Subah Ki Surya Ki Kiran (Dhoop) Ke Fayde [Sunbathing Benefits]

Surya Kiran chikitsa sunbathing benefits

➠ निर्दोष चिकित्सा पद्धतियों की औषधियों में सूर्य और चन्द्रमा की कृपा से ही रोगनाशक शक्तियाँ आती हैं । सूर्यस्नान से बहुत सारे रोग मिटते हैं ।

▣ Benefits of Sunbathing in Hindi [Sunlight Benefits in Hindi]

➠ सिर को ढककर सूर्य की कोमल किरणों में लेट जाओ । लेटे-लेटे किया गया सूर्यस्नान विशेष फायदा करता है । सारे शरीर को सूर्य की किरणें मिलें, जिससे आपके अंगों में जिन रंगों की कमी है, वात-पित्त का जो असंतुलन है, वह ठीक होने लगे ।

What to do after sunbathing in Hindi

➠ सूर्यस्नान करने के पहले एक गिलास गुनगुना पानी पी लो और सूर्यस्नान करने के बाद ठंडे पानी से नहा लो तो ज्यादा फायदा होगा ।

➠ सूर्य की रश्मियों में अद्भुत रोगप्रतिकारक शक्ति है। दुनिया का कोई वैद्य अथवा कोई मानवी इलाज उतना दिव्य स्वास्थ्य और बुद्धि की दृढता नहीं दे सकता है, जितना सुबह की कोमल सूर्य-रश्मियों में छुपे ओज-तेज से मिलता है।

➠ शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सूर्यस्नान बाहर से ठीक है, लेकिन मन और मति को ठीक करने के लिए भगवान के नाम का जप आवश्यक है ।

वर्षा ऋतु/ [Monsoon] Health tips in Hindi for Rainy Season

Rainy Season Health Tips

Monsoon/ Rainy Season Health tips in Hindi– (पूज्य बापूजी के सत्संग-अमृत से संकलित)
(वर्षा ऋतु : 20 जून से 21 अगस्त)

(1) वर्षा ऋतु में मंदाग्नि, वायुप्रकोप, पित्त का संचय आदि दोषों की अधिकता होती है । इस ऋतु में भोजन आवश्यकता से थोड़ा कम करोगे तो आम (कच्चा रस) तथा वायु नहीं बनेंगे या कम बनेंगे, स्वास्थ्य अच्छा रहेगा । भूल से भी थोड़ा ज्यादा खाया तो ये दोष कुपित होकर बीमारी का रूप ले सकते हैं ।

(2) काजू, बादाम, मावा, मिठाइयाँ भूलकर भी न खायें, इनसे बुखार और दूसरी बीमारियाँ होती हैं ।

(3) अशुद्ध पानी पियेंगे तो पेचिश व और कई बीमारियाँ हो जाती हैं । अगर दस्त हो गये हों तो खिचड़ी में देशी गाय का घी डाल के खा लो तो दस्त बंद हो जाते हैं । पतले दस्त ज्यादा समय तक न रहें इसका ध्यान रखें ।

(4) बरसाती मौसम के उत्तरकाल में पित्त प्रकुपित होता है इसलिए खट्टी व तीखी चीजों का सेवन वर्जित है ।

(5) जिन्होंने बेपरवाही से बरसात में हवाएँ खायी हैं और शरीर भिगाया है, उनको बुढ़ापे में वायुजन्य तकलीफों के दुःखों से टकराना पड़ता है ।

(6) इस ऋतु में खुले बदन घूमना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ।

(7) बारिश के पानी में सिर भिगाने से अभी नहीं तो 20 वर्षों के बाद भी सिरदर्द की पीड़ा अथवा घुटनों का दर्द या वायु-संबंधी रोग हो सकते हैं ।

(8) जो जवानी में ही धूप में सिर ढकने की सावधानी रखते हैं उनको बुढ़ापे में आँखों की तकलीफें जल्दी नहीं होतीं तथा कान, नाक आदि निरोग रहते हैं ।

(9) बदहजमी के कारण अम्लपित्त (hyperacidity) की समस्या होती है और बदहजमी से जो वायु ऊपर चढ़ती है उससे भी छाती में पीड़ा होती है । वायु और पित्त का प्रकोप होता है तो अनजान लोग उसे हृदयाघात (heart attack) मान लेते हैं, डर जाते हैं । इसमें डरें नहीं, 50 ग्राम जीरा सेंक लो व 50 ग्राम सौंफ हलकी सेंक लो तथा 20-25 ग्राम काला नमक लो और तीनों को कूटकर चूर्ण बना के घर में रख दो । ऐसा कुछ हो अथवा पेट भारी हो तो गुनगुने पानी से 5-7 ग्राम फाँक लो ।

(10) अनुलोम-विलोम प्राणायाम करो – दायें नथुने से श्वास लो, बायें से छोड़ो फिर बायें से लो और दायें से छोड़ो । ऐसा 10 बार करो । दोनों नथुनों से श्वास समान रूप से चलने लगेगा । फिर दायें नथुने से श्वास लिया और 1 से सवा मिनट या सुखपूर्वक जितना रोक सकें अंदर रोका, फिर बायें से छोड़ दिया । कितना भी अजीर्ण, अम्लपित्त, मंदाग्नि, वायु हो, उनकी कमर टूट जायेगी । 5 से ज्यादा प्राणायाम नहीं करना । अगर गर्मी हो जाय तो फिर नहीं करना या कम करना ।

– ऋषिप्रसाद, जून 2018 (पाठ्यक्रम – जुलाई माह 2020)

Chini (Sugar) & Mithai (Sweets) Ke Nuksan (Health Side effects)

chini ke nuksan

White Sugar (Chini) Khane Ke Nuksan || Mithai/Sweets/ Toffee Ke Health Side effects in Hindi : शक्कर या मिठाइयाँ खाने की लत बच्चों के स्वास्थ्य को बहुत हानि पहुंचाती है। इससे चिड़चिड़ापन, मोटापा, दाँतों में दर्द व सड़न होना आदि अनेक समस्याएँ पैदा होती हैं। इनके बदले बच्चों को ऐसे खाद्य पदार्थ दिये जाएँ जिनसे उन्हें प्राकृतिक शर्करा प्राप्त हो । जैसे किशमिश, खजूर, शुद्ध शहद, अंजीर आदि । इससे जिन बच्चों की ज्यादा शक्कर खाने की आदत हो उनकी वह आदत भी छूटेगी और स्वास्थ्य-रक्षा भी होगी। नमक का सेवन भी अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।

घर पर ही तैयार करें ब्राह्मी घृत। How to Prepare Brahmi Ghrita ?

क्या आपको ब्राह्मी घृत नहीं मिल पाया ?
तो क्या आप सूर्यग्रहण के इस विशेष योग का लाभ लेने से वंचित रह जायेंगे ???
 
नहीं… !!!
 
निम्न विधि द्वारा आप अपने घर पर ही ब्राह्मी घृत तैयार कर सकते हैं ।
 
आइये सीखते हैं –
आवश्यक सामग्री ( 100 ग्राम ब्राह्मी घृत बनाने के लिए )
1. 100 ग्राम ब्राह्मी के सूखे पत्ते ( न मिलने पर ब्राह्मी चूर्ण भी उपयोग कर सकते हैं )
2. वचा चूर्ण – 13 ग्राम
3. शंखपुष्पी चूर्ण – 13 ग्राम
4. कुष्ठ ( उपलेट ) चूर्ण – 13 ग्राम
5. 100 ग्राम गौ-घृत
6. 1700 मि.ली. पानी
 
बनाने की विधि
क्र. 1 से 4 के द्रव्यों को 12 गुना यानि लगभग 1700 मि.ली. पानी में 6 घंटे के लिए भिगोकर रख दें ।
उसके बाद उसे उबालकर एक चौथाई (425 मि.ली.) कर लें । छानकर इस काढ़े में 100 ग्राम गौ-घृत मिलाएं ।
फिर धीमी आँच पर इतना पकाएं कि जलीय अंश जल जाए और केवल घृत रह जाए । घृत बन जाने पर ऊपर की झाग शान्त हो जाती है । फिर उसे छान कर काँच या स्टील के बर्तन में रख लें ।
इस प्रकार आप अपने घर पर ही ब्राह्मी घृत तैयार कर सकते हैं ।
 
उपयोग विधि 
ग्रहणकाल के दौरान ब्राह्मी घृत को निहारते हुए अपने बाएं हाथ की अनामिका उंगली से घृत को स्पर्श करते हुए ८,००० बार ( ८० माला  “ॐ नमो नारायणाय” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें ।
 
सेवन विधि
ग्रहणकाल पूरा होने पर स्नान आदि से शुद्ध होने के बाद 6-12 ग्राम घृत का सेवन करें ।  शेष ब्राह्मी घृत प्रतिदिन सुबह 6 से 12 ग्राम ले सकते हैं ।
 
ब्राह्मी घृत का सेवन कब और कैसे करना है ? और इसके सेवन से क्या चमत्कारिक लाभ होते हैं ?
जानने के लिए लिंक पर क्लिक करें :- Click Here
 
नोट : अगर ब्राह्मी के अतिरिक्त चीजें न मिल पाएं तो मात्र ब्राह्मी में 12 गुना पानी मिलाकर भी उपरोक्त विधि से घृत सिद्ध करके उपयोग कर सकते हैं ।

पेट के कीड़े, दस्त, ज्वर (Fever) Ki Ayurvedic Medicine (Dawa)

kuch samanya rogo ke upay

१) पेट के कीड़े : पपीते के ४-५ बीज व थोड़ा पपीता ‘ संत कृपा चूर्ण ‘ डालकर प्रातः खाली पेट ५-७ दिन लें। साल में ऐसा २-४ बार करें।
२) सामान्य ज्वर : १ काली मिर्च ५-७ तुलसी-पत्तों के साथ पीस के शहद के साथ दिन में १ बार चाटने से बच्चों का सामान्य ज्वर उतरेगा।
३) दस्त व अजीर्ण : बच्चों को इनसे बचाने के लिए कभी -कभी १०मि.ली. पुदीना अर्क आवश्यकतानुसार पानी के साथ दें।

(आंवला-भृंगराज तेल, संतकृपा चूर्ण, पुदीना अर्क, किशमिश, शहद सत्साहिल्य सेवाकेन्द्रों व संत श्री आशारामजी आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर तथा ब्राह्मी तेल व ब्राह्मी घृत आश्रम -संचालित आरोग्य केन्द्रों पर उपलब्ध है)

स्वास्थ्य व पर्यावरण रक्षक पेड़- Plants that Improves Health

World Environment Day

अन्न, जल और वायु हमारे जीवन के आधार हैं । सामान्य मनुष्य प्रतिदिन औसतन १ किलो अन्न और २ किलो जल लेता है परंतु इनके साथ वह करीब १०,००० लीटर (१२ से १३.५ किलो) वायु भी लेता है । इसलिए स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु शुद्ध वायु अत्यंत आवश्यक है ।

प्रदूषणयुक्त, ऋण-आयनों की कमीवाली एवं ओजोन रहित हवा से रोगप्रतिकारक शक्ति का ह्रास होता है व कई प्रकार की शारीरिक-मानसिक बीमारियाँ होती हैं ।
पीपल का वृक्ष दमानाशक, हृदयपोषक, ऋण-आयनों का खजाना, रोगनाशक, आह्लाद व मानसिक  प्रसन्नता  का  खजाना  तथा रोगप्रतिकारक शक्ति बढानेवाला है । बुद्धु बालकों तथा हताश-निराश लोगों को भी पीपल के स्पर्श एवं उसकी छाया में बैठने से अमिट स्वास्थ्य-लाभ व पुण्य-लाभ होता है । पीपल की जितनी महिमा गाएं, कम है । पर्यावरण की शुद्धि के लिए जनता-जनार्दन एवं सरकार को बबूल, नीलगिरी (यूकेलिप्टस) आदि जीवनशक्ति का ह्रास करनेवाले वृक्ष सड़कों एवं अन्य स्थानों से हटाने चाहिए और पीपल, आँवला, तुलसी, वटवृक्ष व नीम के वृक्ष दिल खोल के लगाने चाहिए । इससे अरबों रुपयों की दवाइयों का खर्च बच जायेगा । ये वृक्ष शुद्ध वायु के द्वारा प्राणिमात्र को एक प्रकार का उत्तम भोजन प्रदान करते हैं । पूज्य बापूजी कहते हैं कि “ये वृक्ष लगाने से आपके द्वारा प्राणिमात्र की बड़ी सेवा होगी ।” यह लेख पढने के बाद सरकार में अमलदारों व अधिकारियों को सूचित करना भी एक सेवा होगी । खुद वृक्ष लगाना और दूसरों को प्रेरित करना भी एक सेवा होगी ।

पीपल : यह धुएँ तथा धूलि के दोषों को वातावरण से सोखकर पर्यावरण की रक्षा करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण वृक्ष है । यह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है । इसके नित्य स्पर्श से रोग-प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि, मनःशुद्धि, आलस्य में कमी, ग्रह पीड़ा का शमन, शरीर के आभामंडल की शुद्धि और विचारधारा में धनात्मक परिवर्तन होता है । बालकों के लिए पीपल का स्पर्श बुद्धिवर्धक है । रविवार को पीपल का स्पर्श न करें ।

आँवला : आँवले का वृक्ष भगवान विष्णु को प्रिय है । इसके स्मरणमात्र से गौदान का फल प्राप्त होता है । इसके दर्शन से दुगना और फल खाने से तिगुना पुण्य होता है । आँवले के वृक्ष का पूजन कामनापूर्ति में सहायक है । कार्तिक में आँवले के वन में भगवान श्रीहरि की पूजा तथा आँवले की छाया में भोजन पापनाशक है । आँवले के वृक्षों से वातावरण में ऋणायनों की वृद्धि होती है तथा शरीर में शक्ति का, धनात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
आँवले से नित्य स्नान पुण्यमय माना जाता है और लक्ष्मीप्राप्ति में सहायक है । जिस घर में सदा आँवला रखा रहता है वहाँ भूत, प्रेत और राक्षस नहीं जाते ।

तुलसी : प्रदूषित वायु के शुद्धीकरण में तुलसी का योगदान सर्वाधिक है । तुलसी का पौधा उच्छ्वास में स्फूर्तिप्रद ओजोन वायु छोड़ता है, जिसमें ऑक्सीजन के दो के स्थान पर तीन परमाणु होते हैं । ओजोन वायु वातावरण के बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि को नष्ट करके ऑक्सीजन में रूपांतरित हो जाती है । तुलसी उत्तम प्रदूषणनाशक है । फ्रेंच डॉ. विक्टर रेसीन कहते हैं : ‘तुलसी एक अद्भुत औषधि है । यह रक्तचाप व पाचनक्रिया का नियमन तथा रक्त की वृद्धि करती है ।’

वटवृक्ष : यह वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी में जल की मात्रा का स्थिरीकरण करनेवाला एकमात्र वृक्ष है । यह भूमिक्षरण को रोकता है । इस वृक्ष के समस्त भाग औषधि का कार्य करते हैं । यह स्मरणशक्ति व एकाग्रता की वृद्धि करता है । इसमें देवों का वास माना जाता है । इसकी छाया में साधना करना बहुत लाभदायी है । वातावरण-शुद्धि में सहायक हवन के लिए वट और पीपल की समिधा का वैज्ञानिक महत्त्व है ।

नीम : नीम की शीतल छाया कितनी सुखद और तृप्तिकर होती है, इसका अनुभव सभी को होगा । नीम में ऐसी कीटाणुनाशक शक्ति मौजूद है कि यदि नियमित नीम की छाया में दिन के समय विश्राम किया जाय तो सहसा कोई रोग होने की सम्भावना ही नहीं रहती । नीम के अंग-प्रत्यंग (पत्तियाँ, फूल, फल, छाल, लकडी) उपयोगी और औषधियुक्त होते हैं । इसकी कोपलों और पकी हुई पत्तियों में प्रोटीन, कैल्शियम, लौह और विटामिन ‘ए पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं ।

नीलगिरी के वृक्ष भूल से भी न लगायें, ये जमीन को बंजर बना देते हैं । जिस भूमि पर ये लगाये जाते हैं उसकी शुद्धि १२ वर्ष बाद होती है, ऐसा माना जाता है । इसकी शाखाओं पर ज्यादातर पक्षी घोंसला नहीं बनाते, इसके मूल में प्रायः कोई प्राणी बिल नहीं बनाते, यह इतना हानिकारक, जीवन-विघातक वृक्ष है । हे समझदार मनुष्यों ! पक्षी एवं प्राणियों जितनी अक्ल तो हमें रखनी चाहिए । हानिकर वृक्ष हटाओ और तुलसी, पीपल, आँवला आदि लगाओ ।

(ऋषि प्रसाद : अगस्त २००९)

 

गर्मि घमौरियाँ इलाज, दवा, उपचार – Ghamoriya Home Remedies

Ghamoriya home remedies

गर्मियों के दिनों में त्वचा में पसीना सूखने से रोमकूप बंद हो जाते हैं। शरीर में छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं जिनमें खुजली होती है। उन्हीं को घमौरियां या अँधौरी कहते हैं। इनसे बचाव व उपचार हेतु निम्न प्रयोग लाभदायक हैं..~

(१) खोपरे ( नारियल ) के तेल में थोड़ा नींबू-रस मिलाकर मलने से घमौरियों व खुजली में लाभ होता है।

(२) दूध में मुलतानी मिट्टी मिला के घमौरियों पर लेप करें।

(३) गर्मियों में सूती कपड़े पहनने चाहिए।

(४) अधिक पसीना आता हो तो सूती कपड़े से पोंछते रहें।

(५) गर्मियों में २ बार स्नान करना हितकारी है।

~ गुरुकुल दर्पण

Harmful Problems/ Effects of Fast Food on Kids Health in Hindi

fast food harms

मिठाइयाँ व फास्ट फूड का शौक कुप्रवृत्तियों का कारण है। डॉ. ब्लोच लिखते हैं कि “मिठाई का शौक जल्दी कुप्रवृत्तियों की ओर प्रेरित करता है।”

जो बच्चे मिठाई के ज्यादा शौकीन होते हैं उनके पतन की ज्यादा सम्भावना रहती है और दूसरे बालकों की अपेक्षा वे हस्तमैथुन जैसे कुकर्मो की ओर जल्दी खिंच जाते हैं तो बल व ओज-तेज के रक्षण हेतु कितना जरूरी है मिठाइयों से बचना!

मैदा और प्राणिज वसा (एनिमल फैट) के संयोग से बननेवाले बेकरी के पदार्थ जैसे विभिन्न प्रकार के ब्रेड, बिस्कुट, पाव, नानखटाई, पीजा, बर्गर आदि एवं बेकिंग पाउडर डाल के बनाये जानेवाले पदार्थ जैसे – नूडल्स आदि तथा सैकरीन से बनाये गये बाजारू पदार्थ जैसे आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स, शरबत आदि तथा मिठाइयाँ ये सब खाने में तो स्वादिष्ट लगते हैं परंतु स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं ।

 पाचन में अत्यंत भारी ऐसे पदार्थ व मिठाइयाँ खाने से कब्ज एवं मंदाग्नि होती है, जो सब रोगों का मूल है। मंदाग्नि होने से सातवीं धातु ( वीर्य ) कैसे बन सकती है ?
अतः अंत में नपुंसकता आ जाती है!

ये पदार्थ बल, बुद्धि और स्वास्थ्य के नाशक, रोगकारक एवं तमोगुण बढ़ानेवाले होते हैं। अतः इनसे आप भी बचें, औरों को भी बचायें।

 
 

शाकाहार ही सर्वोत्तम आहार | Vegetarian Food (Diet) is Best

shakahar hi sarvottam aahar

मनुष्य के दाँतों व आँतों की रचना व कार्यप्रणाली शाकाहार के ही अनुकूल है, मांसाहार के नहीं।

वैज्ञानिकों ने इस बात को सिद्ध किया है कि मरते समय पशुओं में उत्पन्न भय, कम्पन, चीत्कार तथा उनमें उपस्थित विषाक्त पदार्थ, बीमारियाँ व उनकी हिंसक प्रवृत्तियाँ मांस रखने वालों के तन व मन पर गहरा कुप्रभाव डालती हैं। ʹविश्व स्वास्थ्य संगठनʹ ने मांसाहार से होने वाली 160 बीमारियों के नाम प्रमाणित किये हैं। 

मांसाहारी व्यक्ति कब्ज, गैस, बवासीर व सिरदर्द से पीड़ित रहते हैं। मांसाहार से मिर्गी, कैंसर, हृदयरोग, चर्मरोग, पथरी व गुर्दे-संबंधी अनेक बीमारियाँ होती हैं। तनाव, क्रोध, आवेग, आपराधिकता, कामुकता आदि मानसिक रोग घेर लेते हैं। जबकि शाकाहार से सत्त्वगुण की वृद्धि होती है, जिससे प्रसन्नता, स्फूर्ति प्राप्त होती है। 

हरी सब्जियाँ, फलों, अनाज आदि से पर्याप्त पोषक तत्त्व मिलने से रोगग्रस्त होने की सम्भावना कम होती है।

 

हेमंत ऋतु में स्वास्थ्य रक्षा | Healthy Lifestyle Tips For Hemant Ritu in hindi

healthy lifestyle tips

Helthy Lifestyle Tips : Hemant Ritu

हेमंत ऋतु प्रारम्भ …

* यह ऋतु विसर्गकाल अर्थात् दक्षिणायन का अन्तकाल कहलाती है ।

* इस काल में चन्द्रमा की शक्ति सूर्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है इसलिये इस ऋतु में औषधियाँ, वृक्ष, पृथ्वी व जीव-जन्तुओं की पौष्टिकता में भरपूर वृद्धि होती है । शीत ऋतु में शरीर में कफ का संचार होता है तथा पित्तदोष का नाश होता है ।

* शीत ऋतु में जठराग्नि अत्यधिक प्रबल रहती है अतः इस समय लिया गया पौष्टिक और बलवर्धक आहार वर्ष भर शरीर को तेज, बल और पुष्टता प्रदान करता है । इस ऋतु में एक स्वस्थ व्यक्ति को अपनी सेहत की तन्दुरुस्ती के लिये किस प्रकार का आहार लेना चाहिए ? शरीर रक्षण कैसे हो ? आइये, हम उसे जानें :-

● शीत ऋतु के इस काल में खट्टा, खारा तथा मधुर रसप्रधान आहार लेना चाहिए ।

● पचने में भारी, पौष्टिकता से भरपूर, गरिष्ठ एवं घी से बने पदार्थों का सेवन अधिक करना चाहिए ।

● इस ऋतु में सेवन किये हुए खाद्य पदार्थों से ही वर्ष भर शरीर की स्वस्थता की रक्षा का भंडार एकत्रित होता है । अतः उड़दपाक, सोंठपाक जैसे बाजीकारक पदार्थों अथवा च्यवनप्राश आदि का उपयोग करना चाहिए ।
जो पदार्थ पचने में भारी होने के साथ-साथ गरम व स्निग्ध प्रकृति के होते हैं, ऐसे पदार्थ लेने चाहिए ।

● दूध, घी, मक्खन, गुड़, खजूर, तिल, खोपरा, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ानेवाले अन्य पौष्टिक पदार्थ इस ऋतु में सेवन करने योग्य माने जाते हैं ।

● इन दिनों में ठंडा भोजन नहीं करना चाहिए बल्कि थोड़ा गर्म एवं घी-तेल की प्रधानता वाला भोजन करना चाहिए ।
(लोक कल्याण सेतु : दिसम्बर 2000)