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महाशिवरात्रि पर्व

शिवरात्रि के दिन देशी घी का दिया जला कर ‘बं’बीजमंत्र का सवा लाख जप करना बहुत हितकारी है। यह मंत्र शुद्ध सात्विक भावनाओं को सफल करने में बड़ा सहयोग देगा । हो सके तो एकांत में शिवजी का विधिवत पूजन करें या मानसिक पूजन करें सवा लाख बार ‘बं’ का उच्चारण भिन्न-भिन्न सफलताएं प्राप्त करने में मदद करेगा। जोड़ों का दर्द, वमन, कफ एवं वायुजन्य बीमारियों,डायबिटीज आदि में भी लाभ पहुंचाता है। बीजमंत्र स्थूल शरीर को फायदा पहुंचाते ही हैं साथ ही सूक्ष्म और कारण शरीर पर भी प्रभाव डालते हैं। लोक कल्याण सेतु / फरवरी २००४
गुरुः शिवो गुरुर्देवो गुरुबन्धुः शरीरिणाम्…

मनुष्यों के लिए गुरु ही शिव हैं, गुरु ही देव हैं, गुरु ही बांधव हैं,
गुरु ही आत्मा है, गुरु ही शिव हैं, गुरु ही धर्म हैं और
गुरु में निष्ठा ही परम तप है।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े…

आत्मशिव का पूजन

अच्छा माना गया है शिवपूजन बाह्य उपचारों से ।
साथ ही अंतर पूजा करें शिवत्व के विचारों से ।।
गहरा गोता लगायें हम शुभ चिंतन से शिवत्व ।
बुद्धि में प्रकाश प्रकट हो शांति पायें गुरुतत्व में ।।
चित्त की चंचलता मिटायें शिवत्व के चिंतन से ।
विश्रांति पायें आत्मा शिव के पूजन से ॥
शिव पूजन करें जब बिल्व के तीन पत्रों से ।
प्रार्थना करें हे प्रभु ! हम पार हो तीन गुणों से ॥
पंचामृत द्वारा शिव पूजन करें उल्लास से ।
पर पार हों हम इस पंचभौतिक विलास से ॥
उत्तम है शिवपूजन धूप-दीप और दान से ।
अंतर में प्रकाश हो हमारे ‘शिवोऽहम्’ के ज्ञान से ।।
पत्र-पुष्पों से शिवजी की बाह्य आराधना से ।
आत्मा शिव को प्रसन्न करें शुद्ध भावना से ।।
शिवरात्रि का जागरण करें पूर्ण सजगता से ।
पर खोजें कि कैसे एक हों हम आत्मा सत्ता से ।।
एक आवृत्ति और दूसरी आवृत्ति के बीच क्षण में ।
टेक जायें हम निज आत्मस्वरूप ‘सोऽहम्’ में ।।
शिवरात्रि के शिव पूजन का यही पूर्ण महाफल।
आत्मा शिव की आराधना से करें जीवन सफल।।

– पूज्य बापूजी का कृपापात्र

📚ऋषि प्रसाद /फरवरी 2007

महाशिवरात्रि विशेष

Shivratri
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महाशिवरात्रि : २१ फरवरी

- पूज्य बापूजी
‘शिव’ से तात्पर्य है ‘कल्याण’ अर्थात यह रात्रि बड़ी कल्याणकारी रात्रि है। इस रात्रि में किया जानेवाला जागरण एवं साधन-भजन अत्यधिक फलदाई माना जाता है।
एक होती है रातपाली, जो चार पैसे की नौकरी के लिए की जाती है और दूसरा होता है जागरण।
‘जागरण’ का मतलब है जागना जिस हेतु से आपको मनुष्य जन्म मिला है वह मनुष्य जन्म में कहीं विषय-विकारों में बर्बाद ना हो जाए बल्कि अपने लक्ष्य परमात्मा को पाने में ही लगे इस प्रकार के विवेक-बुद्धि से अगर आप जागते हो तो यह शिवरात्रि का जागरण हो जाता है।
इस जागरण से आपके जन्म जन्म के पाप ताप कटने लगते हैं,बुद्धि शुद्ध होने लगती है एवं जीव शिवत्व में जागने के पथ पर अग्रसर होने लगता है।
अन्य उत्सवों जैसे दीपावली,होली, मकर संक्रांति आदि में खाने-पीने,पहनने-ओढ़ने मिलने-जुलने आदि का महत्व होता है। लेकिन यह शिवरात्रि महोत्सव ऐसा नहीं है। यह व्रत,उपवास एवं तपस्या का दिन है।
दूसरे महोत्सव तो लोगों से मिलने के लिए होते हैं। लेकिन यह शिवरात्रि का पर्व अपने अहम को मिटाकर लोकेश्वर से मिलने के लिए है।
📚ऋषि प्रसाद / फरवरी ९९

शिवजी ने पिया कालकूट विष,
देवता ने अमृत पान किया। शिवस्वरूप गुरु, कष्ट सहे घने,
सत्य ज्ञान रस हमें पिला दिया।।

शिवरात्रि व्रत-महिमा

🔖शिवरात्रि व्रत के प्रभाव से एक शिकारी भगवान वीरभद्र होकर पूजे जा रहे हैं।
‘स्कंद पुराण’ के केदारखंड में शिवरात्रि व्रत महिमा की एक कथा आती है:
एक चांडाल पशु-पक्षियों को मारता, उनका खून पीता, मांस खाता और उनका चमड़ा बेचकर जीवन का निर्वाह करता था। उसने एक विधवा ब्राह्मणी को फुसलाकर अपने पास रख लिया। उसके गर्भ से एक बालक पैदा हुआ जिसका नाम रखा गया- दुस्सह। दुस्सह भी अपने पिता की तरह ही दुष्कर्म करने लगा।
एक बार उसे जंगल में शिकार के लिए भटकते-भटकते रात हो गयी और वह रास्ता भूल गया। एक पेड़ पर चढ़कर उसने चारों ओर देखा तो कहीं दूर एक दिया जल रहा था। भूख-प्यास से व्याकुल दुस्सह वहाँ गया।
वहाँ एक छोटा-सा शिव मंदिर था और एक संत की कुटीर थी। संत पूजा में बैठे हुए थे। अब उठेंगे… तब उठेंगे… इस प्रकार राह देखते-देखते पूरी रात बीत गयी। दैवयोग से वह रात्रि शिवरात्रि थी। दुस्सह का अनजाने में शिवरात्रि-जागरण हो गया और खाने-पीने के लिए कुछ न मिलने से उपवास भी हो गया। सुबह हुई तब संत ने दुस्सह से कहा: “बेटा ! नहा ले।”
दुस्सह ने नहा-धोकर संत के कहे अनुसार ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण कर शिवजी को बिल्वपत्र चढ़ाये। उसे उन संत का सत्संग मिला। समय पाकर दुस्सह मर गया। शिवरात्रि जागरण, संत दर्शन, उनके दो वचनों का श्रवण और शिव मंत्र के जप के अलावा उसके जीवन में और कोई पुण्य न था। इस पुण्य से वह अगले जन्म में राजा विचित्रवीर्य बना। कहाँ तो एक शिकारी, जो खरगोश, हिरण आदिप्राणियों के पीछे मारा-मारा फिरता था और कहाँ संतदर्शन, अनजाने में शिवरात्रि-जागरण और शिव मंत्र के जप के प्रभाव से अगले जन्म में एक राजा बन गया!
उसकी पूर्वजन्म की स्मृति बनी रही, जिसके प्रभाव से इस जन्म में भी वह शिवजी का पूजन अर्चन करता था। भगवान शिव और संतों में उसकी प्रीति थी। उसके राज्य में लोग बोलते थे कि ‘यह शिवभक्त राजा विचित्रवीर्य का राज्य है।’
राजा विचित्रवीर्य ने राज्य तो किया किंतु राज्य के अहंकार से फूला नहीं। भोगों में तो रहा किंतु भोगों की दलदल में फंसा नहीं। राजगद्दी पर तो रहा किंतु राजगद्दी के दोष उसमें आये नहीं। उसके दिल में तो भगवान शिव की गद्दी थी और संतों का सत्संग था ।
उसने कई शिव मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया, साधु-संतों की सेवा की और शिव भक्ति का प्रचार किया। इन सबका इतना भारी पुण्य हुआ कि मृत्यु के पश्चात् राजा सायुज्य मुक्ति को प्राप्त हुआ। पुण्य के प्रभाव से उसने शिवजी की लीला में सहयोग देने के लिए शिवजी से ही दिव्य जन्म प्राप्त किया।
दक्ष के यज्ञ में जब सती ने योगशक्ति से अग्नि प्रकट करके शरीर छोड़ दिया, तब दक्ष के यज्ञ का ध्वंस करने के लिए शिवजी ने अपनी जटा उखाड़कर उसे पर्वत शिखर पर क्रोधपूर्वक दे मारा। उसीसे वीरभद्र का प्राकट्य हुआ। वीरभद्र पूर्वकाल का राजा विचित्रवीर्य ही था शिवजी ने उसे दक्ष का यज्ञ-ध्वंस करने के लिए भेजा। यज्ञ-ध्वंस करके जब वीरभद्र कनखल से कैलास जा रहे थे, तब हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच में एक स्थान पर उन्होंने थोड़ा आराम किया था। बाद में वहाँ पर उनका मंदिर बनाया गया, जो आज भी मौजूद है। उस स्थान के पास हरिद्वार से ऋषिकेश जानेवाली बसें रुकती हैं। वह जगह ‘वीरभद्र’ नाम से प्रसिद्ध है। शिव भक्ति की कैसी महिमा है कि उसके प्रभाव से एक शिकारी भगवान वीरभद्र होकर पूजे जा रहे हैं।

शिवरात्रि शिव पर्व है
शिव का होकर शिव को भजने का।
शिव रहते शिवस्वरूप में
तुम भी आया करो आत्मशिव में।।