महावीर जयंती (Mahavir Jayanti) : 6 अप्रैल

जैसे हर संत के जीवन में देखा जाता है,वैसे महावीर स्वामी के समय भी देखा गया…… जहाँ उनसे लाभान्वित होनेवाले लोग थे, वहीं समाजकंटक निंदक भी थे।

उनमें से पुरंदर नाम का निंदक बड़े ही क्रूर स्वभाव का था। वह तो महावीर जी के मानो पीछे ही पड़ गया था। उसने कई बार महावीर स्वामी को सताया, उनका अपमान किया पर संत ने माफ कर दिया।

एक दिन महावीर स्वामी (Mahavir Swami) पेड़ के नीचे ध्यानस्थ बैठे थे। तभी घूमते हुए पुरंदर भी वहाँ पहुँच गया। वह महावीर जी को ध्यानस्थ देख आग-बबूला होकर बड़बड़ाने लगा :
“अभी इनका ढोंग उतारता हूँ। अभी मजा चखाता हूँ….”

और आवेश में आकर उसने एक लकड़ी ली और उनके कान में खोंप दी। कान से रक्त की धार बह चली लेकिन महावीर जी के चेहरे पर पीड़ा का कोई चिह्न न देखकर वह और चिढ़ गया और कष्ट देने लगा।

इतना सब होने पर भी महावीरजी किसी प्रकार की कोई पीड़ा को व्यक्त किये बिना शांत ही बैठे रहे। परंतु कुछ समय बाद अचानक उनका ध्यान टूटा, उन्होंने आँख खोलकर देखा तो सामने पुरंदर खड़ा है। उनकी आँखों से आँसू झरने लगे।
पुरंदर ने पूछा : “क्या पीड़ा के कारण रो रहे हो?”
महावीर स्वामी : “नहीं, शरीर की पीड़ा के कारण नहीं।”
पुरंदर : “तो किस कारण रो रहे हो?”

“मेरे मन में यह व्यथा हो रही है कि मैं निर्दोष हूँ फिर भी तुमने मुझे सताया है तो तुम्हें कितना कष्ट सहना पड़ेगा ! कैसी भयंकर पीड़ा सहनी पड़ेगी ! तुम्हारी उस पीड़ा की कल्पना ,करके मुझे दुःख हो रहा है।”

यह सुन पुरंदर मूक हो गया और पीड़ा की कल्पना से सिहर उठा।

पूज्य बापूजी कहते हैं : “जो दुःसंकल्प करता है और उसे क्रियान्वित करते समय भी पश्चात्ताप नहीं करता, दुःखी नहीं होता, वह दुःसंकल्प और दुष्क्रिया का जब फल भोगता है तब दुःखी होता है, जब नरक मिलता है तब दुःखी होता है। अतः गलती करते समय ही रोइये, गलती के संकल्प के समय ही सावधान रहिये ।”

पुरंदर की नाई गोशालक नामक एक कृतघ्न गद्दार ने भी महावीर स्वामी (Mahavir Swami) को बहुत सताया था। महावीरजी के ५०० शिष्यों को उनके खिलाफ खड़ा करने का उसका षड्यंत्र भी सफल हो गया था। उस दुष्ट ने महावीर स्वामी जी को जान से मारने तक का प्रयत्न किया लेकिन जो जैसा बोता है उसे वैसा ही मिलता है। धोखेबाज लोगों की जो गति होती है, गोशालक का भी वही हाल हुआ।

अतः निंदको व कुप्रचारको ! अब भी समय है, कर्म करने में सावधान हो जाओ। अन्यथा जब प्रकृति तुम्हारे कुकर्मों की तुम्हें सजा देगी उस समय तुम्हारी वेदना पर रोनेवाला भी कोई न मिलेगा।

– श्री आर.एन. ठाकुर

~लोक कल्याण सेतु / जून २०१४