Chaitanya Mahaprabhu Jagannath Puri Rath Yatra (भगवान जगन्नाथ रथयात्रा : २३ जून )

१७-१८ वर्षीय निमाई भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हेतु एक बार अकेले ही चले गए ।

जगन्नाथजी के दर्शन करते-करते निमाई का मन बदल गया, आँखें स्थिर हो गयीं एवं मन केन्द्रित हो गया। इतने में वे क्या देखते हैं कि जगन्नाथजी की प्रतिमा में से एक नन्हा-सा, सुकुमार बालक उनको निहारते हुए बोल रहा है :”हे निमाई ! तू क्या कर रहा है ? विद्या को रटते- रटते तू अविद्या वाला होता जा रहा है ? विद्यार्थियों को पढ़ाते – पढ़ाते तू मेरा विद्यार्थी होते हुए भी भटकता जा रहा है ?”

निमाई की आँखों से आंसू की धारा बहने लगी दर्शक तो कई आये और गये, लेकिन उस अलौकिक दर्शन से निमाई का विवेक जाग उठा । जब निमाई घर लौटे, तब अपनी मां के पास आकर चुपचाप पैर दबाने लगे ।

निमाई को देखकर माँ बोल उठी : “निमाई क्या बात है ? तू एकदम गुप-चुप क्यों रहता है ?”

निमाई: “माँ अब मुझे घर में रहने की इच्छा नहीं होती है ।”

माँ:”तेरे पिता तो मुझे कब से छोड़कर चले गये, तेरा बड़ा भाई भी चला गया और अब तू भी जाना चाहता है ? ठीक है, मेरे भाग्य में यही है तो यही सही। जा, तू भी साधु हो जा ।”

निमाई बोले : “माँ ! तू ऐसा मत कह । मैं यहीं रहूंगा, तेरी सेवा करुंगा ।”

निमाई को वापस आया जानकर सभी विद्यार्थी पढ़ने के लिए आ गये और बोले: “गुरुजी! पढ़ाइये । परीक्षा के दिन नजदीक आ रहे हैं ।”

निमाई : “अब और किसी से पढ़ लो। मुझसे अब नहीं पढ़ाया जायेगा ।”

विद्यार्थी: “अब परीक्षा के वक्त दूसरा कौन हमें पढ़ायेगा ? आप ही पढ़ाइये न !”

विद्यार्थियों के आग्रह को देखकर निमाई न्यायशास्त्र पढ़ाने के लिए बैठे

“पृथ्वी का कारण जल है, जल का कारण तेज है, तेज का कारण वायु है, वायु का कारण आकाश है, आकाश का कारण महातत्त्व है, महातत्त्व का कारण प्रकृति है और प्रकृति का कारण परब्रह्म परमात्मा है। उसी परमात्मा को जानना न्याय है. बाकी सब अन्याय है ।”

विद्यार्थी चौंके: “गुरुजी ! यह क्या पढ़ा रहे हैं ? यदि हम ऐसा ही लिखेंगे तो केसे उत्तीर्ण हो सकेंगे ?”

निमाई: “इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि किसी और से पढ़ लो। अब पढ़ाना मेरे वश की बात नहीं रही ।”

विद्यार्थी चले गये। अब परमात्म प्रेम के सिवाय कुछ भी पढ़ाना उनके लिए असंभव-सा हो गया था ।

कबीर जी ने ठीक ही कहा है :

पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ॥

न्यायशास्त्र के प्रसिद्ध पंडित निमाई अब वास्तव में पंडित हो गये थे, पर कैसे पंडित ??? परमात्मप्रेम के पंडित !!

पूर्वकाल के न्यायशास्त्र के जाने-माने पंडित निमाई ने आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु के रूप में लाखों-लाखों लोगों को -प्रेम से सराबोर कर दिया था। धन्य हैं श्री चैतन्य महाप्रभु एवं धन्य है उनकी भगवत् भक्ति !