ब्रह्मचर्य पालन के नियम | Practice of Brahmacharya

brahmacharya, CELIBACY

गृहस्थ दंपति के लिए ब्रह्मचर्य-व्रत (Brahmacharya) की सफलता हेतु निम्नलिखित नियमों का पालन करना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा :

How to Practice Brahmacharya For Married in Hindi – Rules

* पति-पत्नी को अलग-अलग कमरों में सोना चाहिए और सम्पूर्ण एकांत में साथ-साथ नहीं रहना चाहिए ।

* पारिवारिक प्रार्थना : दोनों को अथवा परिवार के सभी लोगों को साथ मिलकर दिन में दो बार प्रार्थना-स्तवन, शास्त्र-पठन आदि करना चाहिए । इससे पति-पत्नी एक-दूसरे को भोग के साधन के रूप में न देखकर जगतरूपी धर्मशाला में कुछ समय के लिए मिलनेवाले दो पथिकों के रूप में अनुभव करेंगे । इससे पति-पत्नी के बीच भोगप्रधान संबंध छूट जायेगा और परस्पर निर्मल, दिव्य प्रेमसंबंध सरलता से जन्मेगा व स्थिर होगा ।

* भूतकाल की रतिक्रीडाएँ और शृंगार-चेष्टाओं की स्मृति को मिटा देना चाहिए ।

* एक-दूसरे को स्त्री या पुरुष रूप में देखने के बदले देह के साथ रहनेवाले देही (परमात्मा) रूप में देखने का प्रयत्न करना चाहिए ।

* शरीर और मन को निरन्तर सत्कार्य या सेवाकार्य में जोडे रखना चाहिए । अपने इष्टमंत्र के जप में मन को रत रखना चाहिए । इससे कामवृत्ति नहीं जगेगी, साथ ही कामवासना पर विजय करानेवाली आध्यात्मिक शक्ति बढती जायेगी ।

* संयमी जीवन शुरू करने पर पति को कभी स्वप्नदोष हो जाय तो उसे क्षुब्ध नहीं होना चाहिए । इस समय पत्नी के साथ क्रीडा कर लेना उचित है, ऐसा समझना योग्य नहीं है । ऐसा सोचने पर तो ब्रह्मचर्य की उपासना हो ही नहीं सकती ।

(ऐसी अनेक हितभरी बातों को जानने हेतु पढें मासिक समाचार पत्र ‘लोक कल्याण सेतु’)

15+ Best Rules of Brahmcaharya [Rules of Celibacy in Hindi]

In rules me Brahmacharya Palank Ke Niyam/ Upaye, Brahmcharya Diet, Yogasana, Mantra for Brahcmacharya Ye sab dia hua hai.

(ब्रह्मलीन ब्रह्मनिष्ठ स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज के प्रवचन से)

ऋषियों का कथन है कि ब्रह्मचर्य ब्रह्म-परमात्मा के दर्शन का द्वार है, उसका पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए यहाँ हम ब्रह्मचर्य-पालन के कुछ सरल नियमों एवं उपायों की चर्चा करेंगेः

1. ब्रह्मचर्य तन से अधिक मन पर आधारित है। इसलिए मन को नियंत्रण में रखो और अपने सामने ऊँचे आदर्श रखो।

2. आँख और कान मन के मुख्यमंत्री हैं। इसलिए गंदे चित्र व भद्दे दृश्य देखने तथा अभद्र बातें सुनने से सावधानी पूर्वक बचो।

3. मन को सदैव कुछ-न-कुछ चाहिए। अवकाश में मन प्रायः मलिन हो जाता है। अतः शुभ कर्म करने में तत्पर रहो व भगवन्नाम-जप में लगे रहो।

4. ‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन।’ – यह कहावत एकदम सत्य है। गरम मसाले, चटनियाँ, अधिक गरम भोजन तथा मांस, मछली, अंडे, चाय कॉफी, फास्टफूड आदि का सेवन बिल्कुल न करो।

5. भोजन हल्का व चिकना स्निग्ध हो। रात का खाना सोने से कम-से-कम दो घंटे पहले खाओ।

6. दूध भी एक प्रकार का भोजन है। भोजन और दूध के बीच में तीन घंटे का अंतर होना चाहिए।

7. वेश का प्रभाव तन तथा मन दोनों पर पड़ता है। इसलिए सादे, साफ और सूती वस्त्र पहनो। खादी के वस्त्र पहनो तो और भी अच्छा है। सिंथेटिक वस्त्र मत पहनो। खादी, सूती, ऊनी वस्त्रों से जीवनीशक्ति की रक्षा होती है व सिंथेटिक आदि अन्य प्रकार के वस्त्रों से उनका ह्रास होता है।

8. लँगोटी बाँधना अत्यंत लाभदायक है। सीधे, रीढ़ के सहारे तो कभी न सोओ, हमेशा करवट लेकर ही सोओ। यदि चारपाई पर सोते हो तो वह सख्त होनी चाहिए।

9. प्रातः जल्दी उठो। प्रभात में कदापि न सोओ। वीर्यपात प्रायः रात के अंतिम प्रहर में होता है।

10. पान मसाला, गुटखा, सिगरेट, शराब, चरस, अफीम, भाँग आदि सभी मादक (नशीली) चीजें धातु क्षीण करती हैं। इनसे दूर रहो।

11. लसीली (चिपचिपी) चीजें जैसे – भिंडी, लसौड़े आदि खानी चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में ब्राह्मी बूटी का सेवन लाभदायक है। भीगे हुए बेदाने और मिश्री के शरबत के साथ इसबगोल लेना हितकारी है।

12. कटिस्नान करना चाहिए। ठंडे पानी से भरे पीपे में शरीर का बीच का भाग पेटसहित डालकर तौलिये से पेट को रगड़ना एक आजमायी हुई चिकित्सा है। इस प्रकार 15-20 मिनट बैठना चाहिए। आवश्यकतानुसार सप्ताह में एक-दो बार ऐसा करो।

13. प्रतिदिन रात को सोने से ठंडा पानी पेट पर डालना बहुत लाभदायक है।

14. बदहज्मी व कब्ज से अपने को बचाओ।

15. सेंट, लवेंडर, परफ्यूम आदि से दूर रहो। इन्द्रियों को भड़काने वाली किताबें न पढ़ो, न ही ऐसी फिल्में और नाटक देखो।

16. विवाहित हो तो भी अलग बिछौने पर सोओ।

17. हर रोज प्रातः और सायं व्यायाम, आसन और प्राणायाम करने का नियम रखो।

📚निरोगता का साधन

 

ब्रह्मचर्य क्या है व जरूरी क्यों – Brahmacharya & it’s Benefits

brahmacharya kya aur kyu

भगवान वेदव्यास जी ने कहा है: ब्रह्मचर्यं गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयमः

ʹविषय-इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाले सुख का संयमपूर्वक त्याग करना ब्रह्मचर्य है।ʹ

शक्ति, प्रभाव और सभी क्षेत्रों में सफलता की कुंजी – ब्रह्मचर्य

राजा जनक शुकदेव जी से बोलेः तपसा गुरुवृत्त्या च ब्रह्मचर्येण वा विभो।

ʹबाल्यावस्था में विद्यार्थी को तपस्या, गुरु की सेवा, ब्रह्मचर्य का पालन एवं वेदाध्ययन करना चाहिए।ʹ (महाभारत, मोक्षधर्म पर्वः 326.15)

ब्रह्मचर्य का ऊँचे-में-ऊँचा अर्थ हैः ब्रह्म में विचरण करना। ʹजो मैं हूँ वही ब्रह्म है और जो ब्रह्म है वही मैं हूँ….ʹ ऐसा अनुभव जिसे हो जाये वही ब्रह्मचारी है।

ʹव्रतों में ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट है।ʹ (अथर्ववेद)

ʹअब्रह्मचर्य घोर प्रमादरूप पाप है।ʹ (दश वैकालिक सूत्रः 6.17)

अतः चलचित्र और विकारी वातावरण से अपने को बचायें। पितामह भीष्म, हनुमानजी और गणेशजी का चिंतन करने से रक्षण होता है।

“मैं विद्यार्थियों और युवकों से यही कहता हूँ कि वे ब्रह्मचर्य और बल की उपासना करें। बिना शक्ति व बुद्धि के, अधिकारों की रक्षा और प्राप्ति नहीं हो सकती। देश की स्वतंत्रता वीरों पर ही निर्भर है।” – लोकमान्य तिलक

आश्रम से प्रकाशित ʹदिव्य प्रेरणा प्रकाशʹ पुस्तक बार-बार पढ़ें-पढ़ायें।

 ~ब्रह्मचर्य रक्षा का मंत्र

 ૐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाये मनोभिलाषितं मनः स्तंभ कुरु कुरु स्वाहा। 

 रोज दूध में निहारकर 21 बार इस मंत्र का जप करें और दूध पी लें। इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है। 

 – जवाब दें और जीवन में लायें। 

 ▪बाल्यावस्था में विद्यार्थी को क्या करना चाहिए ? 

 ▪ब्रह्मचर्य का ऊँचे-में-ऊँचा अर्थ क्या है ? इसकी रक्षा के उपाय लिखें।

 

भीष्म पितामह का प्रसंग Effect of Bhishma Pratigya on Akhanda Brahmacharya

akhanda brahmacharya

महाभारत में ब्रह्मचर्य संबंधित भीष्म पितामह (Bhishma Pitamah)  का एक प्रसंग आता है :~

भीष्म पितामह बालब्रह्मचारी (Bal Brahmachari) थे, इसलिए उनमें अथाह सामर्थ्य था ।

 भगवान श्रीकृष्ण (Shri krishna) का यह व्रत था कि ‘मैं युद्ध शस्त्र नहीं उठाऊँगा ।’ किंतु यह भीष्म पितामह की ब्रह्मचर्यशक्ति का ही चमत्कार था कि उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना व्रत भंग करने के लिए मजबूर कर दिया । 

उन्होंने अर्जुन पर ऐसी बाणवर्षा की कि दिव्यास्त्रों से सुसज्जित अर्जुन जैसा धुरंधर धनुर्धारी भी उसका प्रतिकार करने में असमर्थ हो गया, जिससे उसके रक्षार्थ भगवान श्रीकृष्ण को रथ का पहिया लेकर भीष्म की ओर दौड़ना पड़ा। यह ब्रह्मचर्य (Akhanda Brahmacharya) का ही प्रताप था कि भीष्म मौत पर भी विजय प्राप्त कर सके । उन्होंने ही यह स्वयं तय किया कि उन्हें कब शरीर छोड़ना है । अन्यथा शरीर में प्राणों का टिके रहना असम्भव था परंतु भीष्म की बिना आज्ञा के मौत भी उनसे प्राण कैसे छीन सकती थी ! भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से शुभ मुहूर्त में अपना शरीर छोड़ा ।

 

ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः | Bodhkatha: Brahmachari & General Man in Hindi

Brahmachari & General man

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से …..

एक युवक ने यह बात पढ़ी~ “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ।”

“ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है।” (योग दर्शन साधन पाद: ३८) 

इतने में एक पतला-दुबला संन्यासी सामने से आता दिखाई दिया। उसे देखकर युवक हँसा और बोला ‘ब्रह्मचर्य का पालन करके साधु बन गया और शरीर देखो तो दुबला-पतला….. पतंजलि महाराज के ये वचन पुराने हो गये हैं। वे अतीत के लिए होंगे, अभी के युग के लिए नहीं….
यह देखो दुबले-पतले संन्यासी और हम कितने मोटे-ताजे !

युवक बुद्धिजीवी रहा होगा, जमानावादी रहा होगा।
भोग-रस्सी में बंधा हुआ कुतर्की रहा होगा। वर्तमान में बचाव की कला सीखा हुआ, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला रहा होगा। 

वह संन्यासी से बोला :
”महाराज ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । कहा है पतंजलि महाराज ने, लेकिन आपका शरीर तो देखो, कैसा दुबला-पतला है ? महाराज ! कैसे हैं ?”

फिर आगे कहा : ‘देखो, हम कैसे मजे से जी रहे हैं ? सुधरा हुआ जमाना है, चार दिन की जिंदगी है। मजे से जीना चाहिए…..’ ऐसा करके उसने अपना मज़ा लेने की बेवकूफी की डींग हाकी ।

संन्यासी ने सारी बेवकूफी की बातें सुनते हुए भी कहा :”चलो, मेरे पीछे-पीछे आओ।”
संन्यासी ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) के तेज से संपन्न था। निर्भीकता थी, वचन सामर्थ्य था। वह युवक ठगा-सा साधु के पीछे-पीछे चल पड़ा।
चलते-चलते दोनों पहुँचे एकांत अरण्य की उस गुफा में, जहाँ संन्यासी का निवासस्थान था। संन्यासी उस युवक को पास की एक गुफा में ले गया तो तीन शेर दहाड़ते हुए आये। ब्रह्मचर्य की मखौल उड़ानेवाला युवक तो संन्यासी के पैरों से लिपट गया।

संन्यासी ने शेरों पर नजर डाली….. नज़र डाली और शेर पूंछ हिलाते हुए पालतू पिल्ले की नाईं  बैठ गए।

युवक अभी तक थर-थर काँप रहा था। वह देखता ही रह गया ब्रह्मचर्य (Brahmacharya)  की महिमा का प्रताप ! अब उसे पता चला कि ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) के तेज में कितना सामर्थ्य छुपा है ।
 युवक ने क्षमा माँगी।

कहाँ तो पतला-दुबला दिखनेवाला संन्यासी और और ‘कहाँ तीन-तीन शेरों को पालतू पिल्ले की तरह शांति से बैठा देना !
 यह संन्यासी के ब्रहाचर्य (Brahmacharya) का प्रताप नहीं तो और क्या था ?

~ऋषि प्रसाद/जुलाई २००१/१०३/२६

 

एक विलक्षण सदगुण-मौन | Power of Silence in Hindi | Chup Rahne ke Fayde

chup rahne ke fayde

“दीपक जलता है तो बत्ती और तेल जलता है। इसी तरह जितना अधिक बोला जाता है, अंदर की शक्ति उतनी ही नष्ट होती है।” 

-ब्रह्मलीन ब्रह्मनिष्ठ साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज की हितभरी वाणी

मौन का अर्थ है अपनी शक्ति का व्यय न करना। मनुष्य जैसे अन्य इन्द्रियों से अपनी शक्ति खर्च करता है, वैसे बोलने से भी अपनी बहुत शक्ति व्यय करता है। आजकल देखोगे तो छोटे बालक तथा बालिकाएँ भी कितना वाद विवाद करते हैं। उन्हें इसकी पहचान ही नहीं है कि हमें जो कुछ बोलना है, उससे अधिक तो नहीं बोलते और जो कुछ बोलते हैं वह ऐसा तो नहीं है जो दूसरे को अच्छा न लगे या दूसरे के मन में दुःख उत्पन्न करे।

 कहते हैं कि तलवार का घाव तो भर जाता है किंतु जीभ से कड़वे शब्द कहने पर जो घाव होता है, वह मिटने वाला नहीं है। इसलिए सदैव सोच-समझकर बोलना चाहिए। जितना हो सके उतना मौन रहना चाहिए।

 महात्मा गांधी प्रति सोमवार को मौन व्रत रखते थे। मौन धारण करने की बड़ी महिमा है। इसे धारण करोगे तो बहुत लाभ प्राप्त करोगे।

 

◆ अनमोल वचन –

“आप कम बोलें, सारगर्भित बोलें, सुमधुर और हित से भरा बोलें। मानवी शक्तियों को हरने वाली निंदा, ईर्ष्या, चुगली, झूठ, कपट – इन गंदी आदतों से बचें और मौन व सारगर्भिता का सेवन करें !  -पूज्य बापू जी 

◆ सोचें व जवाब दें- 

 * व्यर्थ की बातें करने वाले का क्या नुकसान होता है ? 

*  दीपक के दृष्टांत से क्या सीख मिलता है ? 

◆ क्रियाकलापः

आप प्रतिदिन कुछ समय मौन रखने का संकल्प करें !

~हम भारत के लाल हैं

 

संयम की शक्ति | Power of Sanyam | Brahmacharya Meaning in Hindi

sanyam ki shakti

संत श्री आशारामजी बापू का बलप्रद संदेश…~

● संयम [Sanyam] बड़ी चीज है। जो संयमी है, सदाचारी है और अपने परमात्म-भाव में है, वही महान बनता है। हे भारत के युवानों ! तुम भी उसी गौरव को हासिल कर सकते हो।

● चाहें बड़ा वैज्ञानिक हो या दार्शनिक, विद्वान हो या बड़ा उपदेशक, सभी को संयम की जररूत है। स्वस्थ रहना हो, सुखी रहना हो और सम्मानित रहना हो, सबमें ब्रह्मचर्य [Brahmacharya] की जरूरत है।

● ब्रह्मचर्य [Brahmacharya] बुद्धि में प्रकाश लाता है, जीवन में ओज तेज लाता है। जो ब्रह्मचारी रहता है वह आनंदित रहता है, निर्भीक रहता है, सत्यप्रिय होता है। उसके संकल्प में बल होता है, उसका उद्देश्य ऊँचा होता है और उसमें दुनिया को हिलाने का सामर्थ्य होता है। स्वामी रामतीर्थ, रमण महर्षि, समर्थ रामदास, भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज, स्वामी विवेकानंद आदि महापुरुषों को ही देखें। उनके जीवन में ब्रह्मचर्य था तो उन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय अध्यात्म-ज्ञान का डंका बजा दिया था।

● यदि जीवन में संयम [Sanyam] को अपना लो, सदाचार को अपना लो एवं समर्थ सदगुरु का सान्निध्य पा लो तो तुम भी महान-से-महान कार्य करने में सफल हो सकते हो। लगाओ छलाँग…. कस लो कमर… संयमी बनो…. ब्रह्मचारी बनो और ʹयुवाधन सुरक्षा अभियानʹ के माध्यम से ʹदिव्य प्रेरणा-प्रकाशʹ पुस्तक अपने भाई-बन्धुओं, मित्रों, पड़ोसियों, ग्रामवासियों, नगरवासियों तक पहुँचाओ। उन्हें भी संयम की महिमा समझाओ और शास्त्र की इस बात को चरितार्थ करोः

सर्व भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।

ʹसभी सुखी हों, सभी नीरोगी हों, सभी सबका मंगल देखें और कोई दुःखी न हो।ʹ

जवाब दें और जीवन में लायें।

ब्रह्मचर्य से जीवन में कौन-कौन से सदगुण आ जाते हैं ?

* योग्यता विस्तारः संत श्री आशाराम जी आश्रम द्वारा प्रकाशित ʹदिव्य प्रेरणा प्रकाशʹ पुस्तक कम से कम 5 बार पढ़ें तथा अपने अन्य मित्रों को भी पढ़ने को दें।

 
 

गाँधीजी का ब्रह्मचर्य-व्रत

जो प्रसन्नता और आनंद मुझे ब्रह्मचर्य-व्रत पालन से मिला, वह मुझे नहीं याद आता इस व्रत से पहले कभी मिला हो । – महात्मा गाँधी

खूब चर्चा और दृढ़ विचार करने के बाद १९०६ में मैंने ब्रह्मचर्य-व्रत धारण किया। व्रत लेने तक मैंने धर्मपत्नी से इस विषय में सलाह न ली थी । व्रत के समय अलबत्ता ली । उसने कुछ विरोध न किया । यह व्रत लेते समय मुझे बड़ा कठिन मालूम हुआ । मेरी शक्ति कम थी । मुझे चिंता रहती कि विकारों को कैसे दबा सकूँगा और स्वपत्नी के साथ भी विकारों से अलिप्त रहना एक अजीब बात मालूम होती थी। फिर भी मैं देख रहा था कि यह मेरा स्पष्ट कर्तव्य है । मेरी नीयत साफ थी । इसलिए यह सोचकर कि ईश्वर शक्ति और सहायता देगा, मैं कूद पड़ा । 

अब २० वर्ष के बाद उस व्रत का स्मरण करते हुए सानंद आश्चर्य होता है। संयम-पालन करने का भाव तो मेरे मन में १९०१ से ही प्रबल था और उसका पालन मैं कर भी रहा था । परंतु जो प्रसन्नता और आनंद मैं अब पाने लगा हूँ, वह मुझे नहीं याद आता कि १९०६ के पहले मिला हो क्योंकि उस समय मैं वासनाबद्ध था और हर समय उसके अधीन हो जाने का भय रहता था । किंतु अब वासना मुझ पर सवारी करने में असमर्थ हो गयी । फिर मैं ब्रह्मचर्य की महिमा अधिकाधिक समझने लगा।

ब्रह्मचर्य का सोलह आने पालन करने का अर्थ है – ब्रह्मदर्शन । यह ज्ञान मुझे शास्त्रों के द्वारा न हुआ। यह तो मेरे सामने धीरे-धीरे अनुभवसिद्ध होता गया । उससे सम्बंध रखने वाले शास्त्र-वचन मैंने बाद में पढ़े।  
 ब्रह्मचर्य में शरीर-रक्षण, बुद्धि-रक्षण और आत्मिक रक्षण सब कुछ है – यह बात मैं व्रत के बाद दिनोंदिन अधिकाधिक अनुभव करने लगा,क्योंकि अब ब्रह्मचर्य को एक घोर तपश्चर्या रहने देने के बदले रसमय बनाना था । उसके बल काम चलाना था, इसलिए उसकी खूबियों के नित नये दर्शन मुझे होने लगे । पर मैं जो उससे इस तरह रस के घूँट पी रहा था, इससे कोई यह न समझे कि मैं उसकी कठिनता का अनुभव नहीं कर रहा था। 

आज यद्यपि मेरे छप्पन साल पूरे हो गए हैं, फिर भी उसकी कठिनता का अनुभव होता ही है। मैं यह अधिकाधिक समझता जाता हूँ कि यह अधिसार-व्रत है । अब निरंतर जागरूकता की आवश्यकता देखता हूँ ।

 ब्रह्मचर्य पालन करने के पहले स्वादेंद्रिय को वश में करना चाहिए । मैंने खुद अनुभव करके देखा है कि यदि स्वाद को जीत लें तो ब्रह्मचर्य पालन सुगम हो जाता है । 

 ~लोक कल्याण सेतु/अप्रैल-मई २००५

 

जहाँ चाह वहाँ राह

जहाँ मन की गहरी चाह होती है, आदमी वहीं पहुँच जाता है। अच्छे कर्म, अच्छा संग करने से हमारे अंदर अच्छे विचार पैदा होते हैं, हमारे जीवन की अच्छी यात्रा होती है और बुरे कर्म, बुरा संग करने से बुरे विचार उत्पन्न होते हैं एवं जीवन अधोगति की ओर चला जाता है।

हर महान कार्य कठिन है और हलका कार्य सरल !! उत्थान कठिन है और पतन सरल। पहाड़ी पर चढ़ने में परिश्रम होता है, पर उतरने में परिश्रम नहीं होता। पतन के समय जरा भी परिश्रम नहीं करना पड़ता है लेकिन परिणाम दुःखद होता है…. सर्वनाश…. उत्थान के समय आराम नहीं होता, परिश्रम लगता है लेकिन परिणाम सुखद होता है। कोई कहे किः ‘इस जमाने में बचना मुश्किल है…. कठिन है….’ लेकिन ‘कठिन है….’ ऐसा समझकर अपनी शक्ति को नष्ट करना यह कहाँ की बुद्धिमानी है ?

नर्तकी की देशभक्ति

उरु प्रदेश में एक नर्तकी थी, जिसका नाम था मृदुला। वह इतनी खूबसूरत थी और उसकी नृत्य कला इतनी मोहक थी कि बड़े-बड़े मंत्री, सेनाधिकारी वगैरह भी उसके नृत्य के चाहक थे। उसका नृत्य और हास्य तो क्या, उसके नेत्रों के एक कटाक्षमात्र से भी अनेकों घायल हो जाते थे ! उसके सौंदर्य पर मुग्ध होकर इतने राजवी पुरुष वहाँ आते थे कि कभी-कभी तो उन्हें मृदुला से मिले बिना ही लौट जाना पड़ता था।

उसके रूप-लावण्य एवं नृत्य कला की प्रशंसा वहाँ के राजा करुष तक पहुँची । एक दिन राजा स्वयं मृदुला के पास आया। मृदुला ने देखा कि राजा खुद आये हैं वह सोचने लगी : अगर राजा ही नर्तकी के चक्कर में पड़कर विलासी हो जायेंगे तो प्रजा का तो सत्यानाश हो जाएगा…, फिर मेरे देश का क्या होगा ?’ भले, वह एक नर्तकी थी लेकिन देशभक्ति उसके अंदर कूट-कूटकर भरी हुई थी।

मृदुला : ‘राजन्! आप और मेरे जैसी, लोगों को विलासिता की खाई में धकेलनेवाली, लोगों की जिंदगी बर्बाद करने वाली एक तुच्छ नर्तकी के पास ?”

राजा : ”हे प्रिये तेरे सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर मैं खिंचा चला आया हूँ। तेरा रूप-लावण्य अप्सराओं को भी लज्जित करने वाला है। तू मेरी रानी से भी अधिक सुंदर है। अब दूसरी बातें छोड़ और मेरे साथ अपने भवन में चल।”

मृदुला : ”अगर आप जैसे प्रजापालक भी फिसलने लगे तो देश का क्या होगा, राजन ?”

राजा: ‘‘अब इन फालतू बातों में समय नष्ट न कर। मैं कुछ सुनना नहीं चाहता। मैं जो अभिलाषा लेकर आया हूँ उसे पूरी कर। इसी में तेरी भलाई है।”

राजा पर तो कामविकार हावी हो चुका था। चतुर मृदुला समझ गयी कि अब इन्हें समझाना मुश्किल है। उसने बात बदल दी।

मृदुला : ‘‘राजन् आप मेरे रूप-लावण्यव सौन्दर्य पर इतने मोहित हैं तो ठीक है। मैं आपके ही राज्य की एक नर्तकी हूँ, अबला हूँ। आपकी आज्ञा का उल्लंघन मैं कैसे कर सकती हूँ ? लेकिन उरु प्रदेश के सर्वेसर्वा ! मैं अभी रजोदर्शन में हूँ। स्त्री अगर रजस्वला हो और पुरुष उसे छुए तो पुरुष की बुद्धि, ओज, तेज और तंदुरुस्ती का नाश होता है, यह आप जानते ही हैं। इसलिए मेरे मासिक धर्म के पाँच दिन बीत जायें फिर मैं अपने रूप-लावण्य और सौन्दर्य को सजा-धजाकर चैत्य सरोवर पर आपसे मिलूंगी।”

मृदुला रजस्वला है यह जानकर राजा ने अपने-आपको सँभाला। अब उसके इंतजार में राजा का एक-एक दिन मानो एक-एक वर्ष के समान बीत रहा था। पहले तो उसने मृदुला के रूप लावण्य-सौन्दर्य के विषय में सुना था लेकिन अभी तो वह स्वयं देखकर आया था। राजा बस यही सोचता रहता कि ‘कब उसके पाँच दिन पूरे होंगे ?’ पाँच दिन पूरे हुए मानो पाँच साल बीत गये। छठे दिन राजा चैत्य सरोवर पर आया। उसे मृदुला तो मिली लेकिन जीवित नहीं, मृतावस्था में।

उसकी लाश के साथ एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था: ‘देश का राजा ही यदि एक नर्तकी के चक्कर में पड़कर विलासिता में डूब जायेगा तो देश पतन के गर्त में चला जायेगा। उसकी अपेक्षा एक नर्तकी की कुर्बानी को मैं अधिक अच्छा समझती हूँ। हालाँकि राजा को बचाने के लिए आत्महत्या जैसा घृणित पाप करने की अपेक्षा वह किसी संत-महात्मा की शरण में जाती तो उसे दूसरे अनेक सुंदर उपाय मिलते।

कौन से हैं वे तीन शत्रु…?? – पूज्य बापूजी

जो व्यक्ति अपनी वीर्यरूपी ऊर्जा को संभालने की अक्ल नहीं रखता, वह मुर्गा छाप बच्चों को जन्म देगा अथवा परिवार-नियोजन के साधनों का उपयोग करके अपना और अपनी पत्नी का सत्यानाश करता ही रहेगा। फिर उसमें सहनशक्ति, आरोग्यता, निर्भयता, ध्यान करने की लगन और मुक्ति के मार्ग पर चलकर परमात्मा को पाने की इच्छा नहीं रहेगी क्योंकि वह अंदर से थक चुका होगा।

आज का युवान समझता ही नहीं कि वीर्यनाश करके वह अपनी अमूल्य शक्ति का अपने ही हाथों से नाश कर रहा है। जो व्यक्ति नीति और मर्यादा के बिना अपनी इच्छाओं को पोसने लगता है उसका मन निर्बल हो जाता है, बुद्धि विनाश की तरफ जाने लगती है और शरीर बीमारियों का शिकार हो जाता है। यदि तुम कामनाओं को व्यर्थ पोसते रहोगे तो तुम्हारे न चाहने पर भी ये तीन शत्रु- काम, क्रोध और लोभ तुम्हें गिरा देंगे।