दीपावली हिन्दू समाज में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्यौहार है । दीपावली को मनाने का उद्देश्य भारतीय संस्कृति के उस प्राचीन सत्य का आदर करना है, जिसकी महक से आज भी लाखों लोग अपने जीवन को सुवासित कर रहे हैं । दिवाली का उत्सव पर्वों का पुंज है । भारत में दिवाली का उत्सव प्रतिवर्ष मनाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है ।

यह तो हमारी प्रतिवर्ष मनायी जाने वाली दिवाली है, किंतु इस दिवाली को हम अपने जीवन की विशेष दिवाली बना लें, ऐसा पुरुषार्थ हमें करना चाहिए ।

भोले बाबा ने कहाः वर्षों दिवाली करते रहे हो, तो भी अंधेरे में पड़े हो ।

वे महापुरुष हमसे कैसी दिवाली मनाने की उम्मीद रखते होंगे ? दीपावली का पर्व प्रकाश का पर्व है, किंतु इसका वास्तविक अर्थ यह होता है कि ‘हमें अपने जीवन में छाये हुए अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान रूपी प्रकाश की ज्योति को प्रज्ज्वलित करना चाहिए । यही बात उपनिषद भी कहते हैं- ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय।’ परंतु इस ओर कभी हमारा ध्यान ही नहीं गया । इसी कारण उन महापुरुषों ने हमें जगाने के यह बात कही होगी :-

जले दिये बाह्य किया उजेरा, फैला हुआ है हृदय में अंधेरा ।

जिस प्रकार हम घी तथा तेल के दीये जलाकर रात्रि के अंधकार को मिटाते हैं, उसी प्रकार हम वर्षों से अपने मनःपटल पर पड़ी अज्ञान रूपी काली छाया को सत्कर्म, सुसंस्कार, विवेक तथा ज्ञान रूपी प्रकाश से मिटाकर ऋषियों के स्वप्न को साकार कर दें । जैसे, एक व्यापारी दीपावली के अवसर पर अपने वर्षभर के कारोबार की समीक्षा करता है, ऐसे ही हम भी अपने द्वारा किये गये वर्षभर के कार्यों का अवलोकन करें ।

यदि सत्कर्म अधिक किये हों तो अपना उत्साह बढ़ायें और यदि गलतियाँ अधिक हुई हों तो उन्हें भविष्य में न दोहराने का संकल्प कर अपने जीवन को सत्यरूपी ज्योति की ओर अग्रसर करें ।

दीपावली के पर्व पर हम अपने परिचितों को मिठाई बाँटते हैं, लेकिन इस बार हम महापुरुषों के शांति, प्रेम, परोपकार जैसे पावन संदेशों को जन-जन तक पहुँचा कर पूरे समाज को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करेंगे, ऐसा संकल्प लें । इस पावन पर्व पर हम अपने घर के कूड़े-करकट को निकालकर उसे विविध प्रकार के रंगों से रँगते हैं । ऐसे ही हम अपने मन में भरे स्वार्थ, अहंकार तथा विषय-विकार रूपी कचरे को निकालकर उसे संतों के सत्संग, सेवा तथा भक्ति के रंगों से रँग दें ।

योगांग झाड़ू धर चित्त झाड़ो, विक्षेप कूड़ा सब झाड़ काढ़ो ।

अभ्यास पीता फिर फेरियेगा, प्रज्ञा दिवाली प्रिय पूजियेगा ।।

आज के दिन से हमारे नूतन वर्ष का प्रारंभ भी होता है । इसलिए भी हमें अपने इस नूतन वर्ष में कुछ ऊँची उड़ान भरने का संकल्प करना चाहिए । ऊँची उड़ान भरना बहुत धन प्राप्त करना अथवा बड़ा बनने की अंधी महत्वकांक्षा का नाम नहीं है । ऊँची उड़ान का अर्थ है विषय-विकारों, मैं-मैं, तू-तू, स्वार्थता तथा दुष्कर्मों के देश से अपने चित्त को ऊँचा उठाना । यदि ऐसा कर सकें, तो आप ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के जैसी दिवाली मनाने में सफल हो जायेंगे ।

हमारे हृदय में अनेक जन्मों से बिछुड़े हुए उस राम का तथा उसके प्रेम का प्राकट्य हो जाये, यही याद दिलाने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने इस पर्व को शास्त्रों में ऊँचा स्थान दिया है । उन्हें यह उम्मीद भी थी कि बाह्य ज्योत जलाते-जलाते हम अपने आंतरिक ज्योति को भी जगमगाना सीख जायेंगे, किंतु हम भूल गये । अतः उन महापुरुषों के संकल्प को पूर्ण करने में सहायक बनकर हम अपने जीवन को उन्नत बनाने का संकल्प करें ताकि आने वाला कल तथा आने वाली पीढ़ियाँ हम पर गर्व महसूस करें ।

भारत के वे ऋषि-मुनि धन्य हैं, जिन्होंने दीपावली – जैसे पर्वों का आयोजन करके मनुष्य को मनुष्य के नजदीक लाने का प्रयास किया है तथा उसकी सुषुप्त शक्तियों को जागृत करने का संदेश दिया है । उन्होंने जीवात्मा को परमात्मा के साथ एकाकार करने में सहायक भिन्न-भिन्न उपायों को खोज निकाला है । उन उपायों की गाँव-गाँव तथा घर-घर तक पहुँचाने का पुरुषार्थ अनेक ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों ने किया है । उन महापुरुषों को आज हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है ।

~ ‘पर्वों का पुंज दीपावली’ पुस्तक से