाए… फिर भगवान का नाम ले और फिर शांत हो जाए।

➠ रघु राजा ने निश्चल चित्त से श्रीहरि का ध्यान किया और कहाः “पातु मां भगवान विष्णुः।” भगवान मुझे रास्ता बताएं।

➠ हरि ओऽऽ…म्। हरि ! हरि ! हे मार्गदर्शक ! हे दीनबन्धु ! दीनानाथ ! मेरी डोरी तेरे हाथ। हम हरि की शरण हैं। जो सबमें बसा है विष्णु, हम उसकी शरण हैं। 

➠ भगवान की स्मृति करते ही देखते-देखते राक्षस को दिव्य आकृति प्राप्त हुई। भगवान की स्मृति ने उस राक्षस के कर्म काट दिये। वह कहता हैः “साधो ! साधो !! मैं पिछले जन्म में शतद्युम्न राजा था। यह राक्षस का रूप मुझे मेरे दुष्कर्मों की वजह से महर्षि वसिष्ठजी के श्राप से मिला था। राजन् ! तुमने हरि की शरण ली। तुम्हारे जैसे धर्मात्मा, तपस्वी के मुख से हरिनाम सुनकर मुझे मुक्ति मिल गयी। अब मुझे इस ब्राह्मण की हत्या करके पेट नहीं भरना है, मैं भी हरि की शरण हूँ।” राक्षस की सद्गति हुई, ब्राह्मण को अभयदान मिला और रघु राजा तृप्तात्मा हो गये।

➠ क्या भगवान का सुमिरन है ! क्या सत्संग का एक वचन है ! जो सत्संग का फायदा लेते हैं वे धनभागी हैं और जो दूसरों को सत्संग दिलाते हैं उनके भाग्य का तो कहना ही क्या !

धन्या माता पिता धन्यो….

~ ऋषि प्रसाद, जून 2011, पृष्ठ संख्या 6 अंक 222

Shri RamJi Ki Lambi Aayu K liye: HanumanJi Ko Chola (Sindur) Kyu

hanuman ji ko sindur(chola) kyu

Bhagwan Shri RamJi Ki Lambi Aayu (Age) Ke lie HanumanJi Ne Kya Kia tha? Hanuman Ji Par Sindur Kyu Lagate Hai? :

भगवान श्री रामचंद्र जी के अनन्य भक्त हनुमान जी ने एक मंगलवार को प्रातःकाल माँ जानकी के समीप जाकर कहा : “माँ ! मुझे भूख लगी है, कुछ खाने को दीजिये ।”

 माँ सीता ने कहा : “बेटा ! मै अभी स्नान करने जा रही हूँ । स्नान करके फिर तुम्हें मोदक देती हूँ ।”

माता के वचन सुनकर हनुमान जी प्रभु श्री राम का नाम जपते हुए माता के स्नान कर लेने की प्रतीक्षा करने लगे । स्नान के बाद माता सीता ने माँग में सिंदूर भरा ।

माता की माँग में सिंदूर देख हनुमान जी ने पूछा : “माँ ! आपने यह सिंदूर क्यों लगाया है ?”

माता जानकी ने उत्तर दिया : “इसे लगाने से स्वामी की आयु वृद्धि होती है ।”

‘सिंदूर लगाने से स्वामी की आयु-वृद्धि होती है।’- यह जानकर हनुमान जी उठे और अपने सर्वांग में तेल एवं सिंदूर पोत दिया और राजसभा में पहुँच गये । उन्हें इस स्थिति में  देखकर पूरी सभा जोरों-से हँस पड़ी ।

भगवान श्री राम जी ने मुस्कुराते हुए पूछा : “हनुमान तुमने आज सर्वांग में सिंदूर का लेप क्यों कर लिया है ?”

सरल स्वभाव हनुमान जी ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया : “प्रभु ! माता सीता जी द्वारा तनिक-सा सिंदूर मांग में भरने से आपकी आयु में वृद्धि होती है, यह जानकर आपकी आयु में अत्याधिक वृद्धि के लिए मैंने पूरे शरीर पर सिंदूर लगाया है।”

भगवान श्री राम जी हनुमान जी के सरल स्वभाव एवं निर्दोष प्रेम पर मुग्ध हो गये और उन्होंने घोषणा कर दी : “आज मंगलवार है । इस के दिन अनन्य प्रीतिभाजन महावीर हनुमान को जो तेल एवं सिंदूर चढ़ायेंगे, उन्हें मेरी प्रसन्नता प्राप्त होगी और उनकी समस्त कामनाओं की पूर्ति हो जायेगी।”

 

Pujya Shri AsharamJi Bapu Ke Sadhak ka Anubhav (Experience)

asharam ji bapu sadhak experience

 

Pujya Shri AsharamJi Bapu Ke Sadhak ka Anubhav (Experience)

  साध्वी सजनी बहन, जो पिछले 36 वर्षों से संत श्री आशारामजी महिला उत्थान आश्रम में सेवा-साधना परायण जीवन का सौभाग्य प्राप्त करते हुए अपना आध्यात्मिक उत्थान कर रही हैं और जिन्हें पूज्य बापूजी की पूजनीया मातुश्री माँ महँगीबा जी की निजी सेवा का सौभाग्य भी मिला, अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहती हैं : ‘‘बचपन से ही मैं पैरों के दर्द व पेट की तकलीफों से बहुत परेशान थी । जिस दिन दवाई न लेती उस दिन चलना मुश्किल हो जाता था ।

एक बार मैं पूज्य बापूजी के दर्शन करने आश्रम गयी तो पूज्यश्री ने मुझे प्रसाद दिया । प्रसाद खाने के बाद कुछ ही देर में सालों पुराना पैरों का दर्द चला गया । पूज्य बापूजी की कृपा का ऐसा सामर्थ्य देख मैं दंग रह गयी !

➠ उसके बाद मैंने आज तक पैर- दर्द की एक भी गोली नहीं ली । बाद में मैंने पूज्य बापूजी से मंत्रदीक्षा ले ली और मुझे महिला आश्रम में रहने का सौभाग्य भी मिला । यहाँ मुझे बड़ी शांति मिली एवं मनोबल व आध्यात्मिक बल में वृद्धि होने लगी ।

➠ पर मेरा तीव्र प्रारब्ध होगा इसलिए यहाँ भी रोगों ने पीछा नहीं छोड़ा । बहुत इलाज कराने पर भी लाभ न हुआ बल्कि तकलीफ बढ़ती गयी । आँतों में छाले पड़ गये । पानी की एक बूँद भी पेट में नहीं टिकती थी । मेरा वजन मात्र 27 किलो रह गया । वैद्यों व डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया ।

➠ मैंने पूज्य बापूजी के श्रीचरणों में समस्या निवेदित की तो गुरुदेव ने मुझे हिम्मत दी और कृपास्वरूप स्वास्थ्य मंत्र तथा रुद्राक्ष की माला दी । पूज्यश्री के आशीर्वाद एवं प्रसाद से मेरे चित्त को बहुत ही शांति मिली । रात को सपने में बापूजी के दर्शन हुए । भक्तवत्सल बापूजी बोले : ‘‘बेटी ! तेरा जो दुःखद प्रारब्ध था,उसको मैंने हर लिया है । अब तू निश्चिंत रह । दूसरे दिन से ही मेरा स्वास्थ्य ठीक होने लगा । सारी तकलीफें ठीक हो गयीं । कहाँ तो एक-एक दिन जीना भी मुश्किल हो रहा था और आज मुझे आश्रम में रहते हुए 36 साल हो गये, मैं एकदम स्वस्थ हूँ ।

नाथ केवल एक है – Sant Eknath Ji Maharaj aur ka Unka Shishya

sant eknath ji

“मैं एक ही जप करता हूँ, ʹनाथ केवल एक है, एकनाथ सत्य है। नाथ केवल….. ʹ मैं आपके नाम का ही जप करता रहता हूँ।”

एकनाथ जी के आश्रम में गावबा नाम का उनका एक भक्त था। भोजन में वह  पूरणपूड़ी ही खाता था। रोटी सब्जी, दाल, चावल, दूसरा कुछ उसे अच्छा नहीं लगता था। लोग उसका नाम भूल गये, ʹपूरणपूड़ाʹ कहकर बुलाने लगे।

एक दिन एकनाथ जी महाराज ने गावबा को बुलाया की “बेटे ! आज मैं तेरे को मंत्रदीक्षा देता हूँ। तू उस मंत्र का जप करना।”
गावबा ने कहाः “गुरुजी ! मैं तो एक जप करता हूँ।”
“तूने किसी और गुरु से दीक्षा ली है ?”

“मेरे को आप पूर्ण गुरु मिल गये हैं, मैं फिर और कहीं से दीक्षा क्यों लूँ !”
“मैंने तो तुझे दीक्षा दी नहीं !”
“पर मैं जप करता हूँ।”
“कौन सा जप करता है तू ?”

“मैं एक ही जप करता हूँ,  ʹनाथ केवल एक है, एकनाथ सत्य है। नाथ केवल…ʹ मैं आपके नाम का ही जप करता रहता हूँ।”
एकनाथ जी ने देखा कि लोग भले इसे कुछ भी समझते हों, इसकी तो रग-रग में गुरुभक्ति समायी हुई है। एकनाथ महाराज का हृदय उसके प्रति और छलका और एकनाथ जी महाराज जो ग्रंथ लिख रहे थे ʹभावार्थ रामायणʹ, उसे एकनाथ जी के बाद उनके इसी सत्शिष्य गावबा ने ही पूरा किया।

ʹमैं केवल संतों का दास हूँ…ʹ
संत एकनाथ महाराज कहते हैं कि “मैं केवल संतों का दास हूँ तथा किसी अन्य के आश्रित नहीं रहता हूँ। संत-समागम से सुख की राशि प्राप्त होती है। इसलिए मैंने संत-चरणों का आश्रय लिया है। पाँच इन्द्रियाँ महापातकी एवं विश्वासघाती हैं। इनके चंगुल से बचने के लिए संतसेवा उत्तम है।”

 

मंत्रदाता पूजनीय हैं – Ved Vyasa Ji Short Story in Hindi

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नैमिषारण्य ( जो लखनऊ के पास है ) में शबर जाति का कृपालु नाम का एक व्यक्ति ʹवृक्ष-नमनʹ मंत्रविद्या जानता था। उसकी विद्या में ऐसा प्रभाव था कि खजूर के वृक्ष झुक जाते थे  और उनका रस वह एकत्र करता था। महर्षि वेदव्यासजी को वह मंत्र जान लेने की जिज्ञासा हुई। व्यास जी उसके पास जाते तो कृपालु भाग जाता था।

जब बहुत बार व्यास जी निराश होकर लौटे तो उसके बेटे को उन पर दया आ गयी।

वह बोलाः “आप जैसे महापुरुष हमारे घर आयें और हमारे पिता जी न मिलें, यह ठीक नहीं लगता। आखिर आपको हमारे पिता जी से क्या काम है ?”

वेदव्यासजी बोलेः “मैं उनसे ʹवृक्ष नमन विद्याʹ का मंत्र लेना चाहता हूँ।”

“महाराज ! यह छोटी सी बात तो मैं ही बता दूँ आपको।” थोड़ी विधि करा के बेटे ने मंत्र दे दिया।

कृपालु शबर आया तो बेटे ने सारी हकीकत बता दी। वह नाराज हो गया कि “मूर्ख है तू ! वेदव्यासजी इतने बड़े महापुरुष हैं, उन्हें हम मन्त्र कैसे दे सकते हैं ! अगर हम मंत्र दें और उनमें श्रद्धा नहीं हो तो मंत्र सफल नहीं होगा। जो मंत्र और मंत्रदाता का आदर नहीं करता उसको मंत्र फलता नहीं है।”

तू जा और देख, व्यासजी मंत्र देने वाले का आदरपूजन करते हैं कि नहीं करते ? अगर नहीं करेंगे तो उनको मंत्र नहीं फलेगा।”

शबरपुत्र वेदव्यास जी के पास गया तो उस समय ऋषि, मुनि, तपस्वी, हजारों लोगों से और राजाओं से सम्मानित होने वाले व्यक्ति भी व्यास जी के चरणों में बैठे थे। व्यासजी की नजर जब शबरपुत्र पर पड़ी तो वे उठकर उसका स्वागत करने गये और आसन पर बैठाकर उसका सत्कार किया। वह दंग रह गया कि ʹभगवान श्री कृष्ण जिनका आदर करते हैं ऐसे भगवान व्यासजी ने मेरा सत्कार किया !ʹ

घर जाकर अपने पिता को सारा वृत्तांत सुनाया। तब उसके पिता ने कहाः “सचमुच, व्यासजी महान हैं।”

व्यास जी की विशाल बुद्धि एवं नम्रता का सदगुण, मंत्रदाता का आदर और मंत्र पर श्रद्धा विश्वास हमें बहुत कुछ सिखाता है।

आरुणि की गुरुभक्ति | Guru Bhakt Aruni Story in Hindi | Guru Bhakti ki kahani

➠ पुराने समय में ज्ञान सम्पन्न गुरु और योग्य शिष्यों को बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ।

➠ कुलीन राजघरानों और ब्राहमणों के पुत्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरुकुल और आश्रमों की शरण लिया करते थे । उन दिनों आमोद धौम्य (Dhaumya)  नामक एक ज्ञान सम्पन्न गुरु थे जो अपने शिष्यों के परम आदरणीय थे । गुरु धौम्य ज्ञान और पुरुषार्थ दोनों की ही शिक्षा प्रदान करते थे इसलिए उनके पास निर्धन और सम्पन्न दोनों ही वर्गों के शिष्य आया करते थे । वह बिना भेदभाव के समान रूप से उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे । आश्रम का खर्च शिष्यों द्वारा की गयी कृषि से ही चलता था । शिष्यों को आत्मनिर्भरता का पाठ पढाने के लिए ही गुरु धौम्य ने उन्हें कृषि करने की आज्ञा दी थी ।

➠ वैदिक ज्ञान , कृषि और अनुशासन आदि क्षेत्रों में गुरु धौम्य (Dhaumya) के शिष्यों का कोई मुकाबला नहीं था फिर भी उनकी ऑंखें किसी योग्य शिष्य को तलाशती रहती थी । एक बार इंद्र के प्रकोप के कारण भीषण वर्षा हुयी । जल और थल का भेद मिटने लगा था । लगता था प्रलय आकर ही रहेगा । गुरु धौम्य अपने सभी शिष्यों के साथ चिंतित खड़े वर्षा रुकने की प्रतीक्षा कर रहे थे और वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी ।

➠ उन्होंने अपने शिष्यों से कहा :- “लगता है इस भीषण वर्षा के कारण हमारी फसल नष्ट हो जायेगी और इस वर्ष आश्रम का खर्च नहीं चल पायेगा ।” 

➠ गुरु द्वारा चिंता व्यक्त किये जाने पर भी किसी शिष्य ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । इस भीषण वर्षा से भला कोई कर भी क्या सकता था ? पीछे खड़े एक शिष्य ने प्रश्न किया “गुरुदेव ! क्या इस समस्या का कोई समाधान भी है ।” यह आरुणि (Aruni) था ।

➠ “हां आरुणि (Aruni) समाधान है ” गुरु धौम्य (Dhaumya)  ने आत्मविश्वास के साथ कहा “यदि समय रहते खेत की मेड की मरम्मत कर दी जाए तो फसल को नष्ट होने से बचाया जा सकता है किन्तु इस प्रलयकारी वर्षा और ठंडी घनघोर रात्रि में कौन साहस करेगा खेत तक जाने का ।”

➠ “हम सब मिलकर जायेंगे गुरुदेव ” आरुणि (Aruni) ने पूर्ण उत्साह के साथ कहा पर किसी भी शिष्य के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला । गुरु आमोद धौम्य (Dhaumya)  इस मौन का कारण समझ चुके थे ।

➠ वे बोले “वत्स आरुणि (Aruni) तुम अकेले खेत की मेड ठीक नहीं कर पाओगे ।”

“गुरुदेव ! आप आज्ञा दीजिये मैं प्रयास करके देखना चाहता हूँ ।”

“नहीं वत्स ! मैं तुम्हे अकेले जाने की आज्ञा नहीं दे सकता ” गुरु ने गहरी साँस भरकर कहा ।

➠ आरुणि दृढ़ता से बोला “आप ही कहते हैं कि बिना प्रयास किये हार नहीं माननी चाहिए फिर मैं इस वर्षा से कैसे हार मान सकता हूँ ।”

➠ गुरु धौम्य (Dhaumya) ने आरुणि (Aruni) के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया । आरुणि ने गुरु के मौन को उनकी स्वीकृति माना और वह सर्दी की उस भयावह रात्रि में वर्षा की परवाह किये बिना अकेला ही खेतों की ओर निकल पड़ा ।

➠ आरुणि (Aruni) जब खेतों के निकट पहुंचा तो वर्षा का पानी बाढ़ का रूप लेकर खेत की मेड से टकरा रहा था । आरुणि ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर मिटटी एकत्रित की और मेड की दरार में भर दी । पानी का बहाव बहुत तीव्र था तथा जो दरार आरुणि ने भरी थी वह ओर भी चौड़ी हो चुकी थी ।

➠ आरुणि (Aruni) दरार भरने के जो भी प्रयास करता उसका प्रभाव उल्टा ही पड़ता । उसके सामने गुरु जी का चिंतित चेहरा घूम रहा था । उनके मौन में छुपी उनकी विवशता नजर आ रही थी । आरुणि (Aruni) किसी बड़े शिलाखंड की खोज कर रहा था जिसे वह दरार में लगाकर पानी को रोक सके । जब उसे कोई शिलाखंड न मिला तो स्वयं एक मजबूत शिला बनकर दरार के आगे लेट गये । वर्षा के पानी में अब इतनी शक्ति नहीं थी जो उस अभेद्य दुर्ग को भेद सके ।

➠ आरुणि (Aruni) उसी सुबह तक खेत की उस दरार के आगे लेटा रहा , ठंड के कारण उसका पूरा शरीर अकड़ गया लेकिन उस भक्त गुरु भक्त ने असम्भव को सम्भव कर दिखाया । सुबह गुरु ने उसे देखा तो उनके नेत्रों से आंसू छलक आये । उन्होंने आरुणि के सिर पर प्रेम से हाथ फेरा तो आरुणि की चेतना लौट आयी । उसकी आँखों में विजेताओं जैसी चमक थी । आकाश में इन्द्रधनुष के दोनों सिरे धरा को छू रहे थे जैसे स्वयं इंद्र अपनी पराजय स्वीकार कर रहे हों । गुरु आमोद धौम्य (Dhaumya) को वर्षों से जिस योग्य शिष्य की तलाश थी वह उन्हें मिल चुका था । उन्होंने अपना सम्पूर्ण ज्ञान उस सच्चे उत्तराधिकारी को सौंप दिया और चिंतामुक्त हो गये ।

जहाँ भी रहे…. अपनी महिमा में मस्त | A Short Life Story on Swami Lilashah Ji

Swami Lilashah Ji

जिसने अपने में ही आत्मतृप्ति का अनुभव कर लिया हो उसे कभी कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। वे जहाँ भी रहते हैं वहाँ अपनी महिमा में ही मस्त रहते हैं।

एक बार पूज्य बापूजी (साईं श्री लीलाशाहजी महाराज – Sai Lilashah Ji Maharaj) नैनिताल के बस स्टैण्ड पर बैठकर नश्वर दुनिया के मायावी खेल को देख रहे थे।
उस समय सभी कुली एक ओर बैठकर हुक्का-बीड़ी पीते-पीते मौज से एक-दूसरे के साथ गप-शप कर रहे थे। इतने में अचानक वे लोग आपस में लड़ने लगे। पूज्य बापूजी को हुआ कि अचानक ये लोग लड़ने क्यों लगे ? पूछताछ करने पर पता चला कि वे लोग मिलकर एक मकान किराये पर ले रहे थे। मकान का किराया 32 रूपये था। 15 कुलियों ने प्रत्येक व्यक्ति के दो रूपये के हिसाब से 30 रूपये इकट्ठे किये किन्तु दो रूपये कम पड़े वह कौन दे ? इस विषय में झगड़ा हो रहा था।

उस जमाने में गरीब मजदूरों के लिए दो रूपये निकालना बड़ी बात थी। पूज्य बापू के पास उस समय नैनिताल में रहने के लिए कोई आश्रम या मकान नहीं था। पूज्य बापूजी ने कुलियों से कहाः
“अरे भाई ! तुम दो रूपये मेरे पास से ले लेना। 15 लोग तुम और 16 वाँ साथी मुझे बना लो। हम सोलह किरायेदार हो जायेगें और 32 रूपये किराया। क्यों? अब तो मामला निपट गया न?”

इस प्रकार पूज्य बापूजी ने 2 रूपयों में ‘मेम्बरशिप’ ले ली और कई वर्षों तक गर्मी के समय में वे उन लोगों के साथ रहे। वे 15 डोटियाल (कुली) और सोलहवें ये महान संत !

वे महा पवित्र हो गये थे। अनंत-अनंत ब्रह्मांडों के ये बेपरवाह बादशाह उन कुलियों के साथ रहे। अब कोई भी अपवित्रता उन्हें छू भी नहीं सकती थी। कहा जाता है कि लोहे के टुकड़े को मिट्टी में रखोगे तो जंग लगेगा। उसे धो-पोंछकर, सँभालकर अटारी पर रखोगे तो भी हवा लगने से पुनः जंग लग जायेगा किन्तु उस टुकड़े को एक बार पारसमणि का स्पर्श हो जाये फिर भले ही उसे अटारी पर रखो या कीचड़ में फेंक दो, उसे जंग नहीं लगेगा। पूज्य बापूजी भी भले गुफा में रहें या कुलियों के बीच रहें, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसने अपने में ही आत्मतृप्ति का अनुभव कर लिया हो उसे कभी कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। वे जहाँ भी रहते हैं वहाँ अपनी महिमा में ही मस्त रहते हैं।

श्री भोले बाबा ने ठीक ही कहा हैः
रहता सभी के संग पर, करता न किंचित् संग है।
है रंग पक्के में रंगा, चढ़ता न कच्चा रंग है।
है आपमें संलग्न, अपने आपमें अनुरक्त है।
है आपमें संतुष्ट सो, इच्छा बिना ही मुक्त है।।

~जीवन सौरभ साहित्य से

गुरुकृपा से कैंसर के रोग से मुक्ति | Experience- Gurukripa Se Cancer Treatment

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अहमदाबाद की मेनका चंदानी जी जिनको सन् 1974 से पूज्य बापूजी के श्री चरणों में प्रत्यक्ष सत्संग श्रवण का सौभाग्य मिला। वे पूज्य श्री के सत्संग सान्निध्य की महिमा से ओतप्रोत एक अनुभव बताती हैं कि मेरे पिताजी एक मिल में मैनेजर थे। वे धार्मिक तो थे परन्तु संतों पर विश्वास नहीं करते थे। सत्संग में खुद भी नहीं जाते थे और हमको भी नहीं जाने देते थे।

 1981 में उनको गले का कैंसर (Throat cancer) हो गया। डॉक्टरों ने बोला इन्हें टाटा हॉस्पिटल जो मुम्बई में है उधर ले जाओ। मेरे चाचाजी की बापूजी के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। वे पिताजी से बोले कि आपको कहाँ ले चलें अस्पताल या बापूजी के पास!

पिताजी ने कहा- “चलो! एक बार बापूजी के पास ले चलो।”

यह सुनकर हम सबको आश्चर्य हुआ कि संतों में श्रद्धा न रखने वाले पिताजी ऐसा बोले। चाचाजी पिताजी को पूज्य श्री के पास ले गये और प्रार्थना की तो बापूजी ने उनकी सारी जाँच रिपोर्टें लेकर अपने पास रख ली और बोले- “तुझे डॉक्टर के पास जाना है या यहाँ पर ठीक होना है..?”

पिताजी ने कहा- “साँईजी आपसे ही ठीक होना है!!”

पूज्य श्री बोले- ‘ठीक है!! फिर इधर आते रहना सत्संग सुनते रहना और चिंता छोड़ देना सब ठीक हो जायेगा। “

सबको आश्चर्य हुआ कि केवल सत्संग श्रवण से व्यक्ति कैसे ठीक होगा। पिताजी नियमित रूप से आश्रम में आकर सत्संग सुनने लगे। सत्संग सुनने मात्र से उनकी चिंता दूर हो गई। बापूजी उनको सात्वंना देते, धैर्य बँधाते, आत्मबल भरते, प्रसाद देते। सत्संग में आने से धीरे-धीरे कैंसर का वह फोड़ा दो तीन माह में ठीक होता गया । बापूजी रोज मेरे पिताजी को प्रसाद देते थे। एक बार एक ऐसा सेवफल दिया जिस पर थोड़ा-सा काला दाग था।

पूज्य श्री वह देते हुए बोले- “इस सेवफल पर जितना दाग है उतना ही तेरा रोग रह गया है! अब इतना डॉक्टर से ठीक करा ले।”

तब तक पिताजी का श्रद्धा विश्वास पक्का हो गया था। 

पिताजी ने कहा- “बापूजी अब मुझे किसी डॉक्टर के पास नहीं जाना, अब आप ही मेरे डॉक्टर हैं मुझे आप ही से ठीक होना है ।”

पूज्य श्री ने कहा- “लेकिन मैं बोलता हूँ तू डॉक्टर के पास जा और थोड़ी सी पट्टी करा ले!!”

आज्ञा मानकर पिताजी ने केवल एक बार मरहम पट्टी करवाई और कुछ ही दिनों में घाव पूरी तरह ठीक हो गया।

एक दिन पूज्य श्री ने वे ही जाँच रिपोर्टें पिताजी को वापस की और बोले- “ये ले जा और उसी डॉक्टर को दिखा !!” डॉक्टर को रिपोर्टें दिखाई तो वह दंग रह गया कि उस समय रिपोर्टों में कैंसर था परन्तु अभी कहाँ गायब हो गया…? फिर तो मेरे पिताजी को पूज्य श्री के सत्संग का गहरा रंग लग गया था। इस तरह बापूजी ने मेरे पिताजी को नया जीवन दिया था।

 

संत और सम्राट | Saint And King – An Inspirational Story & Message in Hindi

raja ki kahani

-स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज की अमृतवाणी

Swami Leelashah Ji Maharaj Ki Amritwani :

एक बार एक संत श्री राजदरबार में गये और इधर-उधर देखने लगे ।

मंत्री ने आकर संत श्री से कहा : “हे साधो ! यह राजदरबार है । आप देखते नहीं कि सामने राजसिंहासन पर राजा जी विराजमान हैं ? उन्हें झुककर प्रणाम कीजिये ।”

संत (Saint) श्री ने उत्तर दिया : “अरे मंत्री ! तू राजा से पूछकर आ कि आप मन के दास हैं या मन आपका दास है ?”

मंत्री ने राजा के समीप जाकर उसी प्रकार पूछा । राजा (King) लज्जा गया और बोला : “मंत्री ! आप यह क्या पूछ रहे हैं ? सभी मनुष्य मन के दास हैं । मन जैसा कहता है वैसा ही मैं करता हूँ ।”

मंत्री ने राजा का यह उत्तर संतश्री से कहा ।

वे यह सुनकर बड़े जोर से हँस पड़े और बोले : ” सुना मंत्री ! तेरा राजा मन का दास है और मन मेरा दास है, इसलिये तेरा राजा मेरे दास का दास हुआ । मैं उसे झुककर किस प्रकार प्रणाम करुँ ? तेरा राजा राजा नहीं, पराधीन है । घोड़ा सवार के आधीन होने के बदले यदि सवार घोड़े के आधीन है तो घोड़ा सवार को ऎसी खाई में डालता है कि जहाँ से निकलना भारी पड़ जाता है ।”

संतश्री के कथन में गहरा अनुभव था । राजा के कल्याण की सद्भावना थी । हृदय की गहराई में सत्यता थी । अहंकार नहीं किन्तु स्वानुभूति की स्नेहपूर्ण टंकार थी । राजा पर उन जीवन्मुक्त महात्मा के सान्निध्य, वाणी और द्रुष्टि का दिव्य प्रभाव पड़ा ।

संतश्री के ये शब्द सुनकर राजा सिंहासन से उठ खड़ा हुआ । आकर उनके पैरों में पड़ा । संतश्री ने राजा को उपदेश दिया और मानव देह का मूल्य समझाया ।

~मन को सीख साहित्य से

 

शिष्य रामदास की अनोखी परीक्षा | Story of 4th Sikh Guru Ramdas ji di Gurgaddi

shishya ramdas ki anokhi pariksha

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सदगुरु सदैव अपने शिष्य पर रहमत की बरसात करते ही रहते हैं। धन्य हैं जो गुरु कृपा को पचाते हैं।

सिख गुरु अमरदास जी (Guru Amardas) की उम्र लगभग 105 वर्ष हो गयी थी, तब उनके कुछ शिष्य सोचा करते थे, ʹमैंने गुरु जी की बहुत सेवा की है, इसलिए यदि गुरुगद्दी मुझे सौंप दी जाय तो कितना अच्छा होगा !ʹ

एक दिन अमरदास जी (Guru Amardas Ji) ने शिष्यों को बुलाकर कहाः “तुम लोग अलग-अलग अच्छे चबूतरे बनाओ !”

चबूतरे बन गये पर उनमें से एक भी पसंद नहीं आया। उन्होंने फिर से बनाने को कहा। ऐसा कई बार हुआ। शिष्य चबूतरे बनाते और गुरुजी उन्हें तोड़ने को कहते।

आखिर शिष्य निराश हो गये और सेवा छोड़कर जाने लगे किन्तु शिष्य रामदास अभी भी चबूतरा बनाने में जुटा हुआ था। उन लोगों ने उससे कहाः “पागल का हुक्म मानकर तुम भी पागल क्यों बन रहे हो ? चलो छोड़ दो चबूतरा बनाना।”

रामदास (Ramdas Ji) ने कहाः “अगर गुरु पागल हैं तो किसी का भी दिमाग दुरुस्त नहीं रह सकता। हमें तो यही सीख मिली है कि गुरु ईश्वर का ही दूसरा रूप हैं और उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। अगर गुरुदेव सारी जिंदगी चबूतरा बनाने का आदेश दें तो रामदास जिंदगी भर चबूतरा बनाता रहेगा।”

इस प्रकार रामदास (Ramdas Ji) ने लगभग सत्तर चबूतरे बनाये और अमरदास जी ने उन सबको तुड़वाकर फिर से बनाने का आदेश दिया। आखिर गुरु ने उसकी लगन और भक्ति देख उसे छाती से लगा कर कहाः “तू ही सच्चा शिष्य है और तू ही गुरुगद्दी का अधिकारी होने के काबिल है।”

इतिहास साक्षी है कि गुरु अमरदासजी (Guru Amardas Ji)  के बाद गुरुगद्दी सँभालने वाले रामदास जी  (Guru Ramdas Ji) ही थे।