bhishma panchak vrat

भीष्म पंचक व्रत (Bhishma Panchak Vrat) - 14 से 18 नवम्बर

  • कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूनम तक का व्रत ‘भीष्म पंचक’ कहलाता है । इस व्रत से व्यक्ति को जो पुण्य होता है वह वर्षभर के सभी जप-तप, होम, व्रत, उपवास का पुण्य माना गया है ।
  • कार्तिक शुक्ल एकादशी को भीष्म पितामह ने जल की याचना की थी : “मुझे जल पिलाओ ।”
  • अर्जुन ने वहाँ धरती में बाण मार के संकल्प किया था । गंगा जी की धार निकली और भीष्म के मुँह में आयी, उनकी प्यास मिटी । तन, मन और प्राण संतुष्ट हुए । भगवान श्रीकृष्ण ने इस मंगलमय घटना की स्मृति में घोषणा कर दी कि “इस एकादशी से पूनम तक भीष्म को जो अर्घ्यदान तृप्त करेगा और इस भीष्म पंचक व्रत का पालन करेगा, उस पर मेरी सहज प्रसन्नता होगी ।”
  • अयोध्या का राजा अतिथि इस व्रत को करने से बड़ा यशस्वी, प्रभावशाली हो गया । वह राज्य-सुख भोगकर अंत में भगवान के धाम को प्राप्त हुआ । जो इस लोक में सुख चाहते हैं और वैकुंठ चाहते हैं, उन्हें यह व्रत करने की सलाह दी गयी है । निःसंतान व्यक्ति पत्नीसहित यह व्रत करे तो उसे संतान प्राप्त होती है ।
  • इन 5 दिनों में अन्न त्याग के कंदमूल, फल अथवा दूध आदि पर रहे या तो यज्ञ का बचा अन्न (हविष्य) लें तो उनको विशेष लाभ होता है । इन दिनों ब्रह्मचर्य-पालन करें, पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोझरण व गोबर-रस का मिश्रण) लें । स्नान भी पंचगव्य से करें अथवा गोक्षरण व गोबर के मिश्रण से । नहीं तो केवल गोझरण थोड़े पानी में मिलाकर शरीर को रगड़ के पंचगव्य की भावना से स्नान करें तब भी शरीर के रोमकूपों के दोष निवृत होते हैं ।
  • जिनको स्वप्नदोष, धातुक्षय या श्वेत प्रदर की बीमारी है अथवा हस्तमैथुन की आदत है, ऐसे लोगों के लिए यह भीष्म पंचक व्रत वरदानरूप है क्योंकि भीष्म आजीवन ब्रह्मचारी रहे थे ।
  • इन पाँच दिनों में इस मंत्र से भीष्मजी के लिए तर्पण करना चाहिए :

सत्यव्रताय शुचये गाङ्गेयाय महात्मने ।
भीष्मायैतद् ददाम्यर्घ्यमाजन्मब्रह्मचारिणे ॥

  • ‘आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले परम पवित्र सत्य-व्रतपरायण गंगानंदन महात्मा भीष्म को मैं यह अर्घ्य देता हूँ ।’
    ( स्कंद पुराण, वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य )
  • ऐसा करके अर्घ्य दें और प्रार्थना करें कि ‘मैं धातुक्षय के रोग से बचूँ, कामविकार से बचूँ… ।’
  • इस अर्घ्य के जल में पुष्प व थोड़ा कुमकुम हो तो और अच्छा है, नहीं तो जैसे भी दे सकें, दें ।
  • जो इस मंत्र से भीष्मजी के लिए अर्घ्यदान करता है, वह मोक्ष का भागी होता है :

व्याघ्रपदगोत्र सांकृतप्रवराय च ।
अपुत्राय ददाम्येतदुदकं भीष्मवर्मणे ॥
वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च ।
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे ॥

  • ‘जिनका व्याघ्रपद गोत्र और सांकृत प्रवर है, उन पुत्र रहित-भीष्मवर्मा को मैं यह जल देता हूँ । वसुओं के अवतार, शांतनु के पुत्र, आजन्म ब्रह्मचारी भीष्म को मैं अर्घ्य देता हूँ ।
    (स्कंद पुराण, वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य)
    – ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2015

Bhishma Panchak Vrat Katha & Vidhi