……क्या बीरबल केवल एक रात्रि भी माँ की सेवा कर पाए ???

एक बार बीरबल ने अपनी माँ से कहाः “माँ मैं तेरी सेवा करके ऋण चुकाना चाहता हूँ। बता, मैं तेरी क्या सेवा करूँ ?”

माँ- “बेटा ! मेरी सेवा का बदला क्या चुकायेगा ?”

“माँ ! तू जो कहेगी, वह करूँगा।”

“बेटा ! मैंने प्रेम से तुम्हारा पालन-पोषण किया, वो मेरा कर्तव्य था। तूने कृतज्ञता का भाव व्यक्त कर दिया…. बस, ठीक है। उसी से मुझे आनन्द है। प्रेम से जो सेवा होती है वह अलग बात है और मंत्री बनकर जो सेवा की जाती है वह अलग बात है।”

बीरबल ने हठ पकड़ा। तब माँ ने कहाः “अच्छा ! वैसे भी मैं बीमार हूँ। बेटा ! आज रात को तू जागना। यदि मुझे पानी की जरूरत पड़े तो तू ही देना।”

बीरबलः “ठीक है माँ।”

रात में बीरबल ने माँ के बिस्तर के पास ही अपना बिस्तर लगाया। थोड़ी रात बीती, माँ को खाँसी आयी।

बीरबल ने पूछाः “माँ ! क्या है ?”

माँ- “बेटा ! एक घूँट पानी पिला दे।”

बीरबल पानी ले आया।

माँ ने कहाः “बेटा ! अभी नहीं चाहिए, रख दे।”

बीरबल ने गिलास रख दिया। थोड़ी देर बीती। माँ ने जरा-सी कुहनी मार दी।

बीरबलः “क्या बात है ?”

माँ- “जरा प्यास लगी है।”

“मैंने पानी तेरे पास ही तो रखा है !”

“जरा उठाकर दे दे।”

बीरबल ने पानी दे दिया। फिर उनकी आँख लग गयी। थोड़ी देर बाद माँ ने फिर हिलायाः “बीरबल !”

“माँ ! क्या है ?”

“बेटा ! नींद नहीं आती है। जरा पानी तो देना !”

“पानी दिया तो सही ! यह गिलास में पड़ा है।”

“अच्छा… अच्छा…”

थोड़ी देर और बीती। माँ ने बीरबल को फिर उठाया और कहाः “बेटा ! पानी….।”

बीरबलः “क्या रात भर ‘पानी-पानी’ करती है ?”

माँ- “अरे ! तूने ही तो कहा था कि सेवा करनी है और तू एक ही रात में थक गया ! तूने तो कई रात्रियों में मुझे जगाया था। मैं तो केवल पानी माँगती हूँ तूने तो बिस्तर पर कई बार टट्टी-पेशाब भी की थी। फिर भी मैंने फरियाद नहीं की थी। मैं तेरे गीले वस्त्रों पर सोयी और तुझे सूखे में सुलाया तब भी मैंने फरियाद नहीं की और तू एक रात न जाग सका ? 
बेटा ! माँ के हृदय में पुत्र के लिए जो वात्सल्य होता है ऐसा प्रेम अगर पुत्र के हृदय में माँ और भगवान के लिए हो जाय तो सारा संसार स्वर्ग बन जाय।”

🍂पाश्चात्य देशों में कई लोग माँ-बाप के वृद्ध होने पर उन्हे ‘नर्सिंग होम’ (वृद्धाश्रम) में छोड़ आते हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति यह नहीं कहती है कि ‘वृद्ध पशु’ की तरह माता-पिता को भी ‘नर्सिंग होम’ में छोड़ आओ। नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का तो कहना है कि ‘जब तुम छोटे थे, हर चीज के लिए मोहताज थे, तब माँ-बाप ने तुम्हारी सेवा की थी। अब माँ-बाप वृद्ध हुए हैं, बीमार हो गये हैं तो तुम्हारा कर्तव्य है कि प्रेम से उनकी सेवा करके अपने हृदय का विकास करो। माता-पिता में परमेश्वर की भावना करके हृदयेश्वर के आनंद को उभारो, जीवन को सफल करो। तुम्हें सेवा का सुंदर अवसर मिल रहा है।’

📚बाल संस्कार पाठ्यक्रम से