Shree Janmashtami  2020 Special Story in Hindi :

❀ पूज्य बापूजी की मधुमय अमृतवाणी

➠ भगवान का स्वभाव है छेड़खानी करके भी आपका अज्ञान मिटा देना। श्री कृष्ण ने मक्खन चोर मंडली बनायी। प्रत्येक घर का एक बच्चा शामिल हुआ। जिसके घर में बिलोना हो, मक्खन निकले, उस घर का लड़का आ के बोले : “कल हमारे यहाँ बिलोना हुआ।”

➠ श्रीकृष्ण बच्चों का टोला ले जायें, फिर मटकी तक पहुँचें और मक्खन खुद भी खायें, औरों को भी खिलायें क्योंकि कृष्ण को कंस के प्रति विद्रोह पैदा करना था। इतना कर (टैक्स) कि गरीब खाये नहीं, बाल-बच्चों को खिलाये नहीं, कर में ही मक्खन दें। तो कर में मक्खन जाए उसके पहले ही कृष्ण बँटवा देते, खिला देते।

➠ प्रभावती नाम की गोपी बड़ी होशियार थी। वह यशोदा को फरियाद करती : “तुम्हारा लाला मक्खन चुरा लेता है और हम उसको पकड़ते हैं तो छटक जाता है। जिसके घर में बिलोना होता है, वह अटकल से मक्खन सुरक्षित करके पड़ोसी के घर में रख आता है या कंस के यहाँ भेज देता है तो तुम्हारा लाला बच्चों को बोलता है : जिस घर में हमारे लिए मक्खन नहीं है वह घर तो श्मशान है।”

➠ यशोदा ने कहा: “ऐसी बातें तो बहुत लोग करते हैं, ‘कृष्ण छेड़खानी करते हैं, यह कहते हुए वह करते हैं…’ रु- बरू कोई मेरे को दिखाए कि कृष्णा ने मक्खन चुराया है। रंगे हाथ पकड़ के लाओ तो मैं बात मानूंगी।”

➠ प्रभावती ने अपने बेटे को कहा: ” मैं माखन निकाल रही हूं, कृष्ण को जा के बताओ।” प्रभावती ने मक्खन निकाल कर मटकी छींके में रखी और जान बूझकर कुछ गोपियों को ले के पड़ोस के घर में यह सोचकर छुप गई कि ‘कृष्ण का टोला आये तो हम कृष्ण को पकड़ेंगे।’

➠ कृष्ण आये, देखा मक्खन तो है लेकिन चारों तरफ रस्सियां बंधी हैं और रस्सियों में घंटियां बंधी हैं। ज्यों ही हमारे मित्र कूदेंगे-फादेंगे तो घंटियां बजेंगी, दूर-दूर जो घर हैं, उनको भी पता चलेगा और हमको पकड़ेंगे ।

➠ कृष्ण ने अपना यौगिक संकल्प चलाया :”हे शब्द ब्रम्ह ! मेरी आज्ञा है, मैं ही नहीं बल्कि मेरा कोई रस्सी को छूए, हिलाये तो भी आवाज नहीं होनी चाहिए।” यहाँ भगवान ने अपना भगवत् स्वाभाव भी दिखाया, भगवत् सामर्थ्य भी दिखाया और छेड़खानी तो थी ही।

➠ बच्चे कूदें -फांदें , घंटियों की आवाज नहीं आयी। लड़कों ने घेरा बनाया । लड़कों के कंधों पर लड़के चढ़ गए, उन पर भी लड़के…..जैसे पिरामिड बनाते हैं। आखिर में कृष्ण पहुंचे। छींके में से मक्खन की मटकी निकाली आज तक तो ये पहले दूसरों को खिलाने के बाद में स्वयं खाते लेकिन ‘प्रभावती थोड़ी चंड हैं, आज न जाने कही धतूरा मिलाया हो, दूसरी कुछ गड़बड़ी की हो तो….’ ऐसा सोच कर श्री कृष्ण मक्खन पहले खुद चखते हैं। ज्यों ही चखते हैं, त्यों ही घंटियाँ बजने लग गयी।

➠ प्रभावती और कुछ सखियाँ दौड़ती आयी। कृष्णा ने कहा: “ऐ शब्द ब्रह्म, हाजिर हो जा ! ( शब्द ब्रह्म हाजिर हो गया। ) मैंने आज्ञा दी थी कि घंटियां नहीं बजनी चाहिए, क्यों बजी ?”

➠ बोले: “प्रभु ! आपकी ही आज्ञा का हमने पालन किया है । शास्त्र भी तो आपके ही वचन हैं । शास्त्र में लिखा है कि और समय घंटी बजे चाहें न बजे लेकिन प्रभु को जब भोग लगता हो तो घंटियां बजनी चाहिए।

कृष्ण बोले : “तू भी बड़ा चालाक है, अब आ रही है तेरी माँ।”

➠ प्रभावती दौड़ी आयी और श्रीकृष्ण को रंगें हाथों पकड़ लिया । हाथ में मक्खन, मुख पर मक्खन…प्रभावती बोलने लगी: “अब यशोदा को बताऊंगी कि मैं हवाई तीर नहीं छोड़ती थी। तेरा लाला चोर है, पक्का चोर ! चल !”

➠ उसका बेटा बोलता है ।”मैया ! छोड़ दे ! छोड़ दे ! तुम्हीं ने तो कहा था, ‘लाला को बोलना हमारे घर मक्खन बना है।’ फिर तुम्हीं उसको पकड़ती हो… मेरे को पकड़ ले, लाला को छोड़ दे।”

➠ ” धत् तेरे की, तेरे को पकड़ के क्या करना है ?? लाला को पकड़ने के लिए रात जगी हूँ रात ! यह सब बाँधा है, सब बनाया है।”

➠ कृष्ण ने देखा कि यह छोड़ेगी नहीं । रास्ते में प्रभावती के ससुर का खेत था। कृष्णा ने मुँह उधर करके उसके ससुर की आवाज में खांसते हुए कहा : “ऐ प्रभावती ! ऐ प्रभावती ! तू कहां जा रही है ?” वह जमाना घूंघट का था । प्रभावती ने घूंघट खींच लिया और हाथ के इशारे से जिस ओर जा रही थी, उधर का इशारा कर दिया।

➠  कृष्ण ने देखा कि अब तो घूंघट खींच लिया है। कृष्ण बोले : “तू छोड़ेगी नहीं मेरा हाथ लेकिन इतना जोर से तूने पकड़ा है कि हाथ दर्द करने लगा है । मेरा दायाँ हाथ छोड़ के बायाँ हाथ पकड ले न !” प्रभावती ने हाथ ढीला कर दिया और कृष्ण ने उसके छोरे का बायां हाथ पकड़ा दिया और खुद छटक गये।

➠ वह घसीटते-घसीटते अपने छोरे को ले जा रही है, उसको पता नहीं । कृष्ण पीछे के रास्ते से पहुंच गये अपने आराम के कमरे में और लेटकर लीला की: “मैया-मैया !”

यशोदा दौड़ी, बोली : “क्या है लाला ?”

“मैया मेरे को तो स्वप्न में प्रभावती दिख रही है। आँखें दिखा रही है कि मैं तेरे पर आरोप लगाऊँगी, पकड़ के यशोदा मैया के पास ले जाऊँगी। ऐसा दिख रहा है मेरे को।”

➠ इतने में दरवाजे से खट-खट की आवाज आयी।

यशोदा :”कौन है ?”

“प्रभावती।”

“क्यों आयी है ?”

“तेरे कन्हैया को पकड़ के लायी हूँ।”

“लाला ! तू सच कह रहा है।”

➠ यशोदा सोचती है, ‘कन्हैयो तो मेरो यहाँ सोयो है, लाला । गाय की पूँछ तो नहीं है लेकिन साड़ी का पल्ला तो है, उसी से मेरे लाला पर उतारा कर देती हैं। वह निगुरी है ही ऐसी।’

“अरे ! तू किसको पकड़ के लायी ?”

“तेरो लाला को पकड़ के लायी हूँ।”

“कन्हैया तो यहाँ लेटा है।”

➠ यशोदा गयी, दरवाजे की दरार से देखा कि प्रभावती का घूंघट नीचे तक खिंचा हुआ है और हाथ में उसके छोरे का हाथ है। फटाक-से दरवाजा खोला। बोली:

“कहाँ है मेरा लाला ?”

“यह रहा।”

“घूंघट तो ऊपर कर !”

घूंघट ऊपर किया : “अरे छोरा ! तू कैसे आ गयो रे?”

कृष्ण वहाँ ठेंगा और जीभ दिखा रहे हैं : “ले-ले!”

➠ यह छेड़खानी करके भी प्रभावती की बुद्धि के अहं को हटाकर शांति का दान, रस का दान देने की लीला है। ऐसे ही आप भी संसार में कहीं-कहीं बिल्कुल रुक जाते हो तो भगवान आपको थोड़ा हिलाकर अपनी तरफ खींचने की छेड़खानी करते रहते हैं।

~ ऋषि प्रसाद / अगस्त 2013