बिना मुहुर्त के मुहुर्त | Raghu Raja Ki Pauranik Katha -Vijayadashami Muhurat

Raghu Raja Ji Ki Pauranik katha

आज हम जानेंगे : क्यों कहते हैं दशहरे (Dussehra) को विजयादशमी ?

विजयादशमी (Vijyadashmi) का दिन बहुत महत्त्व का है और इस दिन सूर्यास्त के पूर्व से लेकर तारे निकलने तक का समय अर्थात् संध्या का समय बहुत ही उपयोगी है ।

 रघु राजा (Raghu Raja) ने इसी समय कुबेर पर चढ़ाई करने का संकेत कर दिया था कि “सोने की मुहरों की वृष्टि करो या फिर युद्ध करो ।”

रामचन्द्रजी रावण के साथ युद्ध में इसी दिन विजयी हुए । ऐसे ही इस विजयादशमी (Vijayadashami) के दिन अपने मन में जो रावण के विचार हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता – इन अंदर के शत्रुओं को जीतना है और रोग, अशांति जैसे बाहर के शत्रुओं पर भी विजय पानी है ।

 दशहरा यह खबर देता है । अपनी सीमा के पार जाकर औरंगजेब के दाँत खट्टे करने के लिए शिवाजी ने दशहरे का दिन चुना था – बिना मुहुर्त के मुहुर्त !

( विजयादशमी – Vijayadashami का पूरा दिन स्वयं सिद्ध मुहुर्त है अर्थात् इस दिन कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग – शुद्धि या शुभ मुहुर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती। ) 
इसलिए दशहरे के दिन कोई भी वीरता पूर्ण काम करनेवाला सफल होता है ।

वरतंतु ऋषि का शिष्य कौत्स विद्याध्ययन समाप्त करके जब घर जाने लगा तो उसने अपने गुरुदेव से गुरुदक्षिणा के लिए निवेदन किया ।

तब गुरुदेव ने कहा : ‘‘वत्स ! तुम्हारी सेवा ही मेरी गुरुदक्षिणा है। तुम्हारा कल्याण हो ।”

परंतु कौत्स के बार-बार गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह करते रहने पर ऋषि ने क्रुद्ध होकर कहा : ‘‘तुम गुरुदक्षिणा देना चाहते हो तो चौदह करोड़ सुवर्णुद्राएँ लाकर दो ।”

अब गुरुजी ने आज्ञा की है । इतनी स्वर्ण मुद्राएँ और कोई देगा नहीं, रघु राजा के पास गये ।

रघु राजा ने इसी दिन को चुना और कुबेर को कहा : ‘‘या तो स्वर्णुद्राओं की बरसात करो या तो युद्ध के लिए तैयार हो जाओ ।”

कुबेर जी ने शमी वृक्ष पर स्वर्णुद्राओं की वृष्टि की । रघु राजा ने वह धन ऋषिकुमार को दिया लेकिन ऋषिकुमार ने अपने पास नहीं रखा, ऋषि को दिया । 

विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है और उसके पत्ते देकर एक-दूसरे को यह याद दिलाना होता है कि सुख बाँटने की चीज है और दुःख पैरों तले कुचलने की चीज है ।

 धन-सम्पदा अकेले भोगने के लिए नहीं है । तेन त्यक्तेन भुंजी था… । जो अकेले भोग करता है, धन-सम्पदा उसको ले डूबती है । भोगवादी दुनिया में विदेशी ‘अपने लिए – अपने लिए… करते हैं तो ‘व्हील चेयर’ पर और ‘हार्ट अटैक आदि कई बीमारियों से मरते हैं । अमेरिका में 58 प्रतिशत लोगों को सप्ताह में कभी-कभी अनिद्रा सताती है और 35 प्रतिशत लोगों को हर रोज अनिद्रा सताती है । भारत में अनिद्रा का प्रमाण 10 प्रतिशत भी नहीं है क्योंकि यहाँ सत्संग है और त्याग, परोपकार से जीने की कला है । 

यह भारत की महान संस्कृति का फल हमें मिल रहा है तो दशहरे की संध्या को भगवान को प्रीतिपूर्वक भजें और प्रार्थना करें कि ‘हे भगवान ! जो चीज सबसे श्रेष्ठ है उसीमें हमारी रुचि करना ।
संकल्प करना कि ‘आज प्रतिज्ञा करते हैं कि ॐ कार का जप करेंगे । ‘ॐ कार जप करने से देवदर्शन, लौकिक कामनाओं की पूर्ति, आध्यात्मिक चेतना में वृध्दि, साधक की ऊर्जा एवं क्षमता में वृध्दि और जीवन में दिव्यता तथा परमात्मा की प्राप्ति होती है ।     

– सीख : गुरुदेव से अपनी बात मनवाने के लिए आग्रह नहीं करना चाहिए । दशहरे के दिन अपनी बुरी आदतों को छोडने का संकल्प लेना चाहिए और ‘ॐ कार जप करना चाहिए ।

– प्रश्नोत्तरी :
 (1) दशहरे का पर्व हमें क्या-क्या सीख देता है ?
(2) शिवजी कौन-सा नृत्य करते हैं तब प्रलय आती है ? (तांडव नृत्य)

~ बाल संस्कार पाठ्यक्रम/ दूसरा सप्ताह – अक्टूबर

 
 

तुलसी हमारी रक्षक और पोषक है | Importance & Benfits of Tulsi (Holy Basil)

tulsi hamari rakshak aur poshak hai holy basil

तुलसी (Holy Basil or Tulsi) आयु, आरोग्य, पुष्टि देती है। दर्शनमात्र से पाप समुदाय का नाश करती है। स्पर्श करने मात्र से यह शरीर को पवित्र बनाती है और जल देकर प्रणाम करने से रोग निवृत्त करती है तथा नरकों से रक्षा करती है। इसके सेवन से स्मृति व रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है।

जिसके गले में तुलसी (Holy Basil or Tulsi) लकड़ी की माला हो या तुलसी (Holy Basil or Tulsi) का पौधा निकट हो तो उसे यमदूत नहीं छू सकते। तुलसी माला धारण करने से जीवन में ओज तेज बना रहता है।

वैज्ञानिक बोलते हैं कि जो तुलसी (Holy Basil or Tulsi) का सेवन करता है उसका मलेरिया मिट जाता है अथवा होता नहीं है, कैंसर नहीं होता। लेकिन हम कहते हैं कि यह तुम्हारा नजरिया बहुत छोटा है, ‘तुलसी भगवान की प्रसादी है, यह भगवत्प्रिया है। हमारे हृदय में भगवत्प्रेम देने वाली तुलसी माँ हमारी रक्षक और पोषक है।’ ऐसा विचार करके तुलसी खाओ, बाकी मलेरिया आदि तो मिटना ही है। हम लोगों का नजरिया केवल रोग मिटाना नहीं है बल्कि मन प्रसन्न करना है, जन्म मरण का रोग मिटाकर जीते जी भगवद्रस जगाना है।”

– पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

वैलेन्टाइन डे’ कैसे शुरू हुआ | What is Valentine’s Day and how did it start?

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रोम के राजा क्लाउडियस ब्रह्मचर्य की महिमा से परिचित रहे होंगे, इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों को शादी करने के लिए मना किया था, ताकि वे शारीरिक बल और मानसिक दक्षता से युद्ध में विजय प्राप्त कर सकें। सैनिकों को शादी करने के लिए ज़बरदस्ती मना किया गया था, इसलिए संत वेलेन्टाइन (Valentines) जो स्वयं इसाई पादरी होने के कारण ब्रह्मचर्य के विरोधी नहीं हो सकते थे, ने गुप्त ढंग से उनकी शादियाँ कराईं। राजा ने उन्हे दोषी घोषित किया और उन्हें फाँसी दे दी गयी। सन् 496 से पोप गैलेसियस ने उनकी याद में वेलेन्टाइन डे मनाना शुरू किया।

वेलेन्टाइन डे (Valentine’s Day) मनाने वाले लोग संत वेलेन्टाइन का ही अपमान करते हैं क्योंकि वे शादी के पहले ही अपने प्रेमास्पद को वेलेन्टाइन कार्ड भेजकर उनसे प्रणय-संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं। यदि संत वेलेन्टाइन इससे सहमत होते तो वे शादियाँ कराते ही नहीं।

अतः भारत के युवान-युवतियाँ शादी से पहले प्रेमदिवस के बहाने अपने ओज-तेज-वीर्य का नाश करके सर्वनाश न करें और मानवमात्र के परम हितकारी पूज्य बापू जी के मार्गदर्शन में अपने यौवन-धन, स्वास्थ्य और बुद्धि की सुरक्षा करें।
“मातृ-पितृ पूजन दिवस मनायें।”

“Matri-Pitri Pujan Divas”

 
 

विश्वमानव की मंगलकामना | How to celebrate Divine Valentines Day ?

vishwa manav ki mangal kamna divine valentines day

प्रेम-दिवस ( वेलेन्टाइन डे | Valentines Day ) के नाम पर विनाशकारी कामविकार का विकास हो रहा है, जो आगे चलकर चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, खोखलापन, जल्दी बुढ़ापा और मौत लाने वाला साबित होगा। अतः भारतवासी इस अंधपरंपरा से सावधान हों !

‘इन्नोसेन्टी रिपोर्ट कार्ड’ के अनुसार 28 विकसित देशों में हर साल 13 से 19 वर्ष की 12 लाख 50 हजार किशोरियाँ गर्भवती हो जाती हैं। उनमें से 5 लाख गर्भपात कराती हैं और 7 लाख 50 हजार कुँवारी माता बन जाती हैं। अमेरिका में हर साल 4 लाख 94 हजार अनाथ बच्चे जन्म लेते हैं और 30 लाख किशोर-किशोरियाँ यौन रोगों के शिकार होते हैं।

यौन संबन्ध करने वालों में 25% किशोर-किशोरियाँ यौन रोगों से पीड़ित हैं। असुरिक्षित यौन संबंध करने वालों में 50% को गोनोरिया, 33% को जैनिटल हर्पिस और एक प्रतिशत के एड्स का रोग होने की संभावना है।एड्स के नये रोगियों में 25% 22 वर्ष से छोटी उम्र के होते हैं। आज अमेरिका के 33% स्कूलों में यौन शिक्षा के अंतर्गत ‘केवल संयम’ की शिक्षा दी जाती है। इसके लिए अमेरिका ने 40 करोड़ से अधिक डॉलर (20 अरब रूपये) खर्च किये हैं।

प्रेम दिवस जरूर मनायें लेकिन प्रेमदिवस में संयम और सच्चा विकास लाना चाहिए। युवक युवती मिलेंगे तो विनाश-दिवस बनेगा। इस दिन बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता का पूजन करें और उनके सिर पर पुष्प रखें, प्रणाम करें तथा माता-पिता अपनी संतानों को प्रेम करें। संतान अपने माता-पिता के गले लगे। इससे वास्तविक प्रेम का विकास होगा। बेटे-बेटियाँ माता-पिता में ईश्वरीय अंश देखें और माता-पिता बच्चों में ईश्वरीय अंश देखें।

तुम भारत के लाल और भारत की लालियाँ ( बेटियाँ ) हो। प्रेमदिवस मनाओ, अपने माता-पिता का सम्मान करो और माता-पिता बच्चों को स्नेह करें।

करोगे न बेटे ऐसा ??

पाश्चात्य लोग विनाश की ओर जा रहे हैं। वे लोग ऐसे दिवस मनाकर यौन रोगों का घर बन रहे हैं, अशांति की आग में तप रहे हैं। उनकी नकल तो नहीं करोगे ?

मेरे प्यारे युवक-युवतियों और उनके माता-पिता ! आप भारतवासी हैं। दूरदृष्टि के धनी ऋषि-मुनियों की संतान हैं। प्रेमदिवस (वेलेन्टाइन डे) के नाम पर बच्चों, युवान-युवतियों के ओज-तेज का नाश हो, ऐसे दिवस का त्याग करके माता-पिता और संतानों प्रभु के नाते एक-दूसरे को प्रेम करके अपने दिल के परमेश्वर को छलकने दें। काम विकार नहीं, रामरस, प्रभुप्रेम, प्रभुरस….

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। बालिकादेवो भव।

कन्यादेवो भव। पुत्रदेवो भव।

माता पिता का पूजन करने से काम राम में बदलेगा, अहंकार प्रेम में बदलेगा, माता-पिता के आशीर्वाद से बच्चों का मंगल होगा।

पाश्चात्यों का अनुकरण आप क्यों करो ? आपका अनुकरण करके वे सदभागी हो जायें।

जो राष्ट्रभक्त नागरिक यह राष्ट्रहित का कार्य करके भावी सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण में साझीदार हो रहे हैं वे धनभागी हैं और जो होने वाले हैं उनका भी आह्वान किया जाता है।

 

अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया | Learn More About Asharam Bapu & Motera Ashram

guru ki agya palan

apna pura jeevan samarpit kar dia

– Asharam Bapu Aur Motera Village

आप अपने पूज्य सद्गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य करके अपनी उच्च समाधि-अवस्था का सुख छोडकर अशांति की भीषण आग से तप्त लोगों में शांति का संचार करने हेतु समाज के बीच आ गये।

सन् १९७२ में आपश्री अहमदाबाद में साबरमती के पावन तट पर स्थित मोटेरा (Motera) गाँव पधारे । तब यहाँ दिन में भी भयानक मारपीट, लूटपाट, डकैती व असामाजिक कार्य होते थे । वही मोटेरा (Motera) गाँव आज करोड़ों श्रद्धालुओं का पावन तीर्थधाम, शांतिधाम बन चुका है । आज विश्वभर में करीब ४२५ से भी अधिक आश्रम स्थापित हो चुके हैं । आज करोड़ों सौभाग्यशाली लोग पूज्यश्री से वैदिक मंत्र की दीक्षा ले चुके हैं । ध्यानयोग शिविरों में आकर उन्हें आपश्री की अहैतुकी करुणा-कृपा से चित्शक्ति-उत्थान के दिव्य अनुभव होते हैं, जिससे चिंता-तनाव, हताशा-निराशा आदि पलायन कर जाते हैं और जीवन की उलझी गुत्थियाँ सुलझने लगती हैं ।

निष्काम कर्मयोग हेतु आश्रम द्वारा स्थापित १४०० से भी अधिक सेवा समितियाँ आश्रम की सेवाओं को समाज के कोने-कोने तक पहुँचाने में जुटी रहती हैं । भारत की राष्ट्रीय एकता-अखंडता व शांति के प्रबल समर्थक पूज्य बापूजी ने राष्ट्र के कल्याणार्थ अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है ।

 

प्राणिमात्र के कल्याण का हेतु होता है संत अवतरण! Avtaran Divas Meaning in Hindi

Avtaran Divas Meaning in Hindi

Avtaran Divas Meaning in Hindi

संतों को नित्य अवतार माना गया है। कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं संत होंगे और उनके हृदय में भगवान अवतरित होकर समाज में सही ज्ञान व सही आनंद का प्रकाश फैलाते हैं। उनके नाम पर, धर्म के नाम पर कहीं कितना भी, कुछ भी चलता रहता है फिर भी संत-अवतरण (Sant Avtaran) के कारण समाज में भगवत्सत्ता, भगवत्प्रीति, भगवद्ज्ञान, भगवद्-अर्पण बुद्धि के कर्मों का सिलसिला भगवान चलवाते रहते हैं….।

तो आपके कर्म भी दिव्य हो जायेंगे…. :-

साधारण आदमी अपने स्वार्थ से काम करता है, भगवान और महात्मा परहित के लिए काम करते हैं। महात्माओं का जन्मदिवस मनाने वाले साधक भी परहित के लिए काम कर रहे हैं तो साधकों के भी कर्म दिव्य हो गये।

इस दिवस पर जो भी सेवाकार्य करते हैं, वे करने का राग मिटाते हैं, भोगने का लालच मिटाते हैं और भगवान व गुरु के नाते परहित करते हैं। उन साधकों को जो आनंद आता होगा, जो कीर्तन में मस्ती आती होगी या गरीबों को भोजन कराने में जो संतोष का अनुभव होता होगा, विद्यार्थियों को नोटबुक बाँटने में तथा भिन्न-भिन्न सेवाकार्यों में जो आनंद आता होगा, वह सब दिव्य होगा। इस दिन के निमित्त प्रतिवर्ष गरीबों में लाखों टोपियाँ बँटती हैं, लाखों बच्चों को भोजन मिलता है और लाखों-लाखों कॉपियां बँटती हैं। औषधालयों में, अस्पतालों में, और जगहों पर – जिसको जहाँ भी सेवा मिलती है, वे सेवा ढूँढ लेते हैं। अपने स्वार्थ के लिए कर्म करते हैं तो उससे कर्मबंधन हो जाता है और परहित के लिए कर्म करते हैं तो कर्म दिव्य हो जाता है।

आपको जगाने के लिए क्या-क्या कर्म करते हैं….!! :-

आप जिसका जन्मदिवस मना रहे हैं, वास्तव में वह मैं हूँ नहीं, था नहीं। फिर भी आप जन्म दिवस मना रहे हैं तो मैं इन्कार भी नहीं करता हूँ। आपने मुकुट पहना दिया तो पहन लिया, फूलों की चादर ओढ़ा दी तो ओढ़ ली। इस बहाने भी आपका जन्म-कर्म दिव्य हो जाये। वे महापुरुष हमें जगाने की न जाने क्या-क्या कलाएँ, क्या-क्या लीलाएँ करते रहते हैं ! नहीं तो ये टॉफी बाँटना, रंग छिड़कना, प्रसाद लेना-बाँटना – ये हमारी दुनिया के आगे बहुत-बहुत छोटी बात है। लेकिन करें तो करें क्या ? आध्यात्मिकता में जिनकी बचकानी समझ है, एक दो की नहीं लगभग सभी की है, उन्हें उठाना-जगाना है। यह अपने-आप में बहुत भारी तपस्या है। एकाग्रता के तप से भी ऊँचा तप है। वे महापुरुष नित्य नवीन रस अद्वैत ब्रह्म में हैं लेकिन नित्य द्वैत के व्यवहार में उतरते हुए हमको ऊपर उठाते हैं।

यह जो कुछ आँखों से दिखता है, जीभ से चखने में आता है, नाक से सूँघने में आता है, मन और बुद्धि से सोचने में आता है – ये सब वास्तव में है ही नहीं। जैसे स्वप्न में सब चीजें सच्ची लगती हैं, आँख खोली तो वास्तविकता में नहीं हैं, ऐसे ही ये सब सचमुच में, वास्तविकता में नहीं है।


आप भी इसका मजा लो….!! :-

वास्तव में प्रकृति और चैतन्य परमात्मा है, बाकी कुछ भी ठोस नहीं है। सिर्फ लगता है यह ठोस है। 10 मिनट हररोज भावना करो कि ‘यह सब स्वप्न है, परिवर्तनशील है। इन सबके पीछे एक सूत्रधार चैतन्य है और अष्टधा प्रकृति है।’ यह याद रखो और स्वप्न का मजा लो तो उसकी गंदगी अथवा विशेषता से आप बंधायमान नहीं होंगे।

भगवान व गुरु भक्त का पक्ष लेते हैं….!! :-

भगवान और गुरु के साथ एकतानता हो जाय तो भगवान और गुरु का अनुभव एक ही होता है। ब्रह्म-परमात्मा तटस्थ हैं, गुरु और भगवान पक्षपाती हैं। ब्रह्म-परमात्मा प्रकाश देते हैं, चेतना देते हैं, कोई कुछ भी करे …. लेकिन भगवान और गुरु भक्त का पक्ष लेते हैं। भक्त अच्छा करेगा तो प्रोत्साहित करेंगे, बुरा करेगा तो डाँटेंगे, बुराई से बचने में मदद करेंगे, भक्त की रक्षा करेंगे। ‘चतुर्भुजी नारायण भगवान नन्हें हो जाओ’ तो माता की प्रार्थना पर ‘उवाँ…..उवाँ……’ करते हुए रामजी बन गये, श्रीकृष्ण बन गये। भक्त के पक्ष में वराह अवतार, मत्स्य अवतार, अंतर्यामी अवतार, प्रेरक अवतार ले लेते हैं।

जन्मदिवस मनाने का उद्देश्य क्या…. ? :-

यह जन्म दिवस मनाने के पीछे भी एक ऊँचा उद्देश्य है। ‘मैं कौन हूँ ?….. ‘ – ‘मैं फलाना हूँ….’ पर यह तो शरीर है, इसको जानने वाला मन है, निर्णय करने वाली बुद्धि है। ये सब तो बदलते हैं फिर भी जो नहीं बदलता है, वह मैं कौन हूँ ?’ – ऐसा खोजते-खोजते गुरु के संकेत से सदाचारी जीवन जिये तो ‘मैं कौन हूँ ?’ इसको जान लेना और जन्म दिव्य हो जायेगा। जन्म दिव्य होते ही कर्म दिव्य हो जायेंगे क्योंकि सुख पाने की लालसा नहीं है, दुःख से बचने का भय नहीं है और ‘जो है, बना रहे’ ऐसी उसकी नासमझी नहीं है।

मरने वाले शरीर का जन्मदिवस तो मनाओ पर उसी निमित्त मनाओ, जिससे सत्कर्म हो जायें, सदबुद्धि का विकास हो जाये। इस उत्सव में नाच कूद के बाहर की आपाधापी मिटाकर सदभाव जगा के फिर शांत हो जायें। श्रीमद् आद्यशंकराचार्यजी ने कहा हैः
मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं….

‘मैं शरीर भी नहीं हूँ, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त भी नहीं हूँ। तो फिर क्या हूँ ?’ बस, डूब जाओ, तड़पो….. प्रकट हो जायेगा।

~ ऋषि प्रसाद, मार्च 2015

Guru Bhakti Ne Asumal Se Asharam Bana Diya

Asharam bapu ki guru bhakti

guru aagya palan

पूज्य श्री अपने सद्गुरु भगवत्पाद साईं श्री लीलाशाहजी महाराज (Leela Shah ji Maharaj) की आज्ञा में रहकर खूब श्रद्धा व प्रेम से गुरुसेवा करते थे । भोजन में मात्र मूँग की दाल लेते । साढे चार फीट के छोटे-से कमरे में सोते । आश्रम के सभी सेवाकार्य आपश्री ने अपने ऊपर ले लिये ।

आत्मसाक्षात्कार :-

साधना की विभिन्न घाटियों को पार करते हुए आश्विन मास, शुक्ल पक्ष द्वितीया संवत् २०२१ (७ अक्टूबर, वर्ष – १९६४) के दिन माध्याहन ढाई बजे सद्गुरु की कृपादृष्टि और संकल्पमात्र से आपश्री को आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हो गया ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान ।

आसुमल से हो गये, साईं आशाराम ।।

Purn Guru Kripa Mili, Purn Guru Ka Gyan ||

Asumal Se Ho Gye, Sai Asharam ||

आज्ञा सम न साहिब सेवा… :-

भगवत्पाद साईं श्री लीलाशाहजी महाराज (Leelashah ji Maharaj) ने आप में औरों को उन्नत करने का सामर्थ्य पूर्ण रूप से विकसित देखकर आदेश दिया : ”आशाराम ! अब तुम गृहस्थी में रहकर संसार-ताप से तप्त लोगों में यह पाप, ताप, तनाव, रोग, शोक, दुःख-दर्द से छुडानेवाला आध्यात्मिक प्रसाद बाँटो और उन्हें भी अपने आत्मस्वरूप में जगाओ ।”

गुरु आज्ञा-पालन कैसे करें ?

guru aagya palan kaise karein

“विचार से (अपनी बुद्धि से कुछ मिलावट किये बिना) सद्गुरु के आदेश का पालन करें, ऐसा करने से काम बन जायेगा।” श्री आनंदमयी माँ

अहमदाबाद आश्रम की वाटिका में बगीचे की सेवा करने वाले संतोष भाई अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं एक बार पूज्य बापूजी प्रातःभ्रमण करते हुए गौशाला पधारे थे तो वहाँ का फाटक देखकर पूछा- ”यह तिरछा कैसे हो गया ?”

सेवक- ‘‘ट्रैक्टर चलाते समय चालक से धक्का लग गया था।”
”उसको बोलना ध्यान रखा करे । लो इसको सीधा करो।’

उस फाटक का एक हिस्सा झुक गया था तो बापूजी बोले :- ”जो हिस्सा ऊपर उठ गया है। उसको तार से बाँधकर नीचे किसी बँटी से कस दो तो फाटक सीधा हो जायेगा।” इतना बोलकर
पूज्य श्री घूमने चले गये।

‘ऐसा तो मैं कर चुका हूँ मगर सीधा नहीं हुआ।…’ ऐसा सोच के मैं अपनी बुद्धि चलाने लगा । बहुत कोशिशें की, फाटक के नीचे खुदाई भी कर दी, जिस खम्भे पर वह लगा था उसको सीधा कर दिया, ठोका-पीटा परंतु कुछ नहीं हुआ। दूसरों की मदद भी खूब ली पर जो करना चाहिए वह नहीं किया।

बापूजी लौटकर आने वाले थे, सोचा कि ‘अब एक बार वैसा ही करके देखता हूँ जैसा गुरुजी ने बताया था।’ फाटक को तार से ४-५ लपेटा मारकर खींचा और बाँध दिया तो एकदम सीधा हो गया। मुझे हमेशा के लिए एक सीख मिल गयी कि गुरु-उपदिष्ट मार्ग पर चलने में ही जीवन की सफलता है।

 सद्गुरु की आज्ञा वास्तव में उनका आशीर्वाद ही होती है। वे जो बताते हैं, संकेत करते हैं उसमें हमारी उन्नति का रहस्य छिपा होता है। वे हमारे लिए जो उचित समझते हैं वह हमें जँचे चाहे न जँचे, हमारे लिए वही हितकर होता है। ‘गुरु भक्ति योग’ शास्त्र में आता है कि ‘सदैव याद रखो, उच्चात्मा गुरु को जो अच्छा लगता है वह आपकी पसंदगी की अपेक्षा अधिक हितकर होता है।’

 

प्राणिमात्र की आशाओं के राम : AsharamJi Bapu Avtaran Special

AsharamJi Bapu Avatarn Special

ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आशारामजी बापू का पावन जीवन तो ऐसी अनेक घटनाओं से परिपूर्ण है, जिनसे उनकी करुणा-उदारता एवं परदुःखकातरता सहज में ही परिलक्षित होती है ।

आज से ३० वर्ष पहले की बात है~…

एक बार पूज्य श्री डीसा में बनास नदी के किनारे संध्या के समय ध्यान-भजन के लिए बैठे हुए थे । नदी में घुटने तक पानी बह रहा था । जख्मी पैर वाला एक व्यक्ति नदी पार अपने गाँव जाना चाहता था । पैर में भारी जख्म, नदी पार कैसे करे ! इसी चिंता में डूबा-सा दिखा । पूज्य श्री समझ गये और उसे अपने कंधे पर बैठाकर नदी पार करा दी । वह गरीब मजदूर दंग रह गया । साईं की सहज करुणा-कृपा भरे व्यवहार से प्रभावित होकर उस मजदूर ने कहा … ‘‘पैर पर जख्म होने से ठेकेदार ने काम पर आने से मना कर दिया है । कल से मजदूरी नहीं मिलेगी ।”

पूज्य बापूजी ने कहा … ‘‘मजदूरी न करना, मुकादमी करना । जा, मुकादम हो जा ।”

दूसरे दिन ठेकेदार के पास जाते ही उस मजदूर को उसने ज्यादा तनख्वाह वाली मुकादमी की नौकरी दे दी । किसकी प्रेरणा से दी, किसके संकल्प से दी यह मजदूर से छिपा न रह सका । कंधे पर बैठाकर नदी पार कराने वाले ने रोजी-रोटी की चिंता से भी पार कर दिया तो मालगढ का वह मजदूर प्रभु का भक्त बन गया ।

ऐसे अगणित प्रसंग हैं जब बापूजी ने निरीह, निसहाय जीवों को अथवा सभी ओर से हारे हुए, दुखी, पीड़ित व्यक्तियों को कष्टों से उबारकर उनमें आनंद, उत्साह भरा हो ।

 सीख ~ संतों का हृदय बडा दयालु होता है । जाने-अनजाने कोई भी जीव उनके सम्पर्क में आ जाता है तो उसका कल्याण हुए बिना नहीं रहता ।

संकल्प ~ ‘हम भी पूज्य बापूजी का ज्ञान जीवन में लायेंगे और दूसरों को भी सत्संग में लेकर आयेंगे ।

 

पूज्य संत श्री आशाराम बापूजी के प्रेरक जीवन प्रसंग

pujya sant asahram ji bapu ke prerak jeevan prasang

 बहुत पहले की बात है। एक बार पूज्य बापूजी हिम्मतनगर आश्रम में रुके हुए थे।

सुबह पूज्यश्री को कहीं दूसरी जगह सत्संग करने जाना था। रसोइया नाश्ते में हलवा बनाकर लाया तो बापूजी बोले ”चलो, रास्ते में गाड़ी में ही नाश्ता कर लेंगे।”

समयाभाव के कारण कभी-कभी पूज्यश्री गाड़ी में ही भोजन-प्रसाद, नाश्ता आदि ले लेते हैं।

गाड़ी चली…….।

हिम्मतनगर शहर से बाहर निकले ही थे कि सड़क के किनारे एक कुत्ता पड़ा हुआ दिखा। उसके दो पैर खराब थे इसलिए वह चल फिर नहीं सकता था। मुँह पर भिनभिनाती मक्खियों को भी उड़ा नहीं सकता था। वह दुबला-पतला, भूखा-प्यासा कुत्ता अत्यंत दीन-हीन दशा में पड़ा था। उसकी वह दशा देखकर ऐसा किसी के भी मन में विचार आ जाय कि ‘मानो-न मानो यह कोई पूर्व जन्मों का बड़ा भारी पाप ही भुगत रहा होगा।’ बापूजी की जैसे ही उस पर दृष्टि पड़ी कि उनका करुणा से भरा हृदय बरस पड़ा। गुरुवर ने गाड़ी रुकवायी।

 रसोइये से कहा ”लाओ, वह हलवा कहाँ है ?”
रसोइये ने डिब्बा दिया तो बोले ”जाओ,उस कुत्ते को हलवा खिलाकर आओ।” क्षणभर के लिए सेवक यह सोचकर ठिठक गया कि ‘गुरुदेव का नाश्ता तो अभी बाकी है और…’

उसके मनोभाव को भाँपकर पूज्य श्री उससे बोले : ”उस कुत्ते में भी तो मैं ही हूँ। इस समय उस शरीर में मुझे आहार की ज्यादा आवश्यकता है।”

 ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की कैसी गजब की अद्वैतनिष्ठा, सर्वात्मदृष्टि होती है। सभी प्राणी उन्हें निजस्वरूप ही प्रतीत होते हैं। ऐसे महाज्ञानी महापुरुषों के लिए गीता (५.१८) में भी आता है।

 विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
 शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
‘वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी ही होते हैं।’

शास्त्रों के ये वचन बापूजी के जीवन में प्रत्यक्ष हैं। कुत्ते को डंडा खिलाने वाले दुनिया में बहुत होते हैं। उसे रोटी का टुकड़ा डालने वाले लोग भी समाज
में हैं परंतु ऐसी अवस्था में पड़े कुत्ते या प्राणी के प्रति आत्मवत् प्रेम रखनेवाले आत्मनिष्ठ महापुरुष तो कभी-कभी, कहीं-कहीं और अत्यंत विरले होते हैं।  समाज के जो लोग उन्हें पहचान पाते हैं उनका महासौभाग्य है और जो उनका कुप्रचार, उनकी निंदा करते हैं उनका बड़ा दुर्भाग्य है !

 सेवक जब उस कुत्ते को हलवा खिलाकर आया तो बापूजी बोले ”अब मुझे तृप्ति हो गयी !”