सुप्तवज्रासन

इस आसन में ध्यान करने से मेरूदण्ड को सीधा करने का श्रम नहीं करना पड़ता और मेरूदण्ड को आराम मिलता है। उसकी कार्य़शक्ति प्रबल बनती है। इस आसन का अभ्यास करने से प्रायः तमाम अंतःस्रावी ग्रन्थियों को, जैसे शीर्षस्थ ग्रन्थि, कण्ठस्थ ग्रन्थि, मूत्रपिण्ड की ग्रन्थि, ऊर्ध्वपिण्ड तथा पुरूषार्थ ग्रन्थि आदि को पुष्टि मिलती है। फलतः व्यक्ति का भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास सरल हो जाता है। तन-मन का स्वास्थ्य प्रभावशाली बनता है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है। मलावरोध की पीड़ा दूर होती है। धातुक्षय, स्वप्नदोष, पक्षाघात, पथरी, बहरा होना, तोतला होना, आँखों की दुर्बलता, गले के टॉन्सिल, श्वासनलिका का सूजन, क्षय, दमा, स्मरणशक्ति की दुर्बलता आदि रोग दूर होते हैं।

यह आसन करने में श्रम बहुत कम है और लाभ अधिक होता है। इसके अभ्यास से सुषुम्ना का मार्ग अत्यन्त सरल होता है। कुण्डलिनी शक्ति सरलता से ऊर्ध्वगमन कर सकती है।

वज्रासन में बैठने के बाद चित्त होकर पीछे की ओर भूमि पर लेट जायें। दोनों जंघाएँ परस्पर मिली रहें। अब रेचक करते बायें हाथ का खुला पंजा दाहिने कन्धे के नीचे इस प्रकार रखें कि मस्तक दोनों हाथ के क्रास के ऊपर आये। रेचक पूरा होने पर त्रिबन्ध करें। दृष्टि मूलाधार चक्र की दिशा में और चित्तवृत्ति मूलाधार चक्र में स्थापित करें।

पादपश्चिमोत्तानासन

इस आसन के अभ्यास से मन्दाग्नि, मलावरोध, अजीर्ण, उदररोग, कृमिविकार, सर्दी, खाँसी, वातविकार, कमर का दर्द, हिचकी, कोढ, मूत्ररोग, मधुप्रमेह, पैर के रोग, स्वप्नदोष, वीर्यविकार, रक्तविकार, एपेन्डीसाइटिस, अण्डवृद्धि, पाण्डुरोग, अनिद्रा, दमा, खट्टी डकारें आना, ज्ञानतन्तु की दुर्बलता, बवासीर, नल की सूजन, गर्भाशय के रोग, अनियमित तथा कष्टदायक मासिक, ब्नध्यत्व, प्रदर, नपुंसकता, रक्तपित्त, सिरोवेदना, बौनापन आदि अनेक रोग दूर होते हैं |

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धनुरासन

इस आसन में शरीर की आकृति खींचे हुए धनुष जैसी बनती है अतः इसको धनुरासन कहा जाता है । ध्यान मणिपुर चक्र में । श्वास नीचे की स्थिति में रेचक और ऊपर की स्थिति में पूरक ।

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मत्स्यासन

मत्स्य का अर्थ है मछली । इस आसन में शरीर का आकार मछली जैसा बनता है अतः मत्स्यासन कहलाता है । प्लाविनी प्राणायाम के साथ इस आसन की स्थिति में लम्बे समय तक पानी में तैर सकते हैं ।ध्यान विशुद्धाख्य चक्र में । श्वास पहले रेचक, बहिर्कुम्भक, फिर पूरक और रेचक ।

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मयूरासन

इस आसन में मयूर अर्थात् मोर की आकृति बनती है इससे इसे मयूरासन कहा जाता है । ध्यान मणिपुर चक्र में । श्वास बाह्य कुम्भक ।

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वज्रासन

वज्रासन का अर्थ है बलवान स्थिति । पाचनशक्ति, वीर्यशक्ति तथा स्नायुशक्ति देनेवाला होने से यह आसन वज्रासन कहलाता है ।

ध्यान मूलाधार चक्र में और श्वास दीर्घ ।

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पद्मासन या कमलासन

padmasan

इस आसन में पैरों का आधार पद्म अर्थात कमल जैसा बनने से इसको पद्मासन या कमलासन कहा जाता है। ध्यान आज्ञाचक्र में अथवा अनाहत चक्र में। श्वास रेचक, कुम्भक, दीर्घ, स्वाभाविक।

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योगमुद्रासन

योगाभ्यास में यह मुद्रा अति महत्त्वपूर्ण है इससे इसका नाम योगमुद्रासन रखा गया है । ध्यान मणिपुर चक्र में । श्वास रेचक, कुम्भक और पूरक ।

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पवनमुक्तासन

pavanmuktasan

शरीर में स्थित पवन (वायु) यह आसन करने से मुक्त होता है इससे इसको पवनमुक्तासन कहा जाता है । ध्यान मणिपुर चक्र में । श्वास पहले पूरक फिर कुम्भक और रेचक ।

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सिद्धासन

siddhasan

पद्मासन के बाद सिद्धासन का स्थान आता है। अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त करने वाला होने के कारण इसका नाम सिद्धासन पड़ा है। सिद्ध योगियों का यह प्रिय आसन है। यमों में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ है, नियमों में शौच श्रेष्ठ है वैसे आसनों में सिद्धासन श्रेष्ठ है।

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