शिक्षक का चरित्र ज्वाज्वल्यमान अग्नि के समान हो, जिससे
उच्चतम शिक्षा का सजीव आदर्श शिष्य के सामने बना रहे। सच्चा शिक्षक वही है जो विद्यार्थी को
सीखने के लिए तत्काल उसी की मनोभूमि पर उतर आये और अपने आत्मा को अपने छात्र के आत्मा में एकरूप कर सके तथा जो छात्र की ही दृष्टि से देख सके, उसीके कानों से सुन सके व उसके मस्तिष्क से समझ सके। ऐसा ही शिक्षक शिक्षा दे सकता है, कोई दूसरा नहीं। शिक्षक को धन, नाम या यश संबंधी स्वार्थसिद्धि हेतु शिक्षा नहीं देनी चाहिए। उसका कार्य तो केवल प्रेम से, सम्पूर्ण मानवता के प्रति विशुद्ध प्रेम से ही
प्रेरित हो।
– स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)