▪एक गरीब परिवार में एक बालक ने जन्म लिया उसके माता-पिता ने उसे अक्षर ज्ञान के साथ संस्कृत-ज्ञान तथा धर्मग्रंथों के सुंदर संस्कार भी दिये । जब बालक 5 वर्ष का हुआ, तब पिताजी उसे पंडित हरदेवजी की पाठशाला में भर्ती कराने के लिए ले गये ।

पंडितजी ने पूछा : ‘‘बालक ! क्या कोई श्लोक जानते हो ?”

बालक : ‘‘जी हाँ !”

“बहुत अच्छा, जरा सुनाओ तो !”

▪बालक ने गुरुजी के पास जाकर उनके पैर छुए । हरदेवजी का हृदय पुलकित हो गया । फिर बालक ने पिताजी को झुककर प्रणाम किया और पिताजी द्वारा प्रतिदिन सिखाये गये श्लोकों को सुनाना प्रारम्भ किया ।

▪गुरुजी प्रसन्नता से बोले : ‘‘कोई कविता आती हो तो सुनाओ ।”

 ‘‘जी गुरुजी !”

बालक द्वारा मीठे स्वर में गायी गयी कविता वातावरण को मधुमय बना गयी ।

▪बालक की विनम्रता व कुशाग्रता देखकर गुरु हरदेवजी बहुत प्रसन्न हुए और उनके हृदय से आशीर्वाद बरस पड़े : ‘‘बेटा ! तुम अपने कुटुंब को स्थायी कीर्ति प्राप्त कराओगे । तुम्हारे कारण तुम्हारा कुटुंब महान बनेगा ।

▪जानते हो वह बालक कौन था ?

महामना मदनमोहन मालवीयजी, जिनकी कीर्ति आज भी भारतीय इतिहास के आकाश में एक उज्ज्वल नक्षत्र की नाई जगमगा रही है । जो माता-पिता और गुरुजनों को प्रणाम करता है, उनका आदर-सम्मान करता है, उससे उनके हृदय में बसे ईश्वर का आशीर्वाद तो मिलता ही है, साथ ही नम्रता, शील, संयम, सदाचार जैसे सद्गुण उसमें सहज ही आने लगते हैं ।
महान लोगों का प्रथम गुण उनकी नम्रता ही है ।

~सीख : उन्नति के गगन में तीव्र गति से उड़ान भरने के लिए बहुत परिश्रम की आवश्यकता नहीं है । दो ही बातें काफी हैं – भगवान के रास्ते, संयम-सदाचार के रास्ते आगे बढ़ने में मदद करनेवाले अपने हितैषी माता-पिता का आदर और भगवत्प्राप्ति के रास्ते पर आगे बढ़ानेवाले परम हितैषी सद्गुरु की आज्ञापालन ।