Significance and Importance Of Guru Purnima 2021. Why we Celebrate Guru Poonam:

गुरुपूर्णिमा जो लघु से गुरु की ओर ले जाए, जो मर शरीर में अपनी अमरता का आत्मप्रकाश कर दे, जीव से ब्रह्म कर दे । जीवत्व बाधित करके ब्रह्मत्व जगा दे, गुरुत्व की ओर ले जावे वह गुरुपूर्णिमा । गुरुपूर्णिमा उत्सव अर्थात् ज्ञान का आदर-पूजन, परब्रह्म परमात्मा का आदर, ब्रह्मज्ञान का पूजन ।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा भी कहते हैं । वसिष्ठजी महाराज के पौत्र पराशर ऋषि के पुत्र वेदव्यासजी जन्म के कुछ समय बाद ही अपनी माँ से कहने लगे : “अब हम जाते हैं तपस्या के लिए ।” माँ बोली : “बेटा ! पुत्र तो माता-पिता की सेवा के लिए होता है । माता-पिता के अधूरे कार्य को पूर्ण करने के लिए होता है और तुम अभी से जा रहे हो ?”

व्यासजी ने कहा : “माँ ! जब तुम याद करोगी और जरूरी काम होगा, तब मैं तुम्हारे आगे प्रकट हो जाऊँगा ।”

माँ से आज्ञा लेकर व्यासजी तप के लिए चल दिये । वे बद्रिकाश्रम गये । वहाँ एकान्त में समाधि लगाकर रहने लगे ।

बदरिकाश्रम में बेर पर जीवन यापन करने के कारण उनका एक नाम ‘बादरायण’ भी पड़ा । व्यासजी द्वीप में प्रकट हुए इसलिए उनका नाम ‘द्वैपायन’ पड़ा । कृष्ण (काले) रंग के थे इसलिए उन्हें ‘कृष्णद्वैपायन’ भी कहते हैं । उन्होंने वेदों का विस्तार किया, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा । भगवान वेदव्यास के नाम से ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा का नाम ‘व्यासपूर्णिमा’ पड़ा है ।

यह सबसे बड़ी पूर्णिमा मानी जाती है । क्योंकि परमात्मा के ज्ञान, परमात्मा के ध्यान और परमात्मा की प्रीति की तरफ ले जानेवाली है यह पूर्णिमा । इसको ‘गुरुपूर्णिमा’ भी कहते हैं । जब तक मनुष्य को सत्य के ज्ञान की प्यास रहेगी, तब तक ऐसे व्यास पुरुषों का, ब्रह्मज्ञानियों का आदर-पूजन होता रहेगा ।

व्यासजी ने वेदों के विभाग किये । ‘ब्रह्मसूत्र’ व्यासजी ने ही बनाया । पाँचवाँ वेद ‘महाभारत’ व्यासजी ने बनाया, भक्ति ग्रन्थ ‘भागवतपुराण’ भी व्यासजी की रचना है एवं अन्य 17 पुराणों की रचना भी भगवान वेदव्यासजी ने ही की है । विश्व में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, फिर वे चाहें किसी भी धर्म-पंथ के हों, उनमें अगर कोई सात्विक और कल्याणकारी बात है तो सीधे-अनसीधे भगवान वेदव्याजी के शास्त्रों से ली गयी है । इसीलिए ‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ कहा गया है । व्यासजी ने पूरी मानव जाति को सच्चे कल्याण का खुला रास्ता बता दिया है । जिन जिनके अन्तःकरण में ऐसे व्यासजी का ज्ञान, उनकी अनुभूति और निष्ठा उभरी, ऐसे पुरुष भागवत कथा में ऊँचे आसन पर बैठते हैं तो कहा जाता है कि अमुक महाराज व्यासपीठ पर विराजेंगे ।

व्यासजी के शास्त्र-श्रवण के बिना भारत तो क्या विश्व में भी कोई आध्यात्मिक उपदेशक नहीं बन सकता, व्यासजी का ऐसा अगाध ज्ञान है । वेदव्यासजी की कृपा सभी साधकों के चित्त में चिरस्थायी रहे । व्यासपूर्णिमा का पर्व वर्ष भर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही नयी दिशा, नया संकेत भी देता है और कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है । जिन महापुरुषों ने कठोर परिश्रम करके हमारे लिए सब कुछ किया, उन महापुरुषों के प्रति कृतज्ञताज्ञापन का अवसर, ऋषिऋण चुकाने का अवसर, ऋषियों की प्रेरणा और आशीर्वाद पाने का अवसर है व्यासपूर्णिमा । यह पर्व गुरुपूर्णिमा भी कहलाता है । भगवान श्रीराम भी गुरुद्वार पर जाते थे और माता-पिता तथा गुरुदेव के चरणों में विनयपूर्वक नमन करते थे ।

प्रात:काल उठि कै रघुनाथा ।

मातु पिता गुरु नावहिं माथा ॥

गुरुजनों, श्रेष्ठजनों एवं अपने से बड़ों के प्रति अगाध श्रद्धा का यह पर्व भारतीय सनातन संस्कृति का विशिष्ट पर्व है ।

इस प्रकार कृतज्ञता व्यक्त करने का, तप, व्रत, साधना में आगे बढ़ने का भी यह त्यौहार है । संयम, सहजता, शान्ति, माधुर्य देनेवाली और विषय-विकारों से बचकर निर्विषय, निर्विकारी नारायण के सुख को प्रकटाने वाली पूर्णिमा है गुरुपूर्णिमा । ईश्वरप्राप्ति की सहज, साध्य, साफ सुथरी दिशा बताने वाला त्यौहार है गुरुपूर्णिमा । यह आस्था, श्रद्धा, समर्पण, सत्यप्राप्ति का पर्व है ।

– लोक कल्याण सेतु, जून-जुलाई 2006