ॐ ॐ ॐ सा विद्या या विमुक्तये ।

शास्त्र कहते हैं : ‘विद्या वही जो बंधनों से छुड़ा दे । जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से बंधा है, उसके पास सोने की लंका हो तो भी हर दशहरे को दे दीयासलाई… समझ गये ! वासनाओं के बंधन में जो बँधा है वह कितना भी धनवान, सत्तावान, सौंदर्यवान, बुद्धिमान दिखे पर आत्मज्ञान के बिना उसका सब कुछ तुच्छ है । संत तुलसीदासजी ने कहा :

काम क्रोध अरु लोभ मोह की,जबल मन में खान ।

तुलसी दोनों एक हैं, क्या मूरख अरु विद्वान ॥

समाज में आज के विद्वान, धनवान, सत्तावान, सौंदर्यवान देर-सवेर कैसी दुर्गति को प्राप्त हो जाते हैं ! कोई आत्महत्या करता है, कोई शराब पीकर, सट्टा, जुआ, जर्दा तम्बाकू, व्यसन में सुख ढूंढ़कर जीवन तुच्छ कर देता है । धनभागी तो वे हैं जिन्हें विद्यार्थी काल में सत्संग, सुमिरन और आत्मा-परमात्मा का ऊँचा ज्ञान और प्रभुप्राप्त महापुरुषों का सत्संग मिल जाता है !

धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः ।

धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरूभक्तत: ।।

उनकी माता धन्य है, उनके पिता धन्य हैं, उनका कुल-गोत्र धन्य है । हे पार्वती ! वे जहाँ रहते हैं वह भूमि भी धन्य है यह शिवजी के वचन वाला श्लोक पक्का कर लेना। प्यारे शिविरार्थी बच्चे-बच्चियाँ भाई-माई ! इरादा पक्का कर लो । ॐ ॐ आनंद… ॐ ॐ शांति.. ॐ ॐ प्रभुजी…ॐ ॐ गुरूजी…ॐ ॐ प्यारेजी… ॐ ॐ मेरेजी… इस प्रकार आत्मविद्या के सत्संग में, सुमिरन में, सुख में तुम सभी जल्दी आगे बढ़ो । फिर पदवियाँ शोभायमान होंगी, सत्ता शोभायमान होगी । अंतरात्मा के सौंदर्य ने कुरूप सुकरात को भी महान बना दिया । १२ वर्ष के कुरूप, काले कलूटे, टेढ़ी टाँगों एवं शरीर में आठ अंगों में वक्रता वाले अष्टावक्र मुनि को राजा जनक पूजते हैं और उनसे आत्मज्ञान, आत्मसुख पाकर धन्य होते हैं! तुम उसी विद्या को पा रहे हो, पचाते जाओ ! सत्संग की पुस्तकों में से और कैसेटों में से रोज अमृतपान करो !

तुम मरने वाला शरीर नहीं हो, दुखी और भयभीत होने वाला मन नहीं हो, राग-द्वेष में फँसने वाली बुद्धि नहीं हो; तुम तो परमात्मा, गुरु के अमृतमय आत्मा हो ।

ॐ अमृतोऽसिशाश्वतोऽसि चैतन्योऽसि ।

बापू के बच्चे, नहीं रहेंगे कच्चे ! आत्मविद्या पायेंगे, आत्मसुख पायेंगे, विश्वमानव को जगायेंगे । एक सौ आठ जो पाठ करेंगे, उनके सारे काज सरेंगे ।

हिम्मत, साहस, संयम, तत्परता, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम ! हरि ॐ, हरि ॐ हरि ॐ… (हास्य-प्रयोग) शांति… शांति… शांति ! गहरी शांति ! जीभ तालू में लगा दो । तुम मन में इन वचनों को सुरक्षित कर लो । जैसे मोबाइल में नम्बर ‘सेव’ होते हैं ऐसे यह आशीर्वचन का पत्र अपने दिल में सुरक्षित कर लो ।

इस बार शिविरार्थियों की संख्या पिछले साल से ११ गुनी है । अभी आऊँगा तो कितने गुनी होगी तुम ही जानो । कदम अपने आगे बढ़ाता चला जा ईश्वर की तरफ… !!

~ ऋषी प्रसाद नवम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 263