रासलीला इन्द्रियों और मन में विचरण करनेवालों के लिए अत्यंत उपयोगी है लेकिन राग, ताल, भजन का फल है भगवान में विश्रांति ।

रासलीला के बाद गोपियों को भी भगवान ने विश्रांति में पहुँचाया था । श्रीकृष्ण भी इसी विश्रांति में तृप्त रहने की कला जानते थे ।

संतुष्टि और तृप्ति सभीकी माँग है । चन्द्रमा की चाँदनी में खीर पड़ी-पड़ी पुष्ट हो और आप परमात्म-चाँदनी में विश्रांति पाओ ।

चन्द्रमा के दर्शन करते जाना और भावना करना कि ‘चन्द्रमा के रूप में साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा की रसमय, पुष्टिदायक रश्मियाँ आ रही हैं । हम उसमें विश्रांति पा रहे हैं ।

पावन हो रहा है मन, पुष्ट हो रहा है तन, ॐ शांति… ॐ आनंद.. पहले होंठों से, फिर हृदय से जप और शांति… निःसंकल्प नारायण में विश्रांति पाते जाना ।

परमात्म-विश्रांति, परमात्म-ज्ञान के बिना भौतिक सुख-सुविधाएँ कितनी भी मिल जायें लेकिन जीवात्मा की प्यास नहीं बुझेगी, तपन नहीं मिटेगी । 

       देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ । – (रामायण)

 

श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं कि “तुम प्रेम करते-करते बाहर-ही-बाहर रुक न जाओ बल्कि भीतरी विश्रांति द्वारा मुझ अपने अंतरात्मा प्रेमास्पद को भी मिलो, जहाँ तुम्हारी और हमारी दूरी खत्म हो जाती है ।

मैं ईश्वर नहीं, तुम जीव नहीं, हम सब ब्रह्म हैं – वह अवस्था आ जाय ।” श्रीकृष्ण जो कहते हैं, उसको कुछ अंश में समझकर हम स्वीकार कर लें, बस हो गया ।   

-ऋषि प्रसाद २६१, सितम्बर २०१४